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संवादहीनता के विरुद्ध एक सार्थक हस्तक्षेप

सवाई सिंह शेखावत
‘अबोले के विरुद्ध वरिष्ठ कवि जयप्रकाश मानस का २०१० में शिल्पायन से आया तीसरा कविता संग्रह है। हाँ, वही जयप्रकाश मानस जिन्होंने साहित्यिक सूचनाओं, कृति संदर्भों, कविता और गद्यांशों को फेसबुक पर साझा करने की महत्त्वपूर्ण शुरुआत की- सोशल मीडिया पर। मैं उनके इस अवदान को एक बडी साहित्यिक पहल मानता हूँ।
खैर, उनके जिस कविता-संग्रह की मैं बात कर रहा हूँ वह पिछले दिनों मेरी दृष्टि से गुजरा। इसका पाठ करते हुए मैंने महसूस किया कि हिन्दी कविता में मठवादी परम्परा के चलते कई बार बेहद अच्छी कृतियाँ भी अनदेखी गई। साहित्य में मुँह देखे टीका करने की यह गैरसाहित्यिक रवायत हर्गिज अच्छी ची*ा नहीं है। कविता के समकालीन पैटर्न, प्रचलित ढर्रे और घोषित प्रयोजनवाद के बरक्स यह कृति मानवीय जीवन के संवेदनात्मक धरातल पर हुई टूट-फूट, छीजते मानवीय मूल्यों और विलोपित होते संवेद्य-काव्य-रूपकों की गहरी पडताल करती है जिनके अभाव में जीवन, जीवन नहीं रह जाता। प्रचलित और तयशुदा काव्य मानकों और मानवीय संवेदन तंत्र पर हुए अपघातों के विरुद्ध जिस मर्मपूर्ण ढंग से यह आवाज उठाती है - वह एक सार्थक मानवीय हस्तक्षेप की तरह लगता है।
साहित्य और उसमें भी खासतौर से कविता का उत्सुक पाठक होने के नाते मैं यह कह सकता हूँ कि पिछले छह सालों के काव्य आँकलनों और सालाना साहित्यिक विवरणों में किसी भी काव्य अध्येता ने इसे रेखांकित किए जाने योग्य नहीं समझा - जबकि मेरे जाने -समझे यह संग्रह सर्वथा उसका हकदार है। मैं भाई मानस जी का आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे इस संग्रह से अवगत कराया और मैं अपने समय की एक संवेदनशील और जरूरी काव्य-कृति के मर्म से अभिज्ञ हो सका।
‘अबोले के विरुद्ध’ पिछले कुछ दशकों से हमारे सामाजिक तंत्र के क्षरण, छीजते संवेदनात्मक धरातल और फिर भी बौद्धिक क्षेत्रों में व्याप्त चुप्पियों के विरुद्ध एक संवेदनशील कवि का आत्मालाप है। लगातार गडबडाते सामाजिक ढाँचें में मनुष्य का दिन-ब-दिन जटिल होता जीवन-संघर्ष, संबंधों की खत्म होती आपसदारी, खोखले नैतिक मूल्य, गैर जिम्मदार होता दायित्वबोध और सबसे बढकर इन ची*ाों को लेकर पनप रही संवादहीनता को तो यह *ांदा दस्तावेज है ही। उल्लेखनीय यह भी है कि इस चिन्ताजनक अपक्षय के विरुद्ध कवि केवल शिकायतकर्ता या मात्र साक्षी भाव में नहीं है। वह लगातार उन सामर्थ्यों की ओर ठोस इशारा करता चलता है, जिनके बूते हम आज भी इन न्यूनताओं-हीनताओं के विरुद्ध हस्तक्षेप कर सकते हैं।
संग्रह की शुरुआती कविताओं में से ही ‘एक उपस्थिति’ में कवि कहता हैः ‘अभी पराजय की घोषणा न की जाए/मुठभेड की आवाजें आ रहीं है। छन-छन कर/क्या पता किसी के पास बची हो एकाध गोली/क्या पता आखिरी गोली से टूट जाए कारागृह का ताला।‘ लेकिन इसके लिए जरूरी है दायित्वबोध की खरी शिनाख्त। कवि स्पष्ट सूत्र देता है कि- ‘हाथी के जो दाँत हों खाने के/हों वही दिखाने के।’ इन दिनों कथनी और करनी का भेद हमारे सामाजिक जीवन में एक घोषित बुराई की तरह शामिल हो गया है। हम बातें तो बडी-बडी करते हैं, लेकिन कर्म के स्तर पर पूरी तरह चूक रहे हैं। कवि का कहना है कि ‘खतरा यदि कहीं हैं/तो मन में घात लगाये बैठे/ इसी घुसपैठिये भय से।’ वह साक्षी भाव से दुनिया को देखने और तटस्थ बने रहने वालों के प्रति भी उतनी ही सख्ती से पेश आता हैः ‘तटस्थ नहीं ढूँढते उपाय/नहीं करते निर्णय/नहीं करते कोई विचार’ पर जो सफलताओं के झण्डे गाड रहे हैं, उनके प्रति भी खरे विवेक का इ*ाहार करते हुए कवि स्पष्ट कहता है- सफलताएँ भी ऐसी हों/ कि न हों औरो की विफलताएँ शामिल जिसमें।’
कवि जीवन को अनवरत चल रहे सामूहिक जीवन-कृत्य की तरह देखता है। जहाँ ऊपरी सतह पर देखने से लगता है कि कहीं कुछ नहीं हो रहा, सब जैसे व्यर्थ की गतिविधियों में मुब्तला हैं। लेकिन कवि की पैनी आँख जीवन-व्यापार की गहरी पडताल करती है कि- ‘यहाँ कोई नहीं बैठा ठाले/कडे सडे-गले पतों के चर रहे हैं/केंचुएँ आषाढ से पहले/उलट-पलट देना चाहते हैं जमीन/वनपाखी कूडा-करकट से घोंसला बना रहे हैं/ भौंरे बटोर रहे हैं मकरन्द/ साँप धान कुतरते चूहों की ताक में है/ काले बादलों के पंजों से/ किरणों को बचाने की कशमकश में हैं चद। इस तरह कवि जीवन को तह देती गतिविधियों में कविता को खोजने-पाने की सफल कोशिश करता है। क्योंकि उसे पूरा भरोसा है कि- कविता होगी तो/सामाज में बची रहेंगी/संघर्ष और आवा*ा उठाने की संभावनाएं।’
जीवन और जीवन की जद्दोजहद के प्रति यही सकारात्मक रुझान जयप्रकाश मानस को हमारे समय का जरूरी कवि बनाता है। लेकिन इसका यह आशय कतई नहीं है कि मानस केवल जीवन का उजला पक्ष देखने-दिखाने के पक्षधर हैं। जीवन की कडी तल्ख सच्चाइयों के भी वे उसी तरह निगहबान हैं। अपनी ‘कुछ लोग सुसाइड नोट नहीं लिख छोडते’ कविता में वे कहते हैं सिर्फ और सिर्फ इसलिए/ कि अचानक यही दुनिया/ फिर किसी को आत्महत्या के लिए मजबूर कर देती है।’ यही ठोस और यथार्थवादी रवैया उनकी, बस्तर- कुछ कविताएँ’, ‘तालिबान’ और ‘देखते ही देखते एक हत्या हो जाती ह’ शीर्षक कविताओं में देखा जा सकता है।
जीवन की सकारात्मकताओं को वे दुनिया की हर इंच जगह में खोजते हैं। खाली समय में जीवन के जरूरी छोटे-मोटे कामों को निपटाने का उपयोगी मश्विरा देते हैं। लोक की सीधी-सादी पारदर्शी अनवरत बहती नदी को देखते ह। भाला-बरछी के अभाव में कंकड सकेल कर *ाोर-*ाोर से गोल-गोल घुमाने की तरकीब सुझाते हैं। और भरोसा जताते हैं कि देखना जानवर भाग खडा होगा। प्यार की *ारूरी मनुहार में भी वे यह कहना नहीं भूलते कि जिन्होंने नहीं लिखा कोई प्रेमपत्र/वे नहीं लिख सकते कविता। बेमौत मरे मनुष्य को श्रद्धांजलि देते हुए यह भी बता देना जरूरी समझते हैं कि- ‘यह कतई नहीं हो सकता कि/ जो आत्महत्या नहीं करता/ वे दुनिया से नारा*ा और दुखी न हों।’
यहाँ जीवन-संवाद को सार्थक बनाती छत्तीसगढ की लोक संस्कृति है, मांदल की थाप है, घुंघरुओं की थिरकन है। खेत पर रतजगे के लिए जागते हरखू की चकमक है। एपन ढारती नई बहू के साथ ही कुछ तो बोलो बतियाओे सुनो-देखो ताकि वह अकेला न समझे/अबोला न रह जाए/ बाहर ही बाहर न मर जाए/ दुर्दिन से न डर जाए की गुहार भी है। कवि साफ कहता है ऐसे में भी हम कुछ नहीं कर सकते तो फिर इस पृथ्वी पर हमारे होने का क्या मतलब है? इसीलिए वह मस्जिद-मंदिर ढहाते जेहादियों और भक्तों से यह जरूरी सवाल पूछता है कि- ‘आखिर क्यों नहीं रोका तुम्हारे पैगम्बर ने? क्यों नहीं समझाया तुम्हारे राम ने? और तालिबानों का वह कुतर्क भी कि म*ाहब को मानिए या फिर बेमौत मरिए।’
कवि प्रेम-पत्र को समय के अच्छे दस्तावेज की तरह शुमार करता है। लेकिन जहाँ गैर जरूरी भीड है वहाँ यह कहने से भी नहीं चूकता कि- ‘लोग *ारूर थे/ पर मनुष्य नहीं थे।’ बेमौत मारे गये मनुष्य की असली जरूरत को उजागर करते हुए वह बताता है- उसकी बस एक ही जरूरत होती है/ हम में से कोई/ हत्यारे का नाम *ाोर-*ाोर से चिल्लाए। उधर सामान्य आदमी की महिमा का बखान करते हुए अपनी ‘निहायत छोटा आदमी’ कविता में कवि कहता है- निहायत छोटा आदमी/सिरहाने रखता है पुरखों का इतिहास/ बूझता है अपना सारा भूगोल/ पृथ्वी पर ओस/जंगल के रास्ते/ चिडियों का दर्द/ जितना दिखता है/ उतना छोटा नहीं होता/ निहायत छोटा आदमी। इसी जिजीविषा के चलते वह आश्वस्त है- फिर भी बचे रहेंगे/अनसुने शब्द हवा में स्पंदित।
इतने अच्छे संग्रह में पू*फ में बरती गई असावधानी कहीं-कहीं अखरती है।