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पाँच कविताएँ

रमेश बोराणा
लौट आओ तुम
मेरे आत्मीय
मेरे बाल सखा
मेरे दोस्त
तुम अंगुली न उठाओ
उस ओर


जहाँ
लुकता-छिपता
लुढकता रहता है
ढलता सूरज
अथाह उजास लिए

क्षितिज को
उसके होने का अर्थ
सौंपता

फिर फिर
तिमिर हरने
सारे जग का

फिर फिर
उदय-आलोकित
होने के खातिर

यह जान लो
कि नियति और
पुरुष-प्रकृति के
बन्धनों से
बंधे हुए हैं हम

लेकिन नहीं है सूरज
अपने पुरुषार्थ और पुरुष को
पहचानो तुम

लौट आओ
पांवों तले की *ामीन
धंसने से
पहले-पहले

लौट आओ
तुम ।


जैसे महाभारत!
बरपाता हुआ
आतंक

चारों ओर
फैलता ही फैलता
जा रहा है
कोलाहल

फैलता है जैसे रात में
भयावह घना अंधेरा
और अंधेरे में
डर उपजाता हुआ
सन्नाटा।

फैलता ही फैलता
जा रहा है
कोलाहल !

यह पक्का है
ऊंचे गढ-किलों के छल-छंद ही
रचा गया है यह षड्यंत्र
कि छा गयी है
चहुँ दिशाओं में गर्द
अफवाहों संग
आर्त ध्वनियों से लिपटी हुई

दहशत में हैं
यहां हरिआई धरती
और ऊपर में
नीला उजला अम्बर
हो गया हो
जैसे महाभारत !


छंट-मिट जाएं
यह कोलाहल
यह गर्द
यह अंधेरा

जला सको तो
जलाओ तुम
एक दीपक

विश्वास का
परस्पर

कि मनों में
हो जाये उजियारा
जाता रहे अंधेरे का एहसास

गोया शर्मिंदगी से
कभी किसी के आगे
न झुकाना पडे शीश

और न ही अपनी
कमजोर हथेलियों में
छुपाना पडे हमें अपना
उतरा हुआ
चेहरा

अमन-चैन से
लेता हुआ सांस
जी पाये सारा जहाँ
जहाँ
‘सारे जहाँ से अच्छा
हिंदोस्तां हमारा’।

परछाईंयां

कब
किसकी हुई हैं ये
परछाईंयां

भ्रम है कोरा
उनके
होते रहने का

ढलती और
मचलती हैं रोशनी में

लेकिन
खौफ खाती हैं
अंधेरों से ।

खौफ खाता हूँ
अकेला हूँ
अकेला ही रहने दो

मत जलाओ ये
चिराग
अंधेरा है यहाँ
बस अंधेरा ही रहने दो

पडती है मेरे ख्वाबों में
खलल
इस तरह ना जगाओ
तुम

गहरी है नींद
गहरी नींद में ही रहने दो

खौफ खाता हूँ
अजनबियों की चाहत से
दूर हूं उनसे
दूर ही रहने दो

*ान्दा रहने की
नहीं है ख्वाहिश अब
उन्मादियों के बीच
अब और जीने का हौसला न दो

टूटा आईना हूँ
टूटा ही रहने दो

सलीका है नहीं चेहरे पढने का
व्यर्थ में क्यों समय जाया करते हो

भीगी पलकों ने मारा है
अश्क सूखे हैं मेरे
सूखे ही रहने दो

हाले-दिल अब बताइएं
तो बताएं किसे
पास बैठे हैं वो
दूर लगते हैं हमें

मैं जो तन्हा हूँ
तन्हा ही रहने दो

सौदाए-इश्क नहीं
फितरत मेरी
प्यार किया है मैंने
तिजारत नहीं

इबादत की है मैंने
इबादत में ही रहने दो

अकेला हूँ
अकेला ही रहने दो।
समन्दर
(1)

अपने कंधों से टकराता
उफनता और
मचलता है समन्दर
अपने ही किनारों की मिट्टी से
पाता हुआ सुकून

तूफानों में
डगमगाने लगती हैं अक्सर
वे ही कश्तियाँ पा जाती हैं
किनारे

लेकिन
जिसके सीने पर
खडे रहते हैं लंगर डाले
असंख्य जहा*ा
उन्हें
कहां नसीब होता है
ऐसा सुकून?

(w)

क्षितिज के चरण पखारे
बांहें पसारे दूर दूर तक

लहराते-लहराते
कबीरा को गाते

तरंगित होते लहर-दर-लहर

अपनी ही तलछट से
पहचान पाते

बोलो, तुम
समन्दर
ही हो न ?