fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

दो कविताएँ

पारुल सिंघल कश्यप
ओस की बूँद-1
कितनी गलत थी
सोचती थी
भीगी काली रातों में
छाया होगा सन्नाटा
पर उन्हीं गहरे अंधेरों में
शोर मचाती हैं
यादों की परछाईंयाँ
आहटों से उनकी
पलक झपकती रात नहीं
झिरमिर बारिश की
बूंदों के
आवरण में
दर्द भी बह जाता है तनिक
आंसुओं की राह
और उठता है फिर वही
अनुत्तरित सवाल
क्यों....आखिर क्यों
इतनी बकुल हैं राहें
इस तथाकथित
चार दिन के जीवन की?
समय इस हद तक
निष्ठुर कैसे हो पाता है?

बादल बिजली
चांद सितारे
धरती आकाश
सब
हो जाते हैं मौन
नहीं जुटा पाते हैं
कोई समाधान
सहसा कहीं से
गिरती है बूंद ओस की
और विलीन हो जाती है
मिट्टी में कहीं
कभी न मिलने के लिए।


ओस की बूँद-2

ख्वाबों के नरम तकिये
उम्मीदों की लोरी है
फिर भी पलक न झपकी
क्या ये रात की घात है?
जोश है जुनून भी
हमराह हमकदम भी
मंजिल सर न हुई
क्या ये राह गुमराह है?
कहने की लियाकत है
*ामाना भी हमातनगोश
आवा*ा रही फिर अनसुनी
क्या ये किस्मत की सियासत है?
मौसम भी है माकूल
नाखुदा भी काबिल
फिर डूबा मेरा सफीना
क्या ये लहरों का कहर है?
दिल आशना इधर है
न*ार-ए-करम उधर भी
मुमकिन नहीं निस्बत फिर
क्या रिवायत की अदावत है?

परिचय ः
पारुल सिंघल कश्यप, अर्थशास्त्र की प्राध्यापिका रही हैं और इन दिनों साहित्यशास्त्र कविताई में रत हैं।