fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

ओल्ड गेस्ट हाउस

मनोज शर्मा
जैसा कि आपको बताऊं, मुझे आज भी विश्वास नहीं हो रहा कि ऐसा हुआ होगा परन्तु यदि ऐसा नहीं हुआ तो, मैं यह कहानी आपको सुनाने के लिए आज जीवित होता और मुझे यह कहानी आपको ई-मेल नहीं करनी पडती।
मैं कर्णीसिंह, फोरेस्ट ऑफिसर। बात अभी की नहीं पचास साल से पहले की है, जैसा कि मुझे याद है राजस्थान में रियासतें समाप्त होने के बाद की एक पूर्व रियासत का उत्तराधिकारी था मैं। ठाठ बाट, धन ऐश्वर्य की कहीं कोई कमी नहीं थी पर वर्दी पहनने और राज का अफसर बनने का शौक था तो फोरेस्ट सर्विस करली जोईन।
हमारी रियासत में मेरे पिता ठाकुर साहब भंवर सिंह जी मेरे नौकरी करने पर बहुत नाराज हुए और इतने लाल पीले हुए कि क्रोध में यह तक कह बैठे कि ‘कहां तो हम शिकार करने वाले ठाकुर और कहां ये नौकरी करने वाला कुल का कलंक निकला कर्णीसिंह।’
फिर अचानक ही स्नेह से मुझे बाहों में भरते बोले ‘कर्णी, मुझे गर्व है तुम पर, अब तक मैंने न जाने कितने जंगली जानवरों का शिकार किया है। पर अब उसके प्रायश्चित्त स्वरूप करणी माता ने तुझे फोरेस्ट सर्विस में जाने की सद्बुद्धि दी।’
बस इसी प्रकार के लव-हेट सम्बन्ध थे मेरे और पिता के मध्य। चाहता तो मैं भी उस समय हमारी रियासत में मिलने वाले सभी आराम और आनन्द भोगता पर मैंने अपने बचपन में देखा था कि अंग्रेज रेजिडेन्ट जब भरतपुर जाते तो मेरे पिता को साथ ले लेते। मैं भी टंगा हुआ दस वर्ष की उम्र वाला बच्चा पिता के साथ ही लग लेता। मुझे ध्यान है कि वहां सर्दियों में पन्द्रह दिन तक चलता था शिकार चिडियों का और शिकार की समाप्ति पर अंग्रेज साहब बहादुर गर्व से एक बडे पत्थर पर लिखवाते कि फलां अंग्रेज ने छब्बीस हजार तीन सौ बाईस चिडियों का शिकार किया। मन बहुत रोता था। क्या आप कल्पना कर सकते हैं, गर्मियों में फिर पिता के साथ अंग्रेजों का जाना होता था और वही शिकार, कभी बघेरों, जंगली सुअरों, हिरणों और कभी-कभी खरगोशों का भी।
मेरा मन बैठ-बैठ जाता था, ये सब आपको इसीलिए बता रहा हूं कि इस सारे निर्दयी कृत्य से मन शिकार के प्रति बहुत वितृष्णा से भर गया था। यूं नहीं कि मैं शाकाहारी रहा हूँ पर जब अंग्रेज मादा जानवरों का भी शिकार करने लगे तो शिकार नाम से अत्यन्त घृणा सी हो गई, इस कारण संकल्प ले लिया कि प्राण रहते पर्यावरण एवं जानवरों को बचाना ही बचाना है। तो जंगलात में अर्थात् फोरेस्ट ऑफिसर की नौकरी कर ली। यह सब कुछ आपको भूमिका बताना जरूरी था इसीलिए बताया, कृपया क्षमा करना।

नकरी के चलते ‘पोचिंग’ यान अवैध शिकार की शिकायत मिलती क्योंकि पश्चिम में विदेशों में बाघ और बघेरों की खोपडियों एवं ट्रोफियों की अमीरों के ड्राइंग रूम सजाये जाने हेतु बहुत मांग थी। इसी के चलते ढेर सारे पैसों के प्रलोभन में पेशेवर जातियां जंगली जानवरों का शिकार करती थी। तो मैंने एक योजना बना शिकार को रोकने का व्यूह रचा। व्यूह रचना से अवैध शिकार पर काफी कुछ काबू भी पा लिया गया था।
इसी क्रम में एक बार सूचना मिलने पर शिकारियों का पीछा करते करते हथियारबंद हो कर मैं रात्रि साढे ग्यारह बजे के लगभग जंगल में घुसा, कई किलोमीटर चलने के पश्चात् अचानक शिकारियों के पदचिह्न एक त्रिकोण रास्ते पर जाकर गायब हो गये। मैंने अनुमान से त्रिकोण के दायें रास्ते पर अपनी जीप मोड ली। और खानसामे तथा ड्राइवर को दो दूसरे रास्तों पर राईफल के साथ खडा कर दिया ताकि कोई शिकारी बच के ना जा सके।
फिर मैं सीधा उस रास्ते पर बढने लगा जहां मुझे लगा कि शिकारियों का बसेरा होगा। मैं लगभग पन्द्रह बीस किलोमीटर तक जंगल के विभिन्न रास्तों पर घूमता रहा पर मुझे कोई सुराग न मिला। अचानक मेरा ध्यान जीप के माईलोमीटर पर गया। मैं देखकर हैरान रह गया, कि जीप के डाइनमों ने काम करना बंद कर दिया था। गाडी की हैड लाईट धीरे-धीरे मंद हो रही थी। भय की एक रेखा मेरे भीतर कौंध गई कि अब कहां जाऊंगा कि दूर दूर तक अंधेरा ही अंधेरा। हैडलाईट मंद होती होती फिर बंद भी हो गई। उस अमावस्या की काली रात्रि में पहली बार लगा कि मैं कमजोर पड रहा हूं। दुर्योग यह भी कि अंधेरे में पेड से टकराकर जीप का इंजन भी बंद हो गया। मैंने अंतिम कोशिश की कि जीप स्टार्ट हो जाये परन्तु बैट्री खत्म हो जाने से जीप टस से मस नहीं हुई।
पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं जंगलात की ट्रेनिंग से घबराहट को काबू में रखकर तारों की छांह में सबसे ऊंचे पेड पर चढ गया इस आशा में कि कोई रोशनी की किरण दिख जाये क्योंकि मुझे आसपास बाघ, लकडबग्घों एवं सियारों की आवाजें अर्थात् उनके द्वारा भोजन की तलाश में निकाली जाने लगी आवाजें नजदीक आती महसूस होने लगी थी।
ज्योंही मैं उस ऊंचे पेड की फुनगी पर चढा तो संतोष की सांस ली। घने जंगल में मुझे एक रोशनी अर्थात् मशाल जलती दिखाई पडी, और उसी रोशनी के प्रकाश में दिखा एक प्राचीन बंगलेनुमा मकान, जिस के अहाते में वह मशाल जल रही थी। मेरे पास कम्पास तो था ही, पेड से उतर छुरा एवं एक हाथ में राईफल आगे-आगे लिए मैं उस दिशा की ओर बढा जहां मशाल जल रही थी। मशाल भवन के गेट पर ही जल रही थी। मशाल के पास ठिठक कर मैंने पुराने विशाल भवन का जायजा लिया। लगभग डेढ सौ वर्ष से अधिक पुराना एवं अंग्रेजी स्थापत्य का भव्य प्रासादनुमा भवन दृष्टिगोचर हो रहा था। गेट पर ही मशाल के उजाले में देखा कि भवन का नाम लिखा था ‘ओल्ड गेस्ट हाउस’।
परन्तु आसपास कोई हलचल नहीं थी, झिंगूरों एवं जंगली जानवरों की आवाजें वातावरण को और भयानक बना रही थी। अचानक ही मशाल के बिल्कुल नीचे एक काले सर्प को विचरण करते देख मुझे ठण्डे पसीने आ गये। चूंकि भवन का गेट बंद था, मैं अन्दर जाने का उपाय तलाशने लगा। इसी उपक्रम में मैंने देखा गेट के सिरे पर एक रस्सी झूल रही थी। रस्सी के नीचे चर्च की घंटी जैसी घंटी का निशान बना हुआ था। मैं समझ गया कि उस रस्सी को खींचना है। घबराहट में मैंने रस्सी को तीन-चार बार खींच दिया। वातावरण में कई बार उस घंटी की ईको ध्वनि लिए आवाज गूंजने लगी टन्न, टन्न, टन्न।
लगभग तीन चार मिनट के पश्चात् मेरी आशा के विपरीत कोई बूढा झुर्रीदार व्यक्ति नहीं अपितु आभिजात्य सा लगने वाला सलोना-सा युवक गेट पर उपस्थित हुआ और बोला ‘क्या चाहिए श्रीमान्।
मैंने उतनी विनम्रता मिश्रित रोब के साथ कहा कि मेरा नाम कर्णीसिंह है, मैं इस इलाके का फोरेस्ट ऑफिसर हूं, मुझे आज रात यहां रुकना है। कृपया गेट खोलिये।
उस युवक ने दुगुनी विनम्रता के साथ कहा ‘श्रीमान्! मेरा नाम रिचर्ड है, मैं यहां का केयर टेकर हूं। गेस्ट हाउस में पांच कमरे हैं, चार कमरों में रिनोवेशन का कार्य चल रहा है। तथा एक कमरे की पहले से बुकिंग है अतः आप कहीं और जाइए। यहां कोई कमरा खाली नहीं है।’
मैं चूंकि जिस परिवार से था वहां ना सुनने की आदत कम ही डाली थी, वैसे भी यह स्थान मेरे फोरेस्ट के इलाके में था तो मैं भला किसी की ना कैसे सुन सकता था! मैंने क्रोध जताते हुए उससे कहा कि ‘मुझे अंदर जाने दीजिए।’ उसने फिर मिन्नत की, ‘हुजूर पहले से बुकिंग है।’
मैंने उसका यह व्यवहार बदतमीजी के रूप में जानकर उसे एक थप्पड रसीद कर दी। चूंकि वह गेट अर्थात् मेन गेट खोल चुका था मैं उसे कॉलर से पकड कर घसीटता-सा गेस्ट हाउस में ले गया।

‘हुजुर आप जाने आपका भाग्य जाने’ उसने रहस्यमयी मिमियाहट भरी आवाज में यह कहा तो सही मानिए एक बार तो मुझे लगा कि कुछ गलत हो रहा है पर अफसरी जो थी सिर पर सवार, तो मैं फिर गरजा.........
‘एन्ट्री रजिस्टर लेकर आओ!’
कुछ देर में वह रजिस्टर लेकर आया, मैंने एन्ट्री की, उसने कमरा खोला कमरे के बाहर लिखा हुआ था ए-1।
ए-वन पढते ही आनन्द आ गया। मैंने नहीं बोला मन बोला ‘आई एम द ए-वन।’
क्या कमरा था, कमरे की एक दीवार पर टाईगर की ट्रोफी एक दीवार पर अफ्रीकी भैंसे की ट्रोफी सजी हुई थी। राजसी संस्कार वाले व्यक्ति को राजसी ठाठ वाला कमरा मिल ही गया।
रिचर्ड ने मुझे चाय एवं भोजन के लिए पूछा परन्तु मुझे नींद आ रही थी मैंने उसे मना कर दिया और यह भी हिदायत दी कि ‘अब डिस्टर्ब नहीं करना’ कमरा बंद करने के पश्चात् चिटकनी लगाकार विशाल पलंग पर सोने का उपक्रम करूं उस के पहले ही कमरे की एक दीवार पर एक आकृति उभरी, पुरूष आकृति, ‘लांग कोट’ एवं ‘बो’ लगाये आकृति।
फ्रैंच दाढी वाली उस पुरुष आकृति ने मेरी ओर देखकर गम्भीर स्वर कहा, ‘सर, आज हमारी यहां बुकिंग थी ना पूर्व से ही, आप को बताया भी गया पर आपने तो कमरे पर कब्जा जमा लिया।’
फिर एक स्त्री और लगभग चौदह वर्ष की लडकी की आकृति दीवार पर उभरी। पुरुष आकृति ने उनकी और देखते हुए कहा ‘हमने तो पहले ही बुकिंग करवा रखी थी और ये आ गये, अब हम कहाँ सोयेंगे।’
मैं यह सब देख सुन थर-थर कांपने लगा। फिर चिटकनी खोल काउण्टर की ओर भागा और काउण्टर पर बैठे रिचर्ड से पूछा, ‘कौन हैं ये लोग जो सिर्फ चित्र की तरह दीवारों पर दिख रहे हैं। और बात भी कर रहे हैं?’
रिचर्ड ने मेरी बात पर कोई आश्चर्स व्यक्त नहीं किया और सहज सा मेरा हाथ पकडकर ए-वन कमरे में ले आया फिर दीवार पर उभरी आकृतियों में से पुरुष कि आकृति की ओर देखकर कहने लगा ‘सर मैंने इन्हें बता दिया था कि आपकी बुकिंग है परन्तु ये फोरेस्ट के बडे अफसर हैं ये नहीं माने।’
फिर रिचर्ड मेरी तरफ देखकर बोला ‘विलियम साहब से माफी मांग लो शायद कुछ इन्हें दया आ जाये क्योंकि अब तक तो जिसने भी इस प्रकार *ाद्द की वह सुबह का सूरज नहीं देख पाया।’
इतना कहकर रिचर्ड कमरे से बाहर निकल गया एवं कमरे की चिटकनी अपने आप बन्द हो गई। मैंने घुटनों के बल घिघियाते हुए तीनों आकृतियों से माफी मांगी पर पुरुष आकृति, जो कि मुझे पता लग चुका था कि कोई विलियम साहब है, की पत्नी अचानक रोने लगी और बोली, ‘हम कहाँ जायेंगे, मेरी बेटी कहाँ सोयेंगी, जब कि हमारी यहां परमानेंट बुकिंग है।’
मैंने हाथ जोडकर कहा कि मैं चला जाता हूं और जीप में सो जाता हूं।
विलियम साहब ने पुनः गूंजते हुए स्वर में कहा, ‘यदि तुमने गेस्ट हाउस के रजिस्टर में एंट्री नहीं की होती तो हम यहीं सो जाते पलंग पर। पर तुम्हारे एंट्री करने के बाद कैसे सो सकते हैं?’
फिर जैसे अपने परिवार को आदेश देते हुए वे बोले ‘चलो, हम तीनों खडे खडे ही सो जाते हैं।’
मैंने कहा नहीं! आप लोग आ जाईए पलंग पर।’
तो विलियम साहब का हाथ जो दो फीट का दिख रहा था वह जैसे बीस फीट का हो गया और उस हाथ की बडी सी हथैली ने मेरे माथे को जकड लिया। मुझे लगा जैसे मेरी खोपडी चकनाचूर हो गई है। मुझे होश ना रहा, खोपडी के चकनाचूर हो जाने के बाद क्या कभी किसी को होश रह सकता है भला........।
मेरी नींद खुली तो सवेरा, मेरा भगवान से मांगा गया सवेरा। मैं बहुत खुश।
बिस्तर पर बीती रात को स्वप्न सा मान आनंद के साथ बिस्तर पर प्रसन्नता से कूदने का अर्थात् पलटियां खाने का उपक्रम करने लगा। पर हठात् क्या देखता हूं कि न तो हाथ मेरे काबू में, न मेरे पैर। लगा जैसे हाथ पैरों में जान ही न रही हो। मैं मुश्किल से घिसटता हुआ बेड के पास फ्रेंच विन्डो को खोलने का प्रयत्न करने लगा। खिडकी खुली नहीं पर जैसे तैसे एक पल्ला खोला और गरदन बाहर निकाल कर आर्तनाद करने लगा। ‘मुझे बाहर निकालो! मैं हूं ए-वन का गैस्ट।’
‘मैं चिल्लाया तो मेरी नजर अचानक एल्युमिनियम की सीढी पर चढी एक स्त्री पर पडी जो कि बाहर की दीवार को साफ कर रही थी। मैंने पुनः चीत्कार की ‘मुझे बाहर निकालो, मैं यहा फंसा हूं।
परन्तु उस स्त्री के चहरे पर ऐसे कोई भाव नजर नहीं आ रहे थे कि वो मुझे स्त्री सुलभ संस्कार से बचायेगी बल्कि वो तो अत्यन्त आश्चर्य से चीखी.... ‘सुनो सुनो! ये ए-वन वाला बच कैसे गया, ये जीवित कैसे है। इसे तो आज मरना था अभी तक तो एक सौ इक्कीस साल से ए-वन में रहने वालों की सवेरे लाश ही मिलती है।’
उस की ये आवाज सुन घिसटता हुआ मैं बालकनी में जा गिरा। क्या देखता हूं कि तीन शरीर। मां का, पिता का और बेटीर का। बेटी ताली बजाते हुए ‘ये तो बच गया। अरे ये तो बच गया।’ एक लोंदे की तरह खिडकी से बाल्कनी में गिरे मैंने पहले तो जायजा लिया कि यह हो क्या रहा है? फिर आंखें झपकाते हुए स्पष्ट देखने का यत्न किया। बाल्कनी में विलियम साहब और उनकी पत्नी एवं बेटी बैठे हुए थे, चाय की टेबल उनके सामने रखी हुई थी, केटली टी-कोजी से ढकी हुई।
मैंने कातर न*ार से विलियम साहब से प्रार्थना की कि ‘मुझे बताओ, मुझे बताओ, मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। रात वाली घटना वास्तविकता थी या अभी जो मैं देख रहा हूं वह सत्य है?’
पहली बार विलियम साहब मेरी और अपनत्व भाव से मुस्कुराए और कुर्सी से उठ मेरी और आये। मेरा हाथ अपने हाथ में लिया, रात्रि में अनुभव किए गए कठोर हाथ के विपरीत, क्या कोमल हाथ, क्या ममत्व लिए स्पर्श!
वे फुसफुसाये ‘डोन्ट वरी माई चाईल्ड, योर वैलकम!’
बस इसके बाद मुझे ऐसा लगा जैसे शनैः शनैः मूर्च्छा छा गई मुझ पर। बेहोशी का अपूर्व आनंद।
मेरी बेहोशी ना जाने कब विलियम साहब की आवाज से टूटी। ‘कर्णीसिंह! अब उठो, बहुत आराम कर लिया, जाओ देखो जरा नीचे पोर्च में कुछ लोग तुम से मिलने आये हैं। मिलकर जल्दी आना, हम लंच पर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।’
मैंने देखा, घोर आश्चर्य! मैं ए-वन में ही पलंग पर पसरा पडा था। तुरन्त उठकर जूते पहन नचे पोर्च की ओर जाने का उपक्रम करूं उसके पहले अपनी घडी पर नजर जो डाली तो स्पष्ट हुआ कि तारीख बदल चुकी थी एवं दूसरे दिन के दोपहर के साढे बाहर बज चुके थे, तो इसका अर्थ यह था कि मैं लगभग अट्ठाइस घन्टे बाद होश में आया था।
मैं खडा हुआ, एक अंगडाई, फिर लम्बी जम्हाई ली। आश्चर्य था कि कोई थकान नहीं, स्वयं को बडा ही तरोताजा अनुभव कर रहा था।
कॉरीडोर में चलते हुए सोचने लगा ‘यहां मुझ से मिलने कौन आया होगा?’
थोडा आगे जाने पर क्या देखता हूं कि पोर्च के पास कोई चालीस-पचास व्यक्ति जमा थे तथा रिचर्ड से कुछ बात कर रहे थे। मैं नीचे पोर्च में पहुंचा तो हर्ष मिश्रित आश्चर्य हुआ, वहां पर मेरे दाता हुकुम अर्थात् मेरे पिताजी, अन्य परिजन तथा हमारी रियासत के दीवान एकत्रित थे। मैंने तुरन्त दाता हुकुम के चरण छुए पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, मैंने दीवान साहब से पूछा कि ‘क्या बात हो गई, आप लोग चिन्तित क्यों नजर आ रहे हो?’
मेरी इस बात पर भी दीवान साहब के चेहरे पर कोई भाव नजर नहीं आए।
तब मैं दाता हुकुम से लिपट गया और बोला, ‘हुकुम, मुझसे बात करिए, आप इतने दुःखी क्यों नजर आ रहे हो?’
पर जैसे दाता हुकुम मेरी उपस्थिति को नकारते हुए से लगे। वे गेस्ट हाउस के उस रिचर्ड से ही बात करना जारी रखे हुए थे जिसका सार यह था कि ‘कर्णीसिंह नामक फोरेस्ट आफिसर दो दिन पूर्व इस इलाके में रात्रि को आया था, गेस्ट हाउस के पास ही उस की क्षतिग्रस्त जीप तथा गेस्ट हाउस के गेट पर उसकी राईफल एवं चाकू मिला है, यदि उनके पास कर्णीसिंह की कोई जानकारी हो तो बताएं। वे अपने इकलौते पुत्र कर्णीसिंह की खोज में आये हैं।’
उनकी बात सुन मैं तुरन्त अपने पिता के सम्मुख जा खडा हुआ और उन्हें गत तीन दिनों की सारी घटना सुनाते हुए कहा कि ‘हुकुम, अब यहां से चलते हैं।’
परन्तु लगा जैसे उन्होंने मेरी कोई बात सुनी ही नहीं, मैंने सोचा पुत्र से ऐसी भी क्या नाराजगी ?
सजल नेत्रों से मैं अपने चाचाजी, जो पास ही खड थे, के पास पहुंच कर बोला ‘काकासा, दाता की नाराजगी समझ में आती है पर अब मैं मिल गया हूं, अब चलते हैं यहां से।’
परन्तु उन्होंने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो मैं बदहवास ही हो गया और जोर से चिल्लाया, ‘मैं यहां खडा हूं कर्णीसिंह! आफ सामने आप लोग मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे हैं!’ इतने में रिचर्ड से बात करते करते दाता हुकुम जमीन पर ही सिर पकडकर बैठ गये और मेरा नाम ले ले कर जोर-जोर से रोने लगे।
मुझे सारा माझरा समझ में आ गया कि एक दिन पहले ही मैं बन चुका था विलियम साहब की जमात का हिस्सा। उनके परिवार का अंग। मनुष्यों के संसार से दूर जा चुका था, पक्का दूर जा चुका था। मैं अवश्य सब को देख सकता था पर मुझे कोई नहीं देख पा रहा था।
यह जानते ही मैं दहाड मारकर रो पडा ‘दाता हुकुम! दाता हुकुम!’
परन्तु प्रेत-आत्माओं की आवाज शायद मनुष्यों को सुनाई नहीं देती। मैं दाता हुकुम एवं अन्य परिजनों को धीरे-धीरे ओल्ड गेस्ट हाउस के गेट के बाहर जाते देख रहा था, असहाय!
पिता! एक बार तो देख लो मेरी ओर पर मैं कहां से उन्हें ऐसी दृष्टि दूं जिससे कि वे मुझे देख सकें।
मैं पोर्च की सीढियों पर एक घडी तक बैठा रोता, कभी पोर्च के खम्भे पर सिर पटकता, पर कोई फायदा नहीं।
थोडी देर बाद रिचर्ड ने मेरे कंधे को हौले से थपथपाते कहा ‘सर, लन्च ठण्डा हो रहा है विलियम साहब टेबल पर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।’
अब मेरे पास विलियम साहब के पास लन्च टेबल पर जाने के सिवाय क्या कोई चारा बचा था? ज्यों ही मैं विलियम साहब के पास पहुंचा, वे उठे और स्वयं मेरे लिए कुर्सी खिसकाते हुए बोले ‘डियर, मिल आये सब से? मैंने कल सुबह तुम से कहा था ना ‘वैलकम कर्णी सिंह’!
मैं क्या बोलता, कदाचित् अब सदैव के लिये यही मेरा परिवार था विलियम्स का, और यही मेरा संसार ‘ओल्ड गेस्ट हाउस’ और यह जंगल।
उस घटना और आपको यह काहनी भेजने के बीच गुजर गये पचास से भी अधिक साल। इस दौरान दाता हुकुम और काकासा भी गु*ार गये, रियासत के गढ को होटल में बदल दिया गया, परिवर्तन की राह अत्यन्त तीव्र हो गई।
बस इस सारे कालखण्ड अर्थात् समय के इस दौर में जो सबसे अच्छी बात हुई कि मेरे लापता होने के बाद पूरे इलाके में यह चर्चा फैल गई या यह बात सत्य मान ली गई कि पूरे जंगल में चौबीसों घण्टे फोरेस्ट आफिसर कर्णीसिंह की आत्मा विचरण करती है तथा जो भी कोई जंगली जानवरों का शिकार करते हैं या पेडों को नुकसान पहुंचाते हैं उन्हें कर्णीसिंह की आत्मा जंगल से बाहर जीवित नहीं जाने देती।
यह धारणा इतनी पुख्ता हो गई कि अब कोई न जंगल को नुकसान पहुंचा सकता है, न ही जानवरों को। कहते हैं कि आत्मा को कुछ महसूस नहीं होता परन्तु मेरी आत्मा तो यह देखकर, जंगल और जानवरों को सुरक्षित देखकर अत्यन्त प्रसन्न है।
हां, एक बात और, कमरा नम्बर ए-वन अब मुझे परमानेन्टली अलाट कर दिया गया है, गेस्ट हाउस का रिनोवेशन होने के बाद से विलियम साहब और उनका परिवार कमरा नम्बर ए-टू और ए-थ्री में रहने चले गये हैं।
आज सुबह ही जब मैं और विलियम साहब ओल्ड गेस्ट हाउस के पीछे ‘अट्ठारह होल’ वाले गोल्फ कॉर्स में गोल्फ खेल रहे थे तो मैंने ही उनसे चुहल की कि ‘यदि यह कहानी मनुष्यों को पता लगे तो क्या वे इस कहानी पर विश्वास करेंगे?
विलियम साहब ने कहा ‘नहीं कतई नही।’
मैंने उन्हें जवाब दिया, ‘सब जरूर विश्वास करेंगे, सत्य पर कौन विश्वास नहीं करेगा। हे पाठक! करेंगे ना आप विश्वास!‘
अभी जब यह कहानी मैं आपको ई-मेल कर रहा हूं विलियम साहब गोल्फ गेंद हाथ में लिए मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं।