fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

अम्बेडकर का महिला दर्शन और महिला स्वाधीनता का सवाल

सीमा सोनी
किसी भी सामाजिक व्यवस्था की मानवतावादी स्थितियों का आकलन का एक आधार उस समाज में महिलाओं की एक मानव मात्र के रूप में जीने एवं रहने का सामाजिक परिवेश हो सकता है। आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में महिलाओं की आजादी के सवाल सभी चिंतकों के वैचारिक और सामाजिक आंदोलन के बुनियादी सरोकार रहे हैं। ऐसे ही प्रेरकों में से एक अम्बेडकर जैसे चिंतक रहे हैं।
भारतीय समाज की राजनीतिक स्वाधीनता के दौरान व उसके पश्चात् अम्बेडकर ने जिस यथार्थ को भोगा उसमें उन्होंने यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि भारतीय समाज जिन सामन्ती मूल्यों और गैर-बराबरी को पोषित करने वाले तंत्र का पक्ष पोषण करता है उसके चलते देश के बहुसंख्यक श्रमजन और महिलाओं को वास्तविक स्वाधीनता नहीं दिलाई जा सकती है। अम्बेडकर के सम्पूर्ण राजनीतिक और सामाजिक दर्शन का फलक बहुत ही व्यापक था। जिसका एक सूत्र महिलाओं की आजादी से आबद्ध था। अम्बेडकर यह भली-भाँति जानते थे कि इस देश में संविधान और जीवन, आदर्श और यथार्थ, सिद्धांत और व्यवहार के बीच एक बहुत बडी ‘रिक्तता’ है जिसके चलते सिद्धांत में यह समाज महिला को देवी बताता है किंतु व्यवहार में उसको तिरस्कृत करता है।
अम्बेडकर यह मानते थे कि ऐसे समाज में महज कानूनी समानता से महिलाओं को नागरिक अधिकार प्रदान नहीं किए जा सकते। इसलिए उन्होंने संविधान निर्माण के दौरान महिला जीवन को प्रभावित करने वाले तमाम कानूनों को बहुत ही सजगता के साथ केन्द्र में लाने के प्रयास किए।
एक समग्र अन्तर्दृष्टि रखने वाले अम्बेडकर ने यह समझ लिया था कि मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण, दमन एवं उत्पीडन करने वाली सामाजिक व्यवस्था के उन्मूलन के लिए जिस जन आंदोलन एवं जनजागृति की आवश्यकता है वह समाज की निर्माण इकाई महिलाओं की सत्रि*य सहभागिता के बिना नहीं हो सकती। समाज को मिलने वाली ऊर्जा का आधा हिस्सा महिलाएँ हैं। महिलाओं में वे सभी गुण क्षमताएं होती हैं जो पुरुषों में होती हैं। जो समाज महिला के योगदान को कम करके देखता है या उसे मात्र ‘अनुचरी’ की भूमिका में रखता है वह समाज एक बीमार समाज ही हो सकता है। भारतीय समाज में महिलाएं, विशेष रूप से दलित सबसे ज्यादा शोषण, उत्पीडन, तिरस्कार एवं पिछडेपन की शिकार रही हैं। वे अछूत जाति की होने के कारण, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के कारण एवं गरीब होने के कारण इस व्यवस्था का अमानवीय दंश झेलती हैं। इसलिए ‘नारी-दास्य’ स्थिति को खत्म करने हेतु उनके द्वारा आजीवन बहुआयामी एवं बहुस्तरीय प्रयास किये गये। आमतौर पर यही माना जाता है कि बाबा साहब अम्बेडकर समाज के दलित वर्ग के उद्धारक के रूप में सत्रि*य रहे। इसलिए उन्होंने दलित वर्ग की स्त्रियों के विषय में ही चिंतन किया है। किंतु उनके सम्पूर्ण लेखन, कार्य करने की दिशा, सामाजिक आर्थिक मुद्दों पर रही उनकी चिंतन दिशा दिखाती है कि वे एक ऐसा समाज बनाने की कोशिश करते रहे जिसमें किसी भी व्यक्ति को दलित जीवन न जीना पडे। अम्बेडकर की दृष्टि में वे सभी भारतीय स्त्रियां दलित श्रेणी में ही हैं, जो मनुवादी सामाजिक नियमों के कारण अपने अधिकारों से वंचित रहती हैं।
इस दिशा में ठोस कदम उठाते हुए उन्होंने 28 जुलाई 1928 को बम्बई विधान परिषद् में महिलाओं के लिए प्रसूति संबंधी एक विधेयक पेश किया। जिसका मुख्य आधार अन्य सुविधाओं के साथ ही महिला श्रमिकों के लिए वेतन समेत छुट्टियों का प्रावधान था। नवम्बर 1938 में बम्बई विधान परिषद् में पी. जे. रोहन द्वारा जनसंख्या नियंत्रक विधेयक के रूप में एक ऐतिहासिक विधेयक पारित करवाया। 1942-46 तक वायसराय की काउन्सिल में श्रम सदस्य के रूप में कई महत्त्वपूर्ण कानून और पुराने कानूनों में बदलाव किया। कार्यस्थलों पर पीने के पानी की व्यवस्था, कारखानों और खदानों में काम के घण्टे कम करने, स्त्री व पुरुष श्रमिकों के लिए समान वेतन का अधिकार, छोटे बच्चों के लिए पालनाघर, सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, स्वास्थ्य और जीवन बीमा जैसे निर्णायक प्रावधान किए गए। सामाजिक एवं राजनीतिक बराबरी हेतु संविधान में लिंगाधारित भेदभाव को खत्म करने के साथ-साथ महिलाओं के जीवन को गहन रूप से प्रभावित करने वाले विवाह, पुनर्विववाह, तलाक, उत्तराधिकारी, सम्पत्ति का अधिकार, प्रसूति अवकाश, बाल विवाह निषेध, दतक ग्रहण जैसे मानवीय अधिकार दिलाने हेतु अप्रेल 1947 में अम्बेडकर ने ‘हिन्दू कोड बिल’ का मसविदा तैयार किया जिसके माध्यम से उन्होंने महिलाओं को एक नया समाज एवं आत्मनिर्भर जीवन देने की पहल की।
‘‘हिन्दू कोड बिल के अनुसार बालिग नारी यदि अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी वर्ग एवं जाति के पुरुष के साथ विवाह कर लेती है तो उस विवाह को वैध माना जाएगा। विवाह में वर का वरण-चयन मनुवादी सामाजिक व्यवस्था में महिला पराधीनता को तोडने का एक महत्त्वपूर्ण आधार बना। पति के अमानुषी अत्याचार से बचने के लिए वह पति से संबंध विच्छेद की भी अधिकारी बन गई। तलाक का अधिकार उसकी सामाजिक गरिमा को प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक ऋांतिकारी कदम था। इसके द्वारा एक पत्नीत्व की प्रथा को भी कानूनी मान्यता मिल गई। सम्पत्ति संबंधी अधिकार बना कर पहली बार स्त्री को अपने पिता व पति की सम्पत्ति में हिस्सा लेने का हक दिलाया। ‘स्त्री’ को ही सम्पत्ति मानने वाले समाज में उसे एक नागरिक का दर्जा देते हुए ‘सम्पत्ति का अधिकार’ दे देना, महिला के जीवन में बराबरी की दिशा में एक निर्णायक प्रगतिशील कदम था जिसके प्रणेता अम्बेडकर थे। अब कानूनन महिला भी दत्तक ली जा सकती है। वह दत्तक पालक की सम्पत्ति पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त करने की अधिकारिणी बना दी गई। राजनैतिक बराबरी के अधिकार दिलाने हेतु अनुच्छेद 14 एवं 15 बनाए गए। ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के नियम द्वारा लिंग भिन्नता को खत्म किया गया। ‘हिन्दू कोड बिल’ द्वारा स्त्री की स्वतंत्रता, समानता एवं गरिमा की रक्षा करने वाले कानून बनाकर उसकी सदियों की दासता को तोडा गया हैं, जिसमें निर्णायक प्रयास युगद्रष्टा अम्बेडकर के ही रहे।
हिन्दू कोड बिल के जरीए उन्होंने संवैधानिक स्तर से महिला हितों की रक्षा का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। अम्बेडकर ने महिलाओं को मतदान का अधिकार प्रदान कर उनके राजनीतिक अधिकरों की रक्षा की। हिन्दू समाज के लिए कोई पर्सनल लॉ नहीं था। भारतीय हिंदू समाज में विवाह, उत्तराधिकार, दत्तक, निर्भरता या गुजारा आदि का नियम कानून एक समान नहीं था। ईसाई और पारसियों में एक समय में एक स्त्री से शादी का प्रावधान था। वहीं मुस्लिम समुदाय में चार शादियों को मान्यता प्राप्त है। लेकिन हिंदू समाज में पुरुष पर कोई सीमा नहीं थी। विधवा को मृत पति की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था। सवर्ण समाज में विधवा विवाह की परम्परा नहीं थी। इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर हिंदू कोड बिल तैयार किया गया, जिसका मकसद हिन्दू पर्सनल लॉ में सुधार करना और महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार व अन्य अधिकारों की गारंटी करना। आरएसएस हिन्दू कोड बिल विरोधी कमेटी का हिस्सा था। गोलवलकर ने घोषणा की कि-
‘‘महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिलने से पुरुषों के लिए ‘भारी मनोवैज्ञानिक संकट’ खडा हो जाएगा जो ‘मानसिक रोग व अवसाद’ का कारण बनेगा।’
मगर संसद में इस बिल का विरोध हुआ और सदन के सदस्यों का समर्थन नहीं मिल पा रहा था। ‘‘11 दिसंबर 1949 को आरएसएस ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली की, जिसमें एक के बाद एक वक्ता ने हिन्दू कोड बिल का विरोध किया। एक ने तो इसे ‘हिन्दू समाज पर एटम बम’ कहा..... अगले दिन आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने असेम्बली भवन पर जुलूस निकाला और ‘हिन्दूकोड बिल के मुर्दाबाद’ के नारे लगाए..... प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री और डॉ. अम्बेडकर के पुतले जलाये।’’ पर अम्बेडकर अडिग रहे। उनका कहना था कि ‘मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से अधिक दिलचस्पी हिंदू कोड बिल पास कराने में है।’ विधेयक को विखंडित करके लागू किए जाने के विरोध में अंबेडकर ने नेहरू मंत्रिमंडल से त्याग पत्र भी दे दिया था। परिणामतः सरकार को हिन्दू कोड बिल विधेयक पास करना पडा।
राजनीतिज्ञ के रूप में जहाँ अम्बेडकर महिलाओं को कानूनी बराबरी देने के लिए संघर्ष करते रहे वहीं समाज चिंतक के रूप में महिला को वैचारिक गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए भी सजग रहे। वे मानते थे कि वैचारिक स्वतंत्रता के अभाव में महिलाएं बराबरी के अधिकारों का उपयोग एवं प्रयोग नहीं कर पायेंगी। अंबेडकर की दृष्टि में हिन्दू समाज में महिलाओं की मानसिक दासता की जडें हमारे धर्मग्रंथों और उस पर निर्मित परम्पराओं में अन्तर्निहित है। ‘मनुस्मृति’ महिला को गुलाम के रूप में जीने का विधान गढती है। समाज व्यवस्था के नियामक मनु महिलाओं के लिए जिस आचारशास्त्र, विचारशास्त्र, मूल्यशास्त्र एवं कर्तव्यशास्त्र की शिक्षा देते हैं, उसमें महिला गुलाम, सम्पत्ति एवं दास ही हो सकती हैं, जहाँ इंसानी जीवन जीने की तमाम संभावनाएं सिरे से खारिज रहती हैं। इस संबंध में अम्बेडकर का लेख ‘हिन्दू नारी का उत्थान एवं पतन’, विभिन्न सार्वजनिक अवसरों पर मनुस्मृति पर दिए गये भाषण और उनके लेखन संग्रह (भाग-3) का ‘नारी और प्रतिऋांति’ महत्त्वपूर्ण दृष्टि प्रदान करते हैं।’
‘हिन्दू नारी का उत्थान एवं पतन’ में डॉ. अम्बेडकर का उद्देश्य यह उद्घाटित करना रहा है कि ‘मनुस्मृति’ ही भारतीय नारी विशेष रूप से दलित नारी, की पतित स्थिति के लिए उत्तरदायी है। उन्होंने मनुस्मृति की नारी विरोधी टीकाओं को उद्धृत करते हुए बताया है कि मनु शूद्रों के प्रति जितना अनुदार था, स्त्रियों के प्रति भी उसके विचार उतने ही अनुदार एवं अमानवीय थे। ‘नारी और प्रतिऋांति’ नामक लेख में अम्बेडकर ने विस्तार से मनुस्मृति के विभिन्न अध्यायों को उद्धृत करते हुए दर्शाया है कि ‘मनुस्मृति’ महिला को हर तरह की स्वतंत्रता एवं मानवीय अधिकारों से वंचित कर पुरुष एवं व्यवस्था की दासता में रखने का एक पूरा तंत्र विकसित करती है। इस संबंध में अंबेडकर ने अध्याय 2. 2, 13, 2. 14, 2. 2, 15, 9. 14, 2. 15, 9. 16, 9. 17 का उल्लेख किया है। उन्होंने अध्याय 9. 2, 9. 3, 9. 5, 5. 147, 5. 148, 5. 149 का उल्लेख करते हुए चिह्नित किया है कि किस प्रकार मनुस्मृति स्त्रियों को किसी भी रूप में बराबरी, स्वतंत्रता एवं सम्मान न मिले, इसका पूरा विधान निर्मित करती है। उदाहरण के लिए
‘‘बालया वा युवत्वा वा वृद्धया वापि याषिता।
न स्वातन्र्त्या कर्त्तव्यं किंचित्कार्य गृहेष्वपि।।
अर्थात् बालिका हो या युवती या वृद्धा, स्त्री को स्वतंत्रतापूर्वक घर का कोई काम नहीं करना चाहिए।’’
‘‘पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे युत्रा न स्त्री स्वातन्र्त्यतर्हति।।
अर्थात् स्त्रियों की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और बुढापे में पुत्र रक्षा करता है, स्त्री कभी स्वतंत्रता के योग्य नहीं।’’
‘‘अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रषिता गृहात्।
सा सधः संनिरोद्धव्या त्याज्या वा कुलसंन्निधौ।।
जो स्त्री स्वामी के दूसरा ब्याह करने पर रुष्ट होकर घर से भागे तो उसे पकड कर घर में बंद कर देना चाहिए या उसको उसके पिता के घर पहुंचा देना चाहिए।’’
अंबेडकर की दृष्टि में मनुस्मृति इसकी पूरी संहिता है कि महिला को किसी भी स्थिति में पति की प्रताडना से मुक्ति नहीं मिल सकती है। उसे विवाह विच्छेद का अधिकार नहीं है। अपने इसी लेख में अंबेडकर ने इस मिथक को भी तोडा है कि हिन्दू धर्म में विवाह एक संस्कार है, इसलिए उसमें विच्छेद की अनुमति नहीं दी जा सकती है। अंबेडकर ने स्पष्ट किया है कि मनु का विच्छेद नियम का उद्देश्य बिल्कुल भिन्न था। यह पुरुष को स्त्री से बाँध देने या उसमें बराबरी के वैवाहिक संबंध स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि यह स्त्री को पुरुष से बाँध देने और पुरुष को स्वतंत्र रखने की बात थी, क्योंकि मनु पुरुष को अपनी पत्नी को त्याग देने से नहीं रोकते हैं। वस्तुतः वे उसे अपनी पत्नी को छोड देने की ही अनुमति नहीं बल्कि उसे बेच देने की भी अनुमति देते हैं। इस संबंध में अध्याय 9.46 कहता है - बेचने और त्याग देने से कोई स्त्री अपने पति से मुक्त नहीं हो सकती।
अंबेडकर अध्याय 8. 416 को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि मनु महिला को समस्त प्रकार के सम्पत्ति संबंधी अधिकारों से वंचित करते हैं। मनु की संहिता में स्त्री दास के समान है। अध्याय 8.416 कहता है कि- पत्नी, पुत्री और दास इन तीनों के पास कोई सम्पत्ति नहीं वे जो सम्पत्ति अर्जित करें, वह उसकी होती है जिसकी वह पत्नी या पुत्री या दास है। अंबेडकर ने अध्याय 8. 299 के माध्यम से चिह्नित किया है कि किस प्रकार मनु स्त्री पर शारीरिक अत्याचारों की स्वीकृति देते हैं। मनु कहते हैं- स्त्री, पुत्र और सहोदर यदि अपराध करें तब रस्सी से या बाँस की छडी से मारना चाहिए। मनुस्मृति शिक्षा के अधिकार से शूद्र एवं स्त्री दोनों को ही वंचित करती है। इस संबंध में अध्याय 2. 66 एवं 9. 18 में मनु कहते हैं - स्त्रियों को पढने का अधिकार नहीं है इसलिए स्त्रियाँ वेद मंत्रों का पाठ नहीं कर सकती हैं। वे उसी प्रकार अपवित्र हैं जिस प्रकार असत्य अपवित्र होता है। अंबेडकर ने बहुत से उदाहरण देते हुए निष्कर्ष निकाला कि मनुस्मृति ने महिलाओं को मन, वचन एवं कर्म में पुरुषाश्रित एवं उसकी अनुचरी बनाया है। मनु की दृष्टि में महिला के जीवन का सांगोपांग लक्ष्य पति की आज्ञा का पालन करना है। ‘तुम उसके लिए अपना जीवन समर्पण कर दो और पति के न रहने पर तुम्हारे लिए उत्तम है कि तुम भी उसके साथ चिता में जल जाओं’, मनुस्मृति की स्त्री के प्रति दृष्टि का यह मूल चरित्र है। ऐसी मनुवादी सामाजिक आचारसंहिता में महिला को यह भूल जाना पडता है कि वह दूसरे इंसानों की तरह इंसान है। सदियों से त्रासदीपूर्ण जीवन जीने वाली दलित महिलाओं को मनुस्मृति जैसे धर्मशास्त्रों ने अनेक क्षेत्रों में अयोग्य बतलाकर मानवोचित अधिकारों से वंचित एवं तिरस्कृत किया है।
अंबेडकर की दृष्टि में मनुस्मृति ने महिला को जिस मानसिक दासता में जकडा है, उससे मुक्ति दिलाने में शिक्षा की अहम भूमिका है। अंबेडकर भली-भाँति समझ गये थे कि जब तक स्त्रियों का ध्यान शिक्षा की ओर नहीं जाएगा तब तक उनका उद्धार संभव नहीं है। वे स्त्रियों को शिक्षा के महत्त्व से परिचित कराते थे। अंबेडकर शिक्षा की सामाजिक रूपान्तरण की प्रत्रि*या में एवं इंसानी जीवन जीने में सक्षम बनाने में निर्णायक भूमिका को भलीभाँति जानते थे। शिक्षा के अभाव में महिलाएँ न केवल अपनी दासता के सामाजिक कारणों को जानने में असमर्थ रहेंगी अपितु उनको प्रदत्त सवैंधानिक नागरिक अधिकारों का समुचित लाभ लेने में भी अक्षम रहेगी और धार्मिक कर्मकाण्डों में जकडी रहेंगी। उनकी दृष्टि में महिलाओं में उत्पीडन को ही अपनी नियति समझने की सोच के पीछे अशिक्षा बहुत बडा कारण है। अंबेडकर ने कहा कि ज्ञान और विद्या केवल पुरुषों के लिए ही नहीं है। वह मानव मात्र के लिए भी आवश्यक है। ‘‘शिक्षा ही वह अस्त्र है जो महिला को धार्मिक कुरीतियों से मुक्त कर उनमें स्वाधीनता का जीवन जीने का बोध पैदा करेगी। अंबेडकर के सामने सावित्री बाई फूले की ओजस्विता एवं जुझारूपन का उदाहरण था। सावित्री बाई फूले ने शिक्षित होकर महिलाओं को शिक्षित करने का जो अभियान चलाया, सार्वजनिक मुद्दों एवं जीवन में भागीदारी निभाई, उससे अंबेडकर इस निष्कर्ष तक पहुँचे कि शिक्षा ही नारी की प्रगति का द्वार है। शिक्षित होकर ही स्त्री चिंतन, मनन एवं लेखन के माध्यम से अपने अधिकारों के लिए स्वयं उठ खडी होंगी किन्तु मनुवादी व्यवस्था में सामाजिक असमानता को प्राकृतिक स्थिति बना महिला शिक्षा के सभी द्वार बंद कर दिए गए हैं। इसलिए अंबेडकर ने सनातनियों के नारी संबंधी बंधनों को चुनौती देते हुए महिलाओं को शिक्षित करने का मिशन चलाया। 16 जून 1936 में बंबई के ही दामोदर हॉल में महिलाओं की सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि आज की कन्याएं ही भविष्य की माताएँ होंगी। जीवन को बदलने का वैचारिक आंदोलन शिक्षा के गर्भ से ही निकलता है। शिक्षित नारी ही न केवल मनुस्मृति जैसे उत्पीडन एवं प्रताडनाशास्त्र को खारिज करने का साहस रखेगी अपितु विभिन्न क्षेत्रों में सार्वजनिक पदों पर रहकर कार्य करने का अवसर भी प्राप्त करने में सक्षम होगी।’’
उन्होंने शिक्षा के साथ ही जीवन की उन बुनियादी बातों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया, जिन पर आमतौर पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। वे जहां भी, जो भी समझाते एकदम स्पष्ट शब्दों में, जिससे उनकी कही गई बातों को स्त्रियाँ सुगमता से समझ जाती और आत्मसात् करती। अंबेडकर के व्यक्तित्व व कृर्तत्व से प्रभावित होकर उनके सभी सामाजिक आन्दोलनों में दलित महिलाएँ भारी संख्या में शामिल रही। अंबेडकर ने महाड में चार्मकार समुदाय की स्त्रियों को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘साफ सुथरा जीवन व्यतीत करो। इसकी कभी चिंता मत करो कि तुम्हारे वस्त्र फटे-पुराने हैं। यह ध्यान रखो कि वे साफ हैं। तुम्हारे वस्त्र की स्वतंत्रता पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकता और न ही कोई तुम्हें जेवरात के चुनाव से रोक सकता है। अपने मन को स्वच्छ बनाने का ध्यान रखो और स्व-सहायता की भावना अपने में पैदा करो।’ इसी सभा में उन्होंने कहा था कि ‘तुम्हारे पति व पुत्र शराब पीते हैं तो उन्हें खाना मत दो। अपने बच्चों को स्कूल भेजो।’ अंबेडकर जिन दिनों जनजागरण अभियान के अन्तर्गत मध्यप्रदेश, मुंबई और मद्रास का दौरा कर रहे थे, उन दिनों उन्होंने मालाबार में दलित समुदाय की स्त्रियों को समझाया कि ‘तुम्हारे गाँव में ब्राह्मण चाहे कितना भी निर्धन क्यों न हो, अपने बच्चों को पढाता है। उसका लडका पढते-पढते कलेक्टर बन जाता है। तुम ऐसा क्यों नहीं करती? तुम अपने बच्चों को पढने क्यों नहीं भेजती? क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारे बच्चे सदा मृत पशुओं का माँस खाते रहें? दूसरों का जूठन बटोर कर चाटते रहें? नागपुर में ‘दलित वर्ग परिषद्’ की सभा में उपस्थित हजारों स्त्रियों को संबोधित करते हुए अंबेडकर ने कहा था कि ‘नारी जगत् की प्रगति जिस अनुपात में हुई होगी, उसी मानदंड से मैं उस समाज की प्रगति को आंकता हूँ।’ उन्होंने गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली स्त्रियों से आग्रह किया था कि ‘आप सफाई से रहना सीखो, सभी अनैतिक बुराइयों से बचो, हीन भावना को त्याग दो, शादी-विवाह की जल्दी मत करो और अधिक संतानें पैदा मत करो। पत्नी को चाहिए कि वह अपने पति के कार्य में एक मित्र, एक सहयोगी के रूप में दायित्व निभाए। लेकिन अगर पति गुलाम के रूप में बर्ताव करे तो उसका खुल कर विरोध करो, उसकी बुरी आदतों का खुल कर विरोध करना चाहिए और समानता का आग्रह करना चाहिए।’
अंबेडकर महिलाओं को लगातार यह समझाते रहे कि उन्हें अपनी ऊर्जा को व्रत, उपवास जैसे धार्मिक कर्मकांडों में खर्च नहीं करनी चाहिए बल्कि उन्हें सावित्री बाई फूले जैसे सत्रि*य सामाजिक व्यक्तित्व का अनुसरण करते हुए अपनी योग्यता व क्षमता को स्वयं के जीवन के उत्थान व उन्नयन में लगा देना चाहिए। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि समाज में उनकी हाशिये की स्थिति शाश्वत नहीं है। वह बदल सकती है जिसकी ताकत उनमें है। स्त्री-पुरुष की जिस समानता की कल्पना अंबेडकर ने की थी वह भी बहुसंख्यक परिवारों के जीवन का आज भी हिस्सा नहीं है। पुरुष की परिभाषा ज्ञाता, कर्ता, धर्ता और नियंता के रूप ??? की गई है तो महिला की परिभाषा भोग्या, काम्या, अनुचरी के रूप में की गई है। वे पुरुष हितवादियों से इन प्रश्नों के तार्किक उत्तर पूछते थे कि क्यों स्त्रियों को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित किया जाए? इस प्रश्न का सही उत्तर किसी के पास नहीं था।
हिन्दू समाज में ही नहीं, भारतीय समाज के सभी वर्गों की स्त्रियों की दशा सुधारने में अंबेडकर ने ध्यान दिया। वे मुस्लिम समाज में स्त्रियों की पिछडी दशा के प्रति भी चिंतित थे। उन्होंने मुस्लिम समाज में व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा - ‘बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किए जा सकते, जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम व इस्लामी देशों में समर्थन मिला है। हालांकि कुरान में वर्णित गुलाम के साथ उचित व मानवीय व्यवहार के बारे में पैगंबर के विचार प्रशंसा के योग्य हैं, लेकिन इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो।’ उन्होंने अपने लेखों में मुस्लिम समाज में परदा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं, जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आप को बहुत बदल लिया है। इसलिए भारतीय मुसलमान को भी अपनी स्त्रियों की दशा सुधारने के बारे में विचार करना चाहिए।
वे स्त्रियों के विकास में बाधा के लिए धर्म व जाति प्रथा को दोषी मानते थे। वे जानते थे कि इन बाधाओं को महज संवैधानिक ढंग से दूर नहीं किया जा सकता है। आधुनिक विज्ञान से प्रभावित एवं तार्किक सोच रखने वाले अंबेडकर का यह स्पष्ट मानना था कि हिन्दू धर्म जिस जीवनदृष्टि, मूल्यबोध और विश्वदृष्टि का निर्माण करता है वह मनुष्य को भाग्यवाद, परलोकवाद और पुरोहिताई में फँसाता है जिसके चलते व्यक्ति अपने जीवन में होने वाले तमाम तरह के कष्टों, दुःखों एवं पीडाओं के सामाजिक कारणों को नहीं देख पाता है और इसे प्रारब्ध का फल मान कर झेलने के लिए मजबूर हो जाता है। धर्म जिस यथास्थितिवाद का पोषण करता है जिसके चलते महिलाएँ अपने दमन, उत्पीडन के सामाजिक चरित्र को नहीं देख पाती हैं। इसलिए अंबेडकर ने बुद्ध के आत्मदीपो भव अर्थात् अपना प्रकाश स्वयं बनो, को अपनाने पर बल दिया और वे लगातार अपने भाषणों में इस बात पर जोर देते रहे कि हमें अपनी वैचारिक आजादी के लिए बुद्ध के इस पथ पर चलना चाहिए कि- किसी भी बात को इसलिए स्वीकार मत करो कि ‘संस्कृति कह रही है’, ‘धर्म कह रहा है’, ‘शास्त्र कह रहे हैं’, ‘पूर्वज कह रहे हैं’, ‘परम्पराएं कह रही हैं’ बल्कि उसको जांचो, परखो और यदि वह मानव जाति के लिए कल्याणकारी है तो उसे अपनाओ। अंबेडकर के अनुसार महिलाओं को जिस तरह से उनके सामाजिक जीवन से बेदखल कर महज परिवार चलाने, बच्चा जनने का साधन मात्र बना दिया है उससे आजादी केवल वैज्ञानिक सोच और उनके बौद्धिक विकास द्वारा ही मिल सकती है।
अंबेडकर की यह सोच वर्तमान समय में महिलाओं के जीवन में जिस तरह से धर्मसत्ता, पितृसत्ता, राजसत्ता और पूंजीसत्ता मिलकर उनकी आजादी के सवालों को पीछे धकेल रही है उसका पर्दाफाश करने और अपने संघर्ष की दिशा को सही दिशा देने में पथप्रदर्शक का कार्य करेगी।