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सजग पाठक की गंभीर आलोचना

साहिल कैरो
हर आलोचक मूलतः पाठक ही तो होता है। बस फर्क इतना है कि वह अपनी ही नहीं बल्कि अन्य पाठकों की आवाज भी बन जाता है। किंतु आलोचना पढते हुए ऐसा कम ही महसूस होता है कि किसी पाठक का लिखा हुआ पढा जा रहा है, क्योंकि एक खास किस्म की गंभीर शैली का प्रयोग ही अमूमन हिंदी आलोचना में प्रचलित रहा है। मोहनकृष्ण बोहरा का लेखन गंभीर होते हुए भी पाठक की नजर से किया गया रचना-कर्म प्रतीत होता है। उनकी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘रचनाकार का संकट’ भी इसकी पुष्टि करती है।
‘रचनाकार का संकट’ के अनुक्रम को देखते ही एक बात साफ हो जाती है कि मूलतः यह पुस्तक नहीं है बल्कि लेखों का संग्रह है। लेख भी ऐसे जो भिन्न-भिन्न विषयों पर अलग-अलग समय में लिखे गये हैं। कुल अठारह लेख हैं। इनमें सात सैद्धांतिक आलोचना से, तीन व्यावहारिक आलोचना से और सात टी.एस.एलियट से संबद्ध लेख है (ऐसा नहीं कि एलियट संबंधी लेख आलोचना के उक्त वर्गों से परे हैं, बस विषय-केंद्रीयता को उजागर करने के लिए उनका अलग से जिक्र है) और एक 2007-2008 ई. में जनसत्ता में प्रकाशित साहित्यकारों के लेखों पर की गयी टिप्पणी ‘क्यों भटक जाती हैं हमारी बहसें’ है। यह देाकर संतोष होता है कि सैद्धांतिक आलोचना के प्रति आलोचकों की जो आत्मघाती उदासीनता रही वह बोहरा जी में नहीं मिलती। स्वातंत्र्योत्तर आलोचना में साहित्य व उससे जुडे मूल प्रश्नों पर विचार करने की प्रवृत्ति उत्तरोत्तर कम होती गयी, इतनी कि लगभग नगण्य ही रह गयी। केवल साहित्यिक आन्दोलन और कुछेक रचनाकार ही आलोचना का पर्याय होकर रह गये, जबकि हिंदी आलोचना की शुरूआत में तमाम बडे आलोचकों ने सैद्धांतिक विषयों पर पर्याप्त चिंतन किया। शुक्ल जी का ‘कविता क्या है’, ‘काव्य में रहस्यवाद’ आदि निबंध और रस एवं साधारणीकरण पर किया गया चिंतन इसके प्रतिनिधि उदाहरण हैं’ तो द्विवेदी जी ने ‘साहित्य सहचर’ में इस तरह की व्यापक चर्चाएँ जो की वो तो हैं ही,उसके अलावा भी उनके रचना-कर्म में ये प्रश्न बराबर बने रहे। कहने को कहा जा सकता है कि उस समय क्योंकि हमारे पास उस तरह से आधुनिक साहित्य के लिए साहित्यशास्त्र या प्रतिमान इत्यादि नहीं थे तो उनका यह लेखन ऐतिहासिक आवश्यकता थी, जबकि बाद में इस तरह की समस्याओं का स्वरूप स्थिर हो जाने से इसकी आवश्यकता नहीं रही। पर यह बात सिर्फ कहने के लिए ही कही जा सकती है। जिस प्रकार साहित्य कोई स्थिर अनुशासन नहीं उसी तरह उससे जुडे प्रश्ा* और प्रतिमान भी कोई ब्रह्म वाक्य नहीं जो एक बार कह दिए गये तो फिर स्थिति भूतो न भविष्यति वाली हो। समय और समाज के हिसाब से बदलते साहित्य से सम्बन्धित संदर्भ भी बदलते रहते हैं. ऐसे में सैद्धांतिक आलोचना की आवश्यकता भी निरंतर रहेगी. हमारे वर्तमान समय में जब साहित्य भयानक बाहरी दबावों (राजनीति, बाजार, तकनीक और उसके गैजेट्स इत्यादि) और निरंतर तेज गति से बदलती दुनिया से इस कदर जूझ रहा है तब तो इसकी आवश्यकता और भी तीव्रता से महसूस की जानी चाहिए।
अलबत्ता बोहरा जी ने सैद्धांतिक आलोचना संबंधी सात लेख लिखे हैं जिनमें से तीन (साहित्य में सांस्कृतिक संकट की अभिव्यक्ति का प्रश्न, स्वाधीन भारत की सांस्कृतिक संरचना और हिंदी आलोचना; और सांस्कृतिक औपनिवेशिकता और भाषा) संस्कृति और साहित्य के अन्तःसम्बन्ध पर हैं तो चार अन्य भिन्न भिन्न विषयों पर, परन्तु अपनी हिस्सेदारी में ये पुस्तक का पाँचवाँ हिस्सा भर हैं। मेरी इस बात से यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिये कि मैं गुणवत्ता पर मात्रा को रख रहा हूँ। कहने का आशय इतना भर है कि संख्या में इस तरह के लेख भले ही ज्यादा हों पर अपेक्षाकृत वे बहुत छोटे हैं। बोहरा जी ने अपनी ऊर्जा दूसरे लेखों पर अधिक खर्च की है। सैद्धांतिक आलोचना-लेखन की कम होती प्रवृत्ति यहाँ भी दिखती है। पर फिर भी मामला यहाँ बेहतर ही है। संस्कृति और साहित्य के आपसी सूत्रों की तलाश करते चार लेखों में से एक (सांस्कृतिक औपनिवेशिकता और भाषा) रामस्वरूप चतुर्वेदी की मान्यता से वैचारिक असहमति के रूप में लिखा गया है। चतुर्वेदी जी ने अपनी पुस्तक कविता का पक्ष में लिखा, फिरदौसी, हाफिज के काव्य से लेकर मीर, गालिब का काव्य भारत म इस्लामी शासन को क्रमशः स्वीकार्य बनाने में सूक्ष्म स्तर पर सहयोग करता है और उसी तरह मिलन, शेक्सपीयर से लेकर टी.एस.एलियट तक का साहित्य अंग्रजी-प्रभुत्व को बनाये रखने में उपकारक हुआ है....मूल भाव यह है कि किसी जाति के प्रभुत्व के परिवेश में पढे जाने पर उस जाति के अन्यथा आक्रमण और अत्याचार को सहनीय बना देता है बल्कि उस अत्याचार की तुलना में वह साहित्य और अधिक मानववादी रूप में उभर उठता हैं।’
ÕôãÚUæ Áè §â•¤æ तार्किक निराकरण करते हुए लिखते हैं, ‘उन्हें (चतुर्वेदी जी) हम लेखक द्वारा व्यवहृत भाषा के आधार पर ही उसकी सांस्कृतिक वफादरी तय करते देखते हैं। फारसी-उर्दू की कविता ने भारत में इस्लामी शासन को सह्य और स्वीकार्य बनाने में एक भूमिका निभाई, यह एक बात हो सकती है लेकिन इसके सहारे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर उर्दू शायर इस्लाम-परस्त होता है या उसके हित इस्लामी शासकों से जुडे होते हैं....उर्दू के अनेक शायर ऐसे हैं जिनकी धार्मिक आस्था इस्लाम में है लेकिन जो केवल भाषा के आधार पर निर्णय करेंगे और उर्दू को इस्लाम से जोडेंगे उनके लिए तो सारा धान बाईस पसेरी होगा.....कसौटी भाव-दृष्टि ही हो सकती है, विषय या भाषा नहीं। ‘आलोचना रचना की पूरक होती है’ और ‘लेखक और पाठक’ उनके शिक्षोपयोगी लेख हैं तो ‘राष्ट्रीय एकता ः रचनाधर्मिता के संदर्भ में’ और ‘कला आलोचना और उसकी भाषा’ गंभीर चिंतनपरक लेख हैं। ‘कला आलोचना और उसकी भाषा’ में साहित्य से संबद्ध लोगों द्वारा सिनेमा आदि कलाओं पर अधिकारपूर्वक लिखने की आदत को लक्षित करते हुए बोहरा जी ने स्पष्ट किया है कि एक सीमा तक तो साहित्य की शब्दावली कलाओं को साधने की छूट देती है, परन्तु क्योंकि हर कला की अपनी तकनीक और उससे सम्बन्धित शब्दावली होती है इसी से उसके बाद उस पर लिखने के लिए हमें उसका ज्ञान होना आवश्यक हो जाता है। अपेक्षित ज्ञान न होने की स्थिति में खुद को उसका विद्वान घोषित करने का मोह क्यों ही रखना। वे लिखते हैं, ‘संगीत को सुनकर हम उसका आनन्द लेते हैं लेकिन उस आनन्द का हम विश्लेषण करना चाहें तो हमें उसकी तकनीकी समझ हासिल करनी होगी। उसमें आरोह-अवरोह, कोमल-तीव्र स्वर होते हैं, राग-रागनियाँ होती हैं, तान पलटे, द्रुत-विलंबित, लय और तालें होती हैं. गायक की गायकी सही अनुशंसा करने के लिए इस तरह की तकनीकी जानकारी अपेक्षित होगी।’
बोहरा जी की ख्याति का आधार अगर कोई पुस्तक अब तक रही है तो वह ‘एलियट और हिंदी साहित्य-चिंतन’ है। टी.एस.एलियट पर रचित यह पुस्तक पाश्चात्य साहित्य-चिंतन के अध्येताओं में भी सम्मान अर्जित करती रही है। लगता है कि एलियट से बोहरा जी का कोई विशेष ही नाता है। स्वंतत्र पुस्तक के बाद इस पुस्तक में भी एलियट सम्बन्धी सात लेख संकलित हैं जो पुस्तक का लगभग आधा हिस्सा है। इनमें से दो आचार्य शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवदी और एलियट के चिन्तन में मिलने वाली समानताओं व भिन्नताओं का रोचक विवेचन प्रस्तुत करते हैं तो एक (टी.एस.एलियट का पद्य-नाट्य चिंतन) एलियट के आलोचना-कर्म के एक अपेक्षाकृत कम चर्चित पक्ष को सामने लाने का प्रयास हैं; शेष चार एलियट मान्यताओं पर किये गये काकुतर्कों के निराकरण हैं। यह अंतिम वर्ग व्याख्या की माँग करता है। डॉ. नगेन्द्र, एलियट और रिचर्ड्स ः प्रभाव संदर्भ’ नामक लेख इन तीनों की कुछ मान्यताओं का तुलनात्मक विवेचन तो है ही, साथ ही डॉ. नगेन्द्र द्वारा एलियट की आरम्भिक आलोचना को आधार बनाकर ही जो निष्कर्षात्मक व्याख्याएँ प्रस्तुत की गयीं, उनका तार्किक प्रतिकार भी है. अन्य तीन ‘एलियट की उत्तर आलोचना; मिथ तोडे जाने की आवश्यकता’ और ‘आर्नोल्ड की बेदी पर एलियट की बलि क्रमशः ‘आलोचना’ पत्रिका में प्रकाशित कृष्णदत्त शर्मा के लेख, श्री रुचिर के लेख और रमेशचंद्र शाह की पुस्तक ‘सबद निरन्तर’ की मान्यताओं का प्रतिकार है। यहाँ एक बात उल्लेख्य है कि बोहरा जी इन लेखों में अन्य विद्वानों की मान्यताओं काप्रतिकार तो करते हैं, पर कहीं भी यह ध्वनित नहीं होता कि मान्यता की बजाय चढाई लेखक पर ही की जा रही है। एक गरिमा वो हमेशा बरकरार रखते ह। यों जिस प्रकार साहित्य हमें जिंदगी से गुजरने की तहजीब देता है उसी तरह आलोचना साहित्य से गुजरने की तहजीब है, पर यह बात बहुत-से उत्साही और वैयक्तिक राग-द्वेष से लबालब भरे आलोचकों की समझ से परे है। बोहरा जी का लेखन इसका प्रतिमान सा गढता ही दिखाई देता है।
व्यावहारिक आलोचना के तीनों लेख- ‘कुँवर नारायण ः साहित्य जगत् में एक निरामिष उपस्थिति’, ‘प्रसाद की नाट्यभाषा पर ‘नाट्येतर विचार’,घृणा और प्रतिशोध की ज्वाला में जलता ‘गुलाम बादशाह’ नाटक का वस्तु- विश्लेषण - लम्बे है। पहला लेख यतीन्द्र मिश्र द्वारा संपादित ‘कुंवर नारायण ः उपस्थिति’ नामक पुस्तक पर विचार के रूप में भले ही लिखा गया हो, पर असल में इसकी मार्फत बोहरा जी कुँवर नारायण के कवि ही नहीं, कहानीकार और आलोचक पक्षों का भी विशद विवेचन करते हैं। पर मजे की बात यह है कि वे पुस्तक के लेखों पर विचार के साथ-साथ अपने खुद के चिन्तन के लिए बडे रचनात्मक ढंग से जगह बनाते चलते हैं। पुस्तक का ऐसा कोई लेख नहीं, जो बोहरा जी की दृष्टि और उनकी कलम के उल्लेख से बच गया हो। सम्पूर्ण लेख चार भागों में लिखा गया है। तीन में कविता, कहानी, आलोचना पर रचित लेखों का विवेचन है तो चौथे में बोहरा जी अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाने वाले पक्ष सम्पादन का विवेचन करते हुए मिश्र जी के प्रयास की प्रश्ंासा के साथ ही बहुत से अनुपयुक्त लेखों को भी शामिल करने पर चुटकी लेते हुए आपत्ति दर्ज कराते हैं कि सम्पादक ने कुँवर जी पर लिखने वाले किसी भी लेखक को नाराज करने की जहमत नहीं उठाई है। साथ ही यह साफ कर देते हैं कि कुँवर जी के कवि-पक्ष ही अधिक अच्छे लेख मिलते हैं। अपने लेख म बोहरा जी कुछ महत्त्वपूर्ण सूत्र देते हैं। मसलन कि, कैसे कुँवर जी के कवित्व पर पडे आलोचना के दबाव से उनकी कविता में परिवर्तन आता गया (उनकी काव्य-यात्रा में आये परिवर्तन और उस पर लिखी गयी आलोचना के माध्यम से माक्र्सवादी आलोचना के बदलते स्वरूप को भी उद्धाटित करते हैं.); कुँवर जी के आलोचकीय पक्ष का साहित्यिकता/रचनात्मकता के प्रति आग्रही मन और प्रतिबद्धता की बात करने वाले दिमाग का द्वंद्व; और ‘स्फुट लेखन को गंभीरता से लिए जाने का चलन हिंदी में नहीं है, इसलिए उनकी आलोचनात्मक हैसियत की सही पहचान नहीं हुई है।’
प्रसाद की नाट्यभाषा हमेशा आलोचकों के चिन्तन के केंद्र में रही। किन्तु उस पर अमूमन नाट्य-कला के दृष्टिकोण से ही विचार किया गया। बोहरा जी उसके कारणों व अन्य आयामों को नाट्यकला से इतर प्रसाद की जीवन-दृष्टि में जाँचते-परखते हैं- ‘उनके हर नाटक में एक-न-एक ऐसा पात्र रहा है जिसके माध्यम से उन्होंने इसकी (विश्वमैत्री की) अभिव्यक्ति करवाई है और इस भावना के औदार्य के अनुरूप ही उसके आदर्श और कर्म को स्पृहणीय बनाया है और उसी के परिणाम म कहीं-कहीं भाषा भी अतिशय आलंकारिक और काव्यात्मक हो गयी है।’ इसी प्रकार ‘गुलाम बादशाह’ वाला लेख पाठ की विषयवस्तु के घटना व्यापार की रचनात्मक विश्वसनीयता को समझने की समझ पैदा करता ह। मजबूत पक्ष, कमजोर कडियाँ और उन्हें दूर करने की युक्तियाँ; तीनों का विवेचन किया है। कारण की पडताल करते हुए लिखते हैं, ‘लेखक के आर्दशवादी आग्रहों ने नाटक के ऐतिहासिक यथार्थ का रास्ता छेंक लिया हैं।’
यों बोहरा जी के लेखन पर सम्पूर्ण लेख में थोडी-बहुत बात की ही गयी है पर फिर भी दो बिंदु ऐसे हैं जिन पर स्वतंत्र विचार किया जाना चाहिए। बोहरा जी के ही दो उद्धरण बात को और स्पष्ट करेंगे- ‘आलोचक वह सजग पाठक होता है जो न केवल रचना में निबद्ध संश्लिष्ट अनुभूति का आनंद लेने में पूर्ण समर्थ होता है बल्कि उस अनुभूति का विवेचन करने और उस आनन्द के विधायक तत्त्वों का विश्लेषण करने में भी पूर्ण सक्षम होता है, इसलिए महती रचना के महत्त्व का उद्घाटन करने के लिए आलोचक की आवश्यकता पडती है।’ और दूसरा उद्धरण ऊपर कुँवर नारायण के संदर्भ में दिया जा चुका है कि स्फुट लेखन को गंभीरता से लेने का चलन हिंदी में नहीं है। बोहरा जी को समझने का सिरा यही दोनों उद्धरण उपलब्ध करते हैं । बोहरा जी के आलोचकीय व्यक्तित्व में पांडित्य से लबालब भरे और अपनी ही एंेठ में विचार-भिन्नता वालों पर प्रहार टिपिकल आलोचक को नहीं बल्कि एक सजग और सचेत पाठक की सी अनुभूति पाते हैं। पाठ को रखत हुए अपनी बात को आगे बढाना और उससे अपने विचारों को प्रमाणित करना, बडी-बडी अवधारणाओं को रखकर आतंक मचाने की बजाय उन्हें स्पष्ट करते हुए सहजता से लिखते जाना और अपने वैचारिक-विरोधियों के प्रति सम्मानजनक स्थिति को बरकरार रखना ऐसी ही विशेषताएँ है। जहाँ तक सवाल दूसरी बात का है तो वह उनके लेखन पर लागू होती है। बोहरा जी का अधिकांश लेखन स्फुट रूप में पत्र-पत्रिकाओं में या व्याख्याओं के रूप में प्रकाश में आता रहा, उसे कभी पुस्तकाकार करने की ओर बोहरा जी ने उतना ध्यान नहीं दिया जिसके चलते ही उनका सही मूल्यांकन हिंदी जगत ने नहीं किया। उम्मीद है कि उनके स्फुट लेखन के संकलन से तैयार हो रही पुस्तकें (विवेच्य पुस्तक और ‘समकालीन कहानियाँ’) इस दिशा में लाभान्वित करेंगी। शोधकर्ताओं और सुधी पाठकों के लिए तो ये पुस्तकें लाभकारी हैं ही, हिंदी आलोचना के क्षेत्र में भी सार्थक योग हैं।