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गाँधी-नेहरु का भाषा चिन्तन

ब्रजरतन जोशी
‘अपनी भाषा को तोतली बोलोगे तो भी वह मीठी लगेगी। विदेशी भाषा में न कभी सच्ची स्वाभाविकता पा सकोगे न सही तेजस्विता। हिन्दी के बिना राष्ट्र गूंगा है।’

- महात्मा गाँधी

भारतीय संस्कृति में प्रज्ञा पुरुषों की परम्परा रही है। गाँधी भारत के प्रज्ञापुरुषों की विभिन्न कडियों में एक विशिष्ट कडी है। वे हमारे समय के स्थितप्रज्ञों में अग्रणी है। हमारी परम्परा के श्रेष्ठ ग्रन्थ छांदोयोग्य उपनिषद् में क्रतुमय पुरुष का वर्णन आता है। उन्हीं अर्थों में गाँधी क्रतुमय पुरुष हैं। अथः खलु क्रतुमयः पुरुषो। यथाक्रतुः अस्मिन्लोके पुरुष भवतिः तथेतः प्रेत्य भवति (छांदोग्य उपनिषद्, अध्याय-3, खण्ड-16.1) यानी क्रतुमय पुरुष वह होता है जिसका संकल्प ही क्रिया बन जाता है। जिसके उच्चार एवं विचार में कोई भेद नहीं रहता। इसलिए उनका उच्चार आचरण बन जाता है। गाँधी हमारे समय के ऐसे विरल महापुरुष रहे हैं कि जिनके व्यक्तित्व में प्रज्ञा पुरुष और क्रतुमय पुरुष दोनों का ही संगम है।

गाँधी की एक अहम् विशेषता रही कि उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम हिन्दी ही रखा। वे अपने भाषणों में अधिकाधिक हिन्दी प्रयोग करते थे। यह उनकी शैलीगत विशिष्टता थी कि सरल एवं सहज तरीके से बडी से बडी बात कह सकते थे। उनकी शैली में आक्रमकता नहीं, आकर्षण अधिक था।

भाषा पर उनके विचार अत्यन्त स्पष्ट थे। मातृभाषा के तो वे पैरोकार थे। मातृभाषा के प्रति उनकी श्रद्धा और प्रेम अविस्मरणीय मिसाल है। उनका स्पष्ट मानना था कि स्वराज्य के मानी यह नहीं है कि भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वालों पर एक ही भाषा लाद दी जाए। फैजपुर राष्ट्रभाषा सम्मेलन के लिए लिखे पत्र में वे लिखते हैं कि- सारे हिन्दुस्तान में एक-दूसरों के साथ संबंध रखने के लिए कोई एक सामान्य भाषा होनी चाहिए। मुझे इसमें शक नहीं है कि वह भाषा हिन्दी यानी हिन्दुस्तानी हो सकती है।

भाषा को लेकर अत्यन्त गंभीर थे। वे यह मानते हैं कि भाषा माता के समान है। माता पर हमारा जो प्रेम होना चाहिए, वह हम लोगों में नहीं है। शिक्षित वर्ग अंग्रेजी के मोह में फँस गया है और अपनी राष्ट्रीय भाषा से उसे असंतोष हो गया है। इतना ही नहीं वे तो लिखते हैं कि अंग्रेजी से हमें जो दूध मिल रहा है, उसमें जहर व पानी मिला हुआ है, और मातृभाषा से ही हमें शुद्ध दूध मिल सकता है। बिना शुद्ध दूध मिले हमारी उन्नति होना असंभव है। पर जो अंधा है वह देख नहीं सकता, गुलाम यह नहीं जानता कि अपनी बेडिया किस तरह तोडे।

गाँधी भाषा और साहित्य के सम्बन्ध में विचार करते हुए कहते हैं कि यदि हिन्दी राष्ट्रीय भाषा होगी तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। जैसे भाषक वैसी भाषा। भाषा-सागर में स्नान स्नान करने के लिए पूर्व-पश्चिम, दक्षिण-उत्तर से पुनीत महात्मा आयेंगे तो सागर का महत्त्व स्नान करने वालों के अनुरूप होना चाहिए। इसलिए साहित्य से दृष्टि के भी भाषा का स्थान विचारणीय है।

भाषा के सम्प्रेषण सम्बन्धी अपने विचारों में वे कहते हैं भाषा वही श्रेष्ठ है जिसको जन-समूह सहज में समझ ले। देहाती बोली सब समझते हैं। भाषा का मूल करोडों मनुष्य रूपी हिमालय में मिलेगा और उसमें ही रहेगा। हिमालय में से निकली हुई गंगाजी अनंतकाल तक बहती रहेगी। ऐसा ही देहाती हिन्दी का गौरव रहेगा। और जैसे छोटी-सी पहाडी से निकला हुआ झरना सूख जाता है वैसे ही संस्कृतमय तथा फारसीमय हिन्दी की दशा होगी। (गाँधी वाङ्मय खण्ड 14, पृ. सं. 270)

गाँधीजी ने अपने सम्पादित पत्रों में मुख्य रूप से हिन्दी को महत्त्व दिया। वे अपने भाषणों, चिट्ठियों में भी हिन्दी को प्राथमिकता देते थे। यंग इण्डिया, हरिजन हिन्दू हरिजन बन्धु, हरिजन सेवक गुजराती समाचार, प्रताप हिन्दी नवजीवन आदि सभी में हिन्दी की पुरजोर वकालत की।

इतना ही नहीं स्वयं गाँधी की भाषा साफ-सुथरी और स्पष्ट है। उदाहरण के लिए जब वे दक्षिण अफ्रीका के फॉक्सरस्ट जेल से ९.११.१९०८ को श्रीमती कस्तूरबा गाँधी को लिखा पत्र उनकी भावुकता से भरी भाषा की एक श्रेष्ठ बानगी है- वे लिखते हैं कि-

प्यारी कस्तूर, तुम्हारी तबियत के बारे मं आज श्री वेस्ट का तार मिला। मेरा हृदय फटा जा रहा है। मैं रो रहा हूँ। लेकिन तुम्हारी सुश्रुषा करने आऊँ, ऐसी स्थिति नहीं है। सत्याग्रह-संघर्ष को मैंने अपना सब कुछ अर्पित कर दिया है। इसलिए मुझसे आना हो नहीं सकता।.... मैं तुमसे विश्वासपूर्णक कहता हूँ कि यदि तुम चली जाओगी तो मैं तुम्हारे पीछे दूसरी शादी नहीं करूँगा। ऐसा मैं कई बार कह भी चुका हूँ। तुम ईश्वर में आस्था रखकर प्राण त्यागना। तुम मर जाती हो तो वह भी सत्याग्रह के लिए ही होगा। हमारा संघर्ष मात्र राजनीतिक नहीं है, यह संघर्ष धार्मिक है, इसलिए अत्यन्त शुद्ध है। उसमें मर जायें तो क्या, और जीवित रहं तो क्या? आशा है, तुम भी ऐसा ही सोचकर तनिक भी खिन्न नहीं होगी। इतना मैं तुमसे मांगे लेता हूँ- मोहनदास

पं. जवाहरलाल नेहरु गाँधी के सच्चे उत्तराधिकारी थे। वे कई भाषाओं के जानकार भी थे, पर उनकी हिन्दी भाषा संबंधी मान्यता स्पष्ट थी कि मुझे इसमें कुछ भी शक नहीं कि हिन्दुस्तानी ही भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा बनेगी। दरअसल रोजमर्रा के कामकाज के लिए वह बडी हद तक आज भी राष्ट्रभाषा-सी बनी हुई है। (मेरी कहानी, पृ.सं. 633)

एक विशिष्ट बिन्दु जिस पर अक्सर हमारा ध्यान कम ही जाता है कि आजादी के पूर्व राष्ट्रभाषा का विवाद प्रधान हीं था। उस समय दो महत्त्वपूर्ण प्रश्ा* हमारे सम्मुख थे- एक तो हिन्दी की लिपि नागरी हो या फारसी? दूसरे भाषा को संस्कृत प्रधान बनाया जाए कि फारसी प्रधान? पं. नेहरु का इस विषय में विचार था कि दोनों लिपियों को अधिकृत रूप से मान लिया जाए और लोगों को इनमें से किसी को भी काम में लाने की छूट प्रदान की जाए। पं. नेहरु भी गाँधी की तरह अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा का विकल्प नहीं मानते थे। पं. नेहरु तो यह मानते थे कि हिन्दी भाषा को लचीलेपन के साथ आगे के रास्ते का सफर तय करना है। उनकी मान्यता थी कि जितना हम दूसरी भाषाओं के शब्दों को पचाएंगे उतना ही हमारी भाषा समृद्ध और विकसित होगी। वे तो क्लिष्ट और आलंकारिक भाषा को दरबारी शैली कहकर खारिज करते हैं। उनकी यह मान्यता थी कि हमें पश्चिम के नवीन विचारों को अनुवाद के जरीये समझना चाहिए।

हिन्दी के लेखकों से वे उम्मीद करते थे कि वे हिन्दुस्तान की आम जनता के लिए लिखें और ऐसी भाषा में लिखें कि जिसे आम आदमी आसानी से समझ सके।

स्वयं नेहरु की भाषा कवित्वपूर्ण एवं चित्रात्मकता से भरपूर थी। उनके वर्णन में प्रवाह, सूक्ष्मता और शैली में सरसता देखते ही बनती है। अपनी चर्चित पुस्तक हिन्दुस्तान की कहानी का वह प्रसंग इसकी मिसाल है जिसमें वे अपनी बीमार पत्नी कमला से जर्मनी में मिलते हुए अपने उद्गार कुछ इस तरह से व्यक्त करते है-दरअसल वह एक हिन्दुस्तानी और खासतौर पर कश्मीरी लडकी थी- चैतन्य और गर्वीली, बच्चों जैसी और बडों जैसी बेवकूफ और चतुर।

दोनों की ही भाषा की संरचना का सूक्ष्म अध्ययन किया जा तो कुछ ची*ो और हमारे सामने आती है कि जहाँ बापू की भाषा में अनुभूति की अभिव्यक्ति की प्रखरता है वही नेहरु की भाषा में इसके साथ कल्पना और लयबद्धता है। गाँधी जहाँ अपने भाषिक चिन्तन में एक केन्द्रीय भाषा यानी वृत्त से बिन्दु पर केन्द्रित होना चाहते हैं, वहीं नेहरु बिन्दु से चलकर वृत्त तक का सफर तय करते करना चाहते हैं। अपने इस सफर में वे दूसरी बडी भाषाओं का भी पूरा ख्याल रखते हैं। शायद यही वजह रही हो कि गाँधी की तुलना में वे अंग्रेजी को थोडी तरजीह भी देते हैं। जो बाद की उनकी राष्ट्रभाषा नीति में स्पष्ट रूप से देखी भी जा सकती है। सम्फ भाषा के रूप में हिन्दी के लिए समय सीमा का निर्धारण न करना उनके हिन्दी प्रेम का अकाट्य प्रमाण है।

लेकिन यह तथ्य है कि गाँधी-नेहरु दोनों ही भाषा के प्रश्ा* को राष्ट्रीयता से जोडते हैं और दोनों ही भाषा को देश का स्वाभिमान और गौरव मानते हैं। और हिन्दी को लेकर दोनों के चिन्तन में दृष्टि बिल्कुल साफ एवं स्पष्ट है।

इस अंक में कुल आठ लेख, चार कहानियाँ, छह कवियों की कविताओं के साथ एक संस्मरण व चार समीक्षाएँ हैं।

सदैव की तरह ही हमारा प्रयास है कि पाठकगण को स्तरीय सामग्री के रसास्वादन का अवसर मिले। हमारी पूरी कोशिश रहती है कि हम सभी रचनाकारों तक पहुँचे और उनकी सृजनात्मक मेधा का लाभ मधुमती परिवार को मिले। मधुमती का हर अंक अपनी तरह की एक योजना का रूपायन होता है। हम निरन्तर मधुमती के उन्नयन हेतु प्रयत्नशील हैं और रचनाकारों के सीधे सम्फ में भी हैं। आने वाले समय में आपको अनेक सुखद परिवर्तन देखने को मिलेंगे जिससे पत्रिका के कलेवर, विषयवस्तु और सृजनात्मक स्तर को निरन्तर गति मिलेगी।

गत अंक मं फोण्ट परिवर्तन और कुछ तकनीकी कारणों से प्रूफ की त्रुटियाँ रह गई थीं, उसके लिए खेद है।

आपकी रचनात्मक सहयोग एवं सुझावों का इन्तिजार रहेगा।

महात्मा गाँधी के भाषा सम्बन्धी कतिपय सूत्र



- हमें एक मध्य भाषा की भी जरुरत है। देशी भाषाओं की जगह पर नहीं, परन्तु उसके सिवा इस बात में साधारण सहमति है कि यह माध्यम हिन्दुस्तानी ही होना चाहिए, जो हिन्दी और उर्दू के मेल से बने और जिसमें न तो संस्कृत की और न फारसी और अरबी की बरमार हो।



- लिपियों में मैं सबसे आला दरजे की लिपी नागरी को ही मानता हूँ। यह कोई छिपी बात नहीं है फिर नागरी लिपी यदि सम्पूर्ण है, तो उसी का साम्राज्य अन्त में होगा।



- भारत के गाँवों में हिन्दी भाषा के द्वारा ही सेवा सम्भव है। आज लोगों को राष्ट्रभाषा हिन्दी सीख लेने की प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिए।



- हिन्दुस्तान को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी जाननेवाले लोग ही हैं। राष्ट्र की हाय अंग्रेजों पर नहीं पडेगी बल्कि हम पर पडेगी।



- 2॰ अक्टूबर 1917 को भरूच में हुई दूसरे गुजरात शिक्षा परिषद् के सम्मेलन में राष्ट्रभाषा के लिए गाँधी जी ने पाँच लक्षणों का होना अनिवार्य बताया-



1. अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।

2. उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का आपसी धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवहार हो

सकना चाहिए।

3. यह जरुरी है कि भारतवर्ष के बहुत-से लोग उस भाषा को बोलते हो।

4. राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।

5. उस भाषा पर विचार करते समय क्षणिक या अल्पस्थायी स्थिति पर ज्यादा जोर

नहीं देना चाहिए।

**यह समस्त सामग्री 20 अक्टूबर 1917 को भरूच में सम्पन्न दूसरे गुजरात शिक्षा परिषद् सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण से ली गई है।