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अज्ञेय के काव्य में प्रेम की अवधारणा

श्रीप्रकाश मिश्र
मलयज कहते हैं कि अपने कवि-व्यक्तित्व में अज्ञेय तीन व्यक्ति हैं। ये तीनों आपस में एक-दूसरे को काटते नहीं हैं, एक-दूसरे को संपूरित करते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी इन्हें अज्ञेय की कविता के विकास के तीन चरण मानते है ः पहला चरण रूमानियत का, दूसरा चरण उनके विरोध का, तीसरा चरण अहम् के विलयन और उसके आत्मदान का। चूँकि रामस्वरूप चतुर्वेदी का इरादा अज्ञेय को आधुनिकता के बोध का और उसी तक सीमित रहने का कवि सिद्ध करने का है, जिसमें प्रथम चरण बाधा की तरह लगता है, इसलिए वे उसे नकारते हैं, एक भटकन मानते हैं, अमहत्त्वपूर्ण मानते हैं। लेकिन यदि आधुनिकता को उनके काव्य का केन्द्रीय बिन्दु मानें तो स्पष्ट लगता है कि वह भी एक महत्त्वपूर्ण नहीं, तो कम से कम एक अनिवार्य चरण उनकी रचना का है। तीनों ही चरणों का सम्बन्ध एक केन्द्रीय प्रश्न से है- मानवीय जीवन में व्याप्त अलगाव का समाधान। अलगाव का सवाल प्रमुखता से माक्र्स ने उठाया था, उसे ईश्वर से, प्रकृति से, परस्पर व्यक्तियों के बीच और स्वयं अपने से। लेकिन यही अस्तित्ववाद का भी केन्द्रीय प्रश्न रहा है। तीनों में अंतर यह है कि जहाँ माक्र्स अलगाव को द्वन्द्वात्मक ढंग से देखता है और उससे मुक्ति आर्थिक सम्बन्धों के बदलाव में देखता है, अस्तित्ववादी उसे समेकित ढंग से देखते हैं और मुक्ति को भी समेकन में ही पाते हैं। अपनी रचनाओं में अज्ञेय अंततः अलगाव का निस्तार समूची सृष्टि की लयबद्धता में महसूस करते हैं। वही उनके काव्य की मूल प्रेरणा है। इस लक्ष्य को पाने के साधन के रूप में वे पहले दौर की कविताओं में प्रेम को अपनाते हैं। अब प्रेम दो प्रकार का होता है। एक वह, जिसमें एक दूसरे पर, यानी इच्छित व्यक्ति पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लेना चाहता है। उसे जब पूरी तरह से आत्मगत कर लेता है, तभी उसके प्रेम की पूर्ति होती है। दूसरा प्रेम वह होता है, जिसमें इच्छित व्यक्ति को अंततः छोड देने की, मुक्त कर देने की बात होती है। विचारकों का कहना है कि यह छोड देना, मुक्त कर देना अंततः अनुपलब्धि का द्योतक है; यह निर्विकार मन से नहीं हो सकता। प्रेम अंततः लैंगिक होता है, दोनों में सम्बन्ध बनना ही उसका अभीष्ट होता है। यदि ऐसा नहीं हो पाता तो वह पराजय है। इस प्रेम का आधार कामवेग होता है, जो एक लम्बे विकास से उत्पन्न परिपक्वता की देन होता है। ऐसा फ्रायड और सार्त्र दोनों ही मानते हैं। यही सारे मानवीय सम्बन्धों के तल में है। अस्तित्व अकेले का नहीं होता। उसके लिए एक पर भी आवश्यकता होती है- यह बात इसे ही इंगित करती है। किन्तु इसकी परिणति एंद्रिक संतृप्ति ही नहीं, उस पर भी, उस अन्य की आत्मवत्ता पर अधिकार पाने की होती है। सार्त्र ने अपनी पुस्तक ‘बीइंग एंड नथिंगनेस’ में लिखा है, अन्य की आत्मवत्ता हमारे अनुभव का अंग सिर्फ दो तरीकों से बन पाती है- या तो हम अपने स्वयं को उसका विषय मानें या फिर उसे ही अपने विषय के रूप में देखें। किन्तु दोनों ही स्थितियों में विषयी के रूप में मैं विषयी के रूप में अन्य को नहीं जान सकता। अन्य की आत्मवत्ता पर हम अधिकार इसलिए चाहते हैं कि स्वयं को हम अन्य का विषय बन जाने से बचाना चाहते हैं। प्रेमी और प्रिय दोनों का ही ऐसी आवश्यकता से परिचालित होना प्रेम की अनस्थिरता और उसकी अंतिम असफलता के पीछे कारण के रूप में होता है।
अज्ञेय के पहले दौर की कविताएँ रूमानी हैं। उनकी लैंगिकता जग-जाहिर है। उनमें प्रेम और स्वतंत्रता का विमर्श सर्वत्र है। उसका स्वरूप कुछ इस प्रकार है-
हम एक दूसरे के आखेट हैं और अनिवार्य
अटल मनोनियोग से एक-दूसरे का पीछ कर रहे हैं
(चिंता)
आगे हम इस आखेट की तृप्ति के बाद अप्राप्ति की पीडा में डूब जाना भी पाते हैंः -
‘‘इतने काल से मैं जीवन की उस मधुरपूर्ति
की खोज कर रहा हूँ-
जीवन का सौन्दर्य, कविता, प्रेम......
और अब मैंने उसे पा लिया है।
यह एक मृदुल, मधुर, स्निग्ध शीतलता
की तरह मुझमें व्याप्त हो गई है
किन्तु इस व्यापक शांतिपूर्ण एकरूपता में
मुझे उस वस्तु की कमी का अनुभव हो रहा है
जिसने मेरी खोज को दिव्य बना दिया था-
एक ही वस्तु- अप्राप्ति की पीडा’’
ऐसा ‘इतल्यम्’ की कविताओं में भी है। एक ही उदाहरण काफी होगा-
श्वास की हैं दो क्रियाएँ- खींचना, फिर छोड देना,
कब भला संभव हमें इस अनुक्रम को तोड देना?
श्वास की उस संधि-सा है इस जगत् में प्यार का पल-
रुक सकेगा कौन कब तक बीच पथ में डाल डेरा।
इसकी मीमांसा हम सार्त्र के दर्शन में पाते हैं। वे मानते हैं कि प्रेम में पूर्ण पारस्परिकता अस्थाई ही नहीं अल्पजीवी भी होती है। ‘जो अन्य है वह सिद्धांततः मेरी पहुँच से बाहर है। जब मैं उस तक पहुँचना चाहता हूँ, वह मुझसे भागता है, और जब मैं उससे अलग हटना चाहता हूँ तो वह मेरा पीछा करता है और मुझे पाना चाहता है।’ यही प्रेम और वैयत्रि*क स्वाधीनता का द्वन्द्व है जो अज्ञेय में देर तक चलता रहता है। जैसे ही वह उसे अपने अधीन कर लेता है, वेसे ही उसका आकर्षण समाप्त हो जाता है, क्योंकि आकर्षण का कारण ही वह स्वाधीनता है, प्रेम की पूर्ति के साथ जिसके समाप्त हो जाने का खतरा है।
जाहिर है कि यहाँ अलगाव का विरोध आत्मसादीकारण से होता है। तब यह अपने आप में एक विरोधाभास पैदा करती है। जब अस्तित्व के लिए एक से अधिक कविता (ड्ढद्गद्बठ्ठद्द) की जरूरत पडती है, तब एक का दूसरे में आत्मसाद हो जाने पर न तो प्रेम का मतलब रह जाता है, न ही स्वतंत्रता का, और न ही अस्तित्व का, जबकि जग-जाहिर है कि जगत् में उपस्थिति सर्वत्र एक से अधिक यानी एक और अन्य की बनी हुई है। यानी यह समाधान ही गलत है। इसलिए अज्ञेय अपने दूसरे दौर की कविताओं में इस रूमानियत का विरोध करते हैं। दूसरे दौर के संग्रह हैं- ‘हरी घास पर क्षणभर’, ‘बावरी अहेरी’ और ‘इन्द्रधनुष रौंदे हुए थे’। इनमें उन्हें लगता है कि प्रेम अलगाव में भी बना रह सकता है, यदि उसमें एक निःसंगता को साध लिया जाय, बिना इस बात से खिन्न हुए कि मिलन-यात्रा का पडाव आ पहुँचा है। लिखते हैं -
राह बदलती ही नहीं- प्यार ही सदृसा मर जाता है,
संगी बुरे नहीं तुम- यदि निःसंग हमारा नाता है।
स्वयंसिद्ध है बिछी हुई यह जीवन की हरियाली-
जब तक हम मत बुझें सोचकर- वह पडाव आता है।
जाहिर है कि यहाँ पहले दौर की कविताओं की संपूर्ण एकत्व पाने की कामना नहीं है। प्रेम को सिद्धि इसी बात से मिल जाती है कि प्यार की स्मृतियों को क्षण भर जी लिया गया। यहाँ अन्य की स्वाधीनता के प्रति सम्मान एक आवश्यक शर्त बनकर उभरता है, प्रेम के बने रहने के लिए। यह भी दिखता है कि यहाँ वासना का उद्रेक नहीं है। यह प्रेम के उदात्त रूप का प्रस्तोता है। किन्तु जब इस उदात्तता का कारण क्या होता है- उसे हम आरम्भ में ही नोट कर आये हैं। यह ‘भागते भूत की लंगोटी ही भली’ जैसी बात है। यही नहीं, यह एक को छोड कर, एक की जगह कइयों से प्रेम की वकालात करता है। और उस प्रेम में है क्या? पहले ही प्रेम का दुहराव। सहारा हैं, स्मृतियाँ। प्रिय पात्र के बदल जाने पर भी यह पहला प्यार ही है जो अपनी प्रधानता बनाए हुए है। यह एक अपराधबोध की ओर ले जाता है-
तुम न मुझे कोसो, लज्जा से मेरा मस्तक झुका हुआ है
उर में वह अपराध व्यक्त है ओठों पर जो रुका हुआ है
आज तुम्हारे सम्मुख जो उपहार रूप रखने आया हूँ
वह मेरा मन-फूल दूसरी वेदी पर चढ चुका हुआ है।
यह प्रेम टिकता भी नहीं- उसका प्रेम पात्र ही नहीं टिकता ः
यह मुकुर दिया था तूने
आज वह मुझसे टूट गया
......................
मोह दूसरा पात्र प्यार का रचने का
उस दिन क्या तुझसे छूटेगा ?
(अरी ओ करूणा प्रभामय)

स्पष्ट है कि इस दूसरे दौर की कविताओं में रूमान के विरोध के बावजूद अलगाव की समस्या दूर नहीं होती हैं। एक तो वह अलगाव को पहले ही स्वीकार कर लेता है, ऊपर से वर्चस्व की आत्मसादीकरण की भावना के पूरा न हो जाने पर विसूरता भी रहता है। यह एक मृंगतृष्णा की ओर ले जाता है। ऊपर उद्धरित कविता यही द्योतित करती है।
इसी पृष्ठभूमि में आरंभ होता है उनकी कविताओं का तीसरा दौर- मेरा मतलब है ‘कितनी नावों में कितनी बार’, ‘क्योंकि मैं उसे जानता हूँ’, ‘सागर मुद्रा’ और ‘पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ।’ इनमें अज्ञेय पीछे की तरफ लौटते हैं। किन्तु जो रास्ता चलकर छोडा जा चुका है, उस पर पूरी तरह से लौटकर हू-ब-हू वैसे ही चला नहीं जा सकता। यह अजीब व्यामोह पैरा करता है। अज्ञेय पहले दौर की रूमानियत, जो अंततः अन्वेषण है, और दूसरे दौर का रूमानियत विरोध, जो बाह्य की लताश है, दोनों के बीच खडे होते हैं। तो क्या यह व्यक्ति और सामाजिकता का समेकन है? क्या यह प्रेम और स्वतंत्रता के बीच नये तरह का सामंजस्य बिठाने का प्रयास है? क्या वे इसमें सफल होते हैं?
मलयज कहते हैं कि अज्ञेय ‘दोनों राहों का अन्वेषण करने के बाद दोनों के संधि-स्थल पर एक अनिश्चितता के साथ खडे होते हैं। यहाँ अन्दर भी नहीं लौटा जाता बाहर भी मुक्ति असंभव दिखती है।’ ऊपर से अकेलापन आच्छादित कर लेता है। यहाँ दो बातें हैं- एक तो यह कि इस अकेलेपन तद्जन्य उदासी से निकलने के लिए कोई अन्य चाहिए, फिर वही पुराना प्यार चाहिए, उसकी विसंगति हम ऊपर देख आये हैं। ऊपर से जब कोई प्रेम पात्र भी नहीं दिखता। इसलिए कवि एक विराट् से मिलने का संकल्प लेकर चलता है-
नील आकाश के तैरते से मेघ के टुकडे
खुली घासों में दौडती मेघ छायाएँ,
पहाडी नदी ः पारदर्शी पानी,
घूपा धुले तल के रंगारंग पत्थर
सब देख बहुत गहरे कहीं जो उठे....
(कितनी नावों में कितनी बार)
लेकिन यह विराटत्व उसका कालातीत सागर कवि को कालबिद्ध नियति से छुटकारा नहीं दिला पाता। कवि किनारे ही छूट जाता है। ऐसा न हो, उसके लिए सागर से प्रार्थना करने के बावजूद छूटा रह जाता है। सागर मुद्रा-८ एक ऐसी ही कविता है। अस्तित्व की समस्या जस की तस है। विराट् और नियति के होने पर समस्या के जस तस बना रहना ही स्वाभाविक है। हद से हद यह व्यक्ति और प्रकृति या कहें ईश्वर से सम्बन्ध पर ही प्रकाश डाल सकती है। अन्य के साथ और स्वयं निज के साथ सम्बन्ध पर नहीं।
दूसरी बात यह है कि यह अकेलापन स्वयं का रचा हुआ है। कितनी नाव में ‘कितनी बार’ संकलन की एक कविता का अंश है-
मन बहुत सोचता है कि उदास न हो
पर उदासी के बिना रहा कैसे जाये?
शहर से दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले
पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव
सहा कैसे जाये?
इस अकेलेपन के रचाव में प्रेम तो चूक ही गया है, स्मृतियाँ भी विलुप्त हो गई हैं। यदि वे कौंध भी जायं तो मीठे दर्द की जगह झुंझलाहट पैदा करती हैं-
धडकन-धडकन-धडकन
दाईं, बाईं, कौन आँख की फडकन
मीठी कडवी तीखी सीठी
कसक-किरकिरी किन यादों की रडकन?
उहं में कुछ नहीं, नशे के झोंके से
स्मृति के शीशे की तडकन?
ये तमाम बातें अज्ञेय को प्रेमी या प्रेमानुभूति से सिक्त नायक की जगह प्रेम का दार्शनिक, कहिए प्रेम का चिंतक बना देती हैं। तब हम उनके प्रेम चिंतन से क्या पाते हैं? एक तो यह कि पुरुष और स्त्री के प्रेम में अंतन होता है। स्त्री का प्रेम प्रेम न होकर एक तरह की करुणा होता है। लेकिन पुरुष का प्रेम प्रेम ही होता है। इसलिए वह करुणा को स्वीकार नहीं करना चाहता, भले ही उसकी तलाश में, उसकी आग में उसे धधककर जल मरना पडे। उसकी वेदना क्षणिक ही सही काम्य है। करूणा में यह एक लम्बी नशीली धुंध है। वह अधिक सुखद और नशीली होने के बावजूद वरेण्य नहीं है। ‘रात चौंध’ कविता इसी का द्योतक है। इस पर टिप्पणी करते हुए प्रणयकृष्ण कहते हैं- ‘निर्वैयक्तिक करुणा और निर्वैयक्तिक प्रेम तो लगभग एक जैसे भाव हैं, लेकिन व्यक्ति के दाखिल होते ही ये भाव एक दूसरे के शत्रु हो जाता हैं। प्रेम और करुणा में एक को दूसरे पर प्राथमिकता देना जरूरी हो जाता है और कवि यहाँ प्रेम का पक्ष लेता है। जब तक क्षमा धरा से अंकुरित हो रही थी, या करुणा व्योम से झर रही थी (दीप पत्थर का और धरा-व्योम जैसी कविताएँ द्रष्टव्य हैं) तब तक तो ग्राह्य थी, लेकिन जैसे ही एक हाड-मांस की स्त्री के हृदय से करुणा निकली वह तिरस्करणीय हो उठी।
अस्तित्ववाद और अलगाव के संदर्भ में यहाँ दो बातें हैं। एक तो यह कि निर्वैयक्तिकता से अलग संसार में तमाम समस्याएँ उठती ही नहीं और जो इस अलग संसार का अकेला वासी है उसे लगता है कि समस्या हल हो गई। लेकिन ऐसी दुनिया में कोई कितने दिन रह सकता है? दूसरी बात यह है कि प्रेम व्यक्ति के मर जाने के बाद भी रह जाता है, जैसे कि यह संसार। व्यक्ति बेकार ही प्रेम को अपनी निजी संपत्ति मानकर उसे अपनी नश्वरता से जोडकर देखता है। जब मालूम है कि यह निरन्तर परिवर्तनशील जगत् इस एक व्यक्ति के न रहने के बावजूद भी बना रहेगा, तब प्रेम को ही वैयक्तिक क्यों माना जाय?
जाहिर है कि ये कविताएँ अज्ञेय को रहस्यवाद के प्रत्याख्यान में ले जाती हैं। वे रूमानियत के जिस रहस्य को दूसरे दौर की कविताओं में छोड आये थे, उसे वे नये सिरे से दाखिल कराते हैं। प्रेम यहाँ एक मानसिक संरचना बन कर रह जाता है। चूंकि वह दाखिला हू-ब-हू पहले जैसा नहीं हो सकता, इसलिए यह रहस्यवाद भी नया हो उठता है। यह रहस्यवाद पुराने रहस्यवाद की ‘आत्मा’ को आत्म में बदल देता है। यह आत्म ही अस्तित्व है, जो आधुनिकता का लक्षण है, जबकि हिन्दी कविता में ‘आत्म’ छायावाद का लक्षण है।
कहना न होगा कि छायावाद के दौर में हिन्दी कविता में रहस्यवाद दो तरह का मिलता है। एक तो पश्चिम का रहस्यवाद, जो बरास्ते अंग्रेजी के कवियों के हमारे बीच आया। रवीन्द्र नाथ ठाकुर में कबीर का परिश्रम मिला, जो सूफीवाद की देन था। सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा ने उसे शिद्दत से स्वीकार किया। एक तरफ प्रकृति पर जोर और दूसरी तरफ ‘कौन’, ‘मौन’, ‘उस पार’ जैसी शब्दावली उसी का द्योतक था। एक दूसरा रहस्यवाद देशी था और बहुत कुछ शैव, बौद्ध और तंत्र से अनुप्रेरित था। उसमें पुरुष और प्रकृति का, कल्याण और शक्ति का द्वैत चाहे जितना हो, आत्मा और परमात्मा में एकत्व विभिन्न स्तरों पर लखा जाता था। इसकी तरफ जयशंकर प्रसाद ने अपने लेख और परशुराम चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक में प्रतिपादित किया है। विजयदेव नारायण साही ने अज्ञेय का संबंध जयशंकर प्रसाद से जोडा है। उनका मानना है कि अज्ञेय अपने पहले दौर की कविताओं में प्रसाद से जुडते हैं। प्रसाद में जो मनु है वह अज्ञेय में शेखर है। जिस वक्त शेखर की रचना हो रही थी उसी वक्त भग्नदूत, चिन्ता और इतल्यम् की अधिकांश कविताएं रची जा रही थीं।
लेकिन मैं एक दूसरी बात कहना चाह रहा हूँ। वह यह कि पश्चिम में आधुनिकतावाद रोमांटिसिज्म के बरक्स विकसित हुई थी। अज्ञेय अपने पहले दौर में चाहे जितना भी रोमांटिक रहे हों आगे के दौर में उत्तरोत्तर आधुनिक होते गये और इस आधुनिकता के बीज उसी पहले दौर में थे। इसलिए वे उस तरह से रहस्यवाद को छोडते गये। तीसरे दौर में जब वे पुनः रूमानियत की ओर लौटे और रहस्यवाद उसका अंतर्मुतत्त्व बना तो उसका स्वरूप वही नहीं रह गया। वह नवरहस्यवाद कहलाया। वह लौकिक होकर आया। नित्से जैसे दार्शनिकों से लेकर जर्मनी के अस्तित्ववादियों ने उसकी खूब चर्चा की थी जहाँ ‘आत्मा क्रमशः’ आत्म का रूप लेता गया था। उसी के प्रभाव में उर्दू-फारसी के कवि मोहम्मद इकबाल ने खुदी (इगो- अहम्-आत्म) को इतना महत्त्व दिया। शमशेर ने इकबाल की प्रशंसा चाहे जितनी की हो काव्य-थीम के रूप में उनकी स्थापना को ग्रहण नहीं कर पाये। वह काम अज्ञेय ने किया। वे अपने समय के अन्य देशी-विदेशी वातावरण से भी खूब हुए। विज्ञान में आइंस्टाइन ले लेकर डेविड वीह्य ने मानवीय अलगाव और उससे विस्फारित समस्याओं का समाधान एक नये रहस्य में टटोला था। कायरा ने क्वाण्टम भौतिकी और प्राच्य रहस्यवाद में समानता खोज निकाला था। नाभिक के धनावेश और इलेक्ट्रान के ऋणावेश के बीच सम्बन्ध द्वंद्वात्मक और अनुपूरक दोनों एक साथ माना था। अनुवांशिकी और मौलिक्यूलर बायलोजी में भी द्वन्द्वपरक वस्तुओं की पारस्परिक अनुपूरकता निरूपित होती जा रही थी। ताओ आफ फिजिक्स की चर्चा भी तभी चली थी जो जगत् को एक विराट् संतुलन की ओर बढता पा रहा था। दार्शनिकों में जे.कृष्णामूर्ति ने अंग्रेजी के शब्द *द्यश्ाठ्ठद्ग को तोडकर *द्यद्यश्ाठ्ठद्ग में रख स्पष्ट किया था कि हम जब अकेले होते हैं, तभी सबके साथ होते हैं। इसका उलट यह भी सही है कि हम जब सबके साथ होते हैं तभी अकेले होते हैं। यही अस्तित्व होता है। तभी हम, जैसा कि इकबाल कहते हैं, उसने अहम् को इतना महत्त्वपूर्ण बना देते हैं कि ईश्वर को भी हमारी रजा पूछनी पडती है। या कि जैसा कबीर कहते हैं, ‘पीछे-पीछे हरि चले’ कहत कबीर-कबीर। इसी तरह की बात साहित्य में टी.एस.इलियट और उसके साथी करते हैं। रचना से कवि के व्यक्तित्व का अलगाव, भोक्ता और रचयिता के बीच का फौक और उसके उत्पन्न निर्वैयाक्तिकता उसी की देन है। गौर करने की बात यह है कि ये सभी वैज्ञानिक, विचारक और कवि बौद्ध मत के जेन पक्ष से प्रभावित हैं। अज्ञेय पर यह प्रभाव और भी स्पष्ट है जब वे ‘असाध्य वीणा’ जैसी लम्बी कविता में तथता की बात करते हैं। ‘तथता’ बताती है कि जगत के सभी पदार्थों, वस्तुओं और फटकों में एक तरफ द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध होता है, तो दूसरी तरफ वे एक-दूसरे को अनुप्रेरित भी करते हैं। और यह अनुपूरण एक विराट् संतुलन के लिए है। यह संतुलन गतिशील है। इसका प्रतिदर्श नटराज की मूर्ति है, जिसकी मुद्रा को कायरा, कृष्णामूर्ति और आनन्द कुमारस्वामी उसी तरह से आचक्षु करते हैं, जिस तरह से अज्ञेय।
सवाल उठता है कि जे. कृष्णामूर्ति द्वारा रचित *द्यद्य श्ाठ्ठद्ग का *द्यश्ाठ्ठद्ग और तद्रूप अज्ञेय का अकेलापन क्या काबिले बरदास्त है? नहीं है। इसलिए उनकी कविता में एक अन्य की तलाश निरन्तर जारी रहती है। किन्तु यह सिर्फ तलाश है। इसमें एक तरफ अस्मिता का विलयन नहीं हो पाता, तो दूसरी ओर प्रेम भी छूट जाता है। यह प्रेम जिसमें वह उस आदिम एकत्व को न पाकर भी उसकी अभिपृष्टि तो पा जाता था। यह स्वयं प्रेम के पूरे व्यापार में अभिशप्त की तरह छुपी पराजय का बोध है। यही अज्ञेय को मृत्युबोध की ओर ले जाता है, जो अस्तित्ववादी चिंतन की एक बडी परिणति है। लेकिन अलगाव की समस्या उससे भी दूर नहीं हो पाती। इस पर विस्तार से फिर कभी।