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साहित्यिक परिदृश्य

परिकल्पना संस्था के तत्त्वावधान में साहित्यकार व ब्लॉगर्स का हुआ सम्मठऽ
हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में लखनऊ की संस्था परिकल्पना का अहम स्थान है। विश्व के 11 देशों में ब्लॉगोत्सव और अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव का आयोजन कर चुकी यह संस्था हिन्दी भाषा को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने की दिशा में बडा काम कर रही है। उक्त उद्गार चर्चित ब्लॉगर व साहित्यकार एवं लखनऊ मुख्यालय परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, लखनऊ में आयोजित परिकल्पना संस्था के 13वें वार्षिक महासभा में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। इस अवसर पर परिकल्पना की अध्यक्ष माला चौबे और महासचिव डॉ. रवींद्र प्रभात के आमंत्रण पर देश के विभिन्न हिस्सों से पधारे ब्लॉगर्स, साहित्यकार और बुद्धिजीवियों को सम्मानित भी किया गया। परिकल्पना की नयी कार्यकारिणी के गठन के साथ नए उत्तरदायित्व ग्रहण करने वाले सदस्यों को पद और गोपनीयता की शपथ भी दिलाई गयी। साथ ही परिकल्पना के जानकीपुरम, लखनऊ स्थित नए परिसर का लोकार्पण भी डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने किया।
डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि- वैश्वीकरण और डिजिटल इण्डिया के इस दौर में हिंदी की अहमियत सारा विश्व समझ रहा है, ऐसे में हिन्दी की विविधता, सौन्दर्य, डिजिटल और अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को परिकल्पना ने जिस तरह से आगे बढाया है, उसने नए प्रतिमान स्थापित किये हैं। यह संस्था हिन्दी भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा हेतु विगत कई वर्षों से संघर्षरत है।
सभाध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मिथिलेश दीक्षित ने कहा कि ‘परिकल्पना जिन पवित्र उद्देश्यों को लेकर काम कर रही है वह बहुत बडा काम है। परिकल्पना की सदस्य होने के नाते यदि मैं कहूँ कि परिकल्पना मुझमें बसती है और मैं परिकल्पना में, तो शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।’ विशिष्ट अतिथि महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील कुलकर्णी ने कहा कि ‘राष्ट्रभाषा के प्रचार को राष्ट्रीयता का मुख्य अंग मानते हुए परिकल्पना सही मायनों में हिन्दी के उत्थान की दिशा में अनुकरणीय भूमिका निभा रही है।’ अवधी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राम बहादुर मिश्र ने कहा कि ‘जहां हिन्दी है, वहीं परिकल्पना है और जहां परिकल्पना है वहीं हिन्दी है। परिकल्पना संस्था नहीं एक वैश्विक परिवार है, जो वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को चरितार्थ करती है।’
परिकल्पना की अध्यक्ष माला चौबे ने कहा कि ‘यह संस्था हिन्दी भाषा और साहित्य की तकनीकी प्रगति को समर्पित है। यह संस्था एक वैश्विक परिवार है जिससे जुडकर आप अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं और राष्ट्र निर्माण में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सकते हैं।’ परिकल्पना समय के प्रधान संपादक डॉ. रवीन्द्र प्रभात ने बताया कि भारतीय भाषाओं के विकास व उनके वैश्विक प्रारूप को समृद्ध बनाने के लिए प्रतिबद्ध संस्था के रूप में परिकल्पना संस्था ने पिछला अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव मई 2019 में भारतीय महावाणिज्य दूतावास वियतनाम के सहयोग से वियतनाम की आर्थिक राजधानी हो ची मिनह में आयोजित किया था।
कार्यक्रम में डॉ. रवीन्द्र प्रभात, माला चौबे, डॉ. सुनील कुलकर्णी, डॉ. मिथिलेश दीक्षित, डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी, कुसुम वर्मा, डॉ.राम बहादुर मिश्र सहित तमाम ब्लॉगर्स, साहित्यकार और बुद्धिजीवी शामिल हुए।

परिकल्पना संस्था की नयी कार्यकारिणी में डॉ. मिथिलेश दीक्षित को मानद अध्यक्ष, डॉ. मीनाक्षी सक्सेना को उपाध्यक्ष (महिला प्रकोष्ठ), सत्या सिंह को उपाध्यक्ष (सामाजिक गतिविधियां), डॉ. सुषमा सिंह को उपाध्यक्ष (वैश्विक प्रसार), रणधीर सिंह सुमन को उपाध्यक्ष (मीडिया सह विधिक प्रभारी), शचिंद्रनाथ मिश्र को उपाध्यक्ष (युवा प्रकोष्ठ), शीला पाण्डेय को सचिव (कार्यक्रम संयोजन), राजीव प्रकाश को सचिव (सेंट्रल उत्तर प्रदेश प्रभारी), डॉ. अमोल रॉय को सचिव (बिहार प्रभारी), गगन शर्मा को सचिव (दिल्ली प्रभारी), डॉ. अरुण कुमार शास्त्री को सचिव (पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रभारी), नीता जोशी को सचिव (महिला प्रकोष्ठ),कनकलता गुप्ता को सचिव (सामाजिक गतिविधियां), कुसुम वर्मा को सचिव (सांस्कृतिक गतिविधियां), डॉ. उदय प्रताप सिंह को सचिव (मीडिया प्रभारी), आकांक्षा यादव को सहसचिव (महिला प्रकोष्ठ) और आभा प्रकाश को सहसचिव (सांस्कृतिक गतिविधियां) का दायित्व प्रदान किया गया। इसके अलावा नकुल दुबे, कृष्ण कुमार यादव, डॉ. सुनील कुलकर्णी, डॉ. राम बहादुर मिश्र, डॉ. चम्पा श्रीवास्तव तथा डॉ. प्रभा गुप्ता को संस्था का संरक्षक और शिव सागर शर्मा, डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी, डॉ. ओम प्रकाश शुक्ल अमिय, डॉ. अनीता श्रीवास्तव और डॉ. बालकृष्ण पाण्डेय को मार्गदर्शक मण्डल में शामिल किया गया।
प्रस्तुति ः
रवींद्र प्रभात, अलीगंज, लखनऊ
पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान समारोह
भीलवाडा। साहित्यिक, सांस्कृति सामाजिक एवं वैचारिक संस्था सन्दर्भ समीक्षा समिति द्वारा पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान समारोह महाराजा रेस्टोरेन्ट, भीलवाडा के सभागार में आयोजित किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ अध्यक्ष प्रहलाद पारीक, मुख्य अतिथि डॉ. बलराम अग्रवाल, दिल्ली, विशिष्ट अतिथि अनिलकुमार सिंह गहलोत, मथुरा, दीपक नगायच रोशन, उदयपुर, संतोष कुमार सिंह, मथुरा, विनोद सिंह, नामदेव शजर, देवास एवं बिट्ठल पारीक, जयपुर द्वारा माँ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर माल्यार्पण के साथ हुआ। श्री अवनीश पारीक द्वारा गणेश वन्दना तथा श्री मेघ श्याम मेघ द्वारा सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की गयी। मंचासीन अतिथियों का तिलक, उत्तरीय, कण्ठहार, श्रीफल व मेवाडी पगडी द्वारा अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम के सम्मान सत्र में डॉ. बलराम अग्रवाल को श्री यशवन्तसिंह सिसोदिया स्मृति कथा शिरोमणि सम्मान-२०१९, डॉ. अनिल कुमार सिंह गहलोत को श्री चौथमल लोढा स्मृति सजल ऋषि सम्मान-२०१९, माधव नागदा को श्री गिरिराजधरण सिंह सिसोदिया स्मृति कथा शिरोमणि सम्मान- २०१९, विट्ठल पारीक को श्री भँवरलाल अग्रवाल स्मृति गीत शिरोमणि सम्मान - २०१९ तथा विनोद सिंह नामदेव श*ार को श्रीमती रामकुँवर पारीक स्मृति ग*ाल शिरोमणि सम्मान-२०१९ से सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरूप दो हजार एक सौ रुपये की पुरस्कार राशि सहित उत्तरीय, कण्ठहार, मेवाडी पगडी, श्रीफल, सम्मान चिह्न प्रदान किये गये। संचालक रेखा लोढा स्मित ने सम्मानित साहित्यिकारों का गद्यात्मक एवं पद्यात्मक परिचय का वाचन किया।
पुस्तक लोकार्पण सत्र में मंचासीन अतिथियों द्वारा रेखा लोढा स्मित की दो पुस्तकें- रोशनी है दाँव पर ग*ाल संग्रह, मुट्ठी भर आकाश कहानी संग्रह एवं प्रहलाद पारीक की पुस्तक जीवन की हलचल कह दूँ, ग*ाल संग्रह लोकार्पित हुई। इस सत्र का संचालन जयपुर के वरिष्ठ साहित्यकार बिट्ठल पारीक ने किया।
विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अनिल कुमार सिंह गहलोत, मथुरा ने हिन्दी की नव प्रसूत विधा सजल पर अपने विचार व्यक्त करते हुए सजल विधा के विधान पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। सजल संग्रह रोशनी है दाँव पर चर्चा करते हुए मथुरा के वरिष्ठ साहित्यकार संतोष कुमार सिंह ने कहा कि रेखा जी की यह कृति शिल्प व कथ्य की कसौटी पर खरी उतरती है।
श्रीमती स्मित के कहानी संग्रह मुट्ठीभर आकाश पर बोलते हुए ख्यातनाम साहित्यकार एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. बलराम अग्रवाल ने समीक्षात्मक उद्बोधन देते हुए कहानियों की बारीकियों पर रोशनी डाली। विशिष्ट अतिथि विनाद सिंह नामदेव श*ार तथा दीपक नगायच ने प्रहलाद पारीक के ग*ाल संग्रह जीवन की हलचल कह दूँ पर बोलते हुए कहा कि इनकी ग*ालें वर्तमान विसंगतियों पर कडा प्रहार करती हैं। कृतिकार रेखा लोढा स्मित ने अपने लेखकीय जीवन पर चर्चा करते हुए सृजन के सहयोगी बने सभी मित्रों एवं परिजनों का आभार व्यक्त किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कृतिकार प्रह्लाद पारीक ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए अपनी सृजन यात्रा के पडावों पर चर्चा की।
संस्था महासचिव श्री वीरेन्द्र कुमार लोढा ने सभी आगंतुक अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए आयोजन सहयोगी मित्रों एवं संस्था सदस्यों को धन्यवाद ज्ञापित किया।
प्रस्तुति ः वीरेन्द्र कुमार लोढा, भीलवाडा
मलेशिया में हुआ हिंदी साहित्य महोत्सव
नई दिल्ली। वैश्विक साहित्य-संस्कृति संस्थान व दै.भारत भास्कर, रायपुर(छग) की ओर से हिंदी दिवस 14 सितंबर के अवसर पर ‘मलेशिया साहित्य महोत्सव’ कुआलालम्पुर व गेंटिंग शहरों में मनाया गया। संस्थान अध्यक्ष संदीप तिवारी राज के नेतृत्व में छत्तीसगढ, उत्तराखंड, नोएडा, दिल्ली, भीलवाडा(राज) के 19 कवि-साहित्यकारों का समूह 13 सित. को कुआलालम्पुर पहुँचा जहाँ एरिना स्टार लक्जरी होटल में रुककर महोत्सव का आनंद लिया।
हिंदी दिवस 14 सित. को मुख्य समारोह का डॉ. मंजू पांडे उदिता के संचालन में शुभारंभ हुआ। सर्वप्रथम साहित्यकारों ने परस्पर परिचय दिया। संदीप तिवाडी राज ने पुष्पगुच्छ से सबका भावभीना स्वागत किया। काव्य प्रस्तुति से पूर्व डॉ. सुधाकर राव बिबे ने भावपूर्ण सरस्वती वंदना की। नोएडा की शीला दीक्षित ने ‘हिंदी एक नदी-सी है’, रायगढ के अजय पाठक ने ‘दुनिया का ये खेल निराला, जीत के जाता धीरज वाला’, केवलकृष्ण पाठक ने ‘जब तुझको मन में लाता हूँ, तुझको ही तुझको पता हूँ’, बिलासपुर के महेश श्रीवास ने ‘वर्तमान से नाता जोडिये हमसे न छुपाना कुछ’, शोभा बिबे ने ‘जिंदगी ऐसे जियो कि मजा आ जाए’ एवं डॉ. सुधाकर बिबे ने ‘रूठा-रूठा दिन है मेरा सूनी-सूनी मेरी रातें, ऐसे में याद आती हैं प्रीतम तुम्हारी बातें’ जैसी रचनाएँ प्रस्तुत कर महोत्सव को परवान चढाया।
इसी प्रकार भीलवाडा के कवि डॉ. एसके लोहानी खालिस ने कवियों की परिचयात्मक कविता ‘यूँही नहीं मैं कवि बन जाता हूँ, मैं कभी रवि की छवि बन जाता हूँ’ गजलें ‘कडवे सच बोल अपनों से बिछुडने के बजाय, चलो दोस्त अब मीठे झूठ बोलना सीखा जाये। हम आदमजात पेड काटते जायें और कागज बनाएं, फिर उसी कागज पे लिखायें...पेड लगाएं पेड बचाएं’ व ‘वक्त का दरिया तो यूँही बहता रहेगा, सितम दर सितम इंसान सहता रहेगा। जमीं पर बाकी है अभी नमक अमन का, यहाँ मुहब्बत का दीया तो जलता रहेगा’, रायपुर के राघवेंद्र धर दीवान ने कविता ‘पलाश के लब पर लिखकर अक्षर, अलाप हो जाते हैं सारे तरुवर, दीपक राग से दीप जल जाते हैं, आलोकित होते हैं त्रिभुवन हमारे, हल्द्वानी की डॉ. मंजू पांडे उदिता ने कविता ‘जो सच जिंदगी का उसे तोड.मोडकर हम क्या करेंगे’ एवं संदीप तिवारी राज ने ग*ाल ‘गम उठाऊँगा तो कुछ और संवर जाऊंगा, मैं तेरी जुल्फ नहीं हूँ जो बिखर जाऊँगा’ सुनाकर महोत्सव की सार्थकता सिद्ध की। सन्तोष उपाध्याय, संजीव व अश्विनी आनदेव, कमलेश पाठक, पुष्पा श्रीवास, मोहनलाल व शकुन्तला थवाईत, इन्दरसिंह छाबडा और आसिफ इकबाल ने भी कार्यक्रम की शोभा बढाई।
तत्पश्चात डॉ. एसके लोहानी खालिस के 5वें काव्य संग्रह ‘उदासी से आनंद की ओर’ एवं नीमच (मप्र) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘ओशो....शून्य के पार’ का विमोचन किया गया।
अंत में हुए सम्मान समारोह में राघवेंद्र धर दीवान, केवलकृष्ण पाठक, डॉ. सुधाकर राव बिबे, महेश श्रीवास, डॉ. एसके लोहानी खालिस, डॉ. मंजू पांडे उदिता को ‘साहित्य साधना सम्मान प्रशस्ति-चिह्न’, संतोष उपाध्याय, मोहनलाल थवाईत, आसिफ इकबाल, संजीव आनदेव, अजय पाठक, इन्दरसिंह छाबडा को ‘भारत भास्कर सम्मान प्रशस्ति-चिह्न’ और अश्विनी आनदेव, कमलेश पाठक, शकुंतला थवाईत, पुष्पा श्रीवास, स्थानीय गाईड गोपाल व सत्या को ‘अतिथि सम्मान प्रशस्ति-चिह्न’ प्रदान कर सम्मानित किया गया।
15 सित.को केसिनो के खुबसूरत शहर गेंटिंग में विश्व के विशालतम टॉप-10 होटलों में से एक होटल में रुककर महोत्सव मनाया। डॉ. मंजू पांडे उदिता के संचालन में काव्यधारा का शुभारंभ हुआ। डॉ. सुधाकर राव बिबे, शीला दीक्षित, अजय पाठक, केवलकृष्ण पाठक, महेश श्रीवास ने बहुत प्रभावी रचनाएँ एवं डॉ. एसके लोहानी खालिस ने गजलें ‘इक मुस्कान उनकी हम होश गंवा बैठे, होश में आते कि वो फिर मुस्कुरा बैठे, आपकी निगाहे-बेनियाड का असर देखिये, जिंदगी में उठी मौजमस्ती की लहर देखिये’ एवं ‘सूरज छुपता नहीं चांद निकलने को तैयार नहीं, प्यार है बेताब ये इंत*ाार करने को तैयार नहीं’ सुनाकर वाह-वाही लूटी। राघवेंद्र धर दीवान, डॉ. मंजू पांडे उदिता, संदीप तिवारी राज ने अपनी धुआँधार रचनाएँ पढकर महोत्सव में चार चांद लगाए। सन्तोष उपाध्याय, संजीव व अश्विनी आनदेव, कमलेश पाठक, पुष्पा श्रीवास, मोहनलाल व शकुन्तला थवाईत, इन्दरसिंह छाबडा और आसिफ इकबाल ने भी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई।
16 सित. को होटल में डिनर के साथ आयोजित संगीतमय सन्ध्या में संदीप तिवारी राज, डॉ. मंजू पांडे उदिता व डॉ. एसके लोहानी खालिस ने कराओके पर गीत प्रस्तुत किये और डॉ. सुधाकर बिबे, केवलकृष्ण पाठक व महेश श्रीवास ने भी सस्वर कविता प्रस्तुत की।
अंत में आयोजक संदीप तिवारी राज ने सबके प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

प्रस्तुति ः एस के लोहानी खलिश
औपनिवेशिक दासता से निकलकर ही रंगमंच में भारतीय दृष्टि संभव-आशीष त्रिपाठी
दिल्ली। ‘भारतेन्दु हरिश्चंद्र और रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रारंभिक प्रयासों के बाद हिंदी रंगमंच पर हबीब तनवीर ने 1954 में आगरा बा*ाार तथा 1958 में मिट्टी की गाडी के प्रदर्शन कर यथार्थवादेतर कल्पनापूर्ण भारतीय रंगदृष्टि का प्रारंभिक अवतरण कर लिया। इन्हीं नाटकों में तनवीर लोक रंगमंच के तत्त्वों से संस्कृत नाटकों की प्रदर्शन पद्धति और भरत मुनि के नाट्यशास्त्र की रंग युक्तियों से भारतीय दृष्टि की स्थापना करते हैं जिसने आगे हमारी अपनी रंग दृष्टि की अनंत संभावनाओं के द्वार खोले।’ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आचार्य और सुपरिचित कवि-आलोचक प्रो. आशीष त्रिपाठी ने उक्त विचार अभिरंग के सत्रारम्भ समारोह में व्यक्त किये। हिन्दू कालेज की हिंदी नाट्य संस्था द्वारा आयोजित इस समारोह में प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय रंग दृष्टि और रंग शैली की खोज के प्रारंभिक संकेत इप्टा तथा उसके कलाकारों उदयशंकर, शान्तिवर्धन, शांता गांधी आदि के काम में मिलते हैं लेकिन इसे पूर्णाकार देने और लोक में स्वीकृत कराने- मान दिलाने के लिए हबीब तनवीर के योगदान को भूला नहीं जा सकता। प्रो. त्रिपाठी ने पश्चिम की यथार्थवादी दृष्टि के विपरीत भारतीय रंगशैली को दर्शकों की भागीदारी वाली, उनका रंजन और शिक्षण करने वाली रंगशैली बताया जिसमें लोकनाटकों जैसी सहजता, पुनर्नवता और जीवंतता विद्यमान है। उन्होंने भारतीय लोक नाट्य शैलियों यथा यक्षगान, नौटंकी, ख्याल, माचा, नकल, कथकली इत्यादि की विस्तार से चर्चा की और भारतीय रंग दृष्टि से इनके सम्बन्ध की व्याख्या की। व्याख्यान के बाद विद्यार्थियों से हुए संवाद के दौरान एक सवाल के जवाब में प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि प्रत्येक कार्य के लिए सरकार का मुखापेक्षी होना ठीक नहीं है। उन्होंने रंगमंच को जनता की गतिविधि बताया जिसे साधारण लोग ही करते रहे हैं।
अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ हिंदी आलोचक प्रो. जीवन सिंह ने कहा कि नाटक सामाजिक विधा है क्योंकि मंच अकेले आदमी से नहीं बनता। उन्होंने इसे बडी विधा बताने का तर्क इसकी सार्वजनिकता बताया। प्रो. सिंह ने संगीत और नृत्य को नाटक के लिए अपरिहार्य बताया जिनके मेल से ही नाटक का जन्म होता है। राजस्थान की अलीबख्शी ख्याल परम्परा का उल्लेख करते हुए उन्होंने रंगमंच में भारतीय दृष्टि को लोक से अभिन्न बताया। उन्होंने कहा कि विभिन्न लोक शैलियों के रास्ते ही भारतीय रंगदृष्टि को समझा जा सकता है। प्रो. सिंह ने अलीबख्शी ख्याल के कृष्ण-यशोदा संवाद के कुछ पद भी सुनाए। अभिरंग की सत्र 2019-20 की कार्यकारिणी की घोषणा भी प्रो.सिंह द्वारा की गई।
इससे पहले अभिरंग के परामर्शदाता डॉ. पल्लव ने अभिरंग के इतिहास और गतिविधियों का परिचय दिया। हिंदी विभाग के वरिष्ठ अध्यापक डॉ. रामेश्वर राय ने प्रो. आशीष त्रिपाठी और डॉ. रचना सिंह ने प्रो. जीवन सिंह का शाल ओढाकर स्वागत किया। कार्यक्रम का संयोजन हिंदी विभाग के अध्यापक डॉ धमेन्द्र प्रताप सिंह ने किया। अभिरंग के सूचना पट्ट का लोकार्पण भी अतिथियों द्वारा किया गया। समारोह में वरिष्ठ कवि राघवेंद्र रावत, कथाकार संदीप मील, डॉ. अभय रंजन, डॉ. प्रणव ठाकुर, अजय आनंद सहित अभिरंग से जुडे पुराने विद्यार्थी तथा शिक्षक भी उपस्थित थे। अंत में अभिरंग की संयोजक काजल साहू ने सभी का आभार व्यक्त किया।
प्रस्तुति ः विकास मौर्य
हिन्दू कालेज में जोशी का उद्बोधन
दिल्ली। युवाओं को अपने भीतर लक्ष्य तय करने का हौंसला और साहस उत्पन्न करना चाहिए। अपनी प्रकृति और रुचि के अनुकूल लक्ष्य तय कर न केवल अपने कैरियर बल्कि देश व समाज के लिए भी हम सार्थक कार्य कर सकते हैं। जाने माने हिंदी कथाकार और सेना में कर्नल रहे मुकुल जोशी ने हिन्दू कालेज के राष्ट्रीय कैडेट कोर के विद्यार्थियों को अपने उद्बोधन में कहा कि पाश की पंक्तियां सदैव प्रेरक बनी रहेंगी जिनमें वे कहते हैं कि सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। जोशी ने कहा कि युवाओं को देश और समाज के लिए स्वप्नद्रष्टा होना होगा। हम बडे सपने देखें और उन्हें पूरा करने के लिए संकल्पबद्ध हों। जोशी ने हिन्दू कालेज के इब्तिदा लॉन में राष्ट्रीय केडेट कोर के विद्यार्थियों को अपने सैन्य जीवन के अनुभव भी सुनाए। इससे पहले उनका स्वागत करते हुए राष्ट्रीय केडेट कोर के अधिकारी सब ले.डॉ. हरींद्र कुमार ने हिन्दू कालेज में एन. सी. सी की गतिविधियों और उपलब्धियों की चर्चा की। डॉ. कुमार ने बताया कि कर्नल जोशी में सेना और साहित्य का दुर्लभ संगम देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि युद्ध का मोर्चा और साहित्य के संसार में एक साथ जोशी जी ने सार्थक योगदान किया है। आयोजन में हिंदी विभाग के अध्यापक डॉ. पल्लव ने कहा कि सैन्य जीवन के प्रामाणिक अनुभवों के जीवंत चित्रण के लिए जोशी की कहानियों को जाना जाता है। डॉ. पल्लव ने उनके कहानी संग्रह मैं यहां कुशल से हूं की चर्चा करते हुए कहा कि कारगिल युद्ध और सीमा के कठिन सैन्य जीवन के दुर्लभ चित्र इस संग्रह में आए हैं। उन्होंने कहा कि जोशी जी की कहानियों में पहाड के जीवन की विसंगतियों के मार्मिक अनुभव उन्हें स्तरीय कथाकार बनाते हैं। चित्तौडगढ के सैनिक स्कूल के प्रधानाचार्य के रूप में किये गए जोशी जी के कार्यों को भी डॉ. पल्लव ने रेखांकित किया। अंत में कालेज के सीनियर कैडेट आयुष सैनी ने आभार प्रदर्शित किया।
-डॉ हरींद्र कुमार
प्रेम जनमेजय को ‘साहित्यश्री’ एवं लालित्य ललित, बसंती पंवार, माधव राठौड को साहित्य सृजन पुरस्कार
श्रीडूंगरगढ। यहां की साहित्यिक संस्था राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति की ओर से 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के अवसर पर सृजन पुरस्कार समारोह का आयोजन किया गया। इसमें संस्था की सर्वोच्च उपाधि साहित्यश्री एवं डॉ. नन्दलाल महर्षि हिन्दी, पं.मुखराम सिखवाल स्मृति राजस्थानी साहित्य सृजन व बृजरानी भार्गव युवा साहित्य पुरस्कार से अलंकृत किया गया। इस अवसर पर वैश्विक फलक पर हिन्दी विषय पर संगोष्ठी भी हुई।
संस्कृति भवन के सभागार में हुए इस समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. उमाकान्त गुप्त ने कहा कि साहित्यकार समाज को दर्पण दिखाता है। हिन्दी व्यक्ति का शरीर है और क्षेत्रीय भाषाएं इसका अंग है। हिन्दी एक विकसित एवं व्यापक भाषा है। हम अपनी भाषा, संस्कृति व अस्मिता को हिन्दी भाषा से ही बचा सकते हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी बाजारवाद की भाषा है। हमारी भाषा हिन्दी सभी तरह की समरसता से ओतप्रोत है।
समारोह के मुख्य अतिथि राजस्थानी कथाकार डॉ. चेतन स्वामी ने कहा कि हिन्दी राष्ट्र भाषा होते हुए भी अंग्रेजी इस भाषा को लील रही है। जब तक लेखक के विचार व शब्दों में दृढता नहीं होगी तब तक वह कोई रास्ता नहीं बना पाएगा। लेखक वैचारिक आधार के बिना कालजयी रचना का निर्माण नहीं कर सकता। साहित्य मनोरंजन व स्वान्त सुखाय का साधन नहीं है, बल्कि साहित्य का उद्देश्य होना चाहिए।
साहित्यश्री से पुरस्कृत प्रेम जनमेजय ने बताया कि हिन्दी का अस्त नहीं होने वाला है। हिन्दी दिन का उजाला व रात की चान्दनी है। हिन्दी हर गरीब की भाषा है। पुरस्कार अलंकार प्राप्त करना मेरे लिए गर्व की बात है। हिन्दी सृजन से पुरस्कृत लालित्य ललित ने कहा कि इस तकनीकी युग ने हिन्दी भाषा को गति दी है। विदेश में रह कर भी कोई हमारी भाषा व संस्कृति से अछूता नहीं है। बाजारवाद के समय में यह संस्था साहित्य व हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार समूचे भारत में कर रही है। राजस्थानी साहित्य सृजन से पुरस्कृत बसंती पंवार ने बताया कि हिन्दी धैर्य संवेदनाओं और राष्ट्र की सर्वोच्च एवं वैज्ञानिक भाषा है।
लायन महावीर माली ने कहा कि आज विदेशी नागरिक भी हिन्दी भाषा को अपना रहे है। यह हमारे देश के लिए सुखद अनुभव है। संस्था के अध्यक्ष श्याम महर्षि ने भाषा के विकास में संस्थागत एवं जन सहयोग की हिमायत करते हुए भाषायी विकास की बात कही। युवा साहित्यकार रवि पुरोहित ने कहा कि यदि कोई साहित्यकार किसी सामाजिक विदू*प या मूल्यगत विचलन के विरुद्ध आवाज नहीं उठाए तो यह सांस्कृतिक हमले का ही प्रतिरूप है। संस्था के डॉ. भंवर भादानी ने आभार जतायाा। इस दौरान एडवोकेट शोभाचन्द आसोपा, कोषाध्यक्ष रामचन्द्र राठी, सत्यदीप, कानाराम तर्ड, सहीराम जाट, डॉ.मदन सैनी, तुरजमल बोधीजा, भंवरलाल भोजक, श्रीभगवान सैनी, रेवन्तमल नैण, श्रीगोपाल राठी, विजयराज सेवग, सोम शर्मा, सुरेन्द्र महावर, दयाशंकर शर्मा सहित कई विद्वज्जन उपस्थित थे।
दिल्ली के प्रेम जनमेजय को सामाजिक सराकारों के लिए मल्लाराम माली की स्मृति में दी जाने वाली संस्था की सर्वोच्च उपाधि साहित्यश्री से अलंकृत किया गया। इसी प्रकार डॉ. नन्दलाल महर्षि स्मृति हिन्दी सृजन पुरस्कार दिल्ली के लालित्य ललित, पं. मुखराम सिखवाल स्मृति राजस्थानी साहित्य सृजन पुरस्कार बसंती पंवार व बृजरानी भार्गव स्मृति युवा साहित्य पुरस्कार जोधपुर के माधव राठौड को दिया गया। यह पुरस्कार डॉ. उमाकान्त गुप्त, डॉ. चेतन स्वामी, संस्था अध्यक्ष श्याम महर्षि, मंत्री बजरंग शर्मा, महावीर माली ने प्रदान किया। इस सम्मान स्वरूप ग्यारह-ग्यारह हजार रुपए व युवा पुरस्कार इक्यावन सौ रुपए, प्रशस्ति पत्र, शॉल एवं प्रतीक चिह्न दिया गया।
प्रस्तुति ः विजय महर्षि,
श्री डूँगरगढ
राष्ट्रीय बाल साहित्यकार सम्मेलन 2019 सम्पन्न
हाडी रानी के बलिदान के लिए प्रसिद्ध उदयपुर के सलूम्बर में साहित्यिक संस्था, सलिला द्वारा आयोजित तीन दिवसीय दसवां राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मलेन सार्थक और निर्धारित लक्ष्य को गरिमा प्रदान करता हुआ सम्पन्न हुआ।
इसमें सम्पूर्ण देश के 7 राज्यों के 80 से अधिक बाल साहित्यकारों ने भागीदारी की। समारोह का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण और बच्चों द्वारा प्रस्तुति से हुआ। इस अवसर पर राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय सवना, भींडर के बच्चों द्वारा एक नाटिका ‘भोपा जी’ प्रस्तुत किया। इसका संचालन ज्योत्सना सक्सेना, विद्यालय की प्राचार्या ने किया।
उद्घाटन सत्र में मशहूर चित्रकार चांद मोहम्मद घोसी के चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। जयेश द्वारा बहुत ही सुंदर ‘देश की जय बोल राणा’ ज्योतिपुंज द्वारा लिखित गीत प्रस्तुत किया गया। शकुंतला सरूपरिया के मीठे स्वर में वीणापाणि की वंदना की।
प्रथम उद्घाटन और लोकार्पण सत्र के मुख्य अतिथि मानस रंजन महापात्र, संपादक पाठक मंच, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास नई दिल्ली थे। अध्यक्षता उदयपुर युग के संस्थापक डॉ. जयप्रकाश पंड्या ‘ज्योतिपुंज’ ने की। पत्र लेखन प्रतियोगिता के निर्णायक के रूप में भूमिका का निर्वाहन करने वाले देवपुत्र के संपादक डॉ. विकास दवे तथा वरिष्ठ बाल साहित्यकार शीला पांडे, लखनऊ मंचासीन हुए। विशिष्ट अतिथि के रूप में संजीव जायसवाल ‘संजय’, लखनऊ और प्रसिद्ध बाल साहित्यकार गोविंद शर्मा थे। सलिला की स्मारिका सलिल प्रवाह इस वर्ष संगीता सेठी, जोधपुर पर केंद्रित थी वह भी मंचासीन हुई। इस सत्र का संचालन डॉ पंकज वीरवाल ने किया।
सभी मंचासीन अतिथियों को सलिला संस्था के पदाधिकारियों ने बैज लगाकर स्वागत किया। सलिला संस्था गीत स्नेहलता भंडारी, निलेश प्रजापत ने प्रस्तुत किया। स्वागत संबोधन सलिला के उपाध्यक्ष चंद्रप्रकाश मंत्री ने किया। संस्था की अध्यक्ष डॉ.विमला भंडारी ने निर्धारित लक्ष्य पर बीज वक्तव्य देकर सत्र आरंभ किया। तत्पश्चात् संस्था की स्मारिका ‘सलिल प्रवाह’, प्रतियोगिता के पत्र पर संकलित पुस्तक ‘पत्र तुम्हारे लिए’, संस्था का पहला प्रकाशन ‘सफल जीवन के सूत्र’ पुस्तक का लोकार्पण किया गया। सलिल प्रवाह के संपादक प्रकाश तातेड ने उद्बोधन और संगीता सेठी ने इस अंक पर अपने विचार और अनुभव व्यक्त किए। इसके बाद अंबालाल शर्मा को मंच पर बुलाया गया और उन्हें ‘मेवाड गौरव’ अलंकरण समर्पित किया गया। मंचस्थ अतिथियों द्वारा उद्बोधन हुआ। सत्र का आभार नरेंद्र मीण्डा और शिवनारायण आगाल ने दिया।

दूसरा सत्र पुरस्कार का समारोह का सत्र था। जिसमें स्वतंत्रता सेनानी ओंकारलाल शास्त्री स्मृति पुरस्कार प्रदान किए गए। इस पुरस्कार के पहले चरण में बाल साहित्य की पुस्तकों के लिए पुरस्कार दिए गए। जिसके तहत पत्र लेखन विधा पर पुस्तक ‘पाती बिटिया के नाम’ पर विकास दवे, इंदौर को पुरस्कृत किया गया। बाल कहानी की पुस्तक ‘सांची की गुडिया’ के लिए शीला पांडे, लखनऊ को पुरस्कृत किया गया। बाल पहेली पुस्तक के अंतर्गत ‘आओ बुद्धि का करें विकास’ के लिए प्रकाश तातेड को पुरस्कृत किया गया। पुरस्कार में शॉल ओढाकर, अभिनंदन पत्र और नकद राशि भेंट स्वरूप दी गई
शास्त्री पुरस्कार के दूसरे चरण में पत्र लेखन प्रतियोगिता में विजयी 13 साहित्यकारों को शाल, प्रशस्ति पत्र एवं नगद राशि प्रदान कर सम्मानित किया गया। यह सम्मान मुख्य अतिथि टीकम चंद्र बोहरा ‘अनजाना’, वरिष्ठ आर.ए.एस.अधिकारी जयपुर एवं विशिष्ट अतिथि उपजिला अधिकारी प्रकाश चंद्र रेगर, बीडीओ शुभ मंगल और प्रोफेसर रघुनाथ मंत्री की अध्यक्षता में तथा सलिला संस्था की अध्यक्ष डॉ.विमला भंडारी के कर कमलों द्वारा प्रदान किया गया। पुरस्कार की नकद राशि, अभिनंदन पत्र और शॉल प्रदान किए गए। सम्पूर्ण देश से प्राप्त 104 बच्चों के लिए लिखे गए पत्रों में से 15 बालसाहित्यकारों को पुरस्कार हेतु चयनित किया गया था। इस सत्र का संचालन शकुंतला सरूपरिया ने किया।
तीसरा सत्र सम्मान सत्र था, जिसमें सलिला संस्था से इस वर्ष 2 शिखर सम्मान दिए गए। पहला मानस रंजन महापात्र को और दूसरा संजीव जायसवाल ‘संजय’ को दिया गया। इसके पश्चात् सलिला साहित्य रत्न सम्मान दिए गए। जिसके तहत टीकम अनजाना और डॉ. जयश्री शर्मा, जयपुर, डॉ. शारदा कृष्ण, सीकर, उपेंद्र ‘अणु’, ऋषभदेव, कुसुम अग्रवाल, कांकरोली और जगदीश तिवारी, पूना को सम्मान दिया गया। सम्मान स्वरूप शॉल ओढा कर अभिनंदन पत्र और नकद राशि भेंट की गयी। इस सत्र का संचालन डॉक्टर संगीता महेश्वरी ने किया।
भोजन पश्चात् रात 8.00 बजे काव्यपाठ का सत्र था। जिसमें देर रात्रि तक सुदूर राज्यों से पधारे बाल साहित्यकारों ने अपनी रोचक रचनाओं से सभी का मनोरंजन किया। इस सत्र का संचालन शकुन्तला सरूपरिया ने किया।
दूसरे दिन का समारोह का शुभारंभ हाडी रानी के महल में पुष्पांजलि समारोह से हुआ। सभी साहित्यकार भंडारी सदन में एकत्र हुए। वहां से ढोल नगाडों के साथ सभी साहित्यकारों ने हाडी रानी के महल में जाकर पुष्प अर्पित किए। वहां पर सुप्रसिद्ध गीतकार श्री नंद किशोर निर्झर जी ने हाडी रानी के जीवनवृत्त पर आधारित प्यारी सी कविता प्रस्तुत की। इस अवसर पर नगरपालिका अध्यक्ष राजेश्वरी शर्मा ने सभी का स्वागत करते हुए बतौर मुख्य अतिथि अपना उद्बोधन दिया। सभी ने खूब फोटोग्राफी का आनंद लिया और यहां के संग्रहालय को भी देखा।
तत्पश्चात् समारोह सभागार में बच्चों का कवि दरबार सजाया गया। इसमें सवना, भींडर के बच्चों ने बाल साहित्यकारों की कविताओं का अत्यंत रोचक ढंग से काव्यपाठ किया। इसकी तैयारी प्राचार्या ज्योत्सना सक्सेना ने करवाई।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली द्वारा यहां बाल साहित्य परिचर्चा का एक तकनीकी सत्र पाठक मंच के संपादक मानस रंजन महापात्र के संचालन से प्रारंभ हुआ। इस सत्र में बाल साहित्य से संबंधित प्रश्नावली मंच विषय विशेषज्ञों द्वारा वार्तालाप के माध्यम से रखी। इस अवसर पर वार्ता के लिए डॉ. भैरूलाल गर्ग, विकास दवे, कुसुम अग्रवाल, शैलबाला और डॉ. विमला भंडारी ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। सभागार से बच्चों ने भी प्रश्नों के उत्तर दिए तो शोधार्थी हरसन मेघवाल ने भी अपने जवाब प्रस्तुत किए। सभागार में बैठे विद्वानों में गोविंद शर्मा और राजकुमार जैन ‘राजन’ ने भी अपनी बात परिचर्चा के दौरान रखी। सत्र में बाल साहित्य के विभिन्न पहलुओं पक्षों पर सार्थक विचार विमर्श हुआ।
समारोह के समापन सत्र की अध्यक्षता की डॉ. भैरूलाल गर्ग ने। मुख्य अतिथि थे पूर्व जिला प्रमुख छगनलाल जैन। मंच पर विशिष्ट अतिथि के तौर पर राजकुमार जैन, सूर्यलता जायसवाल और भगवती प्रसाद गौतम उपस्थित थे। शास्त्री पुरस्कार के तहत दिए जाने वाले तीसरे चरण के बाल प्रतिभा पुरस्कार महाविद्यालय और विद्यालय के बालकों को मंच द्वारा प्रदान किए गए। सलिला संस्था की अध्यक्ष डॉ. विमला भंडारी, कोषाध्यक्ष जगदीश भंडारी एवं मंचस्थ अतिथियों ने गोविंद शर्मा का शॉल ओढा कर प्रतीकचिह्न देकर अभिनंदन किया। सलिला संस्था की ओर से समारोह में आए सभी अतिथियों और संभागियों को प्रतीकचिह्न दिए गए। बच्चों को पुरस्कार दिए गए। सभी का आभार शास्त्री परिवार के मुकेश मेवाडी और डॉ.विमला भंडारी ने आभार का प्रदर्शन किया। सम्मेलन का समापन राष्ट्रीयगान ‘जन-गण-मन’ गाकर हुआ।
डॉ.देशबन्धु शाहजहांपुरी, शाहजहांपुर


पहला स्वतन्त्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना स्मृति सम्मान प्रो. माधव हाडा को चित्तौडगढ 02-09-2019 सुप्रसिद्ध स्व-तंत्रता सेनानी रामचंद्र नन्दवाना के जन्म शताब्दी वर्ष में साहित्य संस्कृति के संस्थान संभावना द्वारा प्रारम्भ किये गए स्वतन्त्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना स्मृति सम्मान की घोषणा कर दी गई है। संभावना के अध्यक्ष डॉ. के सी. शर्मा ने बताया कि पहला ‘स्वतन्त्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना स्मृति सम्मान’ उदयपुर निवासी माधव हाडा को उनकी चर्चित कृति ‘पचरंग चोला पहन सखी री’ पर दिया जाएगा। डॉ शर्मा ने बताया कि बनारस निवासी वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार प्रो. काशीनाथ सिंह, भोपाल निवासी वरिष्ठ हिंदी कथाकार स्वयं प्रकाश और जयपुर निवासी वरिष्ठ लेखक डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की चयन समिति ने सर्व सम्मति से मीरां पर लिखी गई इस कृति को पुरस्कार के योग्य पाया। काशीनाथ सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि विगत वर्षों में आई मध्यकाल के साहित्य पर यह किताब एक नयी दृष्टि से विचार करती है और मीरां जैसी कवयित्री पर हिंदी समाज का ध्यान फिर से ले जाती है। स्वयं प्रकाश ने इस पुस्तक को मीरां पर एक नयी और मौलिक दृष्टि और नए प्रमाणों के साथ रौशनी डालने वाली कृति बताया। डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने अपनी अनुशंसा में इसे शोध और अकादमिकी की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना। डॉ. अग्रवाल ने संस्तुति में कहा कि शोध और अकादमिकी में हिंदी साहित्य का मान बढाने वाली दुर्लभ कृतियों में ‘पचरंग चोला पहन सखी री’ का नाम लिया जाएगा। डॉ. शर्मा ने बताया कि ‘स्वतन्त्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना स्मृति सम्मान’ में कृति के लेखक को ग्यारह हजार रुपये, शाल और प्रशस्ति पत्र भेंट किया जाएगा। उन्होंने कहा कि चित्तौडगढ में आयोज्य समारोह में डॉ. हाडा को सम्मानित किया जाएगा। संभावना द्वारा पुरस्कार के संयोजक डॉ. कनक जैन ने बताया कि राष्ट्रीय महत्त्व के इस सम्मान के लिए देश भर से कुल चौंतीस कृतियां प्राप्त हुई थीं, जिनके मूल्यांकन के पश्चात् गुणवत्ता और नवीनता के आधार पर चयन समिति ने अपनी अनुशंसा में ‘पचरंग चोला पहन सखी री’ को सम्मान की कालावधि की श्रेष्ठतम कृति घोषित किया।
- डॉ. कनक जैन
मनोविश्लेषण प्रेमचंदोत्तर उपन्यासों की मौलिक प्रवृत्ति है - दीप्ति कुलश्रेष्ठ
जोधपुर। ‘‘प्रेमचंदोत्तर हिन्दी उपन्यासों की सबसे प्रमुख और मौलिक प्रवृत्ति मनोविश्लेषण है। बीसवीं शती के हिन्दी उपन्यासों में मनोवैज्ञानिकता की प्रेरणा पाश्चात्य उपन्यासकारों से गृहीत है। यही वह समय था जब सिगमंड फ्रायड के मनोविश्लेषण और स्वप्न सिद्धांतों की समूचे यूरोप में धूम मच चुकी थी। स्नायु रोगियों और मनोचिकित्सा के अपने अनुभवों को आधार बनाकर जो सिद्धान्त उन्होंने प्रतिपादित किए* उन सिद्धांतों ने साहित्य और कला की दुनिया में शीघ्र ही स्वीकृति पाकर अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया था।’’ ये विचार गांधी भवन में अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य परिषद् के तत्त्वावधान में आयोजित ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम की मुख्य वक्ता कथाकार दीप्ति कुलश्रेष्ठ ने व्यक्त किए। आगे आपने कहा कि ‘राजस्थान का हिंदी उपन्यास अपने कथ्य, वस्तु, चरित्र आदि की दृष्टि से निश्चित रूप से हिन्दी की केंद्रीय उपन्यास धारा के अत्यधिक निकट है। यह भी दृष्टव्य है कि मनोविश्लेषण की प्रवृत्ति का स्पर्श भी इन उपन्यासों में हुआ है। यद्यपि सामंती और आंचलिक संदर्भों से सम्पन्न उपन्यास लेखन की परंपरा सर्वाधिक पुष्ट रही है।’’
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए परिषद् के अध्यक्ष जाने माने आलोचक मोहनकृष्ण बोहरा ने कहा कि ‘‘साहित्य में मनोविज्ञान का प्रवेश फ्रायड के अवतरण के बाद हुआ। इससे पहले जो मनोविज्ञान दिखाई पडता है वह रचनाकार की सूक्ष्म समझ की उपज है। मानव मन को जितना लेखक ने समझा है मनोविज्ञान उसका ऋणी है। स्वयम फ्रायड ने दोस्तोवयस्की से अपने सिद्धान्त ग्रहण किए थे। हमारे साहित्य में सूरदास में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है। वह फ्रायड की देन नहीं है। तब फ्रायड का जन्म भी नहीं हुआ था। लेकिन आज के साहित्य में जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव मिलता है वह फ्रायड, एडलर और युंग के सिद्धांतों की देन है। यह प्रभाव ज्यादातर पात्रों के आचरण वैचित्र्य में दिखाई पडता है। इसका कारण कहीं हीनता ग्रंथि होती है तो कहीं दमित यौन भावना से उपजी कुंठा या उपजा विद्रोह। ऐसी रचनाओं को मनोविश्लेषण के आलोक में ही समझा जा सकता है।’’
परिषद की महामंत्री डॉ. पद्मजा शर्मा ने बताया कि कार्यक्रम के ‘प्रश्नोत्तर सत्र’ में कथाकार हरिप्रकाश राठी, एम. मुबीन और गौतम खंडप्पा आदि के प्रश्नों के जवाब दीप्ति कुलश्रेष्ठ ने दिए। कार्यऋम के प्रारम्भ में माँ सरस्वती को अतिथियों ने पुष्प अर्पित किए। धन्यवाद ज्ञापन कथाकार और शाइर हबीब कैफी ने किया। डॉ. वीणा चूंडावत ने कार्यक्रम का सुंदर संयोजन किया।
कार्यऋम में डॉ. सत्यनारायण, मीठेश निर्मोही, डॉ.कौशलनाथ उपाध्याय, डॉ. फतेहसिंह भाटी, प्रगति गुप्ता, माधव राठौड, कमलेश तिवारी, दशरथ सोलंकी, डॉ. बी एस. जैन, संगीता सेठी, डॉ. रंजना उपाध्याय, रेणु वर्मा, अशफाक अहमद फौजदार, संतोष चौधरी, डॉ. शालिनी गोयल, मधुर, डॉ. कल्पना तोमर, डॉ. संध्या शुक्ला, सुशील एम. व्यास, शशि त्यागी सहित कई साहित्यकार, साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

प्रस्तुति ः डॉ. पद्मजा शर्मा

‘सावन में संकल्प’ की हुई अंतिम काव्यगोष्ठी
भीलवाडा,18 अगस्त। भीलवाडा की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक संस्था संकल्प की ओर से सावन माह की अन्तिम काव्यगोष्ठी शास्त्री नगर में दाहरसेन सर्कल पर स्थित राजकुमार सोनी के निवास पर आयोजित की गई जिसका संयोजन व अध्यक्षता की राधेश्याम गर्ग अभिनव ने एवं मुख्य अतिथि थे ओम प्रकाश सोनी। महद्र शर्मा की सरस्वती वंदना से काव्यगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। संस्था महासचिव डॉ. एसके लोहानी खालिस ने बताया कि इस काव्यगोष्ठी में पीडित मानवता, मोदी सरकार द्वारा धारा-370 हटाने,पाकिस्तान के व्यवहार आदि पर एक से बढकर एक सूफियाना रचनाएँ प्रस्तुत की गई। रेखा लोढा स्मित ने ‘हाथ जलाए बैठे हैं नफरत के अंगारों से’, नरेंद्र दाधीच ने ‘क्या बचपन था क्या बचपन की मस्ती थी,कच्ची पगडंडी वाली बस्ती थी’, अरुण शर्मा अजीब ने ‘ये वतन हमारा है, ये वतन तुम्हारा है’, ओम उज्ज्वल ने ‘कश्मीरी के सिर की घाटी आह्वान जब-जब करती है, कलम भवानी कालजयी तू सिंहासन पर चढती है’, महेंद्र शर्मा ने ‘चाहों की हर टूटन के साथ ही मर गया होता मैं, शायर अगर नहीं होता हर बार मर गया होता मैं’ और डॉ. एसके लोहानी खालिस ने ‘सारे जहाँ को इश्क-मुहब्बत की बहार दो, मिलजुल के बनाए इस घरौंदे को संवार दो’ व ‘आज हमें इक नई दुनिया की दरकार हो, जिसमें एक मजहब एक बुलंद सरकार हो’ सरीखी रचनाएँ प्रस्तुत कर गोष्ठी में चार चाँद लगा दिए। इसी प्रकार डॉ. महावीर बैरागी ने ‘जिंदगी धुआँ-धुआँ सिगरेट की मानिन्द, हर कश में राख हो रही बाकी बचा तो क्या?’, निपुन शुक्ला ने ‘उम्मीद है कहानी किरदार खुद कहेंगे’, रतन चटुल ने ‘जीवन के प्रश्न चिह्न का उत्तर नहीं मिला’ एवं राधेश्याम गर्ग अभिनव ने ‘ज्यों-ज्यों कूल निकट आता है, उदधि का होता विस्तार’ सुनाकर गोष्ठी की सार्थकता सिद्ध की। ओमप्रकाश सोनी, निहाल सोनी, शरद सोनी एवं वीरेंद्र लोढा ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
भारत छोडो आंदोलन पर तुषार गाँधी के यादगार उद्गार
जयपुर, 9 अगस्त 2019, गाँधी विरासत मंच, जयपुर द्वारा आज भारत छोडो आंदोलन की 77वीं जयंती के अवसर पर भारत छोडो आंदोलन व आज की चुनौतियां विषय पर कार्यक्रम का आयोजन पूर्व न्यायाधीश श्री विनोद शंकर दवे की अध्यक्षता में आयोजित किया गया जिसमें मुख्य वक्ता महात्मा गाँधी के प्रपौत्र श्री तुषार गाँधी व विशिष्ट अतिथि पूर्व न्यायाधीश श्री पानाचंद जैन थे। अपने संबोधन की शुरुआत 9 अगस्त 1942 को भारत छोडो आंदोलन के अवसर पर कस्तूरबा गाँधी से जुडी महत्त्वपूर्ण घटना का वर्णन करते हुए की और इस घटना को सुनाते हुए श्री तुषार गांधी अत्यंत भावुक हो गए और उनकी आंखों में आँसू आ गए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि बापू ने तो ‘अंग्रेजो भारत छोडो’ का नारा दिया था लेकिन आज जरूरत इस बात की है अशिक्षा, गरीबी, साम्प्रदायिकता, असहिष्णुता, भ*ष्टाचार, तानाशाही जैसी बुराइयों को भगाने के लिए भारत छोडो आंदोलन छेडने की आवश्यकता बताई। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आज के समय ‘रोल्ट एक्ट’ से भी खतरनाक कानून आ गए हैं लेकिन उनके खिलाफ आम जनता का खडा नहीं होना लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। इस अवसर पर जम्मू कश्मीर में धारा 370 को जिस असंवैधानिक तरीके से हटाया गया है और उस पर भी देशभर में जो जश्न का माहौल बनाया जा रहा है उस पर भी उन्होंने चिंता प्रकट करते हुए कहा कि यह कदम महात्मा गाँधी के आदर्शों के पूर्णतया खिलाफ है, उन्होंने ने देश के नागरिकों में जो अंधाधुंध धनलिप्सा बढती जा रही है उसका *ाक्र करते हुए कहा कि ‘धरती पर मौजूद संसाधन प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति करने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन एक भी व्यक्ति का लालच धरती में मौजूद संसाधन पूरा नहीं कर सकते हैं।’ गाँधी जी के इस प्रसिद्ध कथन का *ाक्र किया। इस अवसर पर बोलते हुए सभी वक्ताओं ने देश मे लोकतंत्र, संविधान पर बढते खतरे, पूँजीवाद समर्थक नीतियों व मेहनतकश विरोधी नीतियों, बढती हुई असहिष्णुता के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की व इन तमाम खतरों के प्रति एकजुट होकर संघर्ष करने व जनमत बनाने पर जोर दिया। कार्यक्रम में प्रमुख तौर पर राजस्थान समग्र सेवा संघ के अध्यक्ष सवाई सिंह, इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणवीर सिंह, राजस्थान सरकार के कैबिनेट मंत्री बी.डी.कल्ला, प्रोफेसर मोहन श्रोत्रिय, पत्रकार सुधांशु मिश्र, पूर्व न्यायाधीश टी.सी राहुल, सेबी के पूर्व चेयरमैन डी.आर मेहता, नरेंद्र आचार्य, वेद व्यास, रमेश थानवी, कृष्ण कल्पित, सनी सेबस्टियन, सुमित्रा चौपडा, निशा सिधु, प्रोफेसर रश्मि चतुर्वेदी, डॉक्टर इकबाल सिद्दिकी, प्यारेलाल शकुन, प्रोफेसर विधा जैन, प्रोफेसर पवन सुराणा, विजय स्वामी, सुनीता चतुर्वेदी, भंवर मेघवंशी, सत्यव्रत सामवेदी, रमेश शर्मा, शब्बीर कारपेंटर, हरकेश बुगालिया, आर.सी.शर्मा, भूरे सिंह, फादर विजय पाल, दीपचन्द माली, नरेंद्र सिंह, हेमेंद्र गर्ग, रामावतार कुंडल, एडवोकेट उमेश शर्मा, रतनलाल बैरवा, जसवंत गुर्जर, पवन देव, मोहित आजाद सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। कार्यक्रम के दौरान देश के मौजूदा माहौल पर नाटक भी प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम के प्रारंभ में मुख्यवक्ता तुषार गाँधी सहित अन्य विशिष्ट अतिथियों को बसन्त हरियाणा व अनिल गोस्वामी द्वारा स्मृति चिह्न प्रदान किया गया। मुख्य वक्ता तुषार गांधी द्वारा इस अवसर पर कालेज की वर्षों पुरानी सफाईकर्मी मुन्नी बाई को स्मृतिचिह्न व शाल प्रदान कर सम्मान किया गया। कार्यक्रम में युवा लेखक सन्दीप मील के संयोजन में व युवा चित्रकार अमित कल्ला के नेतृत्व में समारोह स्थल पर चित्रकारों की टीम ने चित्र बनाये। समारोह में बडी संख्या में कालेज की छात्राएं मौजूद थी। कार्यक्रम के अंत मे कनोडिया कालेज की प्रिंसिपल संगीता अग्रवाल ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर हसन ने किया।
चौपाल के मोहनकृष्ण बोहरा पर केंद्रित विशेषांक का लोकार्पण
जोधपुर। पढो तो पूरा पढो, तल तक जाओ। आगे बढो तो उत्स तक जाओ।’ हिंदी के वयोवृद्ध आलोचक प्रो. मोहनकृष्ण बोहरा ने उक्त विचार अपने अस्सीवें जन्मदिन पर चौपाल द्वारा आयोजित समारोह में व्यक्त किये। जोधपुर के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स के सभागार में आत्मीय जन को सम्बोधित करते हुए प्रो. बोहरा ने अपने वक्तव्य की शुरुआत एक पंजाबी कथन से की ‘तुस्सी साड्डा जुलूस करना चांदे हो, यानी आप लोग मेरा जुलूस निकालना चाहते हो। यह इस आयोजन पर उनकी हास्यपूर्ण प्रतिक्रिया थी, जिसमें करुणा और किंचित् नापसंदगी का स्वर भी साफ सुना जा सकता था। इसके बाद वे अपनी रौ में आए और फिर अपनी जीवन यात्रा, लेखन यात्रा का बहुत निर्मम और तटस्थ चित्रण किया। अपने साहित्यिक जीवन में स्व. नेमिचंद्र जैन ‘भावुक’ के अवदान को उन्होंने बहुत कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार किया। उन्होंने नयी पीढी को तुरंत प्रसिद्धि की प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए कहा कि अगर साहित्य कर्म में आ रहे हैं तो यह जानकर आओ कि आपको जीते जी कोई मान नहीं मिलेगा। उनकी यह सलाह भी बहुत महत्त्वपूर्ण थी कि अगर इतिहास ने किसी को भुला दिया तो इतिहास की उस गलती को भी सुधारा जाना *ारूरी है। यह बात उनके अपने काम के संदर्भ में भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है जिसकी गवाही उनकी पुस्तकें आलोचना के पूर्व आयाम और शिलिमुख देती हैं।
समारोह के अध्यक्ष विख्यात कवि -चिंतक डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने बोहरा जी की ही एक किताब के शीर्षक से खेलते हुए कहा कि हक सिर्फ तसलीमा ही नहीं, आत्मीयता का भी होता है। उनका संकेत इस बात की तरफ था कि बोहरा जी इस समारोह के पक्ष में नहीं थे। आचार्य जी ने बोहरा जी के साथ अपने सुदीर्घ और सघन रिश्तों की चर्चा की और फिर उनके आलोचक रूप का विश्लेषण करते हुए कहा कि वे छोटे-बडे का भेद किये बगैर गम्भीरता से पढते और बेबाकी से अपनी बात कहते हैं। आचार्य जी ने तसलीमा और फिर एलियट को केंद्र में रखकर किये गए बोहरा जी के काम की चर्चा की और फिर कहा कि कोई बडा दर्शन ऐसा नहीं है जो पूरी तरह त्रुटिमुक्त हो। मूल बात होती है मूल्य दृष्टि और बोहरा जी की मूल्य दृष्टि सहानुभूतिशील और निष्पक्ष है।
इस अवसर पर प्रो. बोहरा की कौटिल्य प्रकाशन द्वारा सद्य प्रकाशित दो पुस्तकों- रचनाकार का संकट और समकालीन कहानीकार ः नया वितान’ का लोकार्पण भी किया गया। इसी अवसर पर एटा से प्रकाशित हो रही चर्चित पत्रिका ‘चौपाल’ के प्रो. बोहरा पर केंद्रित विशेषांक साहित्य साधना के अस्सी वर्ष ः मोहनकृष्ण बोहरा’ का भी लोकार्पण हुआ। इस विशेषांक का सम्पादन जाने माने आलोचक डा.ॅ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने किया है। इस समारोह में बोहरा जी के अनेक शुभचिंतकों, प्रशंसकों व रचनाकारों ने छोटे-छोटे किंतु सारगर्भित वक्तव्य देकर इसे गरिमा प्रदान की। बनास जन के सम्पादक और युवा आलोचक डॉ. पल्लव का कहना था कि हिंदी आलोचना अभी तक मुख्यतः कविता केंद्रित रही है और उसमें कहानी पर कम ध्यान दिया गया है। ऐसे में प्रो. बोहरा की यहां लोकार्पित पुस्तक समकालीन कहानीकार एक बडे अभाव की पूर्ति करती है। पल्लव ने हमारे समय के बडे कवि नंद चतुर्वेदी की इस शिकायत का स्मरण करते हुए कि उत्तर प्रदेश वाले राजस्थान को अपनी साहित्यिक मण्डी समझते रहे हैं, इस बात पर उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि आज उत्तर प्रदेश की एक पत्रिका ने राजस्थान के एक बडे आलोचक पर अपना विशेषांक केंद्रित किया है। ‘चौपाल’ के सम्पादक डॉ. कामेश्वर प्रसाद सिंह ने कहा कि लघु पत्रिका आंदोलन की सार्थकता इसी बात में है कि चकाचौंध से दूर रहकर निष्ठा से साहित्य सेवा में लगे साहित्यकारों और विचारों का जन जन तक प्रसार करे। डॉ. माधव हाडा ने बोहरा जी के मनुष्यत्व को रेखांकित करते हुए उनके साथ बिताये गए समय की कुछ मार्मिक स्मृतियों को साझा किया। डॉ. हाडा का विचार था कि बोहरा जी ने कभी कहीं भी शॉर्ट कट नहीं अपनाया, और यही वजह है कि वे हिंदी में प्रायः हाशिये पर मानी जानी वाली पुस्तक समीक्षा को भी प्रतिष्ठा प्रदान कर सके। डॉ. हरीदास व्यास का विचार था कि एक आलोचक के रूप में बोहरा जी रूढ और जड होने से बचते हैं। इस आयोजन को प्रो. बोहरा की पौत्री झिलमिल द्वारा बनाई गई एक वीडियो फिल्म के प्रदर्शन ने एक भिन्न आयाम प्रदान किया। इस फिल्म का शीर्षक था- जीवन के मधुर क्षण। इस अवसर पर प्रो. मीनू रॉय, आशा बोथरा, भावेंद्र शरद जैन, डॉ पुष्पा गुप्ता, भागचंद सोलंकी, मुकेश भार्गव, प्रो. कैलाश कौशल और अदिति ने भी अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम के अंत में प्रो बोहरा के सुपुत्र मधुसूदन बोहरा ने कृतज्ञता ज्ञापित की।
प्रस्तुति ः डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
जस्टिस मघराज कल्ला की स्मृति में ऑल इंडिया मुशाइरा
22 अगस्त, 2019 की शाम जोधपुर के पीजी महाविद्यालय के सभागार में जस्टिस (स्व.) मघराज कल्ला की स्मृति में ऑल इंडिया मुशायरे का आयोजन किया गया। जोधपुर के अलावा जयपुर, भोपाल, नॉएडा, एटा और ग्वालियर से तशरीफ लाये शायरों ने शिरकत की। मुशायरे के मेहमाने खूसूसी पूर्व न्यायाधीश एवं कुलपति श्री एन एन माथुर साहब थे और सदारत जनाब शीन काफ निजाम की थी। मुशायरे का संचालन निसार राही ने किया। उर्दू एकेडेमी, जयपुर के सेक्रेटरी मोअ**ाम अली ने मेहमानों और शोराओं का स्वागत किया और उनके बाद श्री एन एन माथुर और शीन काफ निजाम ने मघराज जी कल्ला से जुडी अपनी यादों को शेयर किया। सब ने यह कहा कि कल्ला साहिब एक निहायत ही स्नेहपूर्ण व्यक्ति थे और जितनी पकड उनकी कानून पर थी उतनी ही साहित्य, खासकर उर्दू अदब की उनकी समझ और लगाव बेमिसाल थे। जस्टिस माथुर ने इस बात को खास तौर से रेखांकित किया कि जस्टिस कल्ला केवल फैसले ही नहीं करते थे बल्कि न्याय करते थे। मोअ**ाम अली ने जब मघराज जी साहब के लिए यह शेर पढा ‘बिछुडा वह इस तरह की रुत ही बदल गयी। एक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया। और सद्र शीन काफ निजाम, जो मघराज जी के बहुत करीबी दोस्त हैं, ने जब उनकी शख्सियत को याद करते हुए यह शेर पढा कि ‘न देर तक तुझे मैं खुद ही रोकता ऐ दोस्त, तू जिस अदा से उठा है उसी का रोना है।’ तो माहौल एक गमगीनियत की आगोश में जाने लगा, लेकिन निसार राही ने अपने हुनर से मुशायरे को शायरी और कलाम से जोडा और एक तरतीब से शोराओं को कलाम पढने की दावत दी तो फिर जल्दी ही मुशायरा अपने रंग में आ गया और हॉल तालियों, वाह,वाह, क्या बात है, मुकर्रर इरशाद जैसे लफ्*ाांे से गूँजने लगा। इस्राकुल माहिर, अफ*ाल जोधपुरी, निसार राही, शीन मीम हनीफ, शाकिर अली (सभी जोधपुर से) के बाद आदिल (जयपुर), नासिर अदीब (बीकानेर), अ*म शाकरी, सालिम सलीम, मदन मोहन दानिश, मलिकजादा जावेद, नुसरत मेहंदी (भोपाल) और मलिका नसीम ने अपने कलाम पढे। हरेक शायर और शायरा का अपना अलग अंदा*ा था और जोधपुर के श्रोताओं ने भी अपने शहर की सुनने की रवायत को बरकरार रखते हुए तबियत से कलाम सुने और दाद दी। मुशाइरे के बाद जो अशआर मेरे जेहन में रह गए- दौड में वो लोग जीते जिन पे थी बैसाखियाँ, पाँव वाले रास्तों पर तफसरा करते रहे (हबीब कैफी), अपने जैसी कोई तस्वीर बनानी थी मुझे, मिरे अंदर से सभी रंग तुम्हारे निकले (सालेम सलीम )। मुशाइरे का समापन जनाबे सद्र शीन काफ निजाम के कलाम के साथ हुआ कि अब कोई दोस्त नया क्या करना, भर गया *ाख्म हरा क्या करना / जिसको मुँह तक का कहा याद नहीं, उसके हाथों का लिखा क्या करना //

प्रस्तुति ः
डॉ. अरविन्द कुमार पुरोहित,
जोधपुर
फलोदी में हुआ साहित्यकारों का सम्मान
आशु कवि रतन लाल व्यास साहित्यिक एवं शैक्षणिक संस्थान फलोदी (जोधपुर) के तत्वावधान में 7 सितंबर 2019 को पूनम पैलेस फलोदी में आशु कवि रतन लाल व्यास की 7वीं पुण्य तिथि के अवसर पर साहित्यकार सम्मान, काव्य कृतियों का विमोचन कार्यऋम समारोहपूर्वक आयोजित किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. आईदान सिंह भाटी ने अध्यक्षीय उद्बोधन व्यक्त करते हुए कहा कि शब्द और संस्कार की विरासत संभालना बेहद मुश्किल कर्म है और आज के आर्थिक चुनौतियों के समय में कोई बिरला ही इसे मन, वचन और कर्म से अंगीकार कर सकता है। साहित्य-संस्कृति के मर्मज्ञ डॉ. भाटी ने कहा कि साहित्य और काव्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करते हैं। मनुष्य का जीवन बढे चलो, बढे चलो का नाम है। समाज में साहित्य का वातावरण सदैव मजबूत होना चाहिए, क्योंकि साहित्य समाज के लिए बेहद जरूरी है। किसी शब्दधर्म को इससे बेहतर तरीके से याद नहीं किया जा सकता कि उसकी स्मृति में शब्द और संस्कार की विरासत को आगे बढाया जाए।
श्रोताओं से खचाखच भरे सभागार में इस अवसर पर सबसे पहले मंचासीन अतिथियों ने मां सरस्वती एवं आशु कवि स्व. रतन लाल व्यास की तस्वीर पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि द्वारा कार्यऋम का शुभारंभ हुआ। संस्थान के अध्यक्ष एडवोकेट श्रीगोपाल व्यास ने अतिथियों का स्वागत सत्कार किया। समारोह में हिंदी व राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार नवल जोशी (पोकरण) को आशु कवि रतनलाल व्यास राजस्थान प्रदेश श्रेष्ठ सेवा एवं सृजन पुरस्कार-2019 से नवाजा गया। सम्मान स्वरूप शॉल, श्रीफल, स्मृति चिह्न, सम्मान पत्र एवं 11000 /- रुपये की नकद राशि से मंचासीन अतिथियों ने सम्मान किया। बीकानेर के वरिष्ठ साहित्यकार रवि पुरोहित को इसी सम्मान एवं पुरस्कार राशि से नवाजा गया। कार्यऋम में अब्दुल समद ‘राही’(सोजत) की राजस्थानी गजल की पुस्तक ‘म्हें कांई कैऊं’ के लिए आशु कवि रतनलाल व्यास साहित्यरत्न पुरस्कार - 2019 से सम्मानित किया गया। पुरस्कार स्वरूप शॉल, श्रीफल, स्मृति चिह्न, प्रमाण पत्र एवं 3100 /- रुपये नकद राशि से सम्मान किया गया। युवा साहित्यकार एवं शिक्षक सूर्य प्रकाश जीनगर (फलोदी) को काव्य कृति ‘रेत से हेत’ के लिए आशु कवि रतनलाल व्यास श्रेष्ठ साहित्य सृजन (पांडुलिपि) पुरस्कार -2019 से सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरूप इन्हें शॉल, श्रीफल, स्मृति चिह्न, सम्मान पत्र एवं 1100/- रुपये नकद राशि देकर मंचासीन अतिथियों द्वारा सम्मान किया गया। कार्यऋम में मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम प्रकाश व्यास, कार्यऋम अध्यक्ष डॉ. आईदान सिंह भाटी, विशिष्ट अतिथि प्रवीण व्यास (संपादक-फलोदी जयते) का सम्मान साफा, माल्यार्पण, स्मृति चिन्ह एवं सम्मान पत्र द्वारा भव्य सम्मान किया गया। मुख्य अतिथि प्रेमप्रकाश व्यास ने इस अवसर पर कहा कि फलौदी नमक के लिए देश में मशहूर है। इस बेहतरीन आयोजन के द्वारा देश और प्रदेश में साहित्य के द्वारा जाना जाएगा। नवोदित रचनाकारों को सम्मानित करने एवं उन्हें मंच उपलब्ध करवाने का प्रयास संस्थान द्वारा सराहनीय कार्य है। समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार नवल जोशी, अब्दुल समद ‘राही’, युवा रचनाकार सूर्य प्रकाश जीनगर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए सम्मान के लिए संस्थान का आभार व्यक्त किया। बीकानेर के वरिष्ठ साहित्यकार रवि पुरोहित ने इस अवसर पर अपने उद्बोधन में कहा कि स्वार्थ की सत्ता, मतलब के अनुशासन के आज के समय में शब्द जैसे गिरवी रख दिया गया है। चौबीसों घंटे संस्कार व अध्यात्म के चौनल चलते हैं, पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। आंखों में पानी तो बचा ही नहीं और अगर कहीं भूल से बच भी गया तो शर्मिंदा-सा मुंह छुपाए पडा है। ऐसे में साहित्यकार का सम्मान एक संस्कार का सम्मान है और आने वाली पीढियों को संस्कारित करने का उपऋम है। वहीं साहित्यकार की सामाजिक जिम्मेदारी को बढा देता है। समारोह में मंचासीन अतिथियों ने संस्थान अध्यक्ष एडवोकेट श्रीगोपाल व्यास का प्रथम काव्य संग्रह ‘अनुगूंज बैचेन मन की’ और युवा रचनाकार सूर्य प्रकाश जीनगर का प्रथम काव्य संग्रह ‘रेत से हेत’ का लोकार्पण किया गया। मंचासीन अतिथियों एवं उपस्थित गणमान्य नागरिकों ने दोनों रचनाकारों को प्रथम काव्य संग्रह के प्रकाशन पर शुभकामनाएं दी। समारोह में बीकानेर से पधारे कवि विजय धमीजा और शंकर सिंह राजपुरोहित, युवा कवयित्री कुमारी सलोनी पुरोहित (जोधपुर) ने अपनी रचनाएँ सुनाई। हास्य और व्यंग्य से भरपूर कविताएँ सुनकर उपस्थित श्रोताओं ने करतल ध्वनि से कवियों का हौसला अफजाई की। संस्थान द्वारा कवियों का माल्यार्पण, स्मृति चिह्न एवं सम्मान पत्र द्वारा सम्मान किया गया। कार्यऋम का बेहतरीन संचालन डॉक्टर चंद्रभान विश्नोई (युवा रचनाकार-ओसिया) ने किया। संस्थान द्वारा इनका भव्य स्वागत किया गया। अधिवक्ता गोवर्धन जयपाल ने आभार व्यक्त किया। समारोह में संस्थान सचिव अब्दुल मजीद खिलजी (एडवोकेट), कोषाध्यक्ष मीना व्यास, राधिका व्यास, अगर चंद भाटी (पूर्व अध्यक्ष न.पा. फलोदी), माणकचंद जीनगर, यागचंद नागल, राधेश्याम चांदा, माणक मेघवाल, गोपाल जीनगर (पूर्व पार्षद), साहित्यकार शिवानी पुरोहित, डॉ. अरुण माथुर, मुरारीलाल थानवी, कांता पंवार, मुरली मनोहर व्यास, सिकंदर घोषी, अशोक कुमार मेघवाल, घीसूलाल चौरसिया, संजय जोशी सहित गणमान्य नागरिक और साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

सूर्यप्रकाश जीनगर
हरी सदन, इंदिरा कॉलोनी
फलोदी, जिला-जोधपुर (राज.) 342301
मो. नं. 9413 966 175