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कविता शब्द सादृश्य ......

अमित कल्ला
कविता का अपना एक भरा पूरा संसार है, जो बहुत कुछ कहता, बुनता और समय-असमय यकीनन दृश्य की अनुपम उपमाएं बनकर यथासंभव दीखता भी है, किसी संगीत की सुरमयी तरंग जैसा महसूस होकर सुनाई भी देता है। शब्द जहाँ सुवास का पर्याय बन अपने होने के वजूद को बडी ही सदाकत के साथ अनावृत करता है वहीं किसी रंग सरीखा वह शब्द अनायास ही उस दमकते प्रकाश की उपस्थिति का हिस्सा भी हो जाता है जिसकी रूहानी रौशनी में सदियों से तमाम सभ्यताओं के चिरागों ने अपने होने के असल अर्थों को जाना है, कविता को इबादत बनाकर बडे अदब के साथ अपने माझी की हस्ती को पहचाना है। वास्तव में आज कविता की उपस्थिति को लेकर कई गहरे सवाल हैं, उसकी भाषा, व्याकरण, उसका भूगोल, रसायन, उसकी ध्वनि, स्पंदन, उसमें से उठती आरोहण-अवरोहण की लय-छंद और कितना कुछ न जानें क्या-क्या दुनिया भर में कहीं वह नारे के रूप में न*ार आती, तो कहीं किसी गुणीजन सभा का बीज वक्तव्य बनकर अडे स्वभाव के माफिक चट्टान बन ठहर-सी जाती है और कभी सूक्ष्म लेतिली रेखा बनकर अलग-अलग नाम रूपों में दरियाव की लहर-सी बहती है लेकिन उसका दायरा इन सबसे कहीं ज्यादा विस्तृत जान पडता है।
भाषा की अगर बात करें तो महज उसके अन्तरंग स्वभाव का एक हिस्सा भर है। जिसकी संजीदगी उसके अपने प्रारूप के परिकर को और ज्यादा मुकम्मल अर्थ देती है, उसे मुबारक बनाती है। आज के समय में कविता या शायरी के असल रूप से मुखातिब होना अपने आपमें एक बडा मसौदा है, लिहा*ाा जिसके मुत्लक सबद के उस चश्में शब् से रूबरू होना है। मलयालम भाषा के भरे-पूरे कवि आलोचक अयप्पा पणिकर ने कविता को एक बीज होने की संज्ञा दी है जिसमें प्राण और चेतना है, वृक्ष और उससे जुडा समूचा संसार है जो व्यक्त अव्यक्त जैसी तमाम धाराओं के बीच होने वाली प्रक्रियाओं का आलम्बित अवकाश भी है। कवि अशोक वाजपेयी जिसकी तुलना सत्याग्रह से करते हैं। वे उसके अनुराग के प्रतोप को कहते नहीं थकते जिसमें जीवन संजीवनी के तत्त्व निहित हैं जो कई-कई नामरूपों में मनुष्य के इस दुनिया में होने की गाथा का बेहतरीन दस्तावेज है जहाँ अमियस की भरमार है। वहीं चिन्तक आलोचक नन्दकिशोर आचार्य उसे सृष्टि की लय मानते हैं, क्रमतर तो सूक्ष्म से विराट् और विराट् से सूक्ष्मतर होती जाती है सिलसिलेवार जहाँ जिन्दगी कहीं शुरू हो कर इसी दृश्यमान जिन्दगी में कितनी सहजता से विलीन भी हो जाती है यकीनन जो न केवल ईश्वरीय सत्ताओं को एक रचनात्मक प्रत्युत्तर है बल्कि मृत्यु सरीखे सत्य के अनेक सदस्यों को आईना दिखाती एक बडी हुनरमंद रवायत है, जहाँ तमाम तकलीफों के बावजूद इंसानी ज*बात अपने मूल रूप में कायम रहते हैं और समूचा निसर्ग जिसकी रंगभूमि है। इसी पीढी के कवि रमेश चन्द्र शाह के लिए कविता पल-पल कितना कुछ गहती, सहती और कहकर म*ाबूत परंपरा के रूप में जीवन के प्रति विश्वासों के आधारों को मजबूती देकर निरंतरता की एक नदी जैसी अविरल बहती रहती है जिसका शकशी होना एक बडी उपलब्धि है।
जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, निराला की कालजयी लम्बी छायावाद काव्य परंपरा के बाद मुक्तिबोध, शमशेर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, नागार्जुन, पाश, श्रीकांत वर्मा जैसे कवियों के लिये कविता देश और दुनिया के बदलने का गहनतम दस्तावे*ा रही है। जो किसी गोला-बारूद की गंध से ते*ा महकता हुआ जलजला साबित होने के सबूत पेश करती है वहीं समयातीत कवि अज्ञेय के लिए कविता मानो मन को ठहराने का एक ऐसा विश्वसनीय मुकाम है जो अपने भीतर व्यापकता को भरकर विषय से विचार में ट्रांसफॉर्म होने के रूपांतरण के सर्वोच्च अवसरों को पाने का यथासंभव नजरिया और जरिया भी है। जहाँ इस चिंतन की समूची प्रक्रिया का मेनिफेस्टेशन के रूप में उस अवकाश को गहना न केवल एक संयोग है बल्कि एक सुन्दर संभाव्य संतति का उसमें किसी उपादेय जैसा होना है जिसमें भाव का अपना महत्त्व तो है ही, रस ध्वनि और अलंकार की गरिमामय उपस्थिति भी है जिसने अपनी ही तरह के नए आलोक को बेहद खूबसूरती से रचा-बुना है और काव्य के संदर्भ में ज्यादा गहरा सोचने के बडे परिदृश्य को बनाने में सफलता पायी है।
कुछ बरस पहले हमने भी एक बार शरद के पूरे चाँद की संगति में कविता को पाने की सामूहिक कोशिश की थी जहाँ एक आलम सजाया गया था, शहर के कई कवि शायर जिस जलसे के मुसाहिब थे। जो चाँद के उस अविकृत स्वपन के पूरा होने का उत्स था, और हमारे लिए कोई मुबारक मौका, जिसके मुतल्लक मैंने और मेरे फोटोग्राफर मित्र भाई हिमांशु व्यास ने कुछ शब्द साझा किये थे जो किसी वाकया से बडे दोनों की सहानुभूतियों में सुवासित फूटती किसी कविता का ही हिस्सा थे। यकीनन जो उसे पाने की असीम चाहना और उससे गहरा रिश्ता बनाने की प्रक्रिया आधारित जुम्बिश थी।
‘कविता बचाती, खिलाती है, लहर दर लहर पास आकार अपने-सा होने को सबब सुझाती है, कितनी तसल्ली से बदलती है वह आकार अपना ऐसा कि पाया जा सके उसे कहीं भी, बादल, बूंद, बांसुरी, मन या फिर उस असंग अवकाश को अपने भीतर धारण किये उस आकाश में कभी भी किसी अवधान जैसा।
शहर की ध्वनियों से भिन्न हैं उसके आरोही अवरोही स्वर, सूरज या फिर जीवन से तपती सडक पर गिरते गुलमोहर के गुलमोहरी स्वर, खाली इमारतों में बढती हुई दरारों को अर्थ देता हुआ पीपल। साँस-साँस उनके होने को प्रतिध्वनित करता उसे कहने वाला, कुछ तो है वहाँ कहता, उठता जो यकीनन।
हम तलाशते हैं कविता की ठौर अपने-अपने ठिकानों को छोडकर, साथ हो लेते तरबतर होने को हम झरती बदली के नींचे, शब्द बहते उतरते हैं जहाँ उनमें हम भी शब्द बने रहते, उगते हैं किसी किनारे, शब्द सरोवर को भर देते हैं।
शब्द सरोवर जहाँ सदा पूर्णिर्मा होता है, छिपी होती उसके वृत्त में असंख्य अनुपस्थितियाँ अक्षर-अक्षर जो इस वृत्त से नम माटी लेकर अपनी गोलाई गढता है, तय करता फिसलती मात्राएं इबारत की पलक भर पोरों के स्पंदन महसूस कर संज्ञानता से निःशब्द होकर, कतरा-कतरा हम सब की आपाधापी को बिंदु, वर्ण, हलंत, विराम देता है और बेबाक होकर कविता के शब्द सादृश्य की अनुपम उपस्थिति कहता है।
लिहा*ाा यह भी एक रास्ता है कविता से मुखातिब होने का जहाँ सांस दर सांस जिस्म में वह घुलती जाती है जो खालिस बारीक अनुभव की अभिव्यक्ति है। इस छोर से उस छोर तक फैले जिसके इन्द्रधनुषी रंग अपने मुमकिन मुकाम की तलाश करने वालों को सचेतन ही किसी रूहानियत के आगोश में भर लेते हैं, अक्सर जो जिस्मानी सीमाओं के परे घटित होने वाले स्फोट की दर्शना के बिम्ब सजाती है जिसे आचार्य सायन, पाणिनि, पतंजली, भर्तृहरि जैसे व्याकरणिकों ने सौन्दर्य के आलंबन से भर कर अनुभव मंडल होने की संज्ञा दी है।
दुनिया में शायद ही कोई दूसरा मुल्क हो जहाँ कविता को ईश्वर-सा पूजा जाता हो, उसकी इबादत अरदास की जाती हो। न केवल सिख धर्म बल्कि तमाम मजहबों और सम्प्रदायों में सबद रूप वह आंदोलित होती है। उसके हिलोरों में परोक्ष-अपरोक्ष रूप से बहुत कुछ निर्णायक निपजता है। ह*ाारों ह*ाार साल पीछे देखें तो ऋग्वेद दुनिया की प्राचीनतम कविता जान पडती है, जो अपने आपमें किसी अवधान में लेकर जाती समयातीत अनुभव के अवकाश की बेहतरीन उत्सर्जना है, वहीं रामचरितमानस हिन्दुस्तान की अद्भुत काव्य परंपरा में एक मील का पत्थर है। वैसे तो हमारा समूचा भक्ति और सूफी आन्दोलन कविता के आधारों पर टीका है जहाँ सब कुछ कविता से शुरू होकर उसमें ही विलीन होने की खबर देता है। देवालयों के रंगमंडपों से दरगाह के खानगाहों तक काव्य की स्वर लहरियां अनुनादित होती हैं। दरअस्ल कविता सही अर्थों में न केवल जिन्दगी को जीना सिखलाती है बल्कि उसके आलोकित मर्म से मुखातिब भी करवाती है। उसमें कंटम्प्लेट करने की रवायत का वह अभिन्न संस्कार उसे निरंतर नया बनाए रखता है। कविता कभी भी बूढी नहीं होती क्योंकि समय में साथ उसका खिरना लगातार *ाारी रहता है। देश काल सरीखी सीमाओं में उतार चढाव भरे बहावों के बावजूद उसकी चमक बरकरार रहती है। वास्तव में वह एक संजीवनी है जिलावन हारी बूटी, कबीर ने जिसे पिया था, भीषण विषमताओं को सहते हुए निर्भय होकर उसे पाया और गाया था। वे फरमाते हैं ‘हम न मरही मरही संसारा, हमको मिला जिलावन हारा’ उन्हें जिन्दा करने वाला है- अमर बनाने वाला, जिसे कोई सतगुरु का सबद कोई कविता कहता है। बूँद-बूँद बिंदु बनती हुयी रेखा जो मन की सतहों पर दस्तक देती है फलक से उतारकर घूम-घूम अनुकृतियाँ की अभिव्यक्ति को दौराकर आकृतियाँ रचती है, वास्तव में वह आशाओं का अनंत विस्तार है उम्मिदगी का बेमिसाल सबब है। गहरें उतरे तो जान पडता है कि संसार ही अपने आपमें एक कविता है और कविता संसार का शब्द सादृश्य .......