fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

इतिहास का विखंडनवादी पाठ

जगदीश गिरी
इतिहास लेखन जोखिम भरा काम है । यह जितना परिश्रम-साध्य है, उससे कहीं अधिक जोखिम उसकी विश्वसनीयता, तटस्थता और प्रामाणिकता को लेकर उठाए जा सकने वाले सवालों का सामना करने में है। इतिहासकार भी चूंकि एक सामाजिक प्राणी है इसलिए अपने सामाजिक- सांस्कृतिक संस्कारों का प्रभाव उस पर अवश्य ही होता है। अपने परिवेश और देश काल की परिस्थितियों से जूझते हुए उसे अपनी संतुलित दृष्टि तथा अध्ययन का सहारा लेते हुए अतीत की घटनाओं तथा उनके विभिन्न संदर्भों को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करना होता है । इतिहास लेखक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने निजी राग-द्वेष से मुक्त होकर उपलब्ध तथ्यों के आलोक में एक वृत्तांत प्रस्तुत कर सके तथा टूटी हुई कडियों को जोडते हुए उसे क्रमबद्ध कथा की तरह रख सके। लेकिन अक्सर इतिहासकार टूटी हुई कडियों को जोडने तथा घटनाओं के संदर्भों की व्याख्या करते हुए तटस्थ नहीं रह पाते हैं। उनकी निजी धारणाएं तथ्यों की व्याख्या में घुलमिल जाती हैं जो कि आगे चलकर इतिहासकार पर आक्षेप का कारण बनती हैं । कई बार पूर्ववर्ती इतिहास लेखक के सामने उपलब्ध तथ्यों की तुलना में परवर्ती इतिहासकार के समक्ष विभिन्न शोधों के परिणाम स्वरूप नए-नए तथ्य आ चुके होते हैं तथा अध्ययन की कई नवीन प्रणालियों का विकास हो जाता है, इससे भी इतिहास का चरित्र बदल जाता है। इसलिए कोई भी इतिहास अंतिम नहीं होता। हर आने वाला दिन एक नई रोशनी लेकर आता है जो पूर्ववर्ती धारणाओं को बदलने की क्षमता से युक्त होता है।
राजनीतिक इतिहासों की तुलना में साहित्यिक इतिहास-लेखन और अधिक जोखिम भरा होता है क्योंकि साहित्य में तथ्य की अपेक्षा दृष्टि ही अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। साहित्यिक रचनाओं में सांकेतिकता, प्रतीकात्मकता और व्यंजना अधिक मूल्यवान होती है। ऐसे में किसी साहित्यिक कृति में प्रयुक्त भाषा, प्रतीकों और संकेतों को पकडने में अत्यंत सावधानी की जरूरत होती है। साहित्येतिहास लेखक की जरा-सी असावधानी किसी रचना के पूरे अर्थ-संदर्भों को ही बदल सकती है। साहित्येतिहास में इतिहास लेखक की अपनी अभिरुचि भी कई बार रचना और रचनाकार के मूल्यांकन में प्रमुख भूमिका निभाती है। प्रायः साहित्य के इतिहास लेखक अपनी निजी अभिरुचियों के मुताबिक अपना-अपना कैनन गढ लेते हैं। इन्हीं निर्धारित कैननों की कसौटी पर रचनाओं को कसते हुए उन्हें अलग-अलग खानों में फिट करने की कोशिश की जाती है। इससे साहित्य के इतिहासों में मूल्यांकन के पैमाने प्रायः अलग- अलग हो जाते हैं। इसीलिए भिन्न-भिन्न इतिहासकारों के समान रचनाओं के संदर्भ में भिन्न-भिन्न निष्कर्ष दिखाई देते हैं। इस लिहा*ा से साहित्येतिहासों के निष्कर्षों को बहुत सावधानी से परखे जाने की आवश्यकता रहती है।
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन के संदर्भ में देखा जाए तो यह स्थिति और अधिक विकट नजर आती है क्योंकि हिंदी साहित्य के आरंभ से लेकर उसके अगले हजार वर्ष के साहित्यिक विकास के दौर में हिंदी प्रदेश को बडी भारी उथल-पुथल का सामना करना पडा है। राजनीतिक सत्ताओं के अनेकानेक बार परिवर्तन के दौर और सर्वथा भिन्न-भिन्न सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक दशाओं में हिंदी का साहित्य बनता रहा है। हिंदी साहित्य के रचनाकार सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक दृष्टि से प्रायः विषम परिस्थितियों के शिकार रहे हैं। आधुनिक काल में आकर ही परिस्थितियां उनके अनुकूल हुई। भाषा के स्तर पर भी हिंदी का साहित्य बहुत विविधतापूर्ण रहा है। अनेक बोलियों का साहित्य सामूहिक रूप से हिंदी का साहित्य कहलाता है। विशाल भू-भाग में फैले हुए इन बोलियों के बोलने वाले लोगों की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों में सूक्ष्म अंतर रहे हैं जिससे हिंदी साहित्य की अवधारणा को समेकित ढंग से समझने के लिए इन बोलियों के सूक्ष्म संवेदन व इसके लोक को समझना बेहद जरूरी हो जाता है। अन्यथा इतिहासकार गलत निष्कर्षों का शिकार हो सकता है।
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की दिशा में व्यवस्थित प्रयत्न भी बहुत बाद में शुरू होने के कारण भी बहुत से मसले उलझ गए हैं। राजनीतिक इतिहास की तरह हिंदी जाति अपने साहित्य के इतिहास लेखन के प्रति भी उतनी गंभीर कभी नहीं रही। फ्रेंच विद्वान गार्सा-द-तासी द्वारा लिखे जाने वाले इतिहास से पहले इस क्षेत्र में प्रायः शून्य की-सी स्थिति रही है। इसलिए प्रारंभिक एक हजार साल के साहित्य के इतिहास लेखन में बहुत-सी भूलों की गुंजाइश रहने की संभावना सदैव बनी रहती है। हजार बरस बाद बैठकर पुरानी कडियां जोडना कोई आसान काम नहीं होता। बहरहाल हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की दिशा में हुए प्रारंभिक प्रयत्नों को सर्वप्रथम व्यवस्थित रूप आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ लिख कर दिया गया। आचार्य शुक्ल की अप्रतिम मेधा और सूक्ष्म विवेचन की शक्ति उन्हें हिंदी आलोचना के क्षेत्र में आज दिन तक पूज्य बनाए हुए है। भले ही उनके द्वारा की गई अनेक स्थापनाएं बाद में चुनौती पाती रही हैं। आचार्य शुक्ल के द्वारा की गई स्थापनाओं को सर्वाधिक चुनौती मिली आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की स्थापनाओं से। उन्होंने अपने इतिहास में उनकी अनेक धारणाओं को बदलकर रख दिया। विशेषकर आदिकाल और भक्ति काल को देखने का वर्तमान में जो नजरिया है वह आचार्य शुक्ल द्वारा नहीं बल्कि द्विवेदी द्वारा स्थापित सिद्धांतों से ही बना है। यद्यपि इन दोनों आचार्यों के अलावा भी अनेक विद्वानों ने इतिहास ग्रंथ लिखे हैं परंतु वे इन्हीं दो इतिहासकारों द्वारा स्थापित प्रतिमानों से अधिक दूर नहीं है इसलिए कोई भी नया इतिहास आचार्य शुक्ल अथवा आचार्य द्विवेदी की स्थापना से टकराए बिना नहीं लिखा जा सकता।
आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी के इतिहासों के प्रकाशन के बाद पाश्चात्य संपर्कों के प्रभाव से हिंदी में भी इतिहास और आलोचना के क्षेत्र में अनेक नई अवधारणाएं आ चुकी हैं जिनसे मूल्यांकन के नवीन आयाम स्थापित हुए हैं। हिंदी में उत्तर-आधुनिकता, उत्तर-संरचनावाद और विखंडनवाद आदि को लोकप्रिय बनाने वाले तथा इनके आधार पर हिंदी साहित्य का नवीन मूल्यांकन करने के हिमायती प्रसिद्ध आलोचक सुधीश पचौरी की पुस्तक ‘तीसरी परंपरा की खोज’ हिंदी साहित्य के इतिहास को नए सिरे से लिखने की प्रस्तावना करती है । इस पुस्तक के *ारिए लेखक नव्य इतिहास शास्त्र, उत्तर-संरचनावाद और विखंडनवाद के औजारों से दोनों प्रसिद्ध आचार्यों द्वारा लिखित हिंदी साहित्य के इतिहासों का पुनः पाठ करते हुए एक तीसरी परंपरा की जरूरत पर बल देते हैं। उनके द्वारा प्रस्तावित तीसरी परंपरा से दूसरी परंपरा पर ध्यान जाना स्वाभाविक है। मूर्धन्य आलोचक नामवर सिंह द्वारा लिखित ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जाहिर तौर पर सुधीश पचौरी की दृष्टि में रही है। वह अनेक स्थलों पर इसके लेखक की आलोचना भी करते हैं और बहुत बार अभद्रता की सीमा को भी छू लेते हैं जबकि मजेदार बात यह है कि नामवर सिंह ने ना तो साहित्य का इतिहास लिखा और ना ही उनकी किसी पुस्तक का मूल्यांकन सुधीश पचौरी अपनी इस पुस्तक में करते हैं। वे तो सिर्फ इस बात के लिए उनके निशाने पर हैं कि उन्होंने अपने गुरु आचार्य द्विवेदी की साहित्यिक कृतियों व उनके व्यक्तित्व का उद्घाटन करने वाली रचना ‘दूसरी परंपरा की खोज’ में द्विवेदी जी के विचारों की आलोचना नहीं की। संभवतः सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक का नाम तीसरी परंपरा की खोज भी इसीलिए रखा है। वे चुनौती तो आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी को देते हैं पर लगे हाथ निशाने पर नामवर सिंह को ले लेते हैं जिसका कोई औचित्य नजर नहीं आता। उनकी शिकायत सिर्फ यही है कि नामवर सिंह आचार्य द्विवेदी की मान्यताओं का खंडन क्यों नहीं करते। खैर.... अगर इस प्रसंग को छोडकर तीसरी परंपरा की खोज पर विचार किया जाए तो स्पष्ट है यह पुस्तक हिंदी साहित्य के इतिहास और विशेषकर मध्यकालीन साहित्य को पढने की एक नई दृष्टि प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने यूरोप और अमेरिका में अत्यधिक लोकप्रिय हो चुके नव्य इतिहास शास्त्र के आलोक में हिंदी साहित्य का विखंडनवादी पाठ प्रस्तुत किया है। स्पष्ट है कि उनके कैनन आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी के कैननों से सर्वथा भिन्न हैं। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि, ‘नव्य इतिहास शास्त्र के आगमन के बाद हजार बरस के हिंदी साहित्य के इतिहास को सिर्फ दो आचार्यों की कुछ किताबों के भरोसे नहीं छोडा जा सकता।... उत्तर आधुनिक नजरिए, उत्तर-संरचनावादी विखंडन- पद्धति, मिशेल फूको की इतिहास लेखन-पद्धति एग्रीन ब्लांट और हेडन व्हाइट आदि के विचारों से विकसित ‘नव्य इतिहासशास्त्र’ ने इतिहास-लेखन के क्षेत्र में आज एक भारी क्रांति पैदा कर दी है।’ (आमुख)
जाहिर है कि वे ‘नव्य इतिहासशास्त्र’ के नजरिए से हिंदी साहित्य के इतिहास को देखते हैं तो उन्हें पूर्वलिखित इतिहासों में अनेक कमियां नजर आती हैं। दरअस्ल ‘नव्य इतिहास शास्त्र’ साहित्यिक सैद्धांतिकी का एक नया रूप है जिसका लक्ष्य वैचारिक इतिहास को साहित्य के *ारिए समझना और साहित्य को सांस्कृतिक कॉन्टेक्स्ट में समझना है। बर्कले विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्टीफन ग्रीन ब्लांट ने अपने आलोचकीय प्रतिमानों को गढते हुए प्रथम बार 1980 में इसे प्रस्तुत किया। नब्बे के दशक में इसका प्रभाव अमेरिका और यूरोप तक फैल गया। इस सिद्धांत ने इतिहास लेखन की पुरानी पद्धति को निष्प्राण घोषित कर दिया। इसने साहित्य के इतिहास लेखन को विशेष रूप से प्रभावित किया क्योंकि ‘नव्य इतिहासशास्त्र कहता है कि इतिहास साहित्य की पृष्ठभूमि नहीं होता बल्कि इसके ठीक उलट साहित्य स्वयं इतिहास की ‘पूर्वभूमि’ होता है। इस तर्क से इतिहास बाद में आता है, साहित्यिक रचना या टेक्स्ट पहले आती है।’ (पृ. 244)
सुधीश पचौरी ने बहुत विस्तार से नव्य इतिहासशास्त्र को समझाते हुए अनेक पाश्चात्य विद्वानों और ग्रंथों के हवाले दिए हैं। उन्होंने मिशेल फूको को उद्धृत करते हुए इतिहास की सातत्यवादी अवधारणा को ही गलत बताया है क्योंकि फूको ने यह स्थापित कर दिया है कि इतिहास कभी भी एक सीधी लाइन में घटित नहीं होता। उसमें अनेक टूट-फूट और अनेक दरारें होती हैं जिन्हें पकडकर ही वास्तविक इतिहास को समझा जा सकता है। वे लिखते हैं कि ‘ज्ञानोदय वादी के (एनलाइटिनमेंट) नजरिए से लिखा गया इतिहास घटनाओं के बीच एक सातत्य (यानी कि इतिहास किसी अव्याहत, अविरल धारा की तरह एक ही तरह से बहता रहता है) को तलाशता है जबकि फूको इस सातत्य को सिरे से अस्वीकार करते हैं। सातत्य के *ारिए समग्र इतिहास (टोटल हिस्ट्री) दी जाती है। जबकि फूको समग्रता को नहीं मानते क्योंकि समग्रता संभव ही नहीं है।’ (पृ.19)
लेखक की पीडा है कि हिंदी के लोग पश्चिम में विकसित हो रहे नवीन विमर्शों से अनजान बने रहे इसलिए साहित्येतिहास लेखन के क्षेत्र में कोई नवीन दृष्टि नहीं आ सकी।’ नव्य समीक्षा आई तो उसको शंका से देखा और संरचनावादी (स्ट्रक्चरलिज्म) या विखंडन (डिकंस्ट्रक्शन या उत्तर-संरचनावाद पोस्ट स्ट्रक्चरलिज्म) या उत्तर- आधुनिकतावाद (पोस्ट-मॉडर्निज्म) का नाम लिया गया (तो) उनको भी जड और निठल्ली प्रगतिशीलता की लाठी से ठोक कर अपनी लाठी ही तोड ली। हिंदी वाले ‘हम न बदलेंगे’ का अपना शाश्वत राग अलापते रहे हैं जबकि दुनिया के विमर्श कहां से कहां आ गए?’ (पृ.26)
स्पष्ट है कि लेखक की असली पीडा यह है कि उनके द्वारा हिंदी में इन तमाम विमर्शों पर पुस्तकें लिख देने के बावजूद कोई उनकी चर्चा तक नहीं करता। आज भी आचार्य शुक्ल, आचार द्विवेदी और बहुत हुआ तो नामवर सिंह को ही बार-बार उद्धृत किया जाता है। संभवतः इसीलिए वे अपनी पुस्तक के द्वारा इन बहुप्रतिष्ठित आलोचकों को अपने व्यंग्य के निशाने पर लेते हुए कहते हैं- ‘शुक्ल जी के इतिहास के केंद्र में तुलसी हैं तो हजारी प्रसाद के इतिहास के केंद्र में कबीर हैं। इस तरह तुलसी ‘पहली परंपरा’ के हुए तो कबीर ‘दूसरी परंपरा’ के। इन दो नामों में सारा मध्यकालीन इतिहास निपट गया। क्या गजब की बाइनरी (विलोम) है। मानो इससे बाहर कुछ है ही नहीं। एक हजार साल के इतिहास को देखना हो तो इसी बाइनरी में रिड्यूस करके देखें। एक हजार साल के लंबे इतिहास को क्या कभी इस कदर ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में रिड्यूस किया जा सकता है? दो आचार्य और उनके शिष्य यही चाहते हैं कि आप हिंदी साहित्य के मध्य काल (को) दो विलोमों में घटा दें। यह ज्ञान से दुश्मनी नहीं तो और क्या है? (पृ.32) इसीलिए वे ‘ज्ञान से दोस्ती’ गांठते हुए कहते हैं कि, ‘शुक्ल या द्विवेदी जी के इतिहासों से काम नहीं चलने वाला। हमें तीसरा इतिहास चाहिए। हमें नव्य इतिहासशास्त्रीय प्रविधियों से लिखा नया इतिहास चाहिए।’ (पृ.31)
एक नए इतिहास की तलाश में वे आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी के द्वारा लिखित इतिहासों का विखंडनवादी पाठ करते हैं और दोनों इतिहासकारों की ‘लोकेशन’ को समझने की कोशिश करते हैं। इस तलाश में सबसे पहले आचार्य शुक्ल की मनःस्थिति का पाठ करते हैं तो उन्हें लगता है कि ‘मध्यकाल में शुक्ल जी इस्लाम के बरअक्स जितने हिंदू राष्ट्रवादी दिखते हैं, अंग्रेजों के बरअक्स वे उतने राष्ट्रवादी तो क्या राष्ट्रप्रेमी भी नहीं दिखते। शुक्ल जी वहीं सबसे अधिक मौन हैं जहां उनके राष्ट्रवाद या देशप्रेम को सबसे अधिक मुखर होना चाहिए। (पृ.68) तात्पर्य यह कि लेखक को लगता है कि, हिंदी साहित्य का इतिहास’ लिखते हुए आचार्य शुक्ल की नजर में ‘हिंदू राष्ट्र’ की स्थापना का विचार था इसीलिए वह मुसलमानी राज्य के विरुद्ध जितने कठोर हैं अंग्रेजों के प्रति उतने ही नरम हैं। यही कारण है कि उनके आदर्श तुलसीदास हैं क्योंकि तुलसीदास कलियुग की भर्त्सना के बहाने इस्लामिक राज्य की ही निंदा करते हैं।
सुधीश पचौरी आचार्य शुक्ल व द्विवेदीजी के इतिहास लेखन के साथ सातत्यवादी नजरिए की आलोचना करते हुए उन टूटों को उजागर करते हैं जो उन दोनों को ही ‘अव्वल तो दिखती नहीं, जो दिख भी सकती थीं वे उन पर भी अपने सातत्यवाद का पाटा चला देते हैं।’ (पृ.83) ये टूटें कौन सी हैं जो शुक्ल जी को दिखाई नहीं देती? लेखक का मानना है कि आचार्य शुक्ल आदिकाल में वज्रयान, तंत्रयान, नाथपंथी संप्रदायों, प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं और लोक भाषा में कविता करने वाले अमीर खुसरो और विद्यापति की चर्चा तो करते हैं पर विशेष महत्त्व वीरगाथाओं को देते हैं। इसी तरह वैष्णव धर्म से प्रेरित रचनाएं उन्हें स्वीकार हैं जबकि जैन धर्म की रचनाएं ‘प्रचारात्मक साहित्य’ की श्रेणी में डाल देते हैं। वे भक्ति काल को इस्लाम की प्रतिक्रिया में उद्भव मानते हैं और इस्लाम के आक्रमण को वे एक धक्का मानते हैं लेकिन उसका साहित्य पर कोई प्रभाव स्वीकार करने से मुकर जाते हैं। उनके लिए जनता का तात्पर्य केवल हिंदू जनता है। सिद्ध, कापालिक, तांत्रिक और नाथ आदि साधना मार्ग उनके लिए धर्म के नाम पर बाह्य आडंबर हैं। इस्लाम की स्थापना से जनता निराश है आदि। और उनकी दृष्टि में मुक्ति का मार्ग, कल्याण का मार्ग सिर्फ वैष्णव भक्ति आंदोलन ही था। उनकी आलोचना का कैनन वैष्णव भक्ति से ही बनता है। ‘हृदयग्राह्यता’ श्रद्धा और प्रेम बराबर भक्ति, मार्मिकता, साधनावस्था, रसानुभूति आदि उनके साहित्यिक मानक हैं।’(पृ.89) आचार्य शुक्ल इस्लाम के धक्के को स्वीकार करते हैं लेकिन तुरंत उसे भक्ति मार्ग से पाट देते हैं। और भक्ति के समन्वयकारी रूप की स्थापना कर देते हैं। सुधीश पचौरी इन पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कहते हैं कि इस्लाम को एक धक्का न मानकर एक अनिवार्यता की तरह स्वीकार करके साहित्य पर पडने वाले उसके प्रभावों का मूल्यांकन होना चाहिए था। इसी प्रकार आदिकाल में लिखी गई विभिन्न प्रकार की रचनाओं को बराबर महत्त्व मिलना चाहिए था। उनका मानना है कि आचार्य द्विवेदी के विचार जिसे ‘दूसरी परंपरा’ कहा गया वह भी प्रकारांतर से पहली परंपरा की कॉपी है। कुछ फर्क है तो इतना कि शुक्ल जी इस्लाम के जिस निर्णायक धक्के की बात करते हैं हजारी प्रसाद जी अपने इतिहास में ऐसे किसी धक्के को स्वीकार ही नहीं करते। शुक्ल जी धक्क को बडा धक्का मानकर मिटाते हैं, द्विवेदी जी उसे सिर्फ चवन्नी भर मानकर दफना देते हैं। (पृ. 97)
पचौरी जी बार-बार इन प्रसंगों की चर्चा करते हैं और आचार्य द्विवेदी के इस अति प्रसिद्ध कथन- ‘मैं इस्लाम के महत्त्व को भूल नहीं रहा हूँ लेकिन जोर देकर कहना चाहता हूँ कि अगर इस्लाम न आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।’ (हिंदी साहित्य की भूमिका पृ. 16) की काट करते हैं। इसी बहाने नामवर सिंह जी की भी आलोचना करते हुए कहते हैं कि ‘इस्लाम के आक्रमण में जो लाइन द्विवेदी जी की है वही उनके शिष्य नामवर सिंह की भी है।’ (पृ. 101)
उनकी अपनी स्थापना है कि इस्लाम न तो धक्के की तरह था और न ही ‘चार-आना’ प्रभाव बल्कि वह एक ऐतिहासिक सच्चाई था जिसने पूरे भक्ति आंदोलन की निर्मिती में आवश्यक भूमिका निभाई। इसके प्रमाण स्वरूप वे कबीर द्वारा बार-बार प्रयुक्त ‘बाजार’ और तुलसी द्वारा प्रयुक्त ‘कलि’ का उल्लेख करते हैं। उनके मुताबिक तुलसी जिसे ‘कलि’ कहते हैं वह इस्लामिक सत्ता ही है जिसके प्रभाव से निचली जातियों को वर्णाश्रम धर्म से मुक्त होने का अवसर मिल रहा है और बनी बनाई व्यवस्था टूट रही है। इसी से तुलसी परेशान हैं। कबीर जिस बाजार की चर्चा करते हैं वह भी इस्लामिक राज्य की स्थापना से ही विकसित हुआ और वहां कामगार जातियों को रोजगार के नए-नए अवसर मिल रहे हैं। इससे कामगार जातियों को ताकत मिलती है। कबीर खुद भी इसी बाजार से ताकत हासिल करते हैं क्योंकि वे किसी के अधीन नहीं हैं बल्कि अपने कपडा बुनने की कला के दम पर बाजार से उनकी आमदनी हो रही है लेकिन वे बाजार से आक्रांत भी हैं क्योंकि यह सब को अपने फंदे में फांस रहा है। स्पष्ट है कि ‘ऐसा ना हुआ होता अगर इतिहास उसी तरह चलता, जिस तरह चल रहा था।’ (पृ.103) लेखक का मानना है कि आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी इन टूटों को इसलिए रेखांकित नहीं करते हैं क्योंकि वे हिंदूवादी और प्राच्यवादी दृष्टि से संचालित होकर लिख रहे थे। इसलिए वे जानबूझकर इन सवालों को टाल जाते हैं। पचौरी जी व्यंग्य करते हुए लिखते हैं कि इनका कृत्य वैसा ही है जैसा आजकल के हिंदुत्ववादियों का है। ‘आश्चर्य नहीं कि इन दिनों हिंदुत्ववादी भी मुगल इतिहास के साथ लगभग ऐसा ही सुलूक कर रहे हैं और ऐसी ही समझ आगे बढकर कहने लगती है कि राणा प्रताप अकबर से हल्दीघाटी की लडाई में हारे नहीं थे बल्कि राणा प्रताप ने अकबर को हराया था।’ (पृ.113) जबकि उचित ‘इतिहास दृष्टि’ यह कहती है कि इतिहास को ‘टेक्स्ट’ की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। जो कुछ है, सब टेक्स्ट में है, उसके बाहर कुछ भी नहीं। इसी तर्क पर वे मोहम्मद इकबाल के ‘कौमी तराना’, नेहरू की ‘भारत की खोज’, दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में भी इसी प्राच्यवादी दृष्टि की छाया देखते हैं जो मूलभूत सवालों, टूटों और टकरावों की अनदेखी करती चलती है। इनके बरअक्स वे दलित चिंतक डॉ. धर्मवीर की आलोचना दृष्टि की तारीफ करते हैं जिसके तहत वे स्वीकार करते हैं कि ‘अगर इस्लाम ना आया होता तो कबीर ना होते।’ वे गुरु नानक देव के एक पद, बाबा रामदास के ‘बाबर बानी’ में लिखे छंद, वल्लभाचार्य के ‘मलेच्छाक्रांत देशेष’ वाले पद तथा विद्यापति की ‘कीर्तिलता’ के हवाले से हिंदू-मुस्लिम टकराव को दर्ज करते हुए पहले के इतिहासकारों की समन्वयवादी इतिहास दृष्टि की पोल खोलने का दावा करते हैं। लेखक का तर्क है कि इतिहास की इन घटनाओं को ढंकने का ‘सेकुलरवादी’ नजरिया अंततः सांप्रदायिक शक्तियों को खुलकर खेलने का ही अवसर देता है।’ सेकुलर होने का मतलब तथ्य-चोर होना नहीं है बल्कि तथ्य के सत्य से आंख मिलाना है। आंख मूंद लेने से या नजरें चुराने से आफत टला नहीं करती बल्कि अधिक मारक हो उठती है।’(पृ.122) क्योंकि कोई भी ऐतिहासिक सच्चाई छिपाने से छुप नहीं सकती। और ‘दूसरे ऐसी अवांछित सूचनाओं के बिंदुओं के दमन को अपना मिथकीय औजार बनाकर कट्टर हिंदुत्ववादी न्यस्त स्वार्थ अपनी ‘ऐतिहासिक विक्टिम्हुड’ का तांडव रच कर अतीत के अतिचारों के लिए बदला लेने के ‘अपने फासिस्ट इरादों’ को सही ठहराने लगते हैं और इसी तरह का एकतरफा ‘एकरैखिक’ और ‘सातत्यवादी’ इतिहास रचने लगते हैं। (पृ.123)
पुस्तक में बहुत विस्तार से ‘पद्मावत’ और ‘रामचरितमानस’ को लेकर हाल के दिनों में होने वाले नए-नए पाठों, प्रतिक्रियाओं को दर्ज करते हुए लेखक ने इनके टेक्स्ट के भीतर छुपे हुए राजनीतिक अर्थ-संदर्भों को उजागर किया है। वे तुलसी और केशवदास की ‘लोकेशन’ के बहाने रचना को रचनाकार के परिवेश और उसकी सामाजिक- राजनीतिक स्थिति के नजरिए से बांचने की वकालत करते हैं। पुस्तक यह पुरजोर ढंग से स्थापित करती है कि हिंदी साहित्य के एक इतिहास के बजाय अनेक इतिहास लिखे जाने की जरूरत है ताकि इतिहास में छिपे हुए अंतर्विरोधों को दर्ज किया जा सके। ‘एक’ और अखंड इतिहास पर अत्यधिक बल देने की इसी प्रवृत्ति से टेक्स्ट के अर्थ भी सीमित कर दिए जाते हैं जबकि नव्य इतिहासशास्त्र की दृष्टि से किसी टेक्स्ट का कोई अंतिम अर्थ नहीं होता। ‘यानी कि टेक्स्ट या रचना कक्षाओं में पढाई जाती गुरु जी द्वारा बताए जाते मानी में बंद सिर्फ ‘अकादमिक’ नहीं होती बल्कि वे हमेशा ही सामाजिक और राजनीतिक मानियों के लिए खुली रहती हैं।’(पृ.247)
वे जिस तीसरे इतिहास की कल्पना करते हैं उसमें सभी प्रकार की भिन्नताओं और विविधताओं के लिए खुला स्पेस है और जिसमें सभी अपनी असहमतियों के साथ भी एक-दूसरे से संवाद कर सकते हैं। जिस प्रकार आज स्त्रीवादी, दलितवादी दृष्टि से नए इतिहास लिखने के प्रयास हो रहे हैं वैसे अनेक इतिहास लिखे जाने की संभावना सदैव खुली रहनी चाहिए। यद्यपि वे अनेक इतिहासों की परिकल्पना करते हुए कुछ ऐसे सवाल उठाते हैं जो निश्चय ही विवाद का विषय हो सकते हैं। मसलन, वीरगाथा काव्यों की महानता पर सवाल उठाते हुए वह कहते हैं- ‘जौहर क्या है? वीर गाथाओं को महिमावान बनाकर पितृसत्ता और वंश की नस्ल की शुद्धता की खातिर स्त्री के आत्मदाह को एक विचारधारात्मक सिस्टम की शक्ल दे दी गई।.... हार की कथाएं भी वीरता की कथाएं बना दी गई हैं।’(पृ.249) इसी तरह सूफियों के सौंदर्य वर्णन को फ्रायड की दमित कामवासना के नजरिए से देखा जाए तो पता चलेगा कि उनकी कविता की संचालिका शक्ति दमित कामवासना है। वे मीरा के काव्य को सामंतीय ढांचे में स्त्री की सेक्सुअलिटी के दमन का प्रत्याख्यान बताते हैं और बौद्ध-सिद्धों, नाथों व संतों के काव्य में प्रयुक्त इडा, पिंगला सुषुम्ना और कुंडलिनी आदि के रूप को भी उस दौर की स्त्री की सेक्सुअलिटी को नियंत्रित करने के औजार के तौर पर देखते हैं। हद तो तब हो जाती है जब वे कहते हैं कि ‘सूर के काव्य को छोड बाकी सारा भक्ति काव्य सेक्सुअलिटी के दमन का इतिहास है।’ (पृ.251)
बहरहाल कहा जा सकता है कि सुधीश पचौरी ‘तीसरी परंपरा’ की खोज में निकले हैं और इस खोज के दौरान वे कई मूल्यवान तथ्यों को सामने लाने में सफल भी हुए हैं। लेकिन वे बार-बार रास्ता भटक जाते हैं। किसी भी खोजी को यह याद रखना चाहिए कि समय के साथ उपलब्ध नवीन तथ्यों और नवीन प्रविधियों के आलोक में पुरानी अवधारणाओं को चुनौती दी जाती रही है और ऐसा करना बेहद जरूरी भी है लेकिन अपने पूर्वजों की किसी स्थापना को चुनौती देते हुए भाषा की मर्यादा और उनके द्वारा तत्कालीन समय पर उपलब्ध तथ्यों के लिहाज से किए गए कार्य को तिलांजलि नहीं दे देनी चाहिए। खंडन की भाषा कैसी होनी चाहिए यह आचार्य द्विवेदी से सीखा जा सकता है। नामवर सिंह जी ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ की भूमिका में लिखा है- ‘अनपेक्षित’ प्रसंग वे कहे जा सकते हैं जहां अन्य विद्वानों की आलोचना है लेकिन उनके बिना द्विवेदी जी के वैचारिक संघर्ष का संदर्भ अस्पष्ट और अमूर्त रह जाता। इसलिए शिष्टता पर स्पष्टता को तरजीह क्षम्य होनी चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि पूर्वपक्ष के ऋषि कुछ कम नहीं हैं- यह एहसास मुझमें है। जानता हूं पंडित जी ऐसी नाजुक स्थिति बडी खूबी से निभा ले जाते थे। (भूमिका,पृ.8) यदि पचौरी जी ने दूसरी परंपरा की खोज के लेखक की इस विनम्रता को भी अपनाया होता तो यह पुस्तक और प्रभावी बन सकती थी। वैसे भी दूसरी परंपरा शास्त्र के विरुद्ध लोक की स्थापना पर बल देती है। सिद्धांत के बजाय सहज पर बल देती है और संभ्रांत के स्थान पर देहात को मुख्यधारा में लाती है। साहित्य के इतिहास का पुनः पाठ करना उसका उद्देश्य था ही नहीं। बेहतर होता सुधीश पचौरी इसे तीसरी परंपरा की खोज के बजाय हिंदी साहित्य के इतिहास का पुनः पाठ अथवा नया इतिहास कहते। पुस्तक में वर्तनी और वाक्य गठन की अशुद्धियों से भी खिन्नता होती है। कुछ वाक्यों को बेतहाशा दोहराया गया है, इससे बचा जा सकता था। इन सबके बावजूद लेखक को हिन्दी में नए आलोचकीय प्रतिमानों और प्रविधियों के इस्तेमाल के लिए अवश्य याद रखा जाएगा।
पुस्तक- तीसरी परंपरा की खोज, सुधीश पचौरी,
वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली-2019, पृ.262,
मूल्य 295 (पैपर बैक)

परिचय ः युवा समीक्षक, टिप्पणीकार और ऊर्जावान अध्येता हैं।