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‘डांग’ उपन्यास : एक पृष्ठभूमि

हरिराम मीणा
राजस्थान, मध्यप्रदेश तथा उत्तरप्रदेश के सीमा की इसी पठारी-बीहडी क्षेत्र को डांग के नाम से जाना जाता है। इसी इलाके में से होकर बहती है चम्बल नदी जिसे दस्यु प्रसूता नदी भी कहा जाता है। रोबिनहुड किस्म के डाकू मानसिंह तोमर से लेकर सुल्तानसिंह, माधोसिंह, पुतली बाई, मोहरसिंह, फूलन देवी और जगन गूजर तक की लम्बी दस्यु समस्या के लिए बदनाम रहे इस अंचल को केंद्र में रखकर यह उपन्यास रचा गया है। डांग इलाके में होकर बहने वाली चम्बल नदी के दस्युओं का नाम दुनिया के आपराधिक मानचित्र पर सैकडों सालों से दर्ज है। मिथक व पुराणों में चम्बल को अभिशप्त नदी कहा गया है। उसको लेकर अनेक कथा-किंवदंती प्रचलित है, इन सबका सन्दर्भ देते हुए क्षेत्र में होती रही परिवर्तन प्रत्रि*या का रोचक वर्णन इस कृति में है।
कथाकार ने इस अंचल के भरतपुर एवं धौलपुर जिलों में करीब एक दशक तक की अवधि फील्ड पुलिस अफसर के रूप में यहाँ गुजारी है और इनके जन्म व शिक्षा के संस्कारों में जिला सवाई माधोपुर व करौली की भौगोलिकता रही है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र डांग का बडा भू-भाग बनता है। लेखक ने बहुत गहराई में शोध करने के पश्चात् इस पुस्तक को अंजाम दिया है। इस उपन्यास में समाहित दस्यु समस्या सहित आंचलिक मुद्दों को इससे पूर्व किसी लेखक ने इस कदर अभिव्यक्त नहीं किया है। डांग, डूंगर व डंगरों की यह धरती जिसके मध्य में बहती है दस्यु प्रसूता अभिशप्त चम्बल नदी जिसका बीहडी इलाका सदियों तक बना रहा है बागियों की पनाहगाह। यह अंचल किसी अबूझमाड से कम नहीं। इसी अबूझमाड के अनछुए, पहलुओं को समेटने का प्रयास किया है इस कृति में-
एक
जा को बैरी सुख से सोवै बा कू जीबे को धिक्कार....
कोड्यापुरा गाँव के चौक में आल्हा गाता हुआ नाथ बाबा अचानक रुक गया जैसे उसके भीतर कोई गहरा झटका लगा हो। आसमान के शून्य में कहीं हवा के बेतरतीब लटके शहतीरों पर उसकी न*ारें अटक गयी सी प्रतीत हुई जैसे धरती पर करती रही लम्बी खोज से ऊबकर अब उसे कुछ उम्मीद थी आसमान से। नाथबाबा के नाम से ही जानते थे सब हरजीनाथ को। सारंगी बजाता हुआ डूबकर आल्हा गा रहा था उस दिन। आल्हा-ऊदल की कथा का कोई चरित्र न होते हुए भी वह उसका प्रमुख पात्र बन गया था।
‘का बात भई रे भगत, काहे रुकगो?’ श्रीफल गूजर के टोकते ही नाथबाबा की निगाहें आसमान से उतरकर सारंगी पर आ टिकी। बायीं हथेली पर सारंगी टिकाते हुए दाहिने हाथ से उसकी खूंटी पकड कर तांत को कसने लगा।
‘आल्हा गाते गाते लुक्का डकैत को किस्सो याद आ गो पटेल। तुम्हें खबर है कि नायं, चार पीढी पैले अपने पुरखन को कियो कत्ल को बदलो ले के अपनो कलेजो ठंडो कियो हो वा डकैत ने। असली नाम हो वा बागी को पंडित लोकमन। डाकू बनिबे के बाद ही लुक्का के नाम ते जान्यों गयो। कैसे सोबे देतो चैन ते बैरीन ने। फिर बागी ही काहे को...’
‘हाँ रे नाथबाबा, नाम तो मशहूर बागीन में बतायो वा लुक्का को। ई मैंने बी सुन्यों है।’ श्रीफल गूजर ने जवाब दिया।
‘हम्बे रे श्रीफल काका, नाम तो वाको हमन ने बी सुन्यों है। कहीं सरमथुरा की आजू बाजू को बतायो वा डाकू।’ अधेड उम्र के सुरजीत ने श्रीफल की बात की हाँ में हाँ भरी।
‘ई डकैतन की बात कहाँ ते आ गयी भैया? जोगी बाबा, तू बा गोपीचंद-भरतरी को गीत सुनाय तो सुना दे, मेरे पांव में दर्द है रो है। मोय बैदजी के ढिंग जानो है।’ हंसराम कसाना ने डाकुओं की कहानी को विराम देने का प्रयास किया।
‘वा गूजरी वारो।’
‘हाँ।’
आल्हा छोडकर अब हरजीनाथ सारंगी पर थोडे आलाप के बाद राजा भर्तृहरि का गीत सुनाने लगा।
उज्जयनी के राजपाट त्याग कर राजा भर्तृहरि वैराग्य धारण कर लेते हैं और जंगलों में तपस्या करने लग जाते हैं। राजसी भोजन की जगह जीवन आश्रित हो जाता है भिक्षाटन पर। एक दिन घूमते घूमते भर्तृहरि बाबा पहुँच जाते हैं पहाड की तलहटी में बसी एक गूजरी के घर। कोई आधा द*ार्न भैंस होती है उसके पास, मगर गूजरी थी कंजूस। वैरागी भर्तृहरि ने गूजरी से दूध की भिक्षा मांगी। साधू का रूप होते हुए भी गूजरी ने दूध देने से मना कर दिया।
‘अरे, दूद मेरे ग्वालन कूँ पाऊँ
लेनी होय तो ले, छाच कुल्लड में भर लाऊं....
भर्तृहरि नारा*ा होकर मन ही मन गूजरी को शाप देते हुए वहां से चले जाते हैं। अचानक सभी भैंसें दूध देना बंद कर देती हैं। जो कोई उनके नजदीक जाता है उसे लात मारकर भगा देती हैं। अपने दुधमुहें पडरेटों (शिशुओं) को भी निकट नहीं फटकने देतीं। गूजरी ने अपने पति को काम से घर आने पर सारा किस्सा सुनाया।
उसने बताया कि ‘एक कनफटो सादू आयो हो। भिच्छा में दूद माँगबे लग्यो। मैंने दूद की बजाय छाच देनी चाई। वा ने नाहीं कर दी। अर, मुँह फुलाके नी चलतो बन्यो। मैंने बिचार कियो ऐसे भिकमंगे बाबाजी तो रोज डोलत फिरे हैं। ऐसे न कूं दूद दैबे लग गयी तो घरबार कैसे चलेगो? मोय खबर ना। हो सकै ऊ ने ही कछु कर दियो...’
गूजर सब समझ गया। हो न हो वह साधू बाबा भर्तृहरि के अलावा और नहीं हो सकता। पत्नी को डांटता हुआ गूजर निकल गया भर्तृहरि की तलाश में। कुछ देर बाद वह उन्हें ढूंढ पाया। मिलते ही उनके पांवों में गिर पडा और काफी मिन्नतें करने पर बडी मुश्किल से श्राप के असर से मुक्ति पायी।
‘क्यों भई पंच-पटेलो, देखा बाबा भरतरी को परताप।’ हरजीनाथ ने अपना सामान समेटते हुए कहा।
‘हाँ रे नाथ बाबा, ग*ाब को संन्यासी हो वा बाबा भरतरी तो।’ सभी श्रोताओं ने माथा हिलाकर श्रीफल गूजर की प्रतित्रि*या से सहमति जतायी।
‘काहे रे हरजी भगत, वा गूजरी ने जिन्नगी भर काउ कनफटे नाथन कूं भीक देबे ते इनकार ना कियो हैगो?’ हंसराम ने खाट से उठते हुए सवाल किया।
‘हाँ रे पटेल, भरतरी बाबा वा गूजरी कूं हमेस के काजे सीख दे गो।’ हरजीनाथ ने झोला कंधे पर लटकाते हुए कहा। झोले में सारंगी वह पहले ही रख चुका था।
‘तो आज को बासा न्याहीं कर लेओ भगत।’ श्रीफल गूजर ने हरजीनाथ से कोड्यापुरा गाँव में रात रुकने का आग्रह किया।
‘नहीं श्रीफल भाईए मोये संज्या (संध्या) तक सायपुर गाँव पहुंचनों है। आज रात म्हां देवी माता को जागरन है। राम-राम! मैं चलत हूँ।’
‘ठीक है भगत, जैसी तुमारी म*ाीर्। राम-राम!’ अन्य मौ*ाूद ग्रामीणों ने भी श्रीफल गूजर के संग हरजीनाथ का अभिवादन किया।
‘जै भोले नाथ! भरतरी बाबा सब पर किरपा बनाये रखे।’ सभी के अभिवादनों का एक साथ जवाब दिया हरजीनाथ ने।
लोक की वाचिक परम्परा का अनौपचारिक पडाव थम गया। हरजीनाथ कोड्यापुरा गाँव से चल पडा। अब वह सायपुर की राह पर था। भरतपुर-धौलपुर की डांग के एक कोने से गु*ार रहा था हरजीनाथ।
डांग की पहाडियों के ऊबड-खाबडपन, लाल और भूरे पत्थर-पट्टियों को लादकर ले जाने वाले ट्रकों के भार से मार्ग में पडे गड्ढों व बेतरतीब आडी-टेढी पगडंडियों की शक्लो-सूरत से तुलना करता जा रहा था हरजीनाथ अपने जीवन के उतार-चढावों की।
सरकारी स्कूल में आठवीं तक बडी मुश्किल से पढ सका था वह। उसके बाप ने साफ कह दिया था कि ‘आगे पढने से कोई फायदा नहीं। अपनी कुल-परम्परा का धंधा शुरू करो और परिवार के पालन में हाथ बंटाओ...’
जोगी का धंधा रो*ा सुबह कटोरा हाथ में लेकर चून मांगने के सिवाय और क्या? बदले में देने के लिए जोगी के पास कुछ नहीं। बचपन में एक साधू आया था हरजीनाथ के गाँव सूरोठ में। डांग के नीचे उतरते ही यूँ समझो समतल में बसे गांवों में से एक है सूरोठ गाँव। गाँव में बने हनुमान जी के मंदिर में ही डेरा डाला था उसने अपने एक चेले के साथ। शाम के वक्त खेत-क्यार से निबट कर जब गाँव वाले इकट्ठा हो जाते तब वह ज्ञान व धर्म की बातें बताता था।
‘भीख मांगकर जीवनयापन करना बुरा नहीं है जो एव*ा में आप समाज को कुछ सिखाओ तो। यह काम हमारे बडे बडे संत-फकीरों ने किया है।’ साधू की कही यह बात बालक हरजी के दिल में ऐसी बैठी कि हिली ही नहीं।
‘मैं तूम्बा ले के घर-घर ते चून ना माँगूँगो।’ हरजी ने अपने बाप को एक दिन साफ-साफ कह दिया था। इसी बात पर बाप ने गुस्से में उसे घर से निकाल दिया था। वो दिन है और आज का दिन, हरजी अपने गाँव नहीं लौटा। जिस कदर गुस्से में बाप ने निकाला था हरजी को, उसी तरह गुस्से में डांग के पहाडी अंचल में प्रवेश कर गया था हरजी।
दो
गढी बाजना गाँव के पास कनफटे नाथपंथियों का डेरा था उन दिनों। भटकता भटकता हरजी वहां पहुँच गया। कुछ दिन मठ में रहा। साधुओं की न*ार में आया। आठवीं तक पढा-लिखा और होशियार होने के कारण गद्दीनशीन साधू बाबा अमरानाथ ने उसे अपनी सेवा-चाकरी में रख लिया। बाबा अमरानाथ ने हरजी को बहुत स्नेह दिया था। वही वात्सल्य था हरजी के जीवन में जिसने बाप द्वारा किये निष्कासन के दंश की जलन को थोडा ठंडा किया। फिर भी अपनी जन्मभूमि से बेदखली को कौन बर्दाश्त कर सकता है, यह सवाल हरजी के मन में हमेशा बैठा रहा। बहुत कुछ याद आ रहा था उसे आज जब वह सायपुर गाँव की राह जा रहा था।
इस इलाके में सडकों के नाम पर ऊबड-खाबड रास्ते हुआ करते थे। रास्ता बतानेवाले भी ढूँढने पडते थे। हाँ, चुनावी मौसम में राजनेता *ारूर पहुँच जाते। अंचल के ग्रामीण दुर्भाग्यशाली। उनका जीवन बडा कठिन। पहाडी-पठारी अंचल में थोडी बहुत खेतीबाडी या पत्थर-खनियाँ म*ादूरी। चोरी-डकैती किसी की आदत में नहीं। ऐसे कर्म को आर्थिक दबाव का धंधा अवश्य कहा जा सकता था, जिसे कोई मजबूरी में ही अपनाता, जो बाद में जाकर खतरनाक बन जाती थी। ऐसे बुरे करम करने वाले शख्स दो प्रकार के हुआ करते थे। एक स्थानीय और दूसरे वे जो अपने इलाका में पुलिस का दबाव पडने के कारण आश्रय की तलाश में कुछ दिन ठहरने या उधर से गु*ारने के लिए आते थे। यूँकर ग्रामीणों की अपनी *ान्दगी और डाकुओं व पुलिस की अपनी लुका-छिपी व पकडा-धकडी चलती रहती थी। हरजीनाथ ने डांग के उस जीवन को बडी नजदीकी से अनुभव किया था। फिर भी यह सब कुछ गड्डमड्ड-सा ही रहा उसके मन में।
हरजीनाथ के संग पढने वाला एक लडका पुलिस में भर्ती हो गया था। डिप्टी एसपी के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उसने बयाना कस्बा में आवास बना लिया था। वह भी गरीब घर से था। पिता ने उसे पढा दिया और वह सरकारी नौकरी में आ गया। डकैतों के बारे में कई दफा श्रीफल गूजर ने उसे सूचना दी थी। इसलिए श्रीफल के संफ में था मुरलीधर यादव नाम का वह पुलिसवाला। अफसरों का चहेता होने व राजनीतिक रसूकात के कारण सिपाही से लेकर डिप्टीएसपी तक अक्सर उसकी तैनाती भरतपुर व धौलपुर जिलों में ही रही। उसने पुलिस में भी खूब नाम कमाया था।
एक दिन कोड्यापुरा से श्रीफल का फोन आया, ‘हुजूर, अस्सी बरस को होबे जारो हूँ। खट-करम खुद ई कर लऊं।’ रामा-श्यामा के बाद उसका पहला वाक्य इसी तरह था। मुरलीधर अचंभित था आगे यह जानकर कि श्रीफल गूजर का *ान्दगी में कभी किसी वैद्य-डाक्टर से अबतक पाला नहीं पडा। उसके दिमाग में एक सवाल उठा। ‘क्या कठोर जीवन इसी तरह ताकत देता है जिजीविषा को?’
मुरलीधर के भीतर आयोजित होने लगा स्मृतियों का मेला। बहुत कुछ था वहां। अरावली पर्वत श्ाृृंखला के पठार, नदी-नाले, लाल पत्थर के खदान, मवेशियों की खिरकाडियाँ, बीहडों में बने दुर्गा माँ के घंटाधारी मंदिर, जहाँ डाकू लोग और नहीं तो पीतल का घंटा ऐलानिया और बाकायदा *ारूर चढाते थे। लोक देव-देवियों के थान और दस्यु परम्परा के खूनी इतिहास को अपने सीने में कब से छुपाये वहां से कुछ दूर बह रही चम्बल नदी के पानी की गंध। खैर (कैर नहीं), केक्टस, धौक, बबूल, झाड-झंकाड तथा अनेक प्रकार की अन्य वनस्पतियाँ, कांस व घास। छोटे-छोटे खेतों में काम करते किसान और पत्थर की खानों में खनियाँ म*ादूर, डाकुओं के गिरोह, हथियारबंद पुलिस, यत्र-तत्र सफेदपोश राजनेताओं के पीछे उनके दलों के कार्यकर्ता। इन सब के केंद्र में था डांग जीवन के वृद्धावस्था की दहलीज पर पैर रखता श्रीफल गूजर। इस मानस-दृश्य ने मुरलीधर को पहुंचा दिया ‘विचारों के ताल’ तक जो अवस्थित है उसी डांग क्षेत्र में सायपुर गाँव से करीब एक किलोमीटर की पठारी चढाई वाली दूरी पर।
पठार के झिलारे में किनारे किनारे चार से छः फीट तक पारदर्शी जल से भरा हुआ सरोवर। मध्य में और गहरा पानी। लाल कमल व घेन्टूला के फूलों से सुसज्जित। तालाब की पाल पर चारों ओर उगे हुए आम, जामुन, पीपल, बरगद, इमली एवं अन्य प्रजातियों के दरख्त। पूर्वी कोने में थे पुराने किला के खंडहर जो किले के साथ शायद शिकारगाह भी रहा होगा। शाही आखेट के लिए बंदूकों की आवाजें और उसके बाद पकते मांस की गंध कितना विदीर्ण करती होगी शांत सरोवर के पवित्र हृदय को! यह था विचारों का ताल। यह नाम कैसे पडा? यह सवाल मुरलीधर के दिमाग में हमेशा अनसुलझा रहा।
बु*ाुर्ग लोग बताते हैं कि इस विचारों के ताल से मनसा भैरों, रमधा, कांस की बावडी, वन विहार व धौलपुर के पास मचकुंड तक की जंगली-पहाडी धरा प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों की तपोभूमि हुआ करती थी। उनमें एक थे कण्व ऋषि जिन्होंने मेनकापुत्री शकुंतला को अपने आश्रम में पाला था जो था, कहीं गंगा तट पर, लेकिन उससे पहले उस ऋषि ने यहाँ तपस्या की बतायी।
बयाना वृत्ताधिकारी के सेवाकाल में कई बार मुरलीधर विचारों के ताल गया। न जाने क्यूँ उसे यह स्थान बहुत मनोहारी, शांत एवम् पवित्र लगता था।
उसे याद आया एक दिन पुलिस के खास मुखबिर ने खबर दी कि नरपत डकैत का गेंग विचारों के ताल पर आने वाला है। यह भी पता चला कि पुलिस अगर बावर्दी विचारों के ताल पर जाकर एम्बुश लगायेगी तो गिरोह को शत-प्रतिशत पता लग जायेगा। वजह थी इलाका के चप्पे-चप्पे पर नरपत की पकड। लोग नरपत के नाम के आगे धूजते थे, जैसे वह हो ‘शोले’ का गब्बरसिंह। पुलिस की हर हरकत की खबर नरपत तक। नरपत की किसी भी गतिविधि की कोई हवा पुलिस तक नहीं। तय हुआ कि गुप्त रीति से ही पुलिस दल को वहां पहुँचना चाहिए। प्रायः ऐसे दस्यु विरोधी अभियानों का नेतृत्व संबधित वृत्ताधिकारी को ही करना होता था। मुरलीधर के नेतृत्व में दस्यु-निरोधी विशेष पुलिस दस्ता ने वेशभूषा व हथियार वगैरह की दृष्टि से सब कुछ का इंतजाम ऐसे किया जैसे उन्हें पुलिस के रूप में कोई नहीं पहचान सके। स्याह रात के सन्नाटे में पुलिस ने मोर्चा जमा लिया विचारों के ताल पर अवस्थित किला के खंडहरनुमा बुर्जों के भीतर चारों ओर कडी निगरानी रखते हुए। विचारों के ताल का रमणीय क्षेत्र दिखायी देने लगा पुलिस व डकैतों के बीच होने वाली भयंकर मुठभेड के स्थल के रूप में। फागुनी बयार जेठमासी लू के थपेडों सी प्रतीत होने लगी। कैसी अजीबोगरीब मानसिकता थी जिसने वस्तुजगत् का परिदृश्य ही बदल दिया! सांय सांय करती रात जसतस गु*ार गयी।
पुलिस दल दो वक्त का खाना बांध कर लाया था। अगले दिन की साँझ तक वह खत्म। मुखबिर साथ था। अपनी खुफियागिरी पर पूरी तरह अडिग। दस्यु दल को इधर आना ही है।
फिर एक रात और फिर अगला दिन।
पुलिस दल के सामने खाने की परेशानी आयी। रसद सामग्री जानबूझ कर नहीं लाना था। अभियान ही मुश्किल से था चौबीस घंटे का। दूसरे, खाना बनाने की प्रत्रि*या में विचारों के ताल के गुप्त प्रवास के भंग होने का पूरा पूरा खतरा। वहां तो निबटा-धोयी भी छिपछिपा के करनी थी। दूसरे दिन के साथ नरपत डकैत के गिरोह के आने की सम्भावना क्षीण होने लगी। मुखबिर भी ढीला पड रहा था। अब मुखबिरी तो मुखबिरी ठहरी। चम्बल के डाकुओं की मुखबिरी और वह भी पक्की खबर के साथ। आसान काम नहीं। और ऐसा पहली दफा थोडे ही हो रहा था।
जोग-संजोग से सायपुर का लिछमन पंडित अपनी दिनचर्या के हिसाब से जंगल फिरने विचारों के ताल की तरफ आया। वह अनुभवी आदमी था। उसने टोह ले ली कि गढ में डकैतों का कोई गिरोह ठहरा हुआ है। उसके दिमाग में आया कि उसकी टोह की भनक यदि डाकुओं को मिल गयी तो जिंदा नहीं छोडेंगे। -
पुलिस का गहन अनुभव रखने वाला मुरलीधर सोचे जा रहा था कि यह ऑपरेशन तो असफल हो गया। आगे की सम्भावना बनी रहे, इसलिए चुपचाप यहाँ से निकला जाये। पांचेक किलोमीटर पैदल चलना था। आगे तो वाहनों के लिए वायरलैस से मैसेज दे दिया जाता। यह यात्रा भी तो करनी थी अतिगोपनीय तरीके से। यह सब संभव था रात ही में। समस्या थी भूखा दिन कैसे गु*ारे?
‘ससुरो हमारी जासूसी कर रो है? इते आ।’ दुर्ग के खंडित बुर्ज के नीचे एक कोना से बुलंद आवा*ा सुनकर लिछमन के पांव जहाँ के तहाँ जम गए।
‘माई-बाप, किते हो? दिखायी ना दे रहे...।
‘हरामी की औलाद, इते देख।’ यह स्वर ऐसा था जैसे कान की बगल से पचफेरा राइफल की गोली निकली हो। खंडहर के साये में पली झाडी से बाहर लिछमन पंडित को दिखायी दिया मुंह पर ढाटा बांधे एक शख्स जिसके हाथ में बारह बोर की दुनाली बन्दूक थी। पंडित को अपने पांवों के नीचे की *ामीन खिसकती न*ार आयी। साक्षात् मौत सामने खडी थी।
‘हु*ाुर, तुम का बेदरिया मुखिया के आदमी हो या कोई और सिरदार? मोय बताओ, का सेवा करूँ?’
पंडित को तुरंत *ावाब मिला ‘जादा आंकडेबा*ाी मत कर। पंद्रह करीब जनों की रोटी फटाफट बनवा के ला। हमारे पास टेम नहीं है। और सुनियो, काउए भनक लग गयी तो समझियो तू अपने पुरखन के ढिंग। अपने खोपडीय ठिकाने रखियो। चल फूट...’
‘माई बाप, नेकऊ गल्ती ना होबे की। ई कदम गयो अर ऊ कदम आयो।’ कहते हुए लिछमन पंडित के पांव हवा में।
मुश्किल से आध-पौन घंटा लगा होगा। लिछमन पंडित हांफता हुआ लौटा कपडे की एक पोटली में बाँधकर बेजड की रोटियां और अल्युमिनियम की भगोनी में प्याज की तरीदार सब्जी के साथ।
लिछमन पंडित वाकई में पंडित यानी कि माहिर था डाकुओं की नब्*ा पहचानने में। डाकू गिरोह बने पुलिस दल के एक अन्य सदस्य ने रोटी व सब्जी में से एक गास चखने को पंडित को दिया यह तसल्ली करने के लिये कि कहीं *ाहर तो नहीं मिला लाया। पंडित की न*ार गयी डाकू बने एक सिपाही के सिर के बालों की ओर जो फौजीकट थे। सिपाही के चेहरे के भाव भी पंडित पढ गया। पुलिस दल के सभी सदस्यों के रोटी खा लेने तक पंडित को कहीं जाने नहीं देना था ही। हालाँकि लिछमन के सामने पुलिस दल का मुश्किल से एकाध जना और आया होगा, पर पंडित को विश्वास हो गया कि यह कोई डाकू-गिरोह वगैरा न होकर स्थानीय पुलिस है।
जब सारा भेद थोडी देर में खुल-सा ही गया और एक थानेदार को हंसी आ गयी। डिप्टी एसपी मुरलीधर सहित सभी पुलिस वाले अपने असल रूप में प्रगट हो गये तब लिछमन ने बताया कि ‘हुजुर, डकैत रोटी ले के चलते बनते। ऐसे आराम से रोटी खाबे को खतरा काहे मोल लेते।’
मुरलीधर ने पंडित लिछमन से पूछा, ‘क्यूँ रे पंडित, हम जो असल पुलिस के रूप में ही होते और रोटी की मांग करते तो क्या तू इतनी *ाल्दी रोटी बनवा लाता?’
लिछमन ने *ावाब दिया, ‘हुजुर, कतई नहीं। डकैतन ते डर लगे है। बे तो इंसाने मारबे को लाइसेंस हथेली पे रखे हैं। आपे तो थप्पड मारिबे के पहले कछु सोचनो परे।’
लाव-लश्कर उठाकर पुलिस दल विचारों के ताल से चल दिया। अब तक उस स्थल की छटा अपना मौलिक रमणीक स्वरूप पुनः ले चुकी थी। पंडित लिछमन को यह सलाह देते हुए कि ‘हमारे इस कदर यहाँ आने की बात वह किसी को न बताये। अगर ऐसा किया तो जनता के हित में हमारी आगे की कोई प्लानिंग है, वह फेल हो जायेगी, मुरलीधर अपने पुलिस कर्मियों के साथ बयाना की ओर प्रस्थान कर गया।
जब मुरलीधर कोड्यापुरा के श्रीफल गूजर से फोन पर बात समाप्त कर रहा था तब श्रीफल ने यह भेद खोल दिया था कि लिछमन पंडित पेट में ऊ बाते पचा ई ना पायो जब मालिक, आप डकैतन के गिरोह बने थे। सायपुर गाँव पहुँचते ई वाने सारी कहानी कह दई। हाँ, जो काऊ डाकू ऐसो कह देतो तो वा पंडित अपने देवतान कू भी भनक ना लगिबे देतो। और आप तो पैली बार बागी बन के म्हां गये, डकैतन को तो रो*ा को घर हो, वा विचारन को ताल।’
उसने अंत में कहा, ‘हुजूर डकैतन ते सबकी फटे।’
विचारों के ताल का यह किस्सा कभी खुद मुरलीधर ने हरजीनाथ को सुनाया था। उसी विचारों के ताल के किनारे किनारे होता हरजी पहुँच गया सायपुर...
तीन
धौलपुर के तीनों घरानों के मुखियाओं सहित परिवार के किसी सदस्य या कार्यकर्ता की समझ में नहीं आ रहा था कि इस नये एसपी के साथ कैसे निबटा जाये। पहले घराना का मुखिया सेठ प्रहलाद राय, दूसरे का पंडित हरचरण लाल बोहरा और तीसरे का नेता कप्तान सिंह गूजर। यूँ तीनों ही मुखिया अपने अपने इलाके में धाक जमाते आये राजनीतिक व्यक्तित्व थे व सभी कांग्रेस पार्टी में अपना अच्छा-खासा स्थान रखते थे। उन दिनों कांग्रेस पार्टी का पूरे देश में बोलबाला हुआ करता था। इन तीनों नेताओं की सहमति के बिना किसी भी महकमा के अधिकारी का पदस्थापन धौलपुर जिला में संभव नहीं था। एक अलिखित समझौता चलता आया था कि तीनों में से पहले दो बडे घराने एसपी व कलेक्टर में से एक एक को बाँट कर अगली बार की अदला-बदली के आधार पर पदस्थापित करवाते थे। तीसरा घराना तुलना में कम*ाोर पडता था। अपने उपखंड व तहसील स्तर पर ही मन को दिलासा देकर संतोष कर लेता था। लेकिन उन दिनों राष्ट्रीय स्तर के एक अखबार ने गडबड कर दिया। मुख पृष्ठ पर एक बडी खबर छपी कि ‘धौलपुर बना डाकुओं का अड्डा।’ खबर की पहली पंक्ति थी ‘धौलपुर जिला में तीन राजनीतिक घरानों का राज चलता है, और तीनों का संरक्षण डाकुओं को मिलता रहा है।’
‘पूरे देश में हमारे जिला को बदनाम कर दिया हराम*ाादे उस पत्रकार ने। क्या नाम उसका?’ माथे पर पडी सलवटों को सहलाते हुए सेठ प्रहलाद राय बडबडाया। तीनों घरानों के मुखियाओं के स्तर की यह अतिगोपनीय बैठक थी।
‘हाँ सेठजी, ऊ का कहत है कि ना, का नाम हो वा ससुरे को, हाँ नुनीत सरीन।’ नेता कप्तान सिंह गूजर ने सेठजी को कुछ याद दिलाने का प्रयत्न किया।
‘अरे नेता, नुनीत नहीं नवनीत सरीन।’ हरचरण लाल बोहरा ने नेताजी को दुरुस्त किया। सेठ प्रहलाद राय ने माथा हिलाकर बोहराजी का आभार जताया। तीनों में सेठ प्रहलाद राय का सम्मान सबसे ज्यादा था। व*ाह उसकी उम्र व होशियारी दोनों रही।
‘हरामी की नेक खबर मोय लग जाती तो बाको नामोनिशान यमदूतन कूं बी ना मिलन देतो। भेन्चो! कहूँ ते आबे वारेन कूं रुकिबे को ठिकानों नायं हमारे बोहरे जी के होटल के बाहर ई धोलपुर में। अखिर किते ठहरो वा जासूसी अखबार वारो?’ नेता कप्तान सिंह ने कुर्ते की आस्तीन चढाते हुए कहा।
‘कप्तान, अब सुन, तेरे गुस्सा करने से कुछ नहीं होनेवाला। अब तो अक्ल से काम लेने के अलावा कोई चारा हमारे सामने नहीं है।’ कहते हुए सेठ प्रहलाद राय ने बोहरा हरचरण लाल की आँखों में यूँ झाँका जैसे वह उसकी आँखों के सहारे दिल में उठ रहे विचारों की थाह लेने की कोशिश कर रहा हो।
‘प्रहलाद राय जी, एक बात मेरी समझ से बाहर है कि हम दोनों राजस्थान सरकार में मंत्री हैं। एक तो हमसे बगैर पूछे अखबार की खबर पर मुख्यमंत्री जी ने सीआईडी की जाँच बैठा दी। दूसरे हमारी छाती पर यह छोकरा एंठू एसपी बिठा दिया जो किसी की सुनता ही नहीं। हर जगह अपनी मनमर्जी किये जाता है। हम यहाँ के लोकल जन प्रतिनिधि हैं और सरकार में मंत्री भी। हमसे बिनपूछे कोई सरकारी अफसर यहाँ कैसे चल सकता है?’
‘बोहरे जी, आप ठीक कह रहे हैं। परन्तु इस अखबारवाले व यहाँ के अफसरों को धौलपुर में तो बसना है नहीं। ये तो हमारी साख खराब कर चलते बनेंगे। भुगतना हमें ही पडेगा। अब वह डीआईजी जाँच करने आया। पता है लोगों से क्या पूछा उसने? मैं बताता हूँ, उसने हम तीनों के नाम ले ले के पूछा है कि ‘इन घरानों वाले नेताओं के आदमियों की डकैतों से कहाँ तक मिलीभगत है?’
‘सेठ जी, सुना मैंने भी है। मेरे पास बात दूसरे रूप में आयी है। वो इस तरह कि हम उन अपराधियों को बचाने के वास्ते पुलिस अफसरों से सिफारिश करते हैं, जिनमें डकैतों की मदद का आरोप भी लगाया गया बताया।’
‘आप दोनों तो बडे मंत्री हो सरकार के। वा डीआईजी कूं घर बुला के समझायो काहे ना?’ कप्तान सिंह बीच में टपका।
‘खबर पहुंचायी थी मैंने सर्किट हाउस में। मेरे पास जवाब आया कि वे इन्क्वारी करने आये हैं और मेरे घर आएंगे तो अखबारवाले अनावश्यक तिल का ताड बना देंगे। सोच समझ कर मैं भी उसकी बात से सहमत हो गया था। तुम नेता जी, समझो नायं कि डांग के बाहर सरकार कैसे चले है? तुम तो यहीं गांववालेन कूं बहकाते रहे हो। इससे आगे विकास योजनाओं के फंडन में हेराफेरी या फिर अफसरों की दलाली।’ कहते हुए प्रहलाद राय अपनी भाषा भूल गये। सेठ जी प्रायः आपा नहीं खोते थे। इन दिनों माहौल ही ऐसा बन गया कि उन्हें पहली बार धौलपुर ही नहीं, बल्कि बाहर भी नीचा देखना पड रहा था। व*ाह अन्य कोई नहीं थी सिवाय इसके कि जाँच अधिकारी व नये एसपी का उनके घराना पर हा*ारी भरने नहीं आये। अखबार की खबर ने तो पहले ही माथा खराब कर रखा था।
नेता कप्तान सिंह के ठिकाने को कम*ाोर ही सही पर तीसरा घराना यूँ ही थोडे ही कहा जाता था। खासकर धौलपुर की गूजर कौम का वह सर्वमान्य नेता था। उसके एक इशारे पर लोग कुछ भी करने को आमादा हो सकते थे। स्वभाव से वह भी सेठ प्रहलाद राय की नाईं राबडी को ठंडा करके ही पीने वाला था। सेठ जी की प्रतित्रि*या उसे नागवारा लगी। आखिर वह भी इलाके का कद्दावर नेता था।
कप्तान सिंह ने कुछ सोचकर कहा- ‘सेठ जी, हम का टप्पेमारी में ही दो दो बेर प्रधान बन गये? और एडवांस में बताय देत हूँ, अब की बेर बाडी छेतर ते एमएलए बन के दिखाऊंगो। आप ने ई ऐसी हल्की बात कैसे कह दी कि हम ससुरे अफसरन की दलाली पे गुजर बसर करत फिरत हैं। हाँ, राजनीति में आबे ते पैले खूंटैलगिरी (मवेशी चोरी की दलाली) *ारूर की, वा बात अब पुरानी है गयी।’
‘मेरो मतलब नेताजी तुम्हारो दिल दुखाबे को नईं हो। आप वैसे ही नारा*ा हो रहे हो। छोडो इन बातन ने। अब काम की बात सुनो।’
‘हाँ भई, काफी देर हो गयी। सेठजी बताओ। हमें क्या करना चाहिए इस संकट की घडी में?’ हरचरण बोहरा ने जिज्ञासा *ााहिर की।
धौलपुर के तीन सर्वोच्च राजनेताओं की उस गुप्त बैठक में सर्वसम्मति से तय किया गया कि अपनी ओर से एक ज्ञापन तैयार किया जाये जिसमें स्पष्ट लिखा जाये कि ‘राष्ट्रीय अखबार ने बढाचढा कर खबर दी है जिससे इलाके की बदनामी हुई है। अतः इसकी जाँच गृह विभाग के सचिव से करायी जाये।’
बैठक के अंत में सेठ प्रहलाद राय ने इशारों में दोनों को बताया कि गृह सचिव अपना आदमी है। वह लीपापोती कर जाँच भी पूरी कर लेगा और नतीजा भी कोई ऐसा नहीं निकलेगा जिससे हमें या अपने इलाके को नीचा देखना पडे। विधान सभा में हम निबट लेंगे।
चार
उस साल बरखा ऋतु के आगमन के साथ चम्बल में भयंकर बाढ आई। धौलपुर व मुरैना को जोडनेवाला चम्बल का पुल थरथरा रहा था। दुर्घटना की आशंका को देखते हुए पुलिस ने इधर के वाहन इधर और उधर के उधर खडे करवा दिए थे। दोनों ओर उनका ताँता लग गया था। अपने अपने गंतव्य स्थलों को जाने वाले लोगों की भीड जमा थी जो घटने की बजाय बढ रही थी। नदी पूरे उफान पर होने के कारण नावों के इस्तमाल का प्रश्न ही नहीं उठ रहा था और बरसात का यह आलम कि थमने का नाम ही नहीं। चम्बल के दोनों ओर इकट्ठा भीड में आक्रोश बढता जा रहा था आसमान से *यादा प्रशासन के खिलाफ। प्रकृति के सामने प्रशासन मौन लेकिन भीड को समझाने की पूरी कोशिश। मौसम विभाग बारबार चेतावनी दिये जा रहा था कि राजस्थान के डांग व हाडौती अंचलों में आगामी चौबीस घंटों में और अधिक वर्षा होने की संभावना है।’
कहते हैं ‘चम्बल किसी की नहीं।’ जो नहीं जानते इस नदी को वे कहने लगे, ‘कभी भी उफान ले सकती है चम्बल।’ चम्बल उत्तर भारत की सबसे गहरी नदी। जहाँ तक चम्बल के जानकार बताते हैं, अपने इतिहास में उसने आज तक अपने तट बंध नहीं तोडे। चम्बल कब की एक मिथक बन चुकी है। लोक में चम्बल के रूप में विख्यात। नहीं, कुख्यात! नदी की गहरायी को नापने के लिए एक बार स्थानीय लोगों ने डोरी में पत्थर बांधकर उसकी दह में डुबोया था। डोरी का अंत हो गया, चम्बल की गहरायी का नहीं। कहते हैं उसका तल भूगर्भीय जल से मिला हुआ है। पृथ्वी के गर्भ में जितनी गर्मी होगी उससे कम गर्म व गुस्सैल नहीं है यह नदी।
नदी-घाटी की सभ्यताओं का नाम हमने बहुत सुना-पढा है। ठेठ मिश्र, मेसापोटामियां, बेबीलोन, असीरिया, चीन से लेकर वाया सैन्धव, सारस्वत, गांगेय नामक प्राचीन भू-खण्डों को समेटता समय का लम्बा-चौडा केनवास हमें दिखायी देता है। चम्बल की घाटियों में किसी सभ्यता के खण्डहरों के अवशेष नहीं दिखाई देते। भारत की करीब सभी नदियों की पूजा होती है, उनके तटों पर तीर्थस्थल हैं, उनके जल में स्नान करने से पाप धुल जाने की मान्यता है, लेकिन चम्बल के भाग्य में यह सब नहीं। शास्त्रों में पितरों की प्रिय चर्मण्वती जो निकली पारियात्र पर्वत की घाटियों से। सतयुग में राजा रतिदेव ने यहां अग्निहोत्र यज्ञ कर इतने जानवरों की बलि दी बताई कि इस नदी के किनारे चमडे से भर गए। इस कारण इस नदी का नाम चर्मणी हुआ। देश दुनिया में आदर्श पुत्र के नाम से विख्यात श्रवण कुमार का भी माथा चकरा गया था चम्बल के निकट आते ही।
‘बहुत ढो लिया तुम दोनों को। अब मेरा पीछा छोडो।’ स्पष्ट कह दिया था श्रवण कुमार ने अपने पूज्य माता पिता को।
‘बेटा, बस थोडी सी दूरी पर हम दोनों को छोड दे। फिर तू जहाँ चाहे चले जाना। आगे हमारा अंधा बुढापा और भाग्य।’ गुहार लगायी थी माँ-बाप ने अपने प्यारे पुत्र से। उनके ज्योतिविहीन नेत्र चम्बल की गहराई में झाँकने और उसके रहस्यों को भाँपने की क्षमता रखते थे। वे जानते थे कि इस नदी के प्रभाव क्षेत्र में साधु-संतों के भी दस्युओं में परिवर्तित हो जाने की मानसिकता बन जाने की दुर्संभावना रहती है। इसलिए पुत्र की कोई गलती नहीं, यह तो चम्बल की नियति है।
चम्बल की यह कथा है भगवान राम के त्रेता युग की, और फिर आता है भगवान श्रीकृष्ण का द्वापर युग जिसमें कौरव व पांडवों ने इस नदी की तीर पर द्यूत क्रीडा की, पांडवों ने द्रौपदी को किसी वस्तु की तरह दावं पर लगाया, हारा और फिर ईश्वर और महान पुरुषों से भरे दरबार में मानवीय लज्जा की समस्त सीमाओं का उल्लंघन करते हुए उसका चीर-हरण किया गया! इस कलिकाल में चम्बल के बीहड खतरनाक अँधेरी सुरंगों में बदल जाते हैं जहाँ सुनायी देती हैं बंदूकें चलने की दनदनाती आवाजें। ऋोधित माताओं की कोख से पैदा होते हैं आग उगलते चेहरे। वे ना हँसते हैं कबीर की तरह और ना रोते हैं आम शिशुओं की तरह। वे दहाडते हुए पैदा होते हैं जन्मदात्रियों की कोख-कंदराओं से और मरते हैं चम्बल के बीहडों में प्रतिशोध की हुंकार भरते हुए। कौन सा क्रोध, कौन सा प्रतिशोध, कौन सा अभिशाप और कौन सी त्रासदी, जो भुगत रही है चम्बल सदियों से? कहते हैं कि जब कोई नदी हंसती है तो उसके किनारों की वनस्पतियाँ झूमती हैं, नाचती हैं और खग-वृन्द जल ऋीडा करते हैं। और जब नदी रोती है तो भीषण बाढ आती है। चम्बल का अपना कोई रहस्यमय अभिशाप है। उस अभिशाप का वह प्रतिरोध करती है अपनी ही तरह प्रतिशोध लेकर। इसलिए तटबंध तोड सकने तक के स्तर की बाढ नहीं आने देती वह अपने में। इस काम के लिए पैदा करती है बागी जो कुछ ही दिनों में बनते हैं धाडेती और फिर डाकू। लम्बी स्वयंभू वंशावली है इनकी। रोबिनहुड किस्म के ‘दद्दू’ मानसिंह के पुरखों से लेकर पूर्वी राजस्थान में एस.टी. आरक्षण की मांग को लेकर छेडे गये गूजर आन्दोलन की भीड में सरेआम भाषण देने वाले जगन डकैत तक।
दस्युओं की आद्य जननी उसी चम्बल नदी के दोनों ओर जमा भीड को प्रशासनिक अधिकारियों ने अस्थायी कैम्पों में पहुँचाया। अगले अडतालीस घंटों में चम्बल की बाढ उतरी।
पाँच
मौसम का मि*ााज सुधरने के साथ ही हालात पुनः सामान्य हो गये। लेकिन धौलपुर के तीनों घरानों में अभी भी हलचल मची हुई थी। अखबार की खबर से निकली सीआईडी की जाँच एवं युवा पुलिस अधीक्षक पी.जगन्नाथन की तैनाती के दोनों ही सरकारी कदम धौलपुर के घरानों की पकी फसल पर ओले पडने से कम नहीं थे। जाँच से निबटने का गुर तो बता दिया गोपनीय बैठक में सेठ प्रहलाद राय ने, परन्तु एसपी का क्या करें? इस सवाल से रात भर जूझता रहा सेठ प्रहलाद राय और बोहरा हरचरण लाल। नेता कप्तान सिंह ने अपने घर जाकर टिकाये दारू के चार पैग, जम के खायी रोटी और सो गया चिंता के सारे घोडे बेचकर। डांग में वैसे भी हकीकत के घोडे होते नहीं।
रात भर उनींदे रहे सेठ प्रहलाद राय को अल्लसुबह नींद अपनी गोदी में लेने को रा*ाी हुई। आदमी चाहे जागता रहे फिर भी आँखें मूंद लेने पर सर्वत्र अंधकार व्याप्त हो जाता है। चैन की नींद आराम देने के लिए होती है। दिन का मानसिक तनाव रात की नींद में भी चैन नहीं लेने देता। सेठ प्रहलाद राय घडी भर सोया होगा मगर सपने में मीलों लम्बी भयावह अँधेरी सुरंग से गु*ारता हुआ अंत में निकला बीहडी दर्रे-धसानों में, जहाँ अचानक घेर लिया गया पुलिस अधीक्षक पी. जगन्नाथन ने सशस्त्र पुलिस टोली के साथ।
‘सेठ प्रहलाद राय, चम्बल के बीहडों में इतना दुस्साहस नहीं कि मेरे होते वे तुझ जैसे सफेद भेडिये को पनाह दे सकें।’ गरजती हुई आवा*ा में पुलिस का ‘टाइगर’ दहाडा।
घिग्गी बंध गयी सेठ प्रहलाद राय की। भयभीत सेठ पायजामा ऊँचा करते हुए भागने का प्रयास करने लगा। पायजामा एक झाडी में उलझ गया। ‘ससुरा नेतागिरी के चक्कर में अच्छी खासी धोती छोडकर कुरता के साथ पायजामा पहनने लगा जो ऊपर उठता भी नहीं। राजनीति के इस पायजामा ने लाज छिपाने की जगह लाज उघाड दी।’ घबडाहट के घने कोहरे में घिरा सेठ मन ही मन बडबडाया।
‘चम्बल ने जितने डाकुओं को पनपाया है उनसे *यादा को तूने उन्हें शरण दी है हराम*ाादे। तू अब कहाँ तक बचेगा?’ टाइगर की आवाज फिर गूंजी बीहडों में।
‘नहीं एसपी साब, मैं ठहरा जनप्रतिनिधि आदमी। मिलना सभी से पडता है। डाकुओं का साथ कभी नहीं दिया। आपको *ारूर गलतफहमी हुई है।’
‘और वो गोरधनपुरा ठाकुर हरिसिंह तेरा खास आदमी नहीं है?’
‘हाँ, राजनीति की दृष्टि से हरिसिंह मेरा समर्थक रहा है पर डाकुओं से मेरा क्या लेना-देना? अगर धौलपुर का कोई बच्चा भी आफ इल्जामों की तस्दीक कर दे तो सरेआम गोली मार देना मेरी छाती में।’
‘वो बाद की बात है। फिलहाल तो तुझे मैं देखता हूँ।’ कहते हुए पुलिस अधीक्षक पी.जगन्नाथन ने जैसे ही अपना दाहिना पंजा सेठ प्रहलाद राय की गर्दन की ओर बढाया, सेठ को लगा जैसे पी.जगन्नाथन एसपी न होकर साक्षात् बाघ हो। उसके दिल की गहराइयों से एक लम्बी चीख निकली जो मुँह तक आते आते ‘आ....आ....’ के रूप में ही बाहर आ सकी।
सेठ की पत्नी उसी कमरे में कुछ कर रही थी।
आवा*ा सुनकर वह चौंकी। ‘का भयो सेठजी? कोऊ डरावनो सपनो तो ना देखो?’ कहते हुए उसने सेठ प्रहलाद राय के सीने को झंझोडा।
सेठ हडबडाकर उठा। उस वक्त वह पसीने से तरबतर था। जागने पर उसे तसल्ली हुई कि उसने भयंकर सपना ही देखा, हकीकत नहीं।
‘सेठजी सेठजी, ग*ाब है गयो! वा रतनपुरा के सरपंच सहित सतरह जनेन कूं राजाखेडा थाने की पुलिस रात में पकरि के ले गयी।’ हवेली के चौक में से आवा*ा आयी। सेठ प्रहलाद राय कमरे के वाश-बेसिन में मुँह धो रहा था। रोंयेदार सफेद तौलिया से हाथ-मुँह पोंछता हुआ झरोखे से नीचे झाँका।
‘काहे चिल्ला रहे हो सबेरे-सबेरे?’ सेठ ने अपना वाक्य पूरा किया उसके साथ ही घराना के सदर दरवाजे से पचास-साठ ग्रामीणों की भीड अन्दर चौक में घुस आयी। सेठ प्रहलाद राय नीचे उतरा। वैसे भी सुबह आठ बजे घराना के चौक में रोजाना सेठ जी का दरबार लगता था। आज थोडी सी देर हो गयी। रतनपुरा के लोगों के मुख से सारा वाकया सुनने के पश्चात् सेठ जी ने अपने पी.ए को आदेश दिया- ‘फोन लगाओ राजाखेडा के थानेदार को...’
‘दरोगा जी बाथरूम में हैं।’ उधर से जवाब मिला।
‘साल्ले ये थानेदार-दरोगा भी अफसरों की तरह बाथरूम में कब से रहने लग गए?’ खीजते हुए सेठजी ने पुनः आदेश दिया, डिप्टी का फोन मिला..’
‘ये बताओ डिप्टी साब, मेरा सरपंच कैसे बंद कर दिया थाने में? थानेदार की हिम्मत कैसे हुई?’
‘सर, वो क्या है कि आप को तो पता है ही। *ामीन के मामले को लेकर रतनपुरा में राजपूत व गूजरों के बीच रंजिश चल रही है। पिछली साल आप के नोटिस में लाकर ही दफा एक सौ पैंतालीस के तहत उस *ामीन की कुडकी करवा के उसका कस्टोडियन तहसीलदार को बनाया था। इसके बावजूद सरपंच खुद वहाँ पहुँच गया और राजपूतों से बुवाई करवा दी। गूजरों ने रोका तो गोली चलवा दी। वो तो गनीमत है कि कोई मरा नहीं। दफा तीन सौ सात का मुकद्दमा बनना ही था। कलेक्टर व एसपी साहबान के स्तर पर सब तय हुआ है। एफआईआर भी राजाखेडा के तहसीलदार की तरफ से हुई है।’
रोजनामचे में गिरफ्तारी की रपट डल गयी क्या?’
‘वो सारी कार्यवाही रात में ही हो गयी। मैं खुद रातभर वहीं था। अभी लौटा हूँ।’
‘आप डिप्टी साब, मुझे बताते तो सही! आप की पोस्टिंग हमने ही करवाई है ना।’
‘अब सर, आप सब जानते हैं। एसपी साब के सामने हमारी क्या औकात। मैं ठहरा छोटा अफसर।’
‘तो फिर हमें तुमसे क्या फायदा? अब तुम्हारा मतलब है कि हम एसपी से ही बात करें...’
‘अब मसला उसी लेवल का है। सर, मैं तो आपको एक बात और बता रहा हूँ कि सरपंच ने डाकुओं से गूजरों को मरवाने की धमकी भी दी है।’ डिप्टी एसपी की बात को सुनकर सेठ प्रहलाद राय ने गुस्सा में फोन काट दिया।
राजस्थान सरकार के दबंग मंत्री सेठ प्रहलाद राय की हिम्मत नहीं हुई कि वह इस मामले में एसपी से बात करता। उसने अपने विधानसभा-क्षेत्र के समर्थक ग्रामीणों के सामने रुतबा दिखाते हुए प्रान्त के गृह सचिव से फोन पर बात की। गृह सचिव ने तसल्ली दिलायी कि वह एसपी से बात करेगा। गृह सचिव ने उसी दिन एसपी से प्रकरण की रिपोर्ट मंगवाई। एसपी ने तुरंत विस्तृत सूचना भेज दी। सेठ प्रहलाद राय को सब पता लग गया। वह सोचे जा रहा था कि मंत्री की जगह सेठ ही होता तो शायद पुलिस से ले-देकर पीछा छुडवाने में संभवतः सफल हो ही जाता।
सेठ प्रहलाद राय को शुगर की बीमारी थी। जिले का मुख्य चिकित्सा अधिकारी उनका रिश्तेदार था जो जनरल फिजीशियन था। उसने सेठजी को सलाह दे रखी थी कि उन्हें रो*ा सुबह व शाम कम से कम दो किलोमीटर टहलना जरूरी है। तदनुसार सेठजी उस संध्या के समय अपनी हवेली की लम्बी चौडी छत पर यहाँ से वहाँ तक घूम रहे थे। धौलपुर के भूतपूर्व नरेश के महल को पार करती हुई सेठ जी की न*ारें घंटाघर की सर्वोच्च छठी मं*ाल पर बनी गुम्बज की ओर उठी जिसके नेपथ्य में अन्य कोई इमारत न होकर खुला आकाश था जिसका न*ाारा छतरी के भीतर व बाहर जल रहे सोडियम बल्बों की ते*ा रोशनी के कारण दिखायी नहीं दे रहा था। निहाल टावर के नाम से मशहूर इस घंटाघर को धौलपुर के पूर्व महाराजा निहालसिंह ने बीसवीं सदी के प्रथम दशक में बनवाया था। इन दोनों इमारतों के अलावा उस *ामाने में सेठ जी की तिमंजिला कोठी से ऊँचा अन्य कोई नागरिक भवन बस्ती में नहीं हुआ करता था। सेठ प्रहलाद राय की हवेली धौलपुर कस्बा के मध्य में अवस्थित हुआ करती थी जिसकी एक अलग शान थी। लोगों की *ाुबान से यहाँ वहाँ यह फुसफुसाहट यदा कदा फिसल जाया करती थी कि ‘सेठ प्रहलाद राय के पिता जी के समय एक दफा उसी की टक्कर के सेठ सुनहरीलाल अग्रवाल ने अपनी दुमं*ाला हवेली पर तीसरी मं*ाल की तैयारी की थी जिसे प्रहलाद राय के पिता ने अपने दबदबे से रुकवा दिया था। तब से किसी अन्य व्यक्ति की हिम्मत नहीं हुई इस कोठी से ऊंचा कोई भवन बना सके। राजा के सर्वोच्च महल के बाद धौलपुर के उस उच्चतर भवन की छत पर टहलते हुए सेठ प्रहलाद राय ने अब तक जितने चक्कर काटे उनसे कई गुणा विचार-वृत्त उनके मन के भीतर उठते जा रहे थे। वृत्त के बाहर वृत्त और वृत्त-कुंडली के ऊपर वृत्तों की परत दर परत।
पृथ्वी के पश्चिमी गोलार्द्ध से सूर्य शनैः शनैः क्षितिज की तरफ उतरता जा रहा था जिसकी लालिमा छितराए बादलों को आहिस्ता आहिस्ता ढंके जा रही थी। सेठ जी ने हाथ जोडते हुए डूबते सूरज को आँखें मूंदकर अलविदा किया। जैसे ही पुनः ऑंखें खोली तो उनकी दृष्टि पश्चिम दिशा में ही अवस्थित जिला पुलिस अधीक्षक की सरकारी कोठी पर पडी जिसकी छत पर वायरलेस का एंटीना स्थापित था जिसकी ऊँचाई सेठ प्रहलाद राय की हवेली की छत क्या, धौलपुर के ‘राजमहल’ से भी बहुत अधिक थी। हौले हौले कदम रखते हुए सेठ प्रहलाद राय अपनी कोठी की सीढियों से भींत का सहारा लिए हुए नीचे उतरता गया।