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चार कविताएँ

विनोद सोमानी हंस
एक

मित्र,
कवि नहीं बनते
तो और क्या बनते
समय के अंधड
इतने दर्द झोली में डाल गये
कि आजीवन इन्हें ढो रहा हूँ
और वे ही बीज
अगली पीढी के लिए बो रहा हूँ
ऐसे में कवि बनना ही था
गुलाब कहाँ से लाता
कांटों के बीज बोना ही था।

दो

मेरे घर का कोना
वादों से ठसाठस भरा है
मैं कभी-कभी निहारता हूँ उन्हें
पुलकित होता हूँ पढ कर
बाट जोहता हूँ साकार देखने को
पर, भीतर ही भीतर खा रही है
दीमक उन्हें
चट कर रही है वादों को
पहले घबराया
फिर सोचा
वादों का क्या
फिर कोई दे जायेगा।
तीन

वह लडती रही
वीरांगना की नाईं
अपने हक में फैसले कराती रही
पालती रही सपने
कि वह शक्तिशाली हो गई है
अपने एक संकेत पर
फांसी तक पहुँचाने में समर्थ है
पर, वह नहीं जानती
मन के विकारों की शक्ति को
जो उसके अस्तित्व को
ललकारने पर उतारू है
ये गली के मवाली कुत्ते
बेशक भोंकते रहेंगे
पर, तुम निकल जाना
अपराजित हाथी की तरह।

चार

मेरे दोस्त,
तुम्हारी अभी भी
जयचंदी आदत बरकरार है
तुम्हें नहीं मालूम
कि तुम्हारे ये कृत्य
पृथ्वीराज की आँखें
छीन लेते हैं
चन्द्रबरदाई
काल कवलित हो जाते हैं
संयोगिता का कालखंड तो
बीत चुका है
पर, तुम इतिहास में
खलनायक बन अमर हो गये हो।