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एक साहित्यिक की डायरी : एक संक्षिप्त टीका

शिव किशोर तिवारी
(सूचना ः इस लेख में मुख्यतः भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित ‘एक साहित्यिक की डायरी’ (2019 संस्करण) की चर्चा की गई है। राजकमल द्वारा प्रकाशित रचनावली (खंड 4) में इस शीर्षक से जो सामग्री दी है उससे केवल ‘कलाकार की ईमानदारी ःतीन’ को लिया गया है। दुर्भाग्य से ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित ‘डायरी’ के नये संस्करण में भी छापे की भूलें हैं। रचनावली का पाठ इस दृष्टि से भी उपयोगी है।)
डायरियाँ सदियों से लिखी जा रही हैं। लेकिन उनका छपना उन्नीसवीं शताब्दी से ही शुरू हुआ। सबसे पहली महत्त्वपूर्ण डायरी सम्भवतः1825 में प्रकाशित सैमुएल पीप्स (1633-1703) की डायरी है। सबसे प्रसिद्ध डायरी ऑन फ्रैंक की डायरी (1947) है जो नात्सियों से बचकर छुपे एक यहूदी परिवार के दैनिक जीवन का तिथिबद्ध विवरण है। हिंदी में मोहन राकेश की डायरी (1985) इस कोटि की डायरी है। ये डायरियाँ प्रायः
1. तारीखवार लिखी जाती हैं।
2. आत्मकथात्मक होती हैं।
3. लेखक के परिवेश और उसके प्रति
लेखक की प्रतिक्रिया को दर्ज करती हैं।
4. प्रकाशन के लिए नहीं लिखी जातीं।
मुक्तिबोध की ‘एक साहित्यिक की डायरी’ सचमुच डायरी नहीं है। वह ‘वसुधा’ पत्रिका में लिखे गये एक स्तम्भ का नाम है जिसमें उपर्युक्त लक्षण प्रायः अनुपस्थित हैं। तुलनीय ‘आज’ अखबार में स्तम्भ के रूप में प्रकाशित विवेकी राय की ‘मनबोध मास्टर की डायरी’ है, यद्यपि उसका स्वर हास्य-व्यंग्य वाला है। डायरी नाम से लिखे कॉलम अंग्रे*ाी में प्रचुर हैं जिनमें ‘लंडनर की डायरी’ 1916 से चल रहा है और मुख्यतः गॉसिप कॉलम है।
परंतु मुक्तिबोध डायरी शिल्प के प्रति सजग हैं। इसका पता इन पंक्तियों से चलता है। ‘बीच में डायरी के पन्ने फट गये हैं, इसलिए वह अधूरी मालूम हुई। लेकिन बात पूरी थी।’ (पृ. 70) साधारणतः पाठक का ध्यान इस बात पर जाता है कि इस डायरी की अधिकतर प्रविष्टियाँ एक वृत्तांत के भीतर संवादों के माध्यम से मुख्यतः साहित्यिक सिद्धान्त-कथन करती हैं। पर डायरी का शिल्प इसके लिए आवश्यक नहीं था। 1666 में जॉन ड्राइडन वृत्तांत शैली में चार मित्रों के पारस्परिक संवाद की शक्ल में अपनी आलोचना पुस्तक ‘ऑफ ड्रमैटिक पोए*ाी’ लिख चुके थे। तब डायरी शिल्प की मान्यता भी नहीं थी। जैसा कि आप आगे देखेंगे, ‘एक साहित्यिक की डायरी’ मूलभूत स्तर पर डायरी इसलिए है कि यह कवि मुक्तिबोध के अंतर्द्वंद्वों को अंकित करती है और इस कारण किसी डायरी की तरह वैयक्तिक दस्तावे*ा है। इसलिए इसके आलेखों को ‘प्रविष्टि’ नाम से अभिहित करने जा रहा हूँ। (कहीं-कहीं ‘आलेख’ शब्द का व्यवहार हुआ है।)
1. प्रथम प्रविष्टि ः तीसरा क्षण
‘तीसरा क्षण’ प्रकाशन तिथि के हिसाब से कुल 13 प्रविष्टियों में 9वीं है और नवंबर 1958 में प्रकाशित हुई। सम्पादक श्रीकांत वर्मा के अनुसार प्रविष्टियों का क्रम वही है जो स्वयं मुक्तिबोध ने निर्धारित किया। जो भी हो, यह प्रविष्टि मुक्तिबोध की सृजन-प्रक्रिया का जितना पूर्ण चित्र प्रस्तुत करती है उतना कोई और नहीं करती। इसे उत्तम पुरुषवाचक और उसके मित्र केशव के वृत्तांत के रूप में लिखा गया है यद्यपि दोनों पात्रों के परस्पर संवाद के माध्यम से काव्य की सृजन-प्रक्रिया का निरूपण अभीष्ट है। लेखक ने केशव की आकृति और प्रकृति पर काफी शब्द खर्च किये हैं। 15 साल की उम्र में केशव को गणित में रुचि है पर खेलकूद में बिलकुल नहीं। उसमें बालसुलभ चंचलता नहीं है। वह विवेकशील और धीर-गंभीर है। पर वह योग, इडा, सुषुम्ना जैसी रहस्यमय बातों में भी रुचि रखता है। संभवतः योग में रुचि ही उसे वाचक कवि के भावप्रवण और कल्पनाशील व्यक्तित्व की ओर आकर्षित करती है। दूसरी ओर वाचक को उसका व्यक्तित्व आकृष्ट करने की अपेक्षा आतंकित करता है। 15 वर्ष की वय में वाचक विषयों का बिम्बात्मक ग्रहण करता है- ‘मुझे लगता है कि मन एक रहस्यमय लोक है। उसमें अँधेरा है। अँधेरे में सीढियाँ हैं। सीढियाँ गीली हैं। सबसे निचली सीढी पानी में डूबी हुई है। वहाँ अथाह काला जल है। उस अथाह जल से स्वयं को डर लगता है। इस अथाह काले जल में कोई बैठा है। वह शायद मैं ही हूँ।’ इसके विपरीत केशव का मार्ग बौद्धिक है। उदाहरण के लिए गाँधीवाद के बारे में उसका यह अभिमत है- ‘....गाँधीवाद ने भावुक कर्म की प्रवृत्ति पर कुछ इस ढंग से जोर दिया है कि सप्रश्न बौद्धिक प्रवृत्ति दबा दी गई है। असल में यह गाँधीवादी प्रवृत्ति प्रश्न, विश्लेषण और निष्कर्ष की बौद्धिक क्रियाओं का अनादर करती है।’ इस तरह कच्ची उम्र में ही दोनों पात्रों का अंतर स्पष्ट है- वाचक विषय का भावनात्मक और कल्पनाशील अधिगमन करता है जब कि केशव वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पन्न है।
पात्रों का अगला वार्तालाप कई साल बाद कॉलेज के आखिरी साल में होता है, बल्कि थोडा विराम दे-देकर तीन वार्तालाप होते हैं। इन वार्तालापों में केशव अपनी सौंदर्य-दृष्टि की रूपरेखा प्रस्तुत करता है जिससे वाचक संक्षेप में अपना वैमत्य प्रकट करता है परंतु अधिकतर कवि वाचक श्रोता की भूमिका में ही रहता है। इस बीच कवि को दो बार प्रत्यक्ष सौंदर्यानुभव होते हैं जिनके कारण केशव के सौंदर्य-सिद्धांत से वह सहमत नहीं हो पाता। उसे लगता है कि केशव का सौंदर्य-बोध केवल बौद्धिक है, स्वानुभव से रहित। अपने प्रथम सौंदर्यानुभव का वर्णन वाचक इन शब्दों में करता है- ‘मैं नहीं जानता कि मैं क्या अनुभव कर रहा था। मैं केवल यही कह सकता हूँ कि किसी मादक अवर्णनीय शक्ति ने मुझे भीतर से जकड लिया था। मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि उस समय मेरे अंतःकरण के भीतर एक कोई और व्यक्तित्व बैठा हुआ है। ....अपने से वृहत्तर, विलक्षण अस्वयं।’ दोनों अनुभव प्रकृति से आयत्त होते हैं।
केशव का सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण इन शब्दों में व्यक्त होता है- ‘किसी वस्तु या दृश्य या भाव से मनुष्य जब एकाकार हो जाता है तब सौंदर्य-बोध होता है। सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट, वस्तु और उसका दर्शन, इन दो पृथक तत्त्वों का भेद मिटकर जब सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट से तादात्म्य प्राप्त कर लेता है तब सौंदर्य भावना उद्बुद्ध होती है।’ यह विचार सांख्य-योग की ज्ञान-मीमांसा में कल्पित वृत्ति और प्रमा की अवधारणा की तरह लगता है जिसके अनुसार बुद्धि प्रमेय (ज्ञेय विषय) के साथ तदाकार हो जाती है। कवि वाचक को भी यह साम्य दिखाई देता है क्योंकि वह इस बात को सुनकर दर्शन की ज्ञान मीमांसा के बारे में सोचने लगता है (पृ.13, तृतीय पैराग्राफ)।
कवि इस उपपत्ति को स्वीकार नहीं कर पाता। उसका मत है कि जिसे वस्तु कहते हैं उसके अतिरिक्त मन भी एक वस्तु ही है और मन के क्षेत्र में तादात्म्य की बात निरर्थक है। यहाँ कवि का पक्ष स्पष्ट नहीं है परंतु अभिप्राय यह लग रहा है कि केवल मन भी सौंदर्यबोध का स्रोत और आश्रय दोनों हो सकता है। जैसा कि बाद में देखेंगे केशव और कवि दोनों अपने विचार बाद में संशोधित करते हैं।
इसके अतिरिक्त केशव दो और विचार प्रस्तुत करता है जिनसे कवि संतुष्ट नहीं होता। पहली बात यह है कि सौंदर्य-बोध की चर्चा किसकी दृष्टि से हो- कवि की या भावक की? वाचक कवि की दृष्टि से चर्चा करने का समर्थन करता है। दूसरी बात जो केशव उठाता है वह है- साहित्य-चिन्तन में वैज्ञानिक पद्धति का अवलंबन। जो कोई भी सिद्धांत बनें वे दुनिया की साहित्यिक कृतियों के आधार पर ‘डिडक्टिव’ पद्धति (अनेक उपलब्ध तथ्यों के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकालने की पद्धति) से प्राप्त किये जायँ। कवि इस पर कोई मत व्यक्त नहीं करता परंतु भीतर से सहमत नहीं है।
इन दूसरी मुलाकातों में भी केशव और कवि वाचक का मन नहीं मिलता। पर एक अंतर स्पष्ट है। अब कवि बौद्धिक विमर्श को स्वीकार कर रहा है। दूसरी ओर केशव कवि के दो प्रत्यक्ष सौंदर्यानुभवों का साक्षी होकर केवल बुद्धिवादी नहीं बना रह सकता।
दोनों मित्रों की आखिरी मुलाकात लगभग 35 वर्ष की वय में होती है। अब तक दोनों की वैचारिक दूरियाँ कम हो चुकी हैं, बुद्धिवादी केशव संवेदना का महत्त्व समझने लगा है और संवेदनशील कवि में वैचारिकता आ गई है। इस परिवर्तन का चित्रण इन शब्दों में किया गया है- ‘दो व्यक्ति-बिन्दुओं के बीच की दूरी बढती रही। एक क्षण बाद दो बिन्दुओं के बीचो-बीच समान रूप से दीर्घ दूरी पर एक मध्य-बिंदु-अणु बना। इस अणु बिंदु से एक हाथ की तरफ एक सीधी अणुरेखा निकली। उसी बिंदु से दूसरे हाथ की तरफ दूसरी सीधी-सरल अणु-रेखा फूट पडी। दोनों रेखाएँ आगे बढने लगीं और उसने हम दो व्यक्ति बिंदुओं को एक अणु-प्रशस्त मार्ग-रेखा द्वारा जोड दिया।’
इसके बाद रचना-प्रक्रिया का विस्तृत विश्लेषण है, कुछ वार्तालाप के माध्यम से और कुछ केशव के एक पत्र के माध्यम से। इस विश्लेषण की प्रस्तावना कवि वाचक करता है, फिर उसमें अनेक संशोधन होते हैं। परंतु अंत तक भी कवि पुनःपरीक्षण का अवकाश रख देता है, अर्थात् यह सिद्धान्त-निरूपण अंतिम नहीं है, बल्कि प्रयोगात्मक है।
प्रस्तावना यह है- कला के तीन क्षण होते हैं ः1) जीवन के उत्कट अनुभव का क्षण, 2) व्यक्तिगत अनुभव की वैयक्तिकता से मुक्ति और उसका एक फैंटेसी का आकार ग्रहण करना, और 3) फैंटेसी का शब्दबद्ध होना। स्पष्ट है कि यहाँ मुख्यतः काव्य-कला की बात हो रही है।
प्रथम क्षण
पहला क्षण अनुभव का क्षण है। सृजनशील व्यक्ति को अपने परिवेश से कोई तीव्र अनुभव प्राप्त होता है जो उसकी सृजन की वृत्ति को उत्तेजित करता है। मन में प्रवेश करते ही यह अनुभव अन्य मनस्तत्त्वों से जुडकर परिवर्तित हो जाता है। इन ‘मनस्तत्त्वों’ का स्वरूप मुक्तिबोध स्पष्ट नहीं करते। कदाचित् स्मृति, इच्छा, विवेचना आदि मनोवैज्ञानिक तत्त्वों से मुराद है। कोई संवेदना या अनुभव शून्य में नहीं होता, बल्कि मन में वर्तमान स्मृति, इच्छा आदि तत्त्वों में घुल जाता है। इस तरह सृजनात्मक अनुभव वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ दोनों है।
कला का द्वितीय क्षण
कलात्मक सृजन के दूसरे स्तर पर आकर मुक्तिबोध एक साहसिक कदम उठाते हैं। काव्यालोचन के क्षेत्र में शायद पहली बार वे फैंटेसी को रचना-प्रक्रिया का आवश्यक अंग बताते हैं। यथार्थवाद या प्रकृतिवाद से उनका अलगाव यहाँ स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ है। फैंटेसी शब्द को सुनते ही अतिप्राकृतिक, अलौकिक, रहस्यमय आदि का विचार सबसे पहले आता है। परंतु यहाँ फैटेसी शब्द का प्रयोग भिन्न अर्थ में हुआ है। उस अर्थ का अनुमान ऑस्ट्रेलियन लेखक एम. सैक्स्बी के इन शब्दों से लगा सकते हैं- ‘फैंटेसी.... यथार्थ को अयथार्थ के माध्यम से, जीवन को माया के माध्यम से बिम्बित करती है.... अदृश्य को दृश्य बनाती है।’ (लेख ःफैंटेसी बियांड द रिम ऑफ रियालिटी)।
अनुभव के फैंटेसी में परिवर्तित होने की प्रक्रिया दो स्तरों पर घटित होती है- एक सृजनात्मक कल्पना की भूमिका से संबंधित है, और दूसरा है अनुभव का निर्वैयक्तीकरण। मुक्तिबोध की सृजनात्मक कल्पना की अवधारणा कॉलरिज की ‘सेकंडरी इमैजिनेशन’ की अवधारणा से मिलती-जुलती है। कॉलरिज के अनुसार सेकंडरी इमैजिनेशन कवि की विशिष्ट शक्ति है जिसके द्वारा वह एक प्रति-संसार की सृष्टि करता है। ‘वह लय करती है, विकीर्ण करती है, नष्ट करती है ताकि पुनःसृजन कर सके’ (डि*ााल्व्*ा, डिफ्यू*ो*ा, डिसिपेट्स इन ऑर्डर टु रिक्रिएट’ - ‘बायोग्राफिया लिटरेरिया’, 1817 में प्रकाशित)। अनुभव का निर्वैयक्तीकरण टी.एस.एलियट के ‘डीपरसनलाइ*ोशन’ से मिलता-जुलता है (एलियट-ट्रेडिशन ऐंड दि इनडिविजुअल टैलेंट, द सेक्रेड वुड, 1920)। मुक्तिबोध भी इस प्रश्न का उत्तर खोज रहे हैं कि कला में प्रातिनिधिकता कैसे उत्पन्न होती है अर्थात् पाठक रचना से किस तरह तादात्म्य स्थापित कर पाता है और एक युग का साहित्य परवर्ती युगों में कैसे पाठकों को आकृष्ट करता रहता है। उत्तर है कि रचना वैयक्तिक भावों से प्रेरित होकर भी वैयक्तिक नहीं होती। एलियट के शब्दों में -‘कलाकार की अग्रगति निरंतर आत्मबलिदान के रूप में होती है, उसके व्यक्तित्व के सतत लोप के रूप में।’ मुक्तिबोध भी अनुभव के निर्वैयक्तिक होने पर बल देते हैं पर एलियट के विपरीत वे पूर्ण निर्वैयक्तीकरण को संभव नहीं मानते। एलियट की तरह मुक्तिबोध भी स्पष्ट नहीं करते कि निर्वैयक्तीकरण सम्पन्न कैसे होता है। व्यक्तिगत भावनाओं के प्रति तटस्थता की चर्चा वे अति संक्षेप में करते हैं। दूसरी बात जो वे उतने ही संक्षिप्त तरीके से कहते हैं वह यह है कि दृष्टि की मुक्त निर्वैयक्तिकता और संवेदन की वैयक्तिकता मिलकर एक ऐसे संवेदनात्मक ज्ञान की स्थिति प्राप्त करते हैं जो दोनों से उच्चतर है। ‘दृष्टि’ शब्द सहसा बिना किसी व्याख्या के प्रकट होता है पर ‘दृष्टि’ से मुक्तिबोध का मतलब प्रायः सामाजिक वैचारिकता होता है। इस बात को मुक्तिबोध 1960 में प्रकाशित लेख ‘नई कविता का आत्म-संघर्ष’ में अधिक स्पष्ट ढंग से व्यक्त करते हैं- ‘....आत्म-औचित्य की भावना से प्रेरित होकर वह (कवि) उसके भीतर अपना जो कुछ विशिष्ट है उसे सामान्य में ....इतना अधिक मिला देता है कि उस सामान्य के प्रवाह में बहकर उसका विशिष्ट आमूलाग्र बदल जाता है।’ डायरी की इस प्रविष्टि में जिस ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान की बात कही गई है वह 1960 की कविता ‘अंतःकरण का आयतन में भी प्रकट होता है-
व अपने प्रियजनों के उजलते मुख को
मधुर एकांत में पाकर
किन्हीं संवेदनात्मक ज्ञान-अनुभव के
स्वयं के फूल-ताजे पारिजात-प्रदान करती है;
अचानक मुग्ध आलिंगन
मनोहर बात, चर्चा, वाद और विवाद
उनका अनुभवात्मक ज्ञान-संवेदन....
तृतीय क्षण
अभिव्यक्ति के पूर्व फैंटेसी अस्पष्ट होती है परंतु उसकी एक दिशा होती है। तीसरे क्षण में फैंटेसी की अभिव्यक्ति होती है इस क्षण को मुक्तिबोध इस तरह परिभाषित करते हैं - ‘कलाकार अपने हृदय के तत्त्व के रंग, रूप, आकार के अनुसार अभिव्यक्ति का रंग-रूप और आकार तैयार करना चाहता है।’ एलियट की प्रसिद्ध अवधारणा ‘ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव’ की कुछ ऐसी ही परिभाषा दी है - ‘भाव को व्यक्त करने का एक ही तरीका है- ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव को प्राप्त करना, अर्थात् वह पदार्थ, दशा या घटनाक्रम जो उस विशिष्ट भाव का ऐसा फार्मूला बन सके कि वह भाव (भावक के हृदय में) तत्काल जाग्रत हो जाय। (हैमलेट ऐंड हि*ा प्राब्लेम्स, द सेक्रेड वुड, 1920)
परंतु एलियट और मुक्तिबोध की अवधारणाओं में तीन महत्त्वपूर्ण अंतर हैं-1) एलियट भावक या पाठक को दृष्टि में रखते हैं जब कि मुक्तिबोध पाठक का उल्लेख भी नहीं करते। 2) एलियट के विपरीत मुक्तिबोध की अभिव्यक्ति की प्रक्रिया गतिशील है, अर्थात् अभिव्यक्ति के दौरान फैंटेसी का आकार बदलता जाता है, केवल ‘दिशा’ अपरिवर्तित रहती है। 3) अभिव्यक्ति की प्रक्रिया किसी-किसी रचनाकार को इतना आकर्षित कर लेती है कि वह मूल फैंटेसी में ही काट-छाँट करने लगता है (कलावादियों की ओर इशारा है)।
कवि के आत्मद्वंद्व का दस्तावे*ा
मुझे लगता है कि कवि-वाचक और केशव दोनों मुक्तिबोध के कवि-व्यक्तित्व के दो पहलू हैं - एक संवेदनशील कवि, दूसरा बौद्धिक विचारक। आरंभ में वे आंतरिक द्वंद्व की स्थिति में हैं। कवि के मन में प्रश्न उठते हैं - काव्य का उद्देश्य क्या है, कवि की संवेदना कैसे कविता का रूप ग्रहण करती है, वस्तु-सत्य अधिक महत्त्वपूर्ण है या आत्माभिव्यक्ति, सौंदर्यबोध क्या है आदि। कम उम्र में इन प्रश्नों के जो उत्तर प्राप्त होते हैं उनसे संतोष नहीं होता। परिपक्वता के साथ-साथ वैचारिकता और संवेदनशीलता के बीच एक सेतु बन जाता है। कवि अपनी सृजन-प्रक्रिया को बेहतर समझ पाता है। वह इस प्रक्रिया का वर्णन करता है पर यह भी इंगित कर देता है कि यह अंतिम निष्कर्ष नहीं है। भविष्य में भी चिंतन चलता रहेगा।
कोई आलोचक 1935 से 1958 के बीच लिखी कविताओं की ‘तीसरा क्षण’ के आत्मद्वंद्व से सिलसिलेवार तुलना करके देखें तो रोचक परिणाम मिल सकते हैं।
2. द्वितीय प्रविष्टि ः एक लम्बी कविता का अंत
यह प्रविष्टि ‘नवलेखन’ के जनवरी 1963 अंक में प्रकाशित हुई, अर्थात् यह सभी अन्य प्रविष्टियों के बाद की है। इसमें कोई अन्य पात्र या संवाद नहीं है, केवल कवि के कुछ छिटपुट विचार व्यक्त हुए हैं। मुख्य सूत्र एक लम्बी कविता है जिसे कवि ने अभी लिखकर पूरा किया है। कविता लम्बी है, इसलिए पत्रिकाओं में छपने लायक नहीं है। उससे कवि को न पाठक मिलने की आशा है न आमदनी की। कई लोगों ने सुझाया है कि पैसे कमाने के लिए गद्य लेखन बेहतर है। या कम से कम लंबी कविताओं को ही कई कविताओं में बाँटकर प्रकाशन-योग्य बनाया जाय। पैसे कमाने के लिए दो कुंजियाँ लिखने का प्रस्ताव भी कहीं से आया है। कवि सोचता है कि ये सारे सुझाव मानने लायक और व्यावहारिक हैं। परंतु वास्तव में उसकी मनोवृत्ति छोटी कविताए गद्य आदि के अनुकूल नहीं है। जब वह लिखने बैठता है तो अभिव्यक्ति का विषय फैलता जाता है क्योंकि एक यथार्थ के अनेकानेक परस्पर गुम्फित तत्त्व प्रकट होने लगते हैं। कवि न छोटी कविता लिखने में समर्थ है न कहानी या उपन्यास के माध्यम से अपनी विषयवस्तु को सम्प्रेषित करने में।
यही इस प्रविष्टि का मुख्य कथ्य है जो तीन पृष्ठों में कह लिया जाता है। फिर छह पृष्ठों में मुक्तिबोध कई प्रायः असंबद्ध विषयों पर अपने विचार रखते हैं - पिछली पीढी का भ्रष्टाचार और उसका अप्रासंगिक होते जाना, कविता में अपने परिवेश और अनुभव के स्थान पर पश्चिम से कथ्य का आयात करना, मौलिकता और सृजनशीलता को कुंठित करनेवाला बौद्धिक वातावरण आदि। अंत में वे अपने मूल विषय पर लौटते हैं। मुक्तिबोध को समझने के लिए उपयोगी और अत्यंत स्पष्ट एक कथन यहाँ हमें मिलता है - ‘अब कविता कोई निबंध तो है नहीं कि जिसमें लोगों को आज के हालात की जानकारी मिले, न वह कोई नाटक है जिसमें पात्र प्रस्तुत होकर मूर्त रूप से जीवन-यथार्थ उपस्थित करते हैं। कविता, एक संगीत को छोड, अन्य कलाओं से अधिक अमूर्त है। वहाँ जीवन-यथार्थ केवल भाव बनकर प्रस्तुत होता है, या बिम्ब बनकर या विचार बनकर।’ इन शब्दों में मुक्तिबोध यथार्थवाद पर अपना रुख स्पष्ट करते हैं। अंत में कवि अपनी लंबी कविता की रूपरेखा बताता है और उसके रूपकात्मक या एलिगॉरिकल तत्त्व की ओर ध्यान आकृष्ट करता है।
‘एक लम्बी कविता का अंत’ में कवि जैसे एक विषय से दूसरे विषय पर घूमता रहता है, वह डायरी शैली के अधिक न*ादीक है।

3. डबरे पर सूरज का बिम्ब
यह तीसरी प्रविष्टि है। यह सितम्बर 1957 में ‘वसुधा’ में प्रकाशित हुई। कुल साढे पाँच पेज के इस छोटे आलेख का स्वर व्यंग्यात्मक है। इसमें वाचक कवि नहीं बल्कि (संभवतः) आलोचक है। दूसरा पात्र लेखक है जो किसी ऑफिस में छोटे पद पर काम करता है। उसका नाम नहीं दिया है, केवल परिचित बताया है। वह सारे दिन काम करके थका-हारा बाहर निकला है। वाचक बेकार है पर इस समय सूट-बूट डाटकर किसी भावी नौकरी देने वाले से मिलकर आया है। दोनों पात्रों में के सामाजिक-आर्थिक स्तर में अंतर नहीं है पर इस समय वेशभूषा का अंतर दृष्टिगोचर हो रहा है। वाचक लेखक को चाय पीने का निमंत्रण देता है।
व्यंग्य दोनों पात्रों के बीच आभासी अंतर में छिपा है। इससे एक विदू*प उत्पन्न होता है- वाचक अपने को मार्गदर्शक की भूमिका में ढाल लेता है। साथ ही उसे यह एहसास भी है कि वह झूठी श्रेष्ठता दिखा रहा है। आखिर की पंक्तियों में यह व्यंग्य उभरता है - ‘मेरे कीमती कपडों के ठाठ ने मुझे उत्साहित तो कर ही दिया था।’
परंतु साहित्य के बारे में दोनों पात्र जो बातें करते हैं वे महत्त्वहीन नहीं हैं। साहित्य में मनोविज्ञान, वस्तुसत्य और आक्रामक मुद्रा को लेकर दोनों में बात होती है। लेखक पात्र मनोविज्ञान को पीडितों-वंचितों के जीवन-सघर्ष के बाई-प्रोडक्ट की तरह देखता है। फ्रारायडियन कुंठा के मनोविज्ञान के प्रति वह सचेत है पर उसे चित्रित करने में उसकी रुचि नहीं है। दूसरी बात, दोनों ही पात्र इस बात पर सहमत हैं कि वस्तुसत्य का जितना अंश लेखक के अनुभव में आता है उतने का चित्रण ही सम्भव है। शीर्षक ‘डबरे पर सूरज का बिम्ब’ की यही व्यंजना है। अपने सीमित अनुभव में लेखक वस्तुसत्य का जो रूप अनुभव कर पाता है वही उसके लेखन में प्रतिफलित होता है। अंत में वाचक लेखक को सलाह देता है कि लेखन आक्रामक होना चाहिये। लेखक जवाब नहीं देता और वाचक के मन में भी संदेह है कि यह सलाह आंतरिक है या केवल तात्कालिक मनःस्थिति की उपज।
4. हाशिए पर कुछ नोट्स
यह प्रविष्टि वसुधा में अगस्त 1957 में प्रकाशित हुई। यह रचना-प्रक्रिया पर न होकर आलोचना पर है, पर साहित्यिक आलोचना के बजाय व्यक्तिगत आलोचना की बात की गई है। वाचक के अतिरिक्त एक और पात्र है जिसे केवल मित्र कहा गया है, नाम नहीं दिया गया है। दोनों के सामने एक ही समस्या है- किसी श्रद्धेय में अक्षम्य त्रुटियाँ दिख जायँ तब उसके बारे में कैसे लिखें। मित्र ने ऐसी स्थिति में अपने किसी प्रिय महानुभाव का विदू*प चित्र प्रस्तुत किया था। परंतु वाचक को यह भावात्मक, संवेगात्मक और अनुचित लगता है। गुण-दोष का तठस्थ वर्णन अधिक उचित है। फिर भी आलोचना का पूर्ण बौद्धिक और तटस्थ होना असंभव है। उसमें भावुकता का तत्त्व रहता ही है। इसलिए समीक्षक को अपनी गलतियों के लिए 25-30 प्रतिशत अवकाश रखना चाहिए। इस लिहाज से ‘यह ऐसा ही है’ के बजाय ‘यह संभव है’ या ‘ऐसा हो सकता है’ इस प्रकार की भाषा का प्रयोग अधिक उचित है।
5. सडक को लेकर एक बातचीत
कालक्रम से यह डायरी की पहली प्रविष्टि है जो अप्रैल 1957 में ‘वसुधा’ में प्रकाशित हुई। एक दृष्टि से इस आलेख का बडा महत्त्व है। यहाँ महानगरीय काव्य-अभिरुचि को चैलेंज करके दावा किया गया है कि कविता में वास्तविक अनुभूत से उद्भूत और अनुस्यूत आवेग या आवेश स्वीकार्य ही नहीं काम्य है क्योंकि वह एक वृहत्तर नैतिकता- अपने वर्ग से जुडे रहने की नैतिकता- का काव्यात्मक निदर्शन है। बहुत पहले अनजाने ही मुक्तिबोध ने आज की दलित और स्त्री कविता की भूमिका तैयार कर दी।
वृत्तांत यह है कि वाचक के एक मित्र की कविता बडे शहर के सम्पादक के द्वारा यह कहकर लौटा दी जाती है कि कविता के बीच के हिस्से को दुरुस्त किया जाय। कविता के पहले और आखिरी हिस्से में रूपक के माध्यम से भाव व्यक्त किया गया है जबकि मध्य में सीधे भावात्मक आवेग को व्यक्त किया गया है। सम्पादक जी का विचार है कि नई कविता बौद्धिकता पर आधारित है, अतः आवेग उसमें स्वीकार्य नहीं है। मुक्तिबोध दोनों पात्रों के माध्यम से तर्क देते हैं कि सम्पादक के निर्णय का आधार बौद्धिकता न होकर एक तरह की नागर भद्रता है। कुछ लोगों ने तय किया है कि नई कविता में यह या वह उचित या अनुचित है। परंतु यह मानदंड अवास्तविक और आरोपित है। एक तरह का फैशन है। अपनी भोगी हुई पीडा से पैदा होने वाले आवेश और नकली आवेश में फर्क है। वास्तविक आवेश के लिए कविता में स्थान होना चाहिए।
6. एक मित्र की पत्नी का प्रश्नचिह्न (प्रकाशन -वसुधा, जनवरी, 1958)
यह आलेख ‘हाशिये पर कुछ नोट्स’ का ही विस्तार है। संक्षेप में कथ्य यह है कि किसी व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का विश्लेषण असंभव है क्योंकि 1) व्यक्तित्व के असंख्य पहलू हैं और समय के साथ वह गतिशील भी रहता है, और 2) विश्लेषक के अपने मनोवैज्ञानिक स्वार्थ होते हैं। अतः विश्लेषक को सचेत होकर तटस्थ वैज्ञानिक दृष्टि अपनानी होगी। तब निष्कर्ष अधिक सार्थक होंगे। परंतु मनोवैज्ञानिक स्वार्थ वैज्ञानिक विश्लेषण में भी रहता है, चाहे वह सम्बुद्ध स्वार्थ (अर्थात् व्यक्ति के बजाय वर्ग-स्वार्थ) ही हो। निष्कर्ष यह है कि वैज्ञानिक विश्लेषण भी ‘कामचलाऊ कार्यकारी मान्यता’ से अधिक नहीं है। इस अवधारणा को साहित्य तक ले जाते हुए यह मत व्यक्त किया गया है कि साहित्य में व्यक्तित्व के कुछ बिम्ब ही दिख सकते हैं। व्यक्ति का पूर्ण सत्य साहित्य में प्रकट नहीं हो सकता। परोक्ष रूप से मुक्तिबोध चरित्र-चित्रण की पारम्परिक आलोचना- पद्धति के विषय में भी शंका प्रकट करते हैं।
7. नये की जन्मकुंडली - एक, दो
ये प्रविष्टियाँ वसुधा के मई और जून, 1957 के अंकों में प्रकाशित हुईं। इसमें वाचक एक सफल, दुनियादार आदमी है। एक और पात्र है जो चिंतक और साहित्यकार है। इस आलेख में पात्रों के बीच संवाद नगण्य है। मुख्यतः दूसरे पात्र के एकालाप से कथ्य उद्घाटित होता है। कथ्य जैसे 1957 में प्रासंगिक था वैसे ही अब भी है। नये की बात राजनीति और समाज में खूब होती है पर वह नया केवल नकारात्मक है। औद्योगिक संस्कृति के प्रभाव से सामंती संस्कृति टूट चुकी है परंतु उसके स्थान पर नया, वैज्ञानिक विचार और भावबोध नहीं आया है। इसलिए समाज एक सांस्कृतिक शून्य की स्थिति में है। इस स्थिति में आचरण का आधार व्यक्तिवाद बन गया है। व्यक्तिवाद धन कमाने की शक्ति के आधार पर काम कर रहा है, अर्थात् एक नया सामाजिक वर्गीकरण जन्म ले रहा है जिसका कोई नैतिक आधार नहीं है। विशेषतः परिवार के स्तर पर नये का स्वरूप पूर्णतः अपरिभाषित है। इस स्तर पर शक्तिशाली (अर्थात् धन पैदा करने वाले) सदस्य कहीं कुछ सामंतवादी आचारों को अपनी सुविधा के अनुसार अब भी पकडे हुए हैं, बाकी वे अपनी दृष्टि और रुचि के अनुसार तय करते हैं। राजनीतिक दल केवल राजनीति के माध्यम से नवाचार बनाना चाहते हैं जो संभव नहीं है। साम्यवादी दल वैज्ञानिक सामाजिक दृष्टि से सम्पन्न है पर उसके पास परिवर्तन की कोई रूपरेखा नहीं है जो समाज से लेकर परिवार तक में नवीनता को स्थापित करे। बौद्धिक और साहित्यकार नये की खोज में पश्चिम को ओर भागते हैं। अथवा उत्तरों के अभाव में प्रश्न ही उनके लिए केंद्रीय हो गये हैं। इस आलेख में यह निष्कर्ष दिया गया है कि नये के पास वैज्ञानिक दृष्टि और सामाजिक परिवर्तन का एक खाका होना चाहिये जिसको परिवार के स्तर पर स्थापित करना होगा। यह सभी बुद्धिजीवियों और राजनीतिक दलों का प्रयास होना चाहिए। साहित्य से इस बात को जोडते हुए कहा गया है कि इस परिवर्तन के अभाव में साहित्य में नये की बात करना व्यर्थ है।
8. वीरकर (प्रकाशन - वसुधा, नवंबर 1957)
वीरकर वाचक का मित्र है जिसके साथ उसके संवाद के माध्यम से कथ्य प्रकट होता है। यह आलेख कुछ तो सिद्धान्त-कथन है, कुछ मुक्तिबोध के अपने अंतर्द्वंद्व को चित्रित करता है। इस आलेख में हम वाचक को विश्वासपूर्वक मुक्तिबोध से अभिन्न मान सकते हैं। वीरकर मुक्तिबोध के काव्य की कथित जटिलता की चर्चा करता है- ‘उस वर्ग (खाता-पीता मध्यवर्ग) के आलोचक तुम-जैसों को कहते हैं कि तुम ‘ऑब्स्क्योर’ हो। जो लिखते हो उसका ठीक-ठीक अर्थ समझ में नहीं आता। या फलाँ हो फलाँ हो। असल में तुम्हारी दुनिया ही अलग है।.... तुम्हारी प्रेरणा ही भिन्न है। वह भला उनके लिए अनुकूल क्यों होगी?’ तात्पर्य यह प्रतीत हो रहा है कि कवि के जीवनानुभव एक ऐसे व्यक्ति के हैं जो आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक मान, सफल व्यक्ति होने का संतोष आदि त्यागकर एक ‘आदर्शवादी *ाद’ से चिपका हुआ है। अपने ही वर्ग के ‘सफल’ व्यक्तियों के लिए उसके शब्द अपरिचित होंगे। परंतु इससे शंका का समाधान नहीं होता। उस ‘प्रातिनिधिकता’ का क्या हुआ जिसकी चर्चा प्रथम प्रविष्टि में आई है? अपने औरों के लिए अनजान अनुभव का कवि सामान्यीकरण क्यों नहीं कर पाता? मुझे लगता है यहाँ मुक्तिबोध की कविता की दुर्बोधता का प्रश्न उठाना मुक्तिबोध का एक आंतरिक द्वंद्व है जिसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता।
सामान्य सिद्धांत-कथन जो इस आलेख की अधिकांश जगह घेरता है वह संक्षेप में यह है। जीवनानुभव और कल्पना के संयोग से कवि का कथ्य तैयार होता है। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। सृजन के क्षण में कथ्य शब्दों में पुनर्भाषित होता है। परंतु जो उत्पाद है - अर्थात् कविता - उसमें जीवनानुभव पाठक को महसूस होना चाहिए। परंतु बहुत बार कवि अपने जीवनानुभवों को दबाकर अपने अंदर एक शून्य बना लेता है और केवल कल्पना और शिल्प के बल पर काव्य-रचना करता है। 1957 में यह प्रवृत्ति हिंदी साहित्य में प्रबल है। मुक्तिबोध अपने को भी इस दोष से मुक्त नहीं मानते।
9. विशिष्ट और अद्वितीय (नवलेखन, नवंबर 1962)
यह प्रविष्टि शुद्ध और धारदार व्यंग्य है। निशाने पर वे साहित्यकार हैं जो ‘विशिष्ट’ हो गये हैं या नितांत अद्वितीय होना चाहते हैं। विशिष्ट अर्थात् व्यक्तिवादी और असंग। अद्वितीय माने संवेदनशील और प्रतिभाशाली पर आत्मलीन। नई कविता और नई कहानी में वाचक को ऐसे लोगों की भरमार दिखाई देती है। वाचक एक औसत आदमी है जो साहित्य में रुचि रखता है। वह सुरुचिसम्पन्न है। उसकी पत्नी धनी परिवार की बेटी है और उसके पास दो ह*ाार किताबें हैं। ‘नीरज उसका प्रिय कवि है।’
वाचक का विश्वास है कि जीवन के संघर्ष में भागीदार होना *ारूरी है। रो*ा की *ांदगी में आम आदमी जिन लोगों के सम्फ में आता है, जिन बाधाओं से टकराता है और जिन *ाम्मेदारियों से दबा रहता है वे सब उसे जीवनानुभव प्रदान करते हैं। सामान्य जन से विमुख, आत्मकेन्द्रित, जीवन-सत्य की अवहेलना करने वाले जो कवि- कहानीकार हैं उनके लिए वाचक की अश्रद्धा बार-बार और तीखे ढंग से व्यक्त होती है। वाचक एक अद्भुत निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अधिकांश बडे कवियों पर बीवी-बच्चों की *ाम्मेदारी नहीं है, इसलिए वे असंग और निरपेक्ष रह पाते हैं। स्पष्टतः यह निष्कर्ष व्यंग्यात्मक है, जैसे दो ह*ाार किताबों की मालकिन पत्नी का नीरज-प्रेम तत्कालीन पाठकों पर व्यंग्य है।
तीखे व्यंग्य के दो उदाहरण देकर इस प्रविष्टि की चर्चा समाप्त करते हैं ः
1) ‘खूब खा-पी चुकने के बाद हम *ान्दगी की निरर्थकता के बारे में बहस कर रहे थे। वही दैनिक जीवन का क्रम, वही दफ्तर, वही अफसरों वाली बातें, सिनेमा और कुछ इधर-उधर की गप, सारिका, मनोहर कहानियाँ, कादम्बिनी और ज्ञानोदय। खत्म। हमारी *ादगी खत्म। *ांदगी में दिलचस्पी खत्म। दिलचस्पी में भी दिलचस्पी खत्म।’
(नोट- वाचक अपनी क्लास पर भी व्यंग्य करता है - भरे पेट पर जीवन की व्यर्थता की बातें! सारिका और ज्ञानोदय को मनोहर कहानियाँ के साथ रखने पर भी गौर करें।)
2) ‘मुझे मालूम है (मैं सारिका और नई कहानियाँ पढता हूँ) कि नई कहानी नाम की एक ची*ा आ गई है। बुरी बात नहीं है। अच्छा है। लेकिन अगर नई कहानी का मतलब पानी के भीतर घुसकर, उसमें डूबकर फिर आँख खोलकर देखना है तो तो मैं बता दूँ कि *यादा से *यादा एक धुंध दिखाई देगी और आँखों को तकलीफ तो होगी ही....’
10. कुटुयान और काव्य-सत्य (वसुधा,अक्तूबर 1957)
यह शायद औरों की अपेक्षा कम*ाोर प्रविष्टि है। आधी से अधिक दूरी तक कुटुयान नाम की पारसी महिला और कृष्ण मुरारी शुक्ल नाम के एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण की प्रेमकथा है। यह कथा वादरायण संबंध से काव्य-सत्य से जुड जाती है। वाचक के मित्र का कहना है कि लेखक के जीवन और उसकी रचना में संगति होनी चाहिए। वाचक उससे एक सीमा तक सहमत है। उदाहरण के लिए यदि एक घोषित प्रगतिवादी म*ादूरों के विरुद्ध पूँजी का साथ देता है तो उसकी प्रगतिवादी रचना पर अश्रद्धा उत्पन्न होगी। परंतु व्यक्तिगत आचरण का मूल्यांकन कठिन होता है, इसलिए अत्यंत सावधान होकर ही किसी निर्णय पर पहुँचना चाहिए। इसके अतिरिक्त वाचक का विचार है कि व्यक्तिगत आचरण के आधार पर साहित्य का आकलन हमेशा संभव नहीं है। यह संवाद अनिर्णीत समाप्त होता है।
11. अंतिम तीन प्रविष्टियाँ ः कलाकार की व्यक्तिगत
ईमानदारी- एक, दो, तीन
इस आलेख के पहले दो भाग 1960-61 में प्रकाशित हुए औन ज्ञानपीठ वाली डायरी में संगृहीत हैं। तीसरा भाग अपूर्ण है और पहली बार रचनावली में प्रकाशित हुआ। तीसरे भाग में पहले भाग के ये वाक्य लगभग तद्वत् प्रकट होते हैं - ‘व्यक्तिगत ईमानदारी का अर्थ है - जिस अनुपात में, जिस मात्रा में जो भावना या विचार उठा है उसको उसी मात्रा में प्रस्तुत करना।’ 20 पन्ने के आलेख (तीनों भाग मिलाकर) में 15 पृष्ठों के बाद एक ही उपपत्ति दुहरायी जाती है तो लगता है आलेख में तर्क की प्रगति बहुत कम है। कवि वाचक और उसके मित्र यशराज के बीच कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी के विषय में जो असहमति है वह प्रायः वैसी की वैसी रहती है। ईमानदारी की जो परिभाषा उद्धृत की गई है वह कवि का विचार है। यशराज वस्तुसत्य के प्रति निष्ठा को कवि की ईमानदारी का मानक मानता है। यशराज की ओर से कहीं माक्र्सवादी विचारधारा के अनुसार वस्तुसत्य के अधिगम का संकेत भी प्रतीत होता है, यद्यपि किसी विचारधारा का उल्लेख नहीं है। इस विषय में मुक्तिबोध का विचार यह प्रतीत होता है- ‘मेरे खयाल से कवि- लेखक अपने दृष्टिकोण से किसी वस्तुतथ्य के प्रति प्रतिक्रिया करता है। माना कि मानसिक प्रतिक्रिया में संवेदना अंतर्भूत है, किंतु उसमें दृष्टि या दृष्टिकोण भी अंतर्भूत है। संवेदना और दृष्टि दोनों से मिलकर मानसिक प्रतिक्रिया होती है। हाँ, यह आवश्यक नहीं है कि मानसिक प्रतिक्रिया करते समय उस दृष्टि या दृष्टिकोण के पीछे रहनेवाली अर्थात् उसकी पार्श्वभूमि के रूप में रहनेवाली अपनी संपूर्ण विचारधारा से पूर्णतः सचेत हो।’
दो टूक बात। इस समय मुक्तिबोध की बहुत-सी प्रसिद्ध लम्बी कविताएँ लिखी जा रही थीं। संभव है कवि के अपने मन में संशय हो। संभव है माक्र्सवादी मित्रों ने संशय दिखाया हो। यह भी संभव है किसी माक्र्सवादी विद्वान ने कविताओं पर प्रतिकूल टिप्पणी की हो। न कविताएँ प्रकाशित हुई थीं, न किसी ने उन पर आलोचना लिखी थी। कुछ लोगों को सुनाई होंगी जिनकी टिप्पणियाँ उपलब्ध नहीं हैं। पर ‘कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी’ का यह बेलाग वक्तव्य अवश्य किसी विवाद में कवि का स्पष्ट पक्ष है।
कुछ निष्कर्ष
1. ‘एक लंबी कविता का अंत’ और ‘वीरकर’ को छोडकर अन्य किसी प्रविष्टि में वाचक और मुक्तिबोध को अभिन्न नहीं कह सकते। वाचक का परसोना भी सभी प्रविष्टियों में एक नहीं है। अधिकतर वह कवि है पर ‘डबरे पर सूरज का बिम्ब’ में वह आलोचक कहा गया है और ‘नये की जन्मकुंडली’ में एक सफल दुनियादार आदमी। इसलिए यह किसी एक व्यक्ति की डायरी न होकर कई अलग-अलग वाचकों का वृत्तांत है।
2. मुक्तिबोध ने डायरी में सैद्धांतिक आलोचना के बजाय अपनी ही रचना-प्रक्रिया को कई कोणों से देखा है। इस हिसाब से विभिन्न पात्रों के बीच संवाद वस्तुतः मुक्तिबोध के अंतःसंवाद हैं। इस पुस्तक को डायरी मानने का केवल यही एक औचित्य है।
3. डायरी में मुक्तिबोध ने सैद्धांतिक आलोचना में प्रचलित द्वैतों- जैसे कांटेट और फॉर्म, यथार्थवाद-आदर्शवाद, यथार्थ और रूमान, प्रबंध और लिरिक आदि- की चर्चा बिलकुल नहीं की। केवल वस्तु-तत्त्व और आत्मतत्त्व की बात की है, वह भी किसी दार्शनिक अर्थ में नहीं (दार्शनिक अर्थ में दोनों एक दूसरे के पूर्ण विलोम हैं और उनका समन्वय असंभव है)। मुक्तिबोध के यहाँ वस्तुसत्य एक व्यावहारिक इकाई है और उसका आशय जीवन-जगत् है। आत्मतत्त्व मनुष्य की वह शक्ति है जिसके माध्यम से वह वस्तुसत्य का अनुभव करता है। रचनाकार में यह शक्ति तीव्र होती है, साथ ही वह कल्पनाशील होता है।
4. डायरी से यह स्पष्ट है कि मुक्तबोध कथ्य को शिल्प से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। परंतु शिल्प अपने आप में दो तरह से महत्त्वपूर्ण है। मुक्तिबोध के अनुसार अभिव्यक्ति के दौरान कथ्य नया रूपाकार धरता है अर्थात् बदल जाता है, केवल उसकी दिशा वही रहती है। दूसरे, शब्द इतिहास और संस्कृति की उपज हैं, इसलिए शिल्प व्यक्तिगत और सार्वजनीन एक साथ है। मुक्तिबोध बार-बार व्यक्तिगत और सार्वजनीन के गहन संबंध की बात करते हैं।
5. मुक्तिबोध ने रचना-प्रक्रिया में फैंटेसी को एक आवश्यक सोपान बताया है। अतः यथार्थ के प्रति उनका दृष्टिकोण यथार्थवाद और प्रगतिवाद से पूरी तरह अलग है। इस तथ्य को स्वीकारे बिना मुक्तिबोध को समझना संभव नहीं है।
6. विचारधारा (माक्र्सवाद) के संबंध में भी मुक्तिबोध के विचार प्रगतिवाद से नहीं मिलते। उनके हिसाब से विचारधारा पृष्ठभूमि में रहती है और कवि की दृष्टि के निर्माण में सहायता करती है। इस दृष्टि से वह रॉ मैटीरियल का अंग है जिससे कथ्य रूप लेता है, न कि सृजन-प्रक्रिया में केंद्रीय।
7. सबसे आश्चर्य की बात है कि पूरी किताब में एक बार भी ‘पाठक’ शब्द इस्तेमाल नहीं हुआ है। पहली प्रविष्टि में केशव यह प्रश्न उठाता है कि रचना-प्रक्रिया की विवेचना कवि की दृष्टि से हो या पाठक की। कवि का उत्तर होता है - कवि की दृष्टि से। इसी आलेख में ‘प्रातिनिधिकता’ की चर्चा एक पंक्ति में आती है जो संभवतः पाठक की ओर इशारा करती है। इसके अलावा डायरी से पाठक गायब है। कवि जो अभिव्यक्त करता है वह किसे उद्दिष्ट है? पाठक को कविता का भाव अनुभव होना चाहिए, अन्यथा रचना-प्रक्रिया अर्थहीन है। परंतु मुक्तबोध इस तथ्य की ओर से पूर्णतः उदासीन नहीं तो बेखबर लगते हैं। इस बात का कितना और कैसा प्रभाव उनकी कविता पर पडा यह अलग से जाँचने का विषय है। यहाँ केवल मुक्तिबोध की दुरूहता का *ाक्र करेंगे क्योंकि डायरी की ‘वीरकर’ शीर्षक प्रविष्टि में इसका उल्लेख है। मुक्तिबोध की दुरूहता निर्विवाद है। इसका कारण क्या उनकी कवि-केन्द्रित रचना-प्रक्रिया है? इसके जवाब में कह सकते हैं कि टी.एस.एलियट ने ‘ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव’ के सिद्धांत में सम्प्रेषणीयता को केन्द्र में रखकर भी ऐसी कविता लिखी जो मुक्तिबोध की कविता से कम दुरूह नहीं है। यह एक अलग चर्चा का विषय हो सकता है।