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‘लाम’ की घाटियों में गूँजती शैलेश मटियानी की कहानियाँ

असीम अग्रवाल
‘लाम’ क्या है! शब्दकोशों में इसका अर्थ मिलता है- ‘सेना, युद्ध आदि’। लामबंद शब्द इसी से बना है।
युद्ध या सेना के विषय में कौन नहीं जानता। मानव सभ्यता के विकास-ऋम के आरम्भ में ही ये अवधारणाएँ विकसित होने लगी थीं। विश्व भर में शायद ही ऐसी कोई सभ्यता रही होगी जो युद्ध और सेना से अनभिज्ञ होगी। हाँ, समय के साथ-साथ न केवल इनमें रूप-परिवर्तन आता रहा, बल्कि नए-नए राज्यों के निर्माण में इनकी भूमिका सर्वप्रमुख होती गयी।
कुमाऊँ इससे अछूता नहीं रहा। वहाँ भी कई राजवंशों का शासन रहा है। चंद राजवंश का शासन तो प्रसिद्ध है ही। चंद शासकों ने ही विभिन्न युद्धों के जरिए उस कुमाऊँ को संगठित किया, जिसे आज हम देखते हैं। हालाँकि अट्ठारहवीं शताब्दी में उनकी शक्ति क्षीण पडने लगी तो रोहिल्लों व गढवाल के हाथों चंद शासन का अंत हुआ। बाद में यह अंग्रेजी शासन का भाग बना। इस प्रकार, युद्ध सम्बन्धी गतिविधियों से कुमाऊँ अछूता नहीं रहा। इस सम्बन्ध में यह बताना भी असंगत नहीं लगता कि कुमाऊँ रेजीमेंट की स्थापना 1788 में ही हैदराबाद में हो गयी थी। अंग्रेजों ने इनकी बहादुरी को देखकर कई युद्धों में इनकी सहायता ली। स्वतंत्रता पश्चात् 1947 के भारत-पाक युद्ध व 1962 के भारत-चीन युद्ध में इनके साहस की गाथाएँ आज भी सुनी जाती हैं। भारत के प्रथम परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा इसी रेजीमेंट से थे।
इसके साथ ही, अंग्रेजों ने मैदान की गर्म जलवायु से बचने के लिए पहाडों का रुख किया, वहाँ शहर बसाए, विकास कार्य किये व सैनिक छावनियाँ बनायीं। इस कारण से कुमाऊँ को आधुनिक जीवन का साक्षात्कार सैन्य गतिविधियों के माध्यम से अधिक हुआ। यह संक्षिप्त-सी जानकारी केवल इसलिए दी गयी, जिससे कुमाऊँ के युद्ध-प्रभावित चरित्र को समझने में आसानी रहे।
शैलेश मटियानी नेयुद्ध की पृष्ठभूमि पर कई कहानियाँ लिखी हैं। सुविधा की दृष्टि से इन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है। पहली, वे कहानियाँ हैं जिनमें कहानी में मुख्य कथा युद्ध से ही सम्बन्धित है। दूसरी, वे कहानियाँ हैं, जिनमें युद्ध की पृष्ठभूमि में मानव मन की उन जटिलताओं का स्वर है, जो युद्ध से सृजित होता है। एक तीसरा भाग भी माना जा सकता है, जहाँ युद्ध की केवल पृष्ठभूमि है लेकिन कहानी की संवेदनात्मक भूमि उससे अलग हो जाती है; या फिर वह पृष्ठभूमि जुडती भी है तो केवल कहानी के प्रसार के लिए, प्रभाव के रूप में नहीं।
पहले प्रकार की कहानियों में ‘लोकदेवता’, ‘अपनी-अपनी परम्परा’ और ‘बर्फ की चट्टानें’ प्रमुख हैं।
‘लोक देवता’ कहानी में बलभद्दर थोकदार अपने गाँव के युवकों से बेहद नाराज हैं। कारण-सीमा पर भयानक युद्ध छिडा है, पास के गाँव के लडके अपनी माटी के लिए बलिदान देने के लिए सेना में भर्ती हो रहे हैं, लेकिन थोकदार के गाँव के लडके और अन्य लोग अपने प्रियजनों की जान गँवाने के भय से युद्धभूमि में नहीं जाना चाहते। थोकदार के लिए यह अपमान के खून के घूँट पीने से भी बदतर है। ‘हमारी यह उत्तराखंड की धरती देवताओं की धरती रही है और यहाँ के योद्धाजनों ने बडे-बडे दैत्यवंशों का संहार किया है। ‘हमारा कुमाऊँ वीर-योद्धा लोगों के लिए चार खूँट धरती में नामधारी रहा है।’1
मनुष्य गर्व के आहत होने पर विगत के गौरव को याद करता है। थोकदार न केवल उत्तराखंड की परम्परा से बद्ध हैं, बल्कि उनका कुमाऊँ अँचल के साथ प्रेम और भी गहरा है। जिस भूमि का इतिहास युद्ध से पटा पडा हो, वहाँ ऐसी मुर्दानी देखकर किसी का भी खून उबाल मार सकता है।
इसी तरह ‘अपनी-अपनी परम्परा’ में हवलदार स्वरूप सिंह लद्दाख में तैनात होकर अपने सैनिक साथियों से चीन द्वारा किए गए विश्वासघात को एक सतयुगी लोक कथा के माध्यम से समझाता है, जहाँ एक गीदड शेर से डरकर अपने मालिक को धोखा दे देता है, लेकिन उस मालिक का कुत्ता शेर के सामने तनकर खडा हो जाता है; और शेर कुत्ते की वफादारी देख उन दोनों को छोड देता है।
सैनिकों का जीवन बेहद कठिन होता है। प्रतिकूल मौसम, बेहद सीमित संसाधन और सीमापार बैठे दुश्मन की धूर्तता-उसे इन सबके साथ लडना है और देश की रक्षा करनी है। ऐसे में, वे एक दूसरे के दोस्त से बढकर होते हैं और इसी तरह सबमें जोश भरा जाता है। अपनी मातृभूमि की रक्षा करना तो कर्तव्य है, लेकिन उस बीच अपनी मातृभूमि के उन गुणों को याद करना-जिन्हें उसने काल-ऋम में न केवल अपना हिस्सा बनाए रखा, बल्कि उनका निर्वहन भी किया-मातृभूमि के प्रति समर्पण को और उत्प्रेरित करता है।
मनुष्य सदा से ही सद्गुणों का आकांक्षी रहा है, ऐसे में उन सद्गुणों के साथ अपनी धरती का जुडाव उसके और धरती के जुडाव को और गहरा करता है। इमैन्युअल कांट का एक प्रसिद्ध कथन है-‘यह आवश्यक नहीं है कि जब तक मैं जीवित हूँ तब तक मैं खुशी से जीयूँ, लेकिन यह आवश्यक है कि जब तक मैं जीवित रहूँ तब तक मैं सम्मानपूर्वक जीयूँ।’2
सम्मानपूर्वक जीने और मरने की यह आकांक्षा हर सैनिक की होती है, लेकिन जब इसमें मातृभूमि के व्यवहार का स्वर भी मिल जाए, तब ची*ों और भी म*ाबूत होती हैं।
इस प्रकार शैलेश मटियानी युद्ध के समय एक गाँव, एक समाज व एक सैनिक की मनःस्थिति को परखते हैं। लेकिन शैलेश जी की पहले प्रकार की कहानियाँ अपनी वस्तुगत व शिल्पगत संरचना में कमजोर रह जाती हैं। ऐसा क्यों हुआ, इसको समझना जरूरी है।
‘लोक देवता’ कहानी में थोकदार के तमाम गरजने बरसने के बाद गाँव के युवकों में जोश भर आता है और वे सेना में भर्ती होने के लिए निकल जाते हैं। इसी तरह ‘अपनी-अपनी परम्परा’ में भी कहानी सुनने के अगले ही दिन दुश्मन फिर विश्वासघात कर देता है।
समस्या यह नहीं है कि युवक सेना में भर्ती होने क्यों चले गए! या फिर कि आदर्शवादी स्थिति अंत में क्यों बन गयी! समस्या यह कि कहानी की परिणति जहाँ हो रही है, उस ओर कहानी बेहद सपाट तरीके से आगे बढती है, जहाँ मानसिक द्वन्द्व व उद्वेलन बेहद कम हैं। केवल बातें सुनकर जोश आ जाना तार्किक आधारों को कमजोर बनाता है, वह भी तब, जबकि विपरीत परिणति होने की स्थितियाँ कहानी में अधिक हैं। इसी तरह ‘अपनी-अपनी परम्परा’ अचानक नाटकीयता की ओर चली जाती है। ‘नाटकीयता’ कथा-साहित्य के लिए कोई त्याज्य तत्त्व नहीं है, लेकिन उसका निर्वहन संगत तरीकेसे हो।
यदि इन बातों को एकरूपता दी जाए, तो कहा जा सकता है कि इन कहानियों में ‘रचनात्मक विश्वसनीयता’ की कमी है। ‘रचनात्मक विश्वसनीयता’ वह तत्त्व है, जिसके माध्यम से एक लेखक अपनी रचना और पाठक के बीच के सम्बन्ध को विकसित करने की प्रक्रिया से गुजरता है। यह प्रत्रि*या रचना की सफलता के लिए बेहद जरूरी है। ‘रचनात्मक विश्वसनीयता’ में सबसे महत्त्वपूर्ण है-कहानी की स्वाभाविक तार्किक संरचना। कथा चाहे जिस ओर जाए, लेकिन वह कृत्रिम न हो पाए। ‘सपाट’ होने के पीछे सबसे महत्त्वपूर्ण कारण ‘वस्तु’ की संगति का अभाव है और यह अभाव ‘अनुभव की प्रामाणिकता’ को कमजोर बनाता है। वहीं, वस्तु के स्तर पर यदि कमी रह गयी तो शिल्पगत ढाँचा भी टूटेगा ही। शिल्प को वस्तु से बिलकुल ही अलग करके नहीं देखा जा सकता। नामवर सिंह ने लिखा है, ‘यह असम्भव है कि भाषा-शैली के सौंदर्य को समझने वाला उद्देश्य के बारे में ‘चाहे जो हो’ कहे! अर्थ की उपेक्षा करके शब्द की दाद देने का क्या मतलब है?’3
‘बर्फ की चट्टानें’ तो इस मामले में और भी कमजोर कहानी है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गयी यह कहानी एक सैनिक की उस पीडा को व्यक्त करती है, जोकि समाज उसे देता है। जहाँ उसे भगोडा कहा जाता है, उन्हें अपमानित किया जाता है और उनसे वस्तुओं के अधिक दाम वसूल किए जाते हैं लेकिन सेना के नाम पर दुकानों के नाम रख मोटी कमाई की जाती है। शुरू में सहजता से बढती हुई यह कहानी अचानक से सैनिक की पीडा को निबंध के रूप में विचार की तरह कहने लगती है। कहानी का अंत आते-आते पाठक यह भूल जाता है कि वह कहानी पढ रहा था, या निबंध। नामवर सिंह कहानी में जिस ‘कहानीपन’ को अपरिहार्य मानते हैं, वह कहानी में नहीं है।
इसे क्या कहा जाए! दरअस्ल यहाँ एक समस्या दिखलाई पडती है। शैलेश मटियानी ने कुमाऊँ अँचल को लेकर बहुत-सी कहानियाँ लिखी हैं। उन्होंने स्वयं अपनी ‘मेरी तैंतीस कहानियाँ’ की भूमिका में कुमाऊँ को अपनी रचना-प्रक्रिया में बेहद महत्त्वपूर्ण माना है। अँचल को लिखना, लेखक के लिए ‘भावात्मक’ कर्म भी है। ऐसे में, वह अपने अँचल का सब दुःख-दर्द कह देना चाहता है। सब कुछ कहने में भटकाव का खतरा भी रहता है, जोकि शैलेश मटियानी की इन कहानियों में देखा जा सकता है। वस्तु के अभाव से लेखक संवेदना के जिस स्तर को छूना चाहता है, उसकी संप्रेषणीयता बाधित हो जाती है।
ऐसा नहीं है कि इन कहानियों में कुछ अच्छा नहीं है, सैनिकों की मन की उलझन कई बार बहुत सुंदर अभिव्यक्ति पाती है-‘सुबह भी बर्फ लगातार गिर रही थी, मगर बीच में एक बार हल्की-सी धूप निकल आयी थी, जैसे किसी विषाद में डूबे संत के होंठों पर अचानक मुस्कुराहट आ जाए।’4
*ााहिर है, पहाड के मौसम और अध्यात्म के माध्यम से सैनिक के हृदय की वेदना का जो बिम्ब सामने आया है, वह अद्भुत है; साथ ही, इसी तरह की और भी पंक्तियाँ इन कहानियों में मिलती हैं, लेकिन वे कहानी को कुछ अतिरिक्त सांसें तो दे सकती हैं, सम्पूर्ण जीवन नहीं। कहानी जीवनरक्षक प्रणाली की मोहताज होनी भी नहीं चाहिए। उसकी सफलता उसके समवेत स्वर में है, खंडित ध्वनि में नहीं।
लेकिन शैलेश मटियानी चुकने वाले कथाकार हैं ही नहीं। निस्सन्देह, ‘लाम’ को लेकर उनकी कुछ कमजोर कहानियाँ हैं, लेकिन कुछ ऐसी भी कहानियाँ हैं, जो इस कमजोरी को ओझल कर देती हैं। और ऐसी कहानियाँ, दूसरे प्रकार की कहानियाँ हैं।
शैलेश जी मानव मन के द्वंद्व, सुख-दुःख और ठहराव के कथाकार हैं। उनके पास अनुभव की विपन्नता नहीं थी; बस, *ारूरत थी, उसके उचित प्रयोग की।
युद्ध के समय बहादुरी और समर्पण की चर्चा तो सब करते हैं, लेकिन एक और युद्ध, युद्धभूमि के बाहर लडा जा रहा होता है-सैनिकों के परिवारों में। देश के लिए बलिदान होना निस्सन्देह सैनिक और उसके परिवार के लिए गौरव का क्षण होता है, लेकिन ताउम्र गौरव के सहारे नहीं रहा जा सकता। जहाँ प्रियजन के अहित की आशंका मात्र से ही सिहरन हो उठती है, वहाँ न जाने कितने परिवार इसी आशंका में रोज जीते हैं और न जाने कितने परिवार अपने प्रिय को खोने की पीडा में रिस रहे होते हैं। ‘सीने में धँसी आवाज’ में कमला सूबेदारनी का यही दुःख कहानी को साये में ले लेता है। कमला का पति दो साल पहले ही शहीद हुआ है और उसका बडा बेटा आनंद सेना में भर्ती होना चाहता है। लेकिन कमला अपने दुःख के बल से उसे रोके हुए है। इससे आनंद रुक तो जाता है, लेकिन उसका गौरव पल-पल आहत हो रहा है। ‘माँ, पिताजी तो हमारे लडाई के मैदान में मारे गए थे, मगर तूने मुझे घर पर ही मुर्दा बना दिया है।’5
इस पंक्ति में बेटे का आहत स्वाभिमान तो है ही, लेकिन प्रच्छन्न रूप से कमला की पीडा और गहरा मानसिक द्वंद्व भी साथ चल रहा है। एक तरफएक सैनिक की पत्नी व माँ होने का मान व परिवार का गौरव है, तो दूसरी तरफएक विधवा का अपनी संतति के प्रति प्रेमजनित भय है। कहानीकार यहाँ बिल्कुल हडबडी में दिखलाई नहीं पडता। कमला को अपनी कायरता स्वयं भी बुरी लग रही है और अंततः वह आनंद को सेना में भेज भी देती है, लेकिन यह कहानी में सपाट तरीके से घटित नहीं रहा। कहानी में यह नहीं हुआ कि आनंद के कठोर वचन सुनकर कमला का दर्प जाग उठा और वह बहादुरी से भर गयी; बल्कि कमला अपने द्वंद्व से लडने के लिए ऊर्जा अपने अतीत से ला रही है, जहाँ विवाह के बाद उसके सूबेदार सैनिक पति ने उसे ‘हवलदारनी’ कहकर बुलाया और सैन्य संस्कृति के संस्कार उसको दिए। ‘बंदूक की गोली’ पूरी कहानी को अलग-अलग तरीके से अर्थ दे रही है। कमला का मानसिक तनाव लेखक पंक्ति-दर-पंक्ति अंकित कर रहा है-‘कमला सूबेदारनी के हाथ की दराती घास काटते-काटते, किसी पत्थर से टकराकर, झन्न कर उठी। घाटी में झरने का पानी जैसे और *ाोर से टकरा गया हो।’6
अपनी अतीत की याद से कमला अपने मन की उलझी हुई डोर सुझलाने का प्रयास करती है। और यह सब अनायास घटित हो रहा है। अपने पति के सीने पर लगी गोली से कमला आज भी पीडित है, वह उस पीडा से बँध गयी थी, जिससे उसने खुद को संचित ऊर्जा के माध्यम से आजाद कर लिया और निर्णय की स्थिति में पहुँची।
नई कहानी जिस आदर्शवाद से बचने का प्रयत्न करती रही, उसी में शैलेश मटियानी हस्तक्षेप करते हैं। समस्या आदर्शवादी अंत से नहीं, आदर्श के नाम पर कृत्रिमता के बोझ से है। कहानीकार इस मार्ग पर तार्किक परिणति तक आने के लिए पात्रों या घटनाओं के माध्यम से ऊर्जा को लाने का कितना स्वाभाविक यत्न कर पाता है, कहानी के लिए यही महत्त्वपूर्ण है।
और इसी क्रम में सबसे महत्त्वपूर्ण कहानी है-पोस्टमैन। हिंदी की कालजयी कहानियों में इसकी गणना हो तो अतिशयोक्ति नहीं। दयाराम ने नई-नई पोस्टमैन की नौकरी की। यों नौकरी इतनी मुश्किल नहीं। लेकिन कुमाऊँ की उस भूमि में यह नौकरी कितनी मानसिक यातना से भर उठती है, यह कहानी पढकर ही पता चलता है। युद्धभूमि या सीमा पर तैनात सैनिकों की कुशलक्षेम की चिट्ठी या मनीऑर्डर पोस्टमैन ही घर पहुँचाते हैं। गाँव वालों के लिए ये पोस्टमैन ईश्वर के संदेशवाहक की तरह शुभ हैं जो उनके प्रियजनों के समाचार उन तक पहुँचाते हैं। उनका आदर-सत्कार आवभगत होती है। लेकिन जब यही पोस्टमैन किसी के शहीद होने का ‘जै-हिंदी तार’ लेकर पहुँचे, तब? ‘मर जाए, पोस्टमैन, तेरा पालने-पोसने वाला, जिसने तुझे ऐसे कुकरम सिखाए! मेरे बालकों को अनाथ कर गया तू! जैसा जै हिंदी-तार तूने मेरे घर पहुँचाया, गोल्ल देवता के थान में बकरे काटूँ, जो कोई तेरे घर भी ऐसा ही तार पहुँचा आवे! ‘तुझे आँचल की छाया, हाड-माँस की काया देने वाली भी ऐसे ही छातियाँ कूटे!’7
*ाार-*ाार रोती विधवाएँ और संतानविहीना माताओं की बददुआएँ दयाराम को चीर देतीं। दयाराम धीरे-धीरे आक्रांत होता चला गया-उनकी बददुआओं से नहीं, बल्कि उनकी पीडा से, और उस पीडा के चाहे-अनचाहे माध्यम बनने से। यही कारण था कि दो दिन पहले जसौत सिंह के घर चिट्ठी देने गए दयाराम को जब खूब दूध-शक्कर वाली चाय और प्रेम मिला; तब आज, जब उनके यहाँ का तार आया है तो वह जसौत सिंह नेगी के सैनिक बेटे रतनसिंह नेगी की सम्भावित मृत्यु से काँप उठा। उसकी बेचैन हालत देखकर ब्रांच-पोस्टमास्टर तार देने चले गए।
इसके बाद पूरी कहानी दयाराम के मन में पक रहे विचारों से बन रही है। मन-ही-मन रतन सिंह नेगी की मृत्यु का समाचार पढना, विधवा जैतुली का छाती पीटना और सिर के बाल फैलाए चीख-चीख कर विलाप करना व दयाराम का खाली झोला दरांती से फाडकर कहना-‘इसलिए डाली थी, पोस्टमैन, तेरी चाय में मुट्ठी भर चीनी, कि तू मेरी *ांदगी में बिस घोल जाएगा।’8
लेकिन तार होता है जसौत सिंह की बेटी के पुत्र होने के शुभ समाचार होने का। पोस्टमास्टर वापस आकर जब उसे यह बताते हैं और उनकी आवभगत और आठ आने की दक्षिणा का *ाक्रकरते हैं, तो दयाराम खुशी से झूम उठता है।
कहानी में दयाराम की पीडा है और उसके माध्यम से वह समूची वेदना है जोकि सैनिक परिवारों, खासकर घर की स्त्रियों में हर पल घट रही है। ध्यान रखना चाहिए, हर पीडा का स्त्री-पाठ अलग और कहीं अधिक मार्मिक होता है। स्त्री-पाठ के नजरिए से भी इस कहानी को पढा जाना चाहिए। प्रकाश मनु ने बहुत सही लिखा है, ‘मटियानी की सबसे खूबसूरत कहानियाँ वे हैं, जिनमें उन्होंने पहाडों के दर्द को छुआ है और उसकी अनुगूँज के साथ-साथ बहे हैं। यह आकस्मिक नहीं कि इन कहानियों में स्त्री का दर्द, उसकी करुणा फूट पडी है। लोक शैली के रंग से सराबोर ‘पोस्टमैन’ कहानी इस लिहा*ा से बेमिसाल है जिसमें भाषा की लचक और *ांदादिली देखते ही बनती है।’9
इस कहानी में शैलेश मटियानी अपने कहानीकार के उच्च शिखर को छू लेते हैं। कहानी की संवेदना उसका मूल तत्त्व है, इसमें दो राय नहीं। मामला है, कहानी के कहानी होने का। भावात्मक सघनता का सम्बन्ध अनुभूति की प्रामाणिकता के साथ-साथ उसके आत्मसातीकरण से भी है। जरूरी नहीं कि कहानी की रचना-प्रकिया में घटनाएँ ही उसे आगे बढाने का रास्ता दिखलाएँ। पात्र और मानसिक संरचनाओं की जटिल योजनाएँ इस रचना-प्रत्रि*या को अधिक नैसर्गिक बनाते हैं। ध्यान रहे, ‘पोस्टमैन’ कहानी के अंत में तार के म*ामून के खुलासे में नाटकीयता का तत्त्व है, लेकिन वह कहानी के समवेत प्रभाव को बढाता है। कारण-दयाराम सैनिक परिवार की पीडा को जी रहा है और पाठक दयाराम के माध्यम से उस परिवार की पीडा के साथ-साथ स्वयं दयाराम की वेदना और तनाव की गहराई में उतर चुका है। कहानी पढे जाने के ऋम में पाठक द्वारा कहानी केवल पढी नहीं जा रही होती, बल्कि पाठक कहानी के भीतर भी सम्पूर्ण प्रत्रि*या का पुनःपाठ कर रहा होता है। इस तरह, कहानी अपने अंत के दो पैराग्राफ से पहले तक मन और मर्म के कई स्तरों को आच्छादित कर लेती है और अचानक से तार की असलियत खुलती है। कहानी में डूब चुके पाठक को मानो अचानक होश आता है। डूबने और तरने के बीच का यह अंतराल एक झटके में सुकून के साथ खत्म होता है, जहाँ तार की शुभ सूचना से दयाराम से अधिक खुश पाठक होता है।
यहाँ यह भी कहना जरूरी लगता है कि इन कहानियों में लोकभाषा के शब्दों और लोक-संस्कृति का भी शानदार निर्वहन देखने को मिलता है। भाव की गहनता को निभा सकने वाला शिल्प, भाषा के संयम और उत्तेजन में स्पष्ट दीख जाता है। पात्र जानता है कि उसे कहाँ बोलना है, क्या बोलना और कहाँ नहीं बोलना। कमला और दयाराम का भाषिक विधान इसका उदाहरण है। कहानीकार का बेहद कम हस्तक्षेप शिल्पगत ढाँचे को और मजबूत करता है। कुमाऊँनी भाषा की शब्द-योजना कहानी को जीवंत बना देती है तथा घटना और मनःस्थितियों का संतुलन भाषा की मजबूती से सध जाता है।
शैलेश मटियानी की ‘लाम’ सम्बन्धी इन दोनों प्रकार की कहानियों को पढकर ‘कहानी की रचना-प्रक्रिया’ के सम्बन्ध में भी कई बातें स्पष्ट हो जाती हैं। कहानी कोई कृत्रिम विधा नहीं है, जिसमें मनमाने तरीके से संवेदना को फिट किया जा सके। कहानीकार के लिए *ारूरी है कि जो वह लिखने जा रहा है, उस प्रत्रि*या में आने वाले सभी तत्त्वों को संरचनात्मक कसौटियों पर कसा जाए; चाहे वह अनुभूति के प्रति ईमानदारी हो या अनुभूति को दर्ज करने वाले साधन हों ( यथा- घटनाएँ या पात्र योजना ) या अभिव्यक्ति का बाह्य पक्ष, यानी कि शिल्प हो, जोकि उसके आंतरिक गठन से जुडा हुआ है। इसके बाद, यह जरूरी नहीं कि कहानी मन या अर्थ के कई स्तरों को छुए बिना सफल नहीं हो सकती, *ारूरी यह है कि अर्थगत छवियों का इकहरापन भी मन की जटिलताओं से कहीं-न-कहीं ‘आत्मिक संपृक्ति’ महसूस करे। पाठक भाव को ग्रहण करने की प्रत्रि*या के बाद विराम के साथ नहीं, विचलन के साथ उठे।
शैलेश मटियानी अँचल से प्रभावित भी थे, और कहीं-कहीं मोहग्रस्त भी। हालाँकि उनकी सभी आँचलिक कहानियों को देखा जाए, तब यह मोहग्रस्तता बहुत क्षीण हो जाती है, लेकिन युद्ध सम्बन्धी कहानियों में यह मोह कुछ अधिक है। मोह से धुँधली आँखों के कारण कहानीकार की लेखनी निस्सन्देह भटकी है, जिस कारण कमजोर कहानियाँ सामने आयीं, लेकिन अन्य कहानियाँ स्पष्ट दृष्टि के कारण उस भटकाव को न केवल बढने से रोक देती हैं, बल्कि हिंदी साहित्य को समृद्ध भी करती हैं। गोपाल राय की उनके समग्र साहित्य पर यह टिप्पणी यहाँ भी प्रासंगिक लगती है-‘कथ्यगत वैविध्य, संवेदनात्मक तीव्रता, भाषिक सृजनशीलता और शिल्पविषयक सजगता, सभी दृष्टियों से शैलेश मटियानी की कहानियाँ एक नया प्रतिमान निर्मित करती हैं। रचनात्मकता की दृष्टि से मटियानी की कहानियों में भी उच्चावचता है, पर एक मसिजीवी हिंदी लेखक के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसा प्रेमचंद के साथ भी हुआ। उल्लेखनीय बात यह है कि प्रेमचंद की तरह ही मटियानी की श्रेष्ठ कहानियों की संख्या किसी भी अन्य लेखक से अधिक है।’10