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समय का सच होती हैं कहानियाँ

-मधु आचार्य ‘आशावादी’
साहित्य में कथा या कहानी को सबसे पुराना और प्रभावी माध्यम माना जाता है। राजस्थानी साहित्य एवं अन्य भाषाओं के साहित्य में भी बात साहित्य का होना कहानी के पुराने होने का प्रमाण है। लोक में कहानियाँ लिपिबद्ध नहीं मगर बडे बुजुर्गों के कंठों में बसती थी। कंठ से कंठ तक ही उनका पीढी दर पीढी हस्तांतरण होता रहा है। ये सिलसिला आज भी जारी है। कहानी इसीलिए आज भी सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्यिक विधा मानी जाती है।
समय के साथ साथ कहानी ने भी अपना रूप और रंग बदला। कथ्य और शिल्प के इस बदलाव को आलोचकों ने कालखंडों में भी बांटा है। पर ये सत्य है कि कहानी ने कभी ठहराव नहीं किया, अपने को समय के साथ साथ बदलती रही। सच बदला, व्यक्ति बदले, साधन बदले, संवेदना पर भी इसका असर स्वाभाविक था। जब सच और संवेदना बदलती है तो कहानी में तो बदलाव होना ला*ामी है।
पहले आलोचक और साहित्य मनीषी साहित्य को परिभाषित करते हुए कहते थे, साहित्य सच का अन्वेषण है। मगर आधुनिक युग में इस बात को आलोचक, चिंतक, कवि डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने थोडा आगे बढाते हुए कहा कि साहित्य सच का संवेदनात्मक अन्वेषण है। इस युग में डॉ. आचार्य की ये बात ज्यादा सटीक है। इस आधार पर कह सकते हैं कि संवेदनात्मक बदलाव ने कहानी के कथ्य और शिल्प में बडा बदलाव किया।
डॉ. बबीता काजल ने अपनी पुस्तक ‘हरदर्शन सहगल का कथा साहित्य और समकालीन विमर्श’ में लेखक के रचनाकर्म के साथ समकालीन कथा साहित्य की पडताल की है। कहानी के रूप, रंग, शिल्प, विचार में आये बदलाव के विविध पक्षों को परखा है। शोध के *ारीये समकालीन कहानी को तय प्रतिमानों पर रख एक नई दृष्टि विकसित करने का विशेष प्रयास किया है। लेखिका ने अपना ध्येय बताते हुए आरम्भ में ही लिखा है- संवेदना की जगमगाहट ही जीवन को उजाले से भरती है। एक की संवेदना का उजाला दूसरे के स्याह अंधेरे पक्षों को रौशन कर देता है। लेखिका ने इस ध्येय को सामने रखकर ही इस पुस्तक में कथाकार हरदर्शन सहगल के कथा साहित्य का मूल्यांकन किया है। उसके मर्म तक पहुंचने का प्रयास किया है।
सहगल हिंदी कथा साहित्य में एक जाना-पहचाना नाम है। मूल और संपादित 22 कृतियों का ये रचनाकार 80 की उम्र पार करने के बाद भी सक्रिय है। खुद कहानी के बदलते रूप का गवाह है और अनुभव का एक बडा संसार इनके पास है। डॉ. बबीता ने इस रचनाकार के कृतित्त्व के साथ व्यक्तित्व पर भी लिखा है। ये सोने पर सुहागा है। इससे रचनाकार और उसकी रचनाओं के बारे में सब जानने का अवसर पाठक को मिलता है।
कहते हैं हर रचनाकार पर उसके परिवेश का गहरा असर पडता है, परिवेश उसकी रचनाओं में बोलता है। सहगल बीकानेर में रहते हैं तो उनकी अधिकतर कहानियों में इस शहर की खासियत अभिव्यक्त हुई है। धार्मिक सहिष्णुता, सद्भाव, संघर्ष और आशावाद, बीकानेर की विशेषता है तो सहगल की कहानियों में भी ये सब हैं। लेखिका भी इन विशेषताओं से लिखते समय प्रभावित हुई है।
लेखिका ने कथाकार सहगल के बारे में एक बहुत गहरी बात कही जो हर रचनाकार के लिए आदर्श हो सकती है। डॉ. बबीता लिखती हैं, लेखक का जीवन व लेखन दो अलग-अलग पक्ष होते हुए भी एक ही होते हैं, लेकिन दोनों में विरोधाभास हो तो पाठक के लिए लेखक के लेखन को पचा पाना मुश्किल हो जाता है। सहगल के साथ यह दुविधा नहीं रहती। उनके व्यक्तित्व व लेखन में कहीं विरोधाभास न*ार नहीं आता, व्यक्तित्व सी सादगी लेखन में और लेखन सी शैली उनकी भाषा में।
लेखिका का ये कथन पाठक को सहज में ही कथाकार सहगल के साहित्य से परिचित करा देता है। वे समर्थ रचनाकार हैं और उनके कथानक उलझे जीवन से आये हैं, मगर उनकी अभिव्यक्ति सहजता से हुई है। भाषा सरस और प्रवाहमय है। प्रतीक भी इतने निकट के होते हैं जो पढते ही संप्रेषित होते हैं। जिसने भी हरदर्शन सहगल को पढा है वो भी इस बात की गवाही देगा, लेखिका ने उनके साहित्य के मर्म को पकडा है। उसके कारण ही उनके रचना संसार का सार्थक और सही मूल्यांकन कर पाई हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो शोध की ये पुस्तक पूरी तरह से बोझिल हो जाती।
इस पुस्तक में हरदर्शन सहगल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर छह अध्याय हैं। उनके अलावा उपसंहार और परिशिष्ट है। जिससे ही पता चलता है कि ये एक शोध प्रबंध है।
पहला अध्याय ‘समकालीन विमर्श’ अवधारणा व अभिव्यक्ति का है। इस अध्याय में समकालीन हिंदी साहित्य की अवधारणा पर बात है। लेखिका ने सही कहा है, पिछले 20 वर्षों में तेजी से बदलती सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों के कारण कहानीकार को लेखन के लिए नई जमीन प्राप्त हुई है (पृष्ठ 22)। उनकी ये बात सही है। इन्हीं हालातों से व्यक्ति और समाज की संवेदना बदली है जो साहित्य में साफ-साफ दिखती है। इसी पृष्ठ पर उनके एक कथन पर चर्चा के रास्ते खुलते हैं और अलग-अलग राय भी पढने को मिलती है। उन्होंने लिखा है, विमर्श केंद्रित लेखन प्रायः 1960 के बाद ही न*ार आता है जिसे ‘समकालीन’ की संज्ञा से भी संबोधित किया जा सकता है। आलोचक इस पर भिन्न भिन्न राय रखते हैं। क्योंकि 21 वीं सदी के आरम्भ के बाद तो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मूल्यों में तेजी से परिवर्तन हो रहा है, जिसका स्वाभाविक असर भी साहित्य पर साफ नजर आता है। कहानी से अ-कहानी की बातें भी सामने आई हैं। हां, लेखिका के 1960 से विमर्श की बात पर सब सहमत हो सकते हैं। इस अध्याय में उन्होंने विमर्श की सुंदर व्याख्या करने के साथ साहित्य में उसकी उपादेयता को प्रभावी तरीके से रेखांकित किया है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, सत्ता विमर्श, राजनीतिक विमर्श, विखंडन विमर्श, विघटन विमर्श, बाजार विमर्श, बाल विमर्श सहित अन्य विमर्श पर तार्किक और रोचक विवेचन लेखिका ने किया है जो साहित्य के शोधार्थियों, पाठकों के लिए उपयोगी जानकारी है। इसी अध्याय में लेखिका ने अपनी इस पुस्तक का ध्येय भी स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा है, विमर्श के इन विविध आयामों को कहानी के संदर्भ में खोजना ही इस पुस्तक का उद्देश्य है (पृष्ठ 32)। इस दृष्टि से देखें तो लेखिका डॉ. बबीता ने एक सार्थक प्रयास किया है और ये एक लेखक केंद्रित पुस्तक न बनकर आलोचना की मुकम्मल पुस्तक बनी है।
‘हरदर्शन सहगल ः व्यक्तित्व व कृतित्व’ दूसरा अध्याय है, जिसमें उनके बारे में पूरी जानकारी दी हुई है। जन्म, जीवन यात्रा, सेवा, पुरस्कार आदि के बारे में बताया है तो साथ में उनकी लिखी पुस्तकों की विगत दी है। पुस्तकों के बारे में भी लेखिका ने जानकारी दी है ताकि उनके रचना संसार से पाठक रूबरू हो सके। एक बात डॉ. बबीता ने उनकी आत्मकथा ‘डगर-डगर पर मगर’ बहुत सुंदर लिखी है। आत्मकथा एक व्यक्ति के साहित्यकार होने की गाथा ही नहीं है उसके संघर्षों, उलझनों, सुलझनों, तनावों व मुस्कुराहटों का दस्तावेज भी है। कभी यात्रा वृत्तान्त, कभी संस्मरण, कभी डायरी, कभी कहानी, कभी फिल्मी स्टोरी और कभी आम बातचीत का एहसास कराने वाली यह आत्मकथा हमें 1947 के समय से आज के समय में लाकर छोडती है और जोडती है (पृष्ठ 45)। पाठक इस कथन से जान लेता है कि सहगल के रचनाकर्म में विविधता और गहनता है।
तीसरे अध्याय ‘हरदर्शन सहगल की कहानियाँ ः एक परिचय’ में लेखिका ने उनके कथा साहित्य का मूल्यांकन किया है। अध्याय के आरंभ में लेखिका की एक बात प्रभावी है। जीवन की वास्तविकता का निरूपण जितना कहानी में संभव हो सका है, उतना संभवतः साहित्य की किसी अन्य विधा में नहीं। कहानी चिरकाल से मनुष्य के आकर्षण का विषय रही है (पृष्ठ 46)। ये कहानी के लिए शाश्वत सत्य है। लेखिका ने इस अध्याय में सहगल के 9 कहानी संग्रहों की पूरी पूरी समीक्षा की है। जिसको पढने से पाठक सहगल के कथा साहित्य के बारे में पूरा जान जाता है। ये इस पुस्तक की खासियत है। इस अध्याय को पढने के बाद महसूस होता है कि सहगल की कहानियों का फलक विस्तृत है। जीवन से हर विषय को उन्होंने छुआ है। व्यक्ति के संघर्ष को स्वर दिया है। मन की व्यथा को शब्द दिए हैं। ये अध्याय सच में पठनीय है।
‘हरदर्शन सहगल की कहानियों में समकालीन विमर्श’ शीर्षक वाले चौथे अध्याय में लेखिका ने उनके 10 कथा संग्रहों की लगभग 50 कहानियों की पडताल की है, जिनमें छुपे विमर्श को पाठक के सामने रखा है। मध्यमवर्गीय जीवन के केंद्र वाली कहानियों में साहित्य का हर विमर्श उपस्थित है, लेखिका का ये मानना है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, बाल विमर्श और अन्य विमर्श शीर्षकों में उनकी कहानियों को रखा है। लेखिका ने उनकी कहानियों को विमर्श देते समय अपने तर्क भी दिए हैं जो उनके गहरे अध्ययन को पुष्ट करते हैं। 10 कथा संग्रहों से विमर्श के आधार पर कहानियों को चुनना काफी श्रमसाध्य काम है। लेखिका की इस बात में काफी हद तक सच्चाई है कि दृष्टि की सूक्ष्मता और संदर्भों की सही पहचान के साथ सहगल जी की कहानियाँ परिवेश का आईना है (पृष्ठ 79)। जीवन की त्रासदी को मुखरित करने वाले कथाकार के रूप में ही सहगल साहित्य जगत् में पहचाने जाते हैं। डॉ. बबीता ने उनके कथा साहित्य में विमर्श की तलाश काफी गंभीरता से की है।
पांचवां अध्याय ‘समकालीन कहानी ः संवेदना के स्वर’ इस पुस्तक का उपयोगी और महत्त्वपूर्ण अध्याय है। इसमें लेखिका ने कथा साहित्य के वर्तमान और उसके हर पक्ष को छूने का प्रयास किया है। आज के दौर में जब आदमी सिकुड गया है और संवेदना का संकट है, उस हालत में कथा साहित्य की महती भूमिका है। संवेदना ही इंसान होने का प्रमाण है और उसे जीवित रखने में कहानी की बडी भूमिका हो सकती है। इस दृष्टि से ये अध्याय खास है। वर्तमान कथा साहित्य पर नजर डालते हुए डॉ. बबीता जी ने बहुत उपयोगी बातें इस अध्याय में कही है। इस बात में उनकी बेबाकी है। कुछ कहानीकार केवल यथार्थ को लेकर कहानी लिख रहे हैं और कुछ आदर्श मिश्रित यथार्थ की रचना में विश्वास व्यक्त कर रहे हैं। युगीन चेतना के अनुकूल प्रेमचंद ने भी अपनी कहानियों में घटनाओं, परिस्थितियों का आयोजन किसी नैतिक, सामाजिक मूल्य की अभिव्यक्ति हेतु किया (पृष्ठ 83)। लेखिका ने इसी आधार पर सहगल की कहानियों का भी मूल्यांकन किया है।
अंतिम अध्याय ‘नव विमर्श में निहित संभावनाएं’ में वर्तमान समय में लेखक के सामने आ रही चुनौती पर अपनी बात काफी गंभीरता से कही है। आदमी के बदलते रूप ने लेखक के सामने संकट खडा किया है। समाज बदल गया, समस्याएं बदल गई तो लेखन में बदलाव तो आता ही है। साहित्य का सीधा सरोकार तो समाज से ही है। इस बात की तरफ लेखिका का इशारा हुआ है। उनकी ये बात प्रभावी है, अनेकानेक धाराओं के मध्य ‘मानव विमर्श’ ही परम विमर्श और अंगी विमर्श है, जो मानव की समस्त संवेदनाओं व अनुभूतियों को बनाए रखने का पक्षधर है (पृष्ठ 93)।
लेखिका डॉ. बबीता काजल ने हरदर्शन सहगल के *ारीये समकालीन कथा साहित्य का सार्थक और उपयोगी मूल्यांकन किया है। भले ही केंद्र में एक रचनाकार को रखा गया हो मगर पडताल वर्तमान के कथा साहित्य की है। इसीलिए इसे केवल एक शोध नहीं कहा जाना चाहिए बल्कि कथा साहित्य की एक आलोचनात्मक कृति कहना चाहिए। लेखिका को बधाई।
पुस्तक ः हरदर्शन सहगल का कथा साहित्य और
समकालीन विमर्श।
लेखक ः डॉ. बबीता काजल
प्रकाशक ः बोधि प्रकाशन, जयपुर।
परिचय ः बहुआयामी रचनाकार, संपादक । विविध विधाओं में लिखते हैं।
सम्फ ः कलकतिया भवन, आचार्य-सुराणा मोहल्ला, बीकानेर - 9672869385