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‘मंगल प्रभात’ की प्रतीक्षा है !

गिरीश्वर मिश्र
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का स्मरण हमको सहज और व्यापक मानवीय भाव से ओतप्रोत कर जाता है और मानवता की राह की पहचान करा जाता है। पर इस उपऋम में जो सबसे बडी उपलब्धि होती है वह यह कि हम आचरण के एक नए धरातल से रूबरू होते हैं। इसका प्रमुख आधार यह है कि गाँधी जी हमेशा कर्म की भाषा में बात करते नजर आते हैं। शायद यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि कर्म ही उनकी भाषा है। इस अनोखी कर्मनिष्ठता की पराकाष्ठा तब होती है जब वह यह कहते हैं कि ‘मेरा जीवन एक खुली किताब है’, यानी उन्होंने जो भी जिया, जैसे भी जिया वही उनका संदेश है, सब कुछ यथावत् और पारदर्शी जीवित मनुष्यता की यात्रा के संघर्ष और उत्कर्ष की दास्तान! उनकी आत्मकथा इसकी गवाह है। ‘सत्य के प्रयोग’ की वह रपट ऐसी है जिसमें उनकी जिंदगी का पूरा अक्स उभर आता है, सीधा, सच्चा अनाविल-सत्य के अन्वेषी से यही अपेक्षित भी है।

वह स्वयं किसी भी वाद (गाँधीवाद!) के सख्त खिलाफ थे। ऐसे महापुरुष को कई तरह से याद करने की कोशिशें की गईं जो कृतज्ञ राष्ट्र के लिए स्वाभाविक था। पर इसका एक दुखद पक्ष यह रहा कि इस पावन अवसर पर भी उनको ले कर राजनीतिक रस्साकशी करने से लोग बा*ा नहीं आए। गाँधीजी किसके हैं? और कौन उनका असली उत्तराधिकारी होने का हकदार है? ऐसे सवाल उठाए गए और इन्हें लेकर तूंतूं-मैंमैं शुरू हो गई। एक दूसरे से बढ-चढ कर नोंक-झोंक और बेहद कृत्रिम लगने वाले दिखावे शुरू हो गए। यह घटनाक्रम राजनीति के किरदारों के निजी स्वार्थमय हठधर्मी दृष्टिकोण को ही व्यक्त करता है। इन सबके बीच गाँधी जी दूर तलक नहीं नजर आते। हमें यह याद रखना चाहिए कि बापू का नाम अपनाना और फिर उसे अपने फायदे के लिए भुनाना किसी भी तरह देश के व्यापक समाज को स्वीकार्य नहीं होगा और न देश के हित में होगा। कर्म में विश्वास और भरोसा रखने वाले बापू किसके नहीं थे? वे तो सबके ही थे, पूरे देश के थे। काश! हमारे आज के राजनेता इस महान कर्मवीर राष्ट्रनायक से कुछ सीख लेते और बेतुकी और अनावश्यक बहसबा*ाी छोड कर बापू के विचारों और उनके रचनात्मक कार्यक्रमों पर गौर फर्माते। क्या ही अच्छा होता कि राजनीतिक दल गाँधी जी के किसी कार्यक्रम को सही मायने में अपनाने का संकल्प ले कर उन पर आगे बढते- सामाजिक न्याय और समावेशी विकास का तकाजा है कि स्कूलों, कार्यालयों, उद्योगों और सभी संस्थाओं को अपनी पहुँच के भीतर गाँधी जी के विचारों पर अमल करने की कोशिश की जाय।

स्मरणीय है कि बापू के सामने पूरा भारत रहता था। जब भी वह भारत की बात करते थे उनकी नजर के आगे भारत के गाँव, यहाँ की बहुसंख्यक गरीब जनता, यहाँ की कुशिक्षा और अशिक्षा और यहाँ पर व्याप्त सामाजिक कुरीतियां रहती थीं जिनकी समस्याओं के समाधान के लिए वे जी जान से जुटे रहते थे। उनकी राजनीति सिर्फ सत्ता हथियाने के लिए नहीं थी। उसका प्रथम और अंतिम उद्देश्य जन कल्याण था। इसके लिए वे सहयोग, प्रेम और आपसी समझदारी का उपयोग करने पर बल देते थे। उनका अटल विश्वास था कि स्थानीय उपायों के सहारे समाधान ढूँढे जा सकते हैं। यह सुखद है कि देश ने उनके साथ जुडने की इच्छा जाहिर की है। स्वच्छता को राष्ट्रीय स्तर पर नीति के रूप में लागू करने के लिए सरकार की कटिबद्धता के कुछ अच्छे परिणाम भी सामने आए हैं। आज सभी को पर्यावरण की चिन्ता सता रही है और यह देख सुन कर कुछ सन्तोष भी हो रहा है कि समाज के हर वर्ग के लोगों में एक नई चेतना जग रही है। दरअस्ल गाँधी जी के सीधे, सरल और मानवीय संवेदनाओं से भरे काम बिना किसी ताम-झाम के सहज ही आकर्षित कर लेते हैं, पर उनको अपनाकर चलना मुश्किल होता है।

अप्रत्याशित और एक हद तक विचित्र तथा अकल्पनीय से लगने वाले बापू का जीवन मानवता की गरिमा को बनाये रखने के लिए समर्पित था और जरूरी है उनके विचार और काम हमारे दिलो-दिमाग से ओझल न हों। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के स्वभाव की एक बडी विशेषता सहज आग्रह के साथ प्रभावी सम्प्रेषण है। वह जिस विचार को परख कर अपनाते थे उसे कम से कम शब्दों में और सीधे सादे ढंग से श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते थे। साथ ही बडे धैर्य के साथ सभी स्थितियों में संवाद बनाए रखने के लिए सदैव यत्न करते रहते थे। इस क्रम में एक उल्लेखनीय घटना वर्ष 1930 में यरवदा जेल में रहने के दौरान हुई जब गाँधी जी ने साबरमती आश्रम के रहवासियों के लिए हर मंगलवार को एक पत्र प्रवचन लिखने का काम शुरू किया। ऐसे कुल दस विषयों पर अत्यंत सरल गुजराती में उनके प्रवचन एक पुस्तिका बन गए जिसका गाँधी जी के प्रमुख सहयोगी काका कालेलकर ने सरल हिन्दी भाषा में रूपान्तर किया। अंग्रेजी राज की बन्दिश के कारण मूल प्रवचनों में ‘स्वदेशी’ पर विचार नहीं था जिसे बाद में शामिल कर लिया गया। गांधी जी की सैद्धांतिकी और व्यावहारिक कार्यक्रम के आधार के रूप में यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण परंतु लघु आकार की रचना गाँधी जी के ही शब्दों में जीवन के ‘व्रत’ यानी अडिग निश्चय हैं जिनका हर हालत में पालन करना जरूरी है। ये व्रत इस प्रकार हैं- सत्य, अहिंसा ( हिंसा न करना ही नहीं सक्रिय प्यार, अपने विरोधी से भी प्रेम भरा बर्ताव करना), ब्रह्मचर्य, अस्वाद (स्वाद न लेना), अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह (जमा न रखना), अभय, अस्पृश्यता निवारण (छुआछूत वाला आचरण न करना), जात मेहनत (ब्रेड लेबर), सर्व धर्म समभाव और नम्रता (सहिष्णुता)। इस श्ाृंखला में गाँधी जी ने जेल में रहते हुए 22 जुलाई 1930 को पहला प्रवचन लिखा था और 7 अक्तूबर 1930 को अन्तिम। इस दौरान प्रति मंगलवार के दिन इनको नियमित रूप से लिखा गया। प्रकाशित पुस्तक में इन व्रतों की जरूरत पर भी एक लेख सम्मिलित किया गया है।

यह लघु पुस्तिका गाँधी जी के चिन्तन का सार और उनके द्वारा प्रयुक्त बीज शब्दों की सरल व्याख्या उपस्थित करती है। उनके द्वारा प्रतिपादित व्यक्तिगत और सामाजिक कार्यक्रमों में इन्हीं का विस्तार दिखाई पडता है। उनके सभी आश्रमों में इन व्रतों का पालन करने का विधान था। यह भी सुखद है कि महर्षि पतंजलि के योगसूत्र में उल्लिखित योग के पहले चरण में वर्णित ‘यम’ के सभी अवयव इनमें स्पष्ट रूप से शामिल हैं। गाँधी जी एक आस्तिक व्यक्ति थे और व्यापक ईश्वर में उनका अगाध विश्वास था। सभी धर्मों में शामिल पर सबसे परे उनके राम ईश्वर भी हैं और अल्ला भी। अंधकार के क्षणों में उन्हें ईश्वर का सदैव अनुग्रह मिलता था। उनकी आध्यात्मिक दृष्टि में ‘सत्य ही ईश्वर’ है। सत्य, सत् या अस्तित्व को द्योतित करता है। जीवन के संचालन में गाँधी जी हर जगह व्यापक ईश्वरीय विधान का अनुभव करते रहे और ईश-प्रार्थना का उनके जीवन में विशेष स्थान था। वे प्राथना को आत्मोत्सर्ग का आधार मानते थे और हृदय में ईश्वर की उपस्थिति के प्रति गहरी आस्था थी क्योंकि इससे आत्मशुद्धि होती है। गाँधी जी ने अपने जीवन में श्रीमद्भगवद्गीता को भी बडा महत्त्व दिया। ‘सत्य के प्रयोग’ शीर्षक से प्रसिद्ध उनकी आत्म कथा में निम्नलिखित श्लोक दो बार उद्धृत किया गया है ः

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः

रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ।

-श्रीमद्भगवद्गीता ( अध्याय 2/59)

(निराहारी के विषय (उपवास के दिनों में) तो शांत हो जाते हैं, पर उसका रस नहीं जाता, उसकी वासना का शमन नहीं होता (ईश्वर दर्शन से (रस) वासना भी शांत हो जाती है)

चैतन्य के साथ आत्म नियंत्रण को जीवन और कर्म में उतारना ही गाँधी जी के साधना और सफलता का मूल रहस्य है। इसी के अनुसार वह ‘स्वराज’ को भी आत्म-नियंत्रण और आत्म-संयम या अपने ऊपर नियंत्रण के रूप में देखते हैं न कि हर तरह के बंधन से मुक्ति या स्वतंत्रता के रूप में। वह आत्मानुशासन पर जोर दे रहे थे और तभी वह स्वतंत्रता दिवस के उल्लास के बीच जश्न और शोर शराबे से दूर नोआखाली में बंटवारे के दंश से पीडित और दुखियारी मानवता की सेवा में जुटे हुए थे।

देश का मंगल-प्रभात स्वदेशी के लिए समर्पण और सेवा से ही हो सकेगा। आचरण की शुद्धता और नैतिकता ही इसका आधार हो सकता है। गाँधी जी के द्वारा जिन व्रतों पर जोर दिया गया वे सार्वकालिक महत्त्व के हैं। वे ही ऐसे साधन हैं जिनके साथ कदम बढा कर ही हम बापू की विरासत को सँभाल कर आगे बढ सकते हैं और समर्थ भारत का निर्माण करने में अपना योगदान कर सकते हैं। देश को ऐसे मंगल प्रभात की हम सब को प्रतीक्षा है।