fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

संस्कृति : एक मूल्यगत प्रक्रिया

राजाराम भादू
हम क्या उत्तर पाते हैं यह इस पर निर्भर करता है
कि हम सवाल क्या पूछते हैं। - प्लेटो
हम दरअस्ल, एक तत्त्व-मीमांसीय रोग के शिकार हैं, इसलिए इसका इलाज भी तत्त्व-मीमांसीय होना चाहिए।
- शुभाकर
नंदकिशोर आचार्य का सृजनफलक लेखन की कई विधाओं के आर-पार विस्तारित है। एक कृतिकार के रूप में उनकी पहचान बहु-आयामी है। वे कवि, नाटककार, आलोचक और संस्कृति-चिंतक हैं। करीबन पांच दशक में विस्तारित उनके कृतित्व में लगभग प्रतिवर्ष एक उल्लेखनीय काम दर्ज है। इतनी सक्रियता के बावजूद वे सृजन में कोई समझौता या उतावली नहीं करते। ऐसा शायद इसलिए संभव है कि उनका समूचा सृजनकर्म एक समग्र अन्तर्दृष्टि और विचारणा से अनुप्रेरित व अनुप्राणित है। वे इतिहास के अध्येता रहे और कल्चरल पॉलिटी ऑफ हिन्दूज व दि पॉलिटी इन शुक्रनीतिसार जैसे शोध-कार्यों से अपने वैचारिक लेखन की शुरुआत की जो विभिन्न दार्शनिक-चिंतन दृष्टियों से करते हुए सतत विकासमान रहा। उनकी सृजनात्मक कृतियां दार्शनिक-सौंदर्यपरक उत्सों से अनुस्यूत होकर जीवन की बीहडता और वैविध्य को सम्बोधित करती हैं।
मनुष्य की अवधारणा
आचार्य जी मनुष्य को जैविक और सांस्कृतिक रूप में परिभाषित करते हैं और सांस्कृतिक मनुष्य को अभीष्ट मानते हैं। वे कहते हैं ः जीव विज्ञान की दृष्टि से देखें तो मनुष्य और पशु में उसी प्रकार का अन्तर है, जैसा एक पशु जाति और दूसरी पशु जाति में होता है। वह होमो सेपियन जाति का पशु है, यानी एक अलग किस्म का मानव पशु। इस परिभाषा में भी रहता वह पशु ही है। तब ऐसा क्यों है कि हम उससे एक अलग तरह के आचरण की अपेक्षा करते हैं? जब वह पशुवत्-आचरण करता है तो हमें क्यों क्षोभ होता है? इससे स्पष्ट है कि जैविक विशेषताओं से अलग कुछ ऐसी आचरणगत विशेषताएं और हैं जो उसे पशुत्व से बुनियादी तौर पर अलग करती और मानव बनाती हैं।
आगे आचार्य इन विशेषताओं को स्थापित करते हैं। विचारशीलता और उसमें निहित सृजनशीलता ऐसी विशेषताएं हैं जो मनुष्य को बुनियादी तौर पर दूसरे प्राणियों से अलग करती हैं। आचार्य व्याख्यायित करते हैं, पक्षियों द्वारा घोंसला बनाना अथवा पशुओं द्वारा मांद आदि बना लेना एक सहज जैविक वृत्ति के अन्तर्गत आते हैं, चेतनापूर्ण सृजन के अन्तर्गत नहीं। पशु और अन्य मनुष्येतर प्राणियों में इसीलिए जो क्रियाएं सहज होती हैं, वे भी मानवीय जीवन में एक प्रकार के मूल्यबोध से अनुप्राणित और अनुशासित होने लगती हैं क्योंकि विचारशीलता और सृजनशीलता मिलकर मानव जीवन के सभी पक्षों उसके प्राकृतिक कार्य व्यापार से लेकर सामाजिक व्यवहार तक में - एक उत्तरदायित्व का बोध विकसित करती हैं। यह उत्तरदायित्व उन मूल्यों के प्रति होता है जिन्हें स्वयं मनुष्य की चेतना ने सिरजा है, अतः यह उत्तरदायित्व उसकी अपनी चेतना के प्रति उत्तरदायित्व ही है और यही बात है जो उसके आचरण को अर्थवत्ता या सार्थकता देती है, उसे मानव बनाती है। इस प्रकार मानव होने का अर्थ है चेतना-सम्पन्न, सृजनशील और उत्तरदायी होना।
आचार्य मूल्य के अर्थ को इस प्रकार व्याख्यायित करते हैं ः मनुष्य के आचरण की मूल प्रेरणा और कसौटी यानी वे आदर्श जिनसे वैयक्तिक और सामूहिक मानवीय आचरण अनुप्राणित होता है और जिन के आधार पर ही उसका औचित्य निर्धारित होता है। आचरण का क्षेत्र आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक कुछ भी हो सकता है, लेकिन यदि उससे इन मूल्यों की पुष्टि नहीं होती है या इन पर आघात होता है तो उसे उचित नहीं कहा जा सकता। वे चेतना और सृजनशीलता को मूल्यों का दर्जा देते हैं और इनके साथ दो अन्य बातों को जुडा हुआ बल्कि अन्योन्याश्रित मानते हैं और वे हैं- स्वतंत्रता और सामाजिकता, जो अपने से इतर के साथ सम्बन्ध विधान का स्थूल रूप हैं। इस प्रकार चेतना, स्वतंत्रता, सृजनशीलता और सामाजिकता ऐसे चार आधार-स्तम्भ हो जाते हैं जिन पर मानव जीवन की इमारत खडी होती है।
उनकी तमाम पुस्तकों, यथा संस्कृति का व्याकरण; परम्परा और परिवर्तन; सभ्यता का विकल्प और संस्कृति की सभ्यता’ में मनुष्य को परिभाषित-पुनर्परिभाषित किया गया है किन्तु वहां उसके अर्थ की एकान्विति और संगति है। मनुष्य अपने सभ्यतागत अस्तित्व और सांस्कृतिक भूमिका से वैयक्तिक अस्मिता अर्जित करता है। समाज रचना में व्यक्तियों के मूल्यपरक सम्बन्ध और समृद्धिकारी प्रतिक्रियाए निर्णायक भूमिकाएं निभाती हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी ची*ांें वांछित गुणात्मक उत्कर्ष की दिशा में ही जाती रही हों।
सृजनशीलता
सृजनशीलता का नंदकिशोर आचार्य के संस्कृति चिंतन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके उनके यहां विशिष्ट आशय हैं। उनके अनुसार, सृजनशीलता कोई कला या साहित्य में ही अभिव्यक्त होने वाला गुण नहीं है- यह मनुष्य के दैनन्दिन आचरण में प्रकट होने की अपेक्षा रखता है। अपने साथ और अपने से इतर सब कुछ के साथ- इस सब कुछ में केवल मानवीय समाज ही नहीं सम्पूर्ण प्राणी जगत्, वनस्पति जगत् और जिसे जड-जगत् कहा जाता है वह भी सम्मिलित है- एक सर्जनात्मक रिश्ता मानवीय आचरण की नैतिक कसौटी है।
आचार्य सृजनात्मकता को मनुष्य का स्वयम्भू गुण, उसकी प्रकृति मानते हैं। स्वतंत्र चेतना इस सृजनात्मकता के गुण में अन्तर्निहित है। इसलिए मनुष्य की सृजनात्मकता को जिस हद तक पुष्ट और विकसित किया जा सकता है उसी हद तक हम मनुष्यत्व की सिद्धि करते रहते हैं। जैविक स्तर पर मनुष्यत्व स्वयं प्राप्य है लेकिन उसके बाद के मनुष्यत्व को अर्जित करना होता है- इस अर्जन की सारी सम्भावनाएं मनुष्य में ही हैं। जिस सीमा तक कोई यह अर्जन कर पाता है वास्तविक अर्थों में उसी सीमा तक वह मनुष्य हो पाता है।
इसी प्रसंग में अमानवीयता को परिभाषित किया गया है। सृजनात्मकता को कुंठित करने वाली प्रवृत्तियों और शक्तियों को ही हम वास्तविक अर्थों में अमानवीय कह सकते हैं। और इसलिए इस तरह की अमानवीयता के खिलाफ संघर्ष भी मनुष्य होने की बुनियादी शर्त बन गयी है। इसीलिए मनुष्य के मनुष्य बने रहने के लिए यह आवश्यक है कि उसका आचरण उत्तरदायी हो, सृजनशील हो और विभिन्न स्तरों पर अमानवीयता का विरोधी हो। यही नैतिकता है और इसलिए मनुष्य अनिवार्यतः नैतिक है क्योंकि उसके बिना मनुष्यत्व का कोई अर्थ नहीं है।
स्वतंत्रता
मनुष्यत्व और स्वातंत्र्य को अविभाज्य मानते हुए आचार्य लिखते हैं, स्वतंत्र हो सकने में ही हमारे मनुष्य हो सकने की सारी संभावनाएं निहित हैं, क्योंकि स्वतंत्र हुए बिना सृजनशील होना संभव नहीं और मनुष्य होने का अनिवार्य लक्षण सृजनशील होना है। स्वतंत्रता एक ऐसी गतिशील स्थिति है जो मनुष्य में निहित सृजनात्मकता को प्रेरित करती है और इसीलिए वे सभी प्रवृत्तियाँ तथा स्थितियाँ स्वतंत्रता-विरोधी हैं जो मानवीय सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति के रास्ते में बाधाएं पैदा करती हैं। उनके विरुद्ध किया गया हर संघर्ष इसीलिए स्वतंत्रता के लिए किये जाने वाला संघर्ष है। वे यहां तक कहते हैं कि राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर लोकतंत्र तथा आर्थिक स्तर पर समाजवाद के लिए किया जाने वाला संघर्ष भी स्वतंत्रता संघर्ष है। राजनीतिक दमन, सामाजिक उत्पीडन तथा आर्थिक शोषण मूल रूप में एक ही स्वतंत्रता विरोधी प्रवृत्ति के अलग दीखने वाले रूप हैं पर बुनियाद एक ही है- स्वतंत्रता विरोध अर्थात् मानव विरोध।
लेकिन इस संदर्भ में वे एक खतरे से भी आगाह करते हैं कि लोकतांत्रिक या समाजवादी व्यवस्था को ही स्वतंत्रता मान लेना सही नहीं होगा क्योंकि अक्सर यह देखा गया है कि संगठन या व्यवस्थाएं बहुत शीघ्र अपने मूल्यगत उद्देश्यों को भूलकर अपना अस्तित्व बनाये रखने को ही प्रमुख उद्देश्य समझ लेती हैं तथा येन केन प्रकारेण अपने औपचारिक स्वरूप को बनाये रखने के लिए उन मूल्यों के विरोध में ही काम करने लग जाती हैं जिनके लिए उनका जन्म हुआ था। किसी भी समाज में- चाहे उसने लोकतंत्र का औपचारिक रूप बना रखा हो- किसी प्रकार के शोषण और पूरी मानवता के साधनों और श्रम को किसी एक व्यक्ति, व्यक्ति समूह, वर्ग, जाति या देश द्वारा दोहन व उस के फलों को अपने उत्तराधिकारियों के लिए सुरक्षित कर देने की चेष्टा भी स्वतंत्रता विरोधी व अलोकतांत्रिक है।
आचार्य की चिन्तन-पद्धति म भी स्वतंत्रता की अहम जगह है बल्कि कहना चाहिए कि इसके अभाव में यह प्रक्रिया संभव ही नहीं है। अपनी चिंतन प्रक्रिया के शुरू में वे किसी प्रत्यय (या अवधारणा) की प्रस्तावना करते हैं। फिर उससे जुडे संभावित प्रश्नों की ससंदर्भ एक सूची प्रस्तुत करते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर तलाशते हैं और इनसे गु*ारकर ही अपने प्रस्तुत किये गये प्रत्यय (या अवधारणा) का औचित्य प्रतिपादित करते हैं।
यह प्रक्रिया यहीं नहीं निष्पन्न हो जाती बल्कि प्रस्तुत प्रत्यय या अवधारणा को वे सांस्कृतिक प्रतिमानों की संगति में रखते हैं। उल्लेखनीय है कि उन्होंने इन प्रतिमानों को पारम्परिक या प्रचलित धार्मिक-साम्प्रदायिक सम्बद्धताओं से स्वतंत्र कर दिया है। उनकी नैतिकता स्वतंत्र मानवीय मूल्यों पर आधारित है। ये मूल्य संस्कृति सापेक्ष तो हो सकते हैं किन्तु वर्चस्व से बाधित या सीमित नहीं हो सकते अन्यथा ये अपना औचित्य ही खो देते हैं। इसीलिए आचार्य बार-बार दार्शनिक तत्त्व-मीमांसा का सहारा लेते हैं जहां ची*ों अपने सार (सत्य) रूप म विद्यमान होती हैं। इसी भांति साहित्य-आलोचना में वे सौंदर्यमूलक प्रयोजनों को ही अहमियत देते हैं जो किसी कृति के मूल्यांकन की अपेक्षाकृत समग्र रूपरेखा प्रस्तुत करती है।
मनुष्य और प्रकृति
मनुष्य के प्रकृति से सम्बन्ध पर विचार करते हुए आचार्य पाश्चात्य और भारतीय दृष्टि का भेद प्रस्तुत करते हैं। पश्चिम में प्रकृति के प्रति शत्रु भाव है और विकास की प्रक्रिया को प्रकृति पर विजय के रूप में देखा जाता रहा है। जबकि भारतीय सभ्यता में प्रकृति के प्रति अनन्यता का भाव है और मनुष्य एवं प्रकृति के सम्बन्ध अन्योन्याश्रित हैं।
लेकिन इस संदर्भ में आचार्य जी की तर्क-संहति को देखना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उनकी कई विचारणाएं इसी से प्रसत हैं। आचार्य यह स्वीकार करते हैं कि मनुष्य जैविक विकास का सर्वश्रेष्ठ स्तर है, कि उस में जीवन और चेतना की अद्यतन सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हुई है और भविष्य में इसके और गुणात्मक विकास की अपेक्षा भी उसी से की जा सकती है। इस स्वीकृति के बाद आचार्य सवाल उठाते हैं कि क्या उसका तात्पर्य यह होता है कि मनुष्य अन्य जीवों से अधिक समर्थ, सचेत और श्रेष्ठ है, अतः शेष जीवन और जगत् के संरक्षण और सम्पोषण का दायित्व उसका है अथवा यह कि वही सब से श्रेष्ठ है इसलिए अन्य सब कुछ उसके अबाध उपयोग के लिए है जिसे वह स्वेच्छाचारी तरीके से इस्तेमाल कर सकता है ः वह श्रेष्ठ है इस लिए प्रकृति और जीव जगत् का शोषण, दोहन और दमन करने का उसे अधिकार है, कि अधिक से अधिक उस का दायित्व अपनी ही जाति के अन्य सदस्यों- बल्कि अपने वर्ग या राष्ट्र के सदस्यों के प्रति है? और प्रकृति या मनुष्येतर जीवों के प्रति दायित्व ही क्या है? उनका तो प्रयोजन ही यही है कि मनुष्य उनका इस्तेमाल करे- बल्कि यह इस्तेमाल मनुष्य के अस्तित्व की आवश्यकता है क्योंकि उसके बिना वह जीवित नहीं रह सकेगा। क्या ऐसा नहीं है?
इन सवालों के प्रत्युत्तर में आचार्य का तर्क है, मनुष्य केवल जैविक अस्तित्व नहीं है। वह एक मूल्य स्रष्टा, स्वतंत्रचेत्ता और इसीलिए उत्तरदायी प्राणी है जिसके आचरण को सिर्फ जैविक स्तर पर नहीं परखा जा सकता। यह ठीक है कि मूल्यों के उद्भव, विकास और पहचान की परख वैज्ञानिक चिन्तन-दृष्टि से की जानी चाहिए लेकिन तब भी यह स्मरण रखना होगा कि विज्ञान अपनी प्रक्रिया में मूल्य-निरपेक्ष है, उसके उपयोग को भी मूल्यवत्ता देने का काम मानव चेतना ही करती है।
चेतना के स्तर पर मनुष्य की श्रेष्ठता और प्रकृति एवं प्राणीजगत् को हीन मानने की प्रवृत्ति की आचार्य एक और परिणति देखते हैं। मनुष्यों में भी चेतना के विकास के भिन्न स्तर और आयाम मिलते हैं -यदि मानवीय आचरण की कसौटी उपयुक्त मान्यता है तब तो अधिक विकसित चेतना और जीवन-शक्ति वाले मनुष्यों, समाजों या राष्ट्रों को यह सर्वमान्य अधिकार होना चाहिए कि वे अपने से कमजोर और हीनतर मनुष्यों, समाजों या राष्ट्रों का उपयोग अपने लिए कर सकें। वस्तुतः यही वह धारणा है जो उपनिवेशन और आन्तरिक उपनिवेशन का आधार रही है। यही धारणा विकसित और विकासशील देशों के मध्य सांस्कृतिक भेद की खाई बनाती है। इस सांस्कृतिक भेद का कारक ‘अन्यता का बोध’ है। एक राष्ट्र या समुदाय दूसरे राष्ट्र या समुदाय को हेय और स्वयं को श्रेष्ठ मानता है और इस ‘अन्य’ को वह हीनता, दया या करुणा भाव से देखता है। आचार्य इस प्रवृत्ति को नैतिक नहीं मानते। वे अन्य के प्रति ‘लगाव के बोध’ को भी उचित नहीं मानते बल्कि ‘एक्य भाव’ को ही नैतिकता और मानव-मूल्य के रूप म स्वीकृति देते हैं।
इस संदर्भ में उनका अभिमत उद्धृत करना बेहतर होगा ः कुछ लोग समझ सकते हैं कि मैं जीव दया जैसी किसी धार्मिक या मानवतावादी भावना अथवा पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरण की शुद्धता के लिए चलाये जा रहे आन्दोलनों के समर्थन में इतना तर्क-जाल फैला रहा हूँ। इन दोनों को मैं गलत नहीं मानता पर मेरा आग्रह उन पर एक अलग दृष्टि से विचार करने का है।
जब हम जीव दया की बात करते हैं तब अपने को एक दाता के भाव से गरिमा मंडित कर लेते हैं- उसमें यह भावना नहीं रहती कि हम पर जीवों या मनुष्येतर जीवन का कोई अधिकार है बल्कि यह भावना अधिक प्रबल हो जाती है कि हम उनसे श्रेष्ठ हैं। तब यह तर्क कुछ भ्रामक हो जाता है क्योंकि इसमें जीवन मात्र के प्रति कृतज्ञता का भाव नहीं रहता। मनुष्य जीवन की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है, अतः जीवन मात्र से जुडना, उसका संरक्षण और संवर्धन उसके मनुष्य होने की अनिवार्य नैतिक और भावात्मक शर्त है। जब मनुष्येतर जीवन के साथ मनुष्य का रिश्ता अस्तित्वगत स्तर पर अनुभव किया जाता है तभी वह वास्तविक अर्थों में मानवता का अर्जन करने वाला आचरण हो पाता है।
पर्यावरण और पारिस्थितिक संतुलन के लिए चलाये जा रहे आन्दोलनों के पीछे भी अभी तक केन्द्रीय दृष्टि मनुष्य के लिए उनकी उपयोगिता है। यह महसूस किया जा रहा है कि अभी तक जिस तरह से प्रकृति का दोहन किया जाता रहा है, यदि उसी गति और पद्धति से वह प्रक्रिया जारी रही तो मानव जाति के लिए उसके परिणाम बडे भयंकर होंगे । इसलिए वास्तविक चिन्ता यहां भी मनुष्य की ही है। मनुष्य की चिन्ता करना आवश्यक है लेकिन जीवन की चिन्ता करना भी उतना ही आवश्यक है क्योंकि मनुष्य जीवन की ही सर्वश्रेष्ठ और उत्तरदायी अभिव्यक्ति है। जिस तरह समाज में मनुष्य का केन्द्रीय महत्त्व है उसी तरह पूरे ब्रह्माण्ड में जीवन का केन्द्रीय महत्त्व है। इस प्रकार आचार्य पाश्चात्य मनुष्य-केन्द्रित न*ारिये का प्रतिवाद करते हुए मनुष्येतर जीवन-जगत् के प्रति उनके उपयोगितावादी दृष्टिकोण को अनैतिक ठहराते हैं।
यहीं आचार्य इधर के पर्यावरणवादियों से सैद्धान्तिक रूप से भिन्न और विशिष्ट न*ार आते हैं। निसर्ग से एकात्मक सम्बन्ध का यह आयाम अपने उत्स में एक ही स्रोत है सम्बद्ध है। दर्शन का मूल प्रश्न मैं कौन हूँ या फिर कि मैं क्यों हूँ’ निसर्ग की सापेक्षता में ही अर्थ पाता है। इसी का गुणात्मक विस्तार सौन्दर्य बोध है। मनुष्य के इर्द-गिर्द का परिवेश और प्रकृति उसके सौन्दर्य बोध की रचना ही नहीं करती बल्कि उसी के लिए यह बोध प्रतिश्रुत भी होता है।
आचार्य इसे भारतीय दृष्टि की विशेषता मानते हैं जिसे गांधी जी ने हिन्द स्वराज में पाश्चात्य सभ्यता की समीक्षा के लिए सैद्धान्तिक रूपरेखा की तरह प्रयुक्त किया। इसी क्रम में वे कह सके कि पृथ्वी बहुत विपुल है जो सभी को सभी कुछ दे सकती है लेकिन यह लालचियों की तृष्णा को संतुष्ट नहीं कर सकती। तो भी यह प्रश्न तो उठता ही है कि क्या पूरा पश्चिम एक ही तरह सोचता था? क्या वहां इसके अपवाद नहीं हैं? अन्यथा सौन्दर्यंशास्त्र में फिर क्यों कर इतना साम्य है?
अहिंसा ः जीवन-संहिता के रूप में
आचार्य के लिए अहिंसा का मानव जीवन में केन्द्रीय महत्त्व है। अहिंसा को वे लगभग जीवन-संहिता की तरह व्याख्यायित करते हैं। उनके अनुसार हिंसा स्व के संकुचन से पैदा होती है जबकि अंहिसा का तात्पर्य है स्व की सार्वभौमिक व्याप्ति। भारतीय परम्परा में स्व की पहचान को ही जीवन का प्रयोजन माना गया है। लेकिन इस स्व या अस्मिता के कई वृत्त हैं जिनका विस्तार अपनी देह से लेकर अनन्त सृष्टि तक है। मैं एक नाम से जानी जा रही देह हूँ, मैं एक परिवार हूँ, मैं एक जाति हूँ, मैं एक अध्यापक, मजदूर, व्यापारी या कुछ और हूँ, मैं एक विशेष सम्प्रदाय का अनुयायी या दल विशेष का कार्यकर्ता हूँ, मैं एक प्रदेश विशेष या राष्ट्र विशेष का निवासी हूँ, आदि सभी मान्यताएं अस्मिता के छोटे-बडे घेरे हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि के साथ मेरे एकत्व की धारणा तक फैलते हैं। सभी सामाजिक असमानताएं, विद्वेष और तनाव अपनी अस्मिता के एक घेरे को अंतिम मान लेना है। अनन्त सृष्टि के साथ एकता का अनुभव करते हुए भी मैं देह तो रहता हूँ, लेकिन तब देह मेरी अस्मिता के उन्नयन का साधन बनती है जबकि केवल देह होना मेरी अस्मिता की वास्तविक संभावनाओं का दमन करना है। आज जिस सामाजिक व्यवस्था में हम जी रहे हैं वह स्पष्टतया एक विकृत व्यवस्था है क्योंकि वह हमें किसी-न-किसी छोटे घेरे में बांधने का प्रयास करती है- वह घेरा जाति, उपजाति का भी हो सकता है और सम्प्रदाय, दल, प्रदेश या राष्ट्र का भी। तब ये घेरे ‘स्व’ के विस्तार के माध्यम नहीं बल्कि उसके संकुचन के साधन बन जाते हैं जो अनिवार्यतया हिंसा पैदा करते हैं।
आचार्य के अनुसार जाति, नस्ल, वर्ग, राष्ट्र, धर्म के आधार पर अपने को श्रेष्ठ समझना और दूसरे पक्ष से सम्बन्धित व्यक्ति को अपने से ओछा या नीचा समझना हिंसा का ही सूक्ष्म रूप है। इसलिए दैहिक बल प्रयोग नहीं, राजनीतिक दमन, आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीडन भी हिंसा की विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं। इस तर्क के आधार पर जाति, नस्ल, सम्प्रदाय, राष्ट्र आदि की अन्य से श्रेष्ठता की भावना भी कहीं गहरे में हिंसा की वृत्ति से प्रेरित और उसे ही पुष्ट करने वाली भावना है।
आचार्य की मान्यता है कि लोकतंत्र, समाजवाद और अन्तरराष्ट्रीयता या वैश्विकता की धारणाएं बुनियादी रूप में एक दूसरे से जुडी धारणाएं हैं क्योंकि इन सब का मूल उत्स अहिंसा की वह विधायी प्रवृत्ति है जो मनुष्य के वास्तविक अर्थों में मनुष्य हो सकने का मूल आधार है।
अहिंसा को एक जीवन दृष्टि और जीवन जीने की पद्धति के रूप में देखने के आचार्य जी के लिए खास मायने हैं। वे पश्चिम में आर्थिकी के विकास और उसके जीवन शैली पर प्रभाव के संदर्भ में उभरी शास्त्रीय बहसों का इसी संदर्भ में विवेचन करते हैं। इनमें कींथ और एडम स्मिथ के बरक्स ल्योतार, हबर्ट माक्यूज और शुमाकर की बहसें हैं। एल्फ्रेड मार्शल के विपरीत इवान इलिच है। विराटता के समानान्तर ‘स्माल इज ब्यूटीफुल’ की प्रस्तुत की गयी धारणाएं हैं। खुद पश्चिम में वर्चस्वशाली आर्थिक-सांस्कृतिक धारा की एक प्रतिधारा वैचारिक रूप से सत्रि*य रही है। हम देख सकते हैं कि आर्थिक उदारवाद के साथ-साथ दुनिया में समूहों की हिंसा भी बढती गयी है।
विवाह और यौन-सम्बन्ध
विवाह की पद्धति और यौन-सम्बन्ध संस्कृति के खुलेपन या संकीर्णता के सूचक रहे हैं। आचार्य इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि पारम्परिक समाजों में ही नहीं, अपने को आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष मानने वाले समाजों में भी यौन आचरण को अधिकांशतः रूढिबद्ध नैतिकता- जिसका आधार साम्प्रदायिक मान्यताएं ही रही हैं- की ही कसौटी पर परखा जाता है।
इस संदर्भ में आचार्य की धारणा है, पशु जीवन और मानव जीवन में एक बुनियादी और गुणात्मक फर्क यह है और यही उसे श्रेष्ठ दर्जा देता और मानव बनाता है कि मानव जीवन केवल आवेगों से संचालित नहीं है बल्कि आवेगों को सिर्फ स्नायविक और जैविक स्तर से ऊपर उठाता है और उन्हें एक सृजनशील चेतना और मूल्य बोध से अनुप्राणिता करता है। इसी प्रक्रिया का नाम संस्कृति है। वे उल्लेख करते हैं कि परिवार का आधार विवाह संस्था रही है। पारम्परिक समाजों में विवाह को दो व्यक्तियों के बीच का निजी मसला न मानकर सदैव एक सामाजिक संस्था के रूप में देखा जाता रहा है और इसीलिए पहले धर्म और फिर राज्य द्वारा वैवाहिक सम्बन्धों को लेकर समय-समय पर कानून बनाये जाते रहे हैं। आधुनिक राज्य भी, चाहे उसका स्वरूप किसी भी प्रकार का हो, इसीलिए विवाह संस्था को अपने कानूनी क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत समझता है।
वैवाहिक सम्बन्ध की प्रकृति का विवेचन करते हुए उनका कहना है कि यौनेच्छा की पूर्ति विवाह का मुख्य आधार है। साथ ही अपेक्षा करते हैं कि मनुष्य को आवेगों में भी सौंदर्य-बोध और मूल्य-बोध तलाश करना चाहिए। वे बच्चों को यौन-त्रि*या का सर्जनात्मक जैविक प्रतिफलन मानते हैं। विवाह का अर्थ दो व्यक्तियों का निरन्तर साथ है जो तभी संभव है जब उनकी रुचियों, स्वभाव और जीवन शैली में कुछ बुनियादी सहमति हो। लेकिन दोनों में से किसी एक का या दोनों का यौन-सम्फ किन्हीं परिस्थितियों में किसी अन्य से हो गया है, इस आधार पर निरन्तर सहयोग और भावात्मक लगाव की बात को भुलाकर अलग हो जाना उचित नहीं कहा जा सकता ।
आचार्य मानते हैं, मनुष्य को यह भी देखना होगा कि उस का यौन आचरण केवल स्नायविक तनाव का शमन या जैविक आवश्यकता की ही पूर्ति पर न अटक जाये बल्कि उसके व्यक्तित्व का सृजनात्मक विकास भी करे। यौन-सम्बन्धों को केवल आवेग के शमन या दैहिक आकर्षण तक सीमित कर देना मानवत्व की अवमानना है। यौन-सम्बन्ध दो स्वतंत्र व्यक्तियों के मिलन की, ऐसे मिलन की जिसमें दोनों व्यक्तित्व और भी सम्पन्न होते हैं- प्रक्रिया और अभिव्यक्ति हैं। इसलिए यह मूलतः सृजनात्मक सम्बन्ध है।
विवाह सम्बन्धी कानूनों की प्रासंगिकता का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं कि उस समय समाज का ढांचा मूलतः पुरुष-प्रधान था और उसमें स्त्री के अधिकारों की रक्षा आवश्यक थी। लेकिन मौजूदा स्थिति में विवाह और यौन-सम्बन्धों की अन्योन्याश्रितता पर पुनर्विचार करना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, वे यह भी कहते हैं कि विवाहेतर यौन-सम्बन्धों पर विचार करते समय हमें नैतिक रूढियों के आधार पर नहीं बल्कि मानवीय चेतना और सृजनात्मकता की भावना के विकास को आधार बना कर विचार करना चाहिए क्योंकि नैतिक-अनैतिक की वास्तविक कसौटी भी वही है।
आचार्य के अनुसार किसी भी प्रकार की वेश्यावृत्ति और बलात्कार अनैतिक हैं तो इसलिए कि उनमें गैर-सर्जनात्मक विवशता, पाशविकता और मानवत्व की अवमानना है। जिस प्रकार आर्थिक क्षेत्र में किसी की विवशता का लाभ उठाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति करना शोषण है, उसी प्रकार किसी की आर्थिक विवशता, सामाजिक दीनता या दैहिक कमजोरी का लाभ उठाकर यौनतुष्टि करना भी दमन है, शोषण है और इसीलिए अनैतिक है, अपराध है, पशुता है और मानसिक विकृति है।
आचार्य आगे कहते हैं, काम लोलुपता की अबाध स्वीकृति जहां विकृत मनोवृति और पाशविकता की स्वीकृति है, वहीं यौन आकर्षण की अनिवार्यता विवाह की परिधि में बन्द कर देना भी एक आवश्यक सृजनात्मक मानवीय त्रि*या की सहज जीवन्तता को समाप्त कर उसे एक ऐसी आत्माहीन जैविक प्रक्रिया मात्र में निशेष कर देना है जो मानव के सृजनात्मक विकास में कम से कम कोई सकारात्मक भूमिका तो नहीं निभाती। इसलिए दो व्यक्तियों के बीच यौन-सम्बन्धों का औचित्य विवाह में नहीं बल्कि इस बात में ही देखना चाहिए कि वे किस सीमा तक दोनों व्यक्तित्वों के सृजनात्मक विकास को गति प्रदान करते हैं।
मनुष्य सम्बन्धों और इनसे मूल्य-संरचना में उत्पन्न झंझावातों का सबसे बेहतर प्रतिबिम्बन कला और साहित्य में मिलता है। कलाओं ने ही पारंपरिक व प्रचलित परंपराओं और नैतिकी को प्रश्नित किया है। अनेक बार इन पर गंभीर विवाद उत्पन्न हुए हैं। अन्ततः इन्हें सौन्दर्यशास्त्रीय और मानवीय इयत्ता से जुडे पहलुओं के लिहाज से विवेचित-विश्लेषित किया गया है। अन्ततः इनमें मानवीय सम्बन्ध; इनके साहचर्य की गहराई या द्वन्द्व और टकराहटें ही समझी जाती हैं कि ये कहां हमें समृद्ध या विपन्न बनाती हैं।
संस्कृति - एक सार्वभौम प्रक्रिया
संस्कृति को लेकर आचार्य की मूल प्रस्थापना है कि यह एक मूल्यगत प्रक्रिया है और सार्वभौम तथा सनातन है। इस प्रक्रिया का बुनियादी प्रयोजन और लक्ष्य एक ही है। आचार्य इस प्रश्न का परीक्षण करते हैं कि हम संस्कृति को सदैव कालबद्ध या देशबद्ध कर क्यों देखते हैं? संस्कृति मूल्य-दृष्टि है तो वह सार्वभौम है और तब उसे देश-प्रदेश की सीमाओं में बांटकर देखना बुनियादी रूप से गलत है। यदि उसके बाह्य स्वरूप में कोई परिवर्तन दिखायी भी देते हैं तो वे संदर्भगत परिवर्तन हैं जिनसे मूल आधार पर कोई असर नहीं पडना चाहिए। यह कहा जाता है कि देशकाल के अनुसार मूल्य बदलते रहते हैं अतः विभिन्न देश-प्रदेशों की संस्कृति का एक-दूसरे से अलग होना स्वाभाविक है। लेकिन समय और संदर्भ के अनुसार मूल्यों के स्वरूप में तो परिवर्तन हो सकता है, होता है, लेकिन मूल्यों की मूल प्रकृति नहीं बदलती। इसमें आचार्य यह भी जोडते हैं कि मूल्य दृष्टि को निर्देशित करने वाला तत्त्व अब शास्त्र या धर्म नहीं बल्कि मनुष्य का अपना विवेक हो गया है। यह विवेक सार्वभौम है, किसी भौगोलिक सीमा या राजनीतिक नागरिकता से बद्ध नहीं है।
इस प्रसंग में वे आगे कहते हैं ः संस्कृति को अक्सर किसी भाषा या धर्म-सम्प्रदाय या देश के साथ जोडकर देखा जाता रहा है- यथा बंगला संस्कृति, हिन्दू संस्कृति, मुस्लिम संस्कृति, ईसाई संस्कृति, भारतीय संस्कृति, फ्रेंच संस्कृति आदि। लेकिन ऐसा विभाजन यदि एक मूलभूत संस्कृति के संदर्भगत और परिवेशगत विभिन्न स्वरूपों को समझने के लिए किया जाय तो कुछ सीमा तक उसकी अपनी उपादेयता भी है लेकिन इस विभाजन को आत्यंतिक मानकर इसे ही विभिन्न समाजों या व्यक्तियों के सांस्कृतिक आचरण की एकमात्र कसौटी बना लेना क्या एक सांस्कृतिक पाखंड, को विकसित होने देना नहीं है?

आचार्य *ाोर देकर कहते हैं, यदि संस्कृति की बात पूरी मानव जाति के संदर्भ में नहीं की जाती है और हमारा ध्यान स्वरूपगत भिन्नताओं के कारण अलगाव को पुष्ट करते रहने की बजाय प्रकृतिगत बुनियादी एकता को पुष्ट करने की ओर नहीं जाता है तो यह सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक विसंगति की ओर से आँखें मूँदना होगा जिसके परिणाम पूरी मानव जाति को, और इसलिए हमें भी, भुगतने होंगे।
इस ऐतिहासिक विसंगति से बचने के लिए हमें सांस्कृतिक बहुलवाद की धारणा की पुनर्व्याख्या करनी होगी, यद्यपि सांस्कृतिक बहुलवाद को लेकर भी कई मतान्तर और बहसें हैं। यह निर्विवाद है कि यह संस्कृतियों के बीच अन्तत्रि*र्या और संवाद का ऐतिहासिक दौर है। इसके चलते स्वतंत्रता, समता और सृजनशीलता के वैयक्तिक सामाजिक मूल्य संस्कृतियों के बीच सम्बन्धों पर भी तो प्रयुक्त होंगे। तब कोई संस्कृति कथित रूप से भले कितनी ही उन्नत हो, अगर किसी लघु संस्कृति को दबाती है तो उसका प्रतिकार ही करना होगा। संस्कृतियों की अपनी स्वायत्तता है जिनके बिना समूहों की स्वतंत्रता की कल्पना ही नहीं की जा सकती। विश्व के भाषा सर्वेक्षणों में हम पाते हैं कि अनेक भाषाएं लुप्त हो रहीं हैं या विलुप्ति के कगार पर हैं। यह विश्व की मानव सभ्यता की एक विराट् सांस्कृतिक क्षति है, किसी समूह विशेष का भाषा खो देने का सवाल भर नहीं है।
संस्कृति-विमर्श के परिदृश्य को लेकर आचार्य इस सीमा को उजागर करते हैं कि संस्कृति के नाम पर उपकरणों की चर्चा तो की जाती है लेकिन उसके मूल तत्त्वों पर विचार नहीं किया जाता। जबकि तात्त्विक और अभिव्यक्ति स्तर पर संस्कृति के मूल आधार का ज्ञान ही संस्कृति का वास्तविक ज्ञान है। उन्होंने इस विडम्बना पर भी चिन्ता व्यक्त की है कि संस्कृति को अधिकांशतः एक ऐतिहासिक वस्तु माना जाता है।
आचार्य यहां एक गंभीर मुद्दा उठाते हैं ः यदि किसी समाज में कला और साहित्य को पर्याप्त आर्थिक संरक्षण प्राप्त है लेकिन अपने आचरण में वह समाज एक शोषक, आततायी और हिंसक समाज है तो क्या उसे सांस्कृतिक दृष्टि से भी अविकसित कहा जा सकता है जबकि कला और साहित्य को वहां श्लाघनीय सुविधाएं और सम्मान प्राप्त हैं? क्या कला और साहित्य को पुरस्कृत करने वाला वह व्यक्ति भी एक सांस्कृतिक व्यक्ति है जिसकी सारी सम्पन्नता अपने से इतर के शोषण और दमन पर टिकी है। आचार्य की राय में कला और साहित्य सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति के उपकरण हैं और उपकरणों का सम्मान तब तक संस्कृति का सम्मान नहीं माना जा सकता जब तक कला और साहित्य में अभिव्यक्त हो रही मूल्य चेतना का भी व्यावहारिक स्तर पर सम्मान न हो। इसके बिना भी यदि समाज में कला और साहित्य के प्रति सम्मान का भाव प्रदर्शित किया जाता है- जैसा कि आजकल बहुधा किया जाता है तो यही मानना होगा कि वह समाज एक सांस्कृतिक पाखंड का शिकार है।
आचार्य ने यह एक ऐसा मापदण्ड प्रस्तुत किया है जिसके आधार पर हम स्थानीय और वृहद्, सूक्ष्म और व्यापक स्तर पर अपने सांस्कृतिक जीवन की विसंगति और विडम्बनाओं को बखूबी चीन्ह सकते हैं।
शिक्षा एक सांस्कृतिक प्रक्रिया
आचार्य शिक्षा की प्रक्रिया को मूलतः एक सांस्कृतिक प्रक्रिया मानते हैं क्योंकि उसका उद्देश्य संस्कृति का नैरन्तर्य और उसका परिष्करण एवं परिवर्द्धन है। एनसाईक्लोपीडिया ऑफ सोशल साईंसेज में शिक्षा की परिभाषा को वे उद्धृत करते हैं, जिसमें शिक्षा को बालक के संस्कृति में प्रवेश की प्रक्रिया कहा गया है। इसलिए शिक्षा के उद्देश्य और उसकी पूर्ति के लिए उचित प्रक्रिया का निर्धारण करते समय आचार्य यह ध्यान रखना जरूरी मानते हैं कि उसका अन्तः सूत्र सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया से जुडे।
चूंकि संस्कृति मानवीय चेतना और व्यवहार का गुणात्मक उत्कर्ष है इसलिए शिक्षा की वही प्रक्रिया सही और सार्थक मानी जा सकती है जो मानवीय सृजनात्मक विकास में सहायक हो।
शिक्षा के बारे में प्रचलित मान्यता का उल्लेख करते हुए आचार्य कहते हैं, अधिकांशतः शिक्षा को एक ऐसी प्रक्रिया माना गया है जिसके द्वारा व्यक्ति को परिवेश के अनुकूल होने या उस पर नियंत्रण करने के लिए तैयार किया जाता है। उससे आशा की जाती है कि वह सामाजिक परिवेश के अनुकूल हो और प्राकृतिक परिवेश पर नियंत्रण रख सके। इस मान्यता से घोर असहमति व्यक्त करते हुए आचार्य कहते हैं कि अनुकूलन और नियंत्रण दोनों ही किसी न किसी स्तर पर अलोकतांत्रिक और इसलिए उस सीमा तक मानव विरोधी प्रवृत्तियां हैं। किसी सीमा तक अनुकूलन या नियंत्रण यदि आवश्यक हो- यदि इसके सीमा निर्धारण का सवाल बहुत टेढा है- तो भी यह देखते रहना जरूरी होगा कि इनके पीछे कौन सी प्रवत्ति काम कर रही है। यदि शिक्षा व्यक्ति में एक प्रवृत्ति के रूप म अनुकूलन और नियंत्रण की भावना का विकास करती है तो निश्चय ही सारे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को देने वाली होने पर भी उसे मानवीय सृजनशीलता के विकास को कुंठित करने वाली ही मानना होगा। वे तर्क देते हैं, यदि सामाजिक मान्यताओं और स्थापित रीतियों के प्रति व्यक्ति का अनुकूलन हर परिस्थिति में सही ही होता तब तो मानवीय चेतना का कोई विकास संभव ही नहीं हुआ होता और किसी तरह के मौलिक अनुसंधान की प्रेरणा समाप्त हो गयी होती।
आचार्य के अनुसार शिक्षा प्रक्रिया का बुनियादी प्रयोजन यही हो सकता है कि वह व्यक्ति की अन्तर्निहित सृजनशीलता को अभिव्यक्त होने की प्रेरणा दे और इसके लिए आवश्यक गुणों का व्यक्ति में मानसिक और व्यावहारिक स्तर पर विकास करे। वे यहां तक कहते हैं कि शिक्षा यदि सामान्य मनुष्य की इस सृजनात्मकता की भावना को नहीं बचाती है तो वह मनुष्य को भी नहीं बचा पायेगी।
शिक्षा को आजीविका से जोडने की संकीर्ण प्रवृत्ति पर आचार्य प्रश्न करते हैं, क्या शिक्षा का प्रयोजन किसी विषय की जानकारी दे देना या किसी तकनीकी अथवा व्यवसाय में दक्षता पैदा करने तक ही सीमित है? शिक्षा यदि संस्कृति में प्रवेश की - व्यक्ति के संस्कृतिकरण की प्रक्रिया है तो उसका क्षेत्र सिफ र् उपयोगी जानकारी देने तक ही सीमित नहीं समझा जा सकता। संस्कृति ज्ञान के स्तर पर मूल्यबोध और आचरण के स्तर पर मूल्यनिष्ठा की सहज प्रक्रिया है। जीवन में मूल्यबोध और मूल्यनिष्ठा की यह सहजता विकसित करना ही शिक्षा का प्राथमिक प्रयोजन होना चाहिए। जीवन को जी सकने के लिए आवश्यक साधन जुटाने की क्षमता के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि वह जीवन जीने के योग्य भी हो। मूल्य बोध से रहित जीवन पशु स्तर का जीवन है, अतः शिक्षा- जो एक मानवीय प्रक्रिया है- अपना वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा कर सकती है जब वह शिक्षार्थी को मानवीय मूल्यों और संवेदना से अनुप्राणित कर सके। उनका कहना है कि जानकारी या दक्षता संस्कृति का सृजन नहीं करती यद्यपि उसके विकास में वे सहायक उपकरण जरूर हो सकती हैं। इसका सीधा तात्पर्य यही है कि केवल जानकारी या दक्षता देना शिक्षा के वास्तविक प्रयोजन की अवहेलना करना है।
आचार्य शिक्षा के संदर्भ में एक और आशंका व्यक्त करते हैं। यह सर्वमान्य है कि शिक्षा की प्रक्रिया और उसके माध्यम से सम्प्रेषित होने वाले मूल्यों का निर्धारण सम्बन्धित जाति, वर्ण, समाज या राष्ट्र के अपने हितों या प्रवृत्तियों के अनुकूल होता है। इसलिए इस बात का बहुत खतरा रहता है कि मूल्यबोध के नाम पर शिक्षा के माध्यम से कोई व्यक्ति, संस्था, वर्ग या राष्ट्र शिक्षार्थी का अनुकूलन करने लगे। इसलिए शिक्षा की सही प्रक्रिया वही हो सकती है जो शिक्षार्थी को किन्हीं मूल्यों को सम्प्रेषित करने की बजाय उसे इस योग्य बना दे कि वह मूल्यों की परख और तदनुकूल उनका अपने लिए वरण कर सके। आचार्य की राय में, शिक्षा की सार्थकता की एक कसौटी यह भी होनी चाहिए- खासतौर पर आधुनिक समाजों में- कि वह किस हद तक शिक्षार्थी को अनुशासित होन के साथ-साथ विद्रोही भी बनाती है।
आचार्य के अनुसार शिक्षा की वास्तविक सार्थकता इसमें है कि वह न केवल शिक्षार्थी के मूल्यबोध और उसके अनुकूल आचरण करने की प्रवृत्ति को पुष्ट करे बल्कि अन्याय और असत्य के विरुद्ध असहयोग और संघर्ष की प्रवृत्ति का विकास भी करे। अन्याय और उसके विरुद्ध संघर्ष ही व्यक्ति के मूल्यगत आचरण की वास्तविक कसौटी है, अतः यदि शिक्षा प्रक्रिया इस आचरण को पुष्ट नहीं करती है तो वह अपने वास्तविक उद्देश्य में असफल ही कही जायेगी।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आचार्य शिक्षा प्रक्रिया का ही नहीं शिक्षा-व्यवस्था का भी स्वायत्त होना आवश्यक मानते हैं। उनके अनुसार जहां यह आवश्यक है कि शिक्षार्थी की सीखने की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाये वहीं यह भी उतना ही आवश्यक है कि इस प्रक्रिया और इसकी प्रबन्धक व्यवस्था को राज्य, पूंजी, सम्प्रदाय आदि सत्ता के विभिन्न प्रकारों से भी अलग रखा जाये।
अन्यत्र आचार्य लिखते हैं, शिक्षा के माध्यम से हम अधिकांशतः अपने पूर्वग्रहों और मान्यताओं को नयी पीढी तक सम्प्रेषित करना चाहते रहे हैं। शिक्षा को जीवन के समग्र विकास के उपकरण की तरह ग्रहण करने की बजाय अपनी दृष्टि को समाज पर आरोपित करने का उपकरण बनाना चाहने लगते हैं। इसे उन्होंने अधिनायकवादी प्रवृत्ति कहा है। बहुत से शिक्षाशास्त्री और सांस्कृतिक विचारक यदि शिक्षा और संस्कृति को किसी एक ही संस्था पर - चाहे वह राज्य हो या धर्म या बाजार-निर्भर कर देने को अनुचित मानते हैं तो इसका एक प्रमुख कारण यही होता है कि वे इसको किसी एक दृष्टिकोण या वर्ग के आग्रहों का माध्यम नहीं बनने देना चाहते क्योंकि वे मानवीय चेतना के विकास की संभावनाओं के रूपायन पर किसी तरह का एकांगी दबाव डाल कर उसे विकृत नहीं करना चाहते। आचार्य का कथन है, शिक्षा समाज का वैसा ही निर्माण करती है जैसा समाज शिक्षा का निर्माण करता है। शिक्षा और मीडिया भी अन्ततः संस्कृति के घटक ही हैं जो अपने में संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं और सांस्कृतिक पुनरुत्पादन भी।
संस्कृति और मीडिया
आधुनिक प्रौद्योगिकी के बारे में आचार्य का दृढ मत है कि यह केन्द्रीकरण और एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों को जन्म देती है। इसके प्रभाव सभी सामाजिक रिश्तों और सांस्कृतिक प्रक्रिया अर्थात् मानवीय चेतना के विकास पर भी स्पष्ट पडने लगते हैं, और जैसाकि *ााहिर है, ये प्रभाव हमेशा वांछनीय या काम के नहीं होते ।
मीडिया की प्रभाविता का विश्लेषण करते हुए आचार्य लिखते हैं, सम्प्रेषण प्रक्रिया में निहित आत्मीयता का स्थान एक ठंडी तटस्थता लेती जा रही है, जिसका असर मानवीय चेतना के संवेदन-पक्ष पर भी देखा जा सकता है। मीडिया की केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति उसे अपने तात्कालिक और स्थानीय परिवेश से काट देती है। यह बडी आसानी से देखा जा सकता है कि जो व्यक्ति या समाज जितने बडे प्रसार साधन का उपभोक्ता होता है, वह स्थानीय परिवेश और समस्याओं के साथ उतना ही कम जीवन्त रिश्ता रख पाता है।
इसी क्रम में वे आगे कहते हैं, सांस्कृतिक विकास का सृजनात्मक पक्ष भी इस प्रौद्योगिकी के दूषित प्रभावों या विकारों से मुक्त नहीं है। कोई भी समाज सही मायनों में सांस्कृतिक तभी होता है जब वह अपने सामान्य दैनन्दिन जीवन में भी अपनी संस्कृति से रचनात्मक स्तर पर जुडता है- उसके बिना सांस्कृतिक आदर्शों की सैद्धान्तिक मान्यता या सम्मान उस समाज की आकांक्षाओं का तो परिचय देते हैं, लेकिन उन आकांक्षाओं और वास्तविक जीवन की दूरी या भेद अनिवार्यतः एक सांस्कृतिक द्विभाजन को जन्म देता है। कला और साहित्य सांस्कृतिक चेतना का रचनात्मक अनुभूति पक्ष है। लेकिन यह पक्ष पूर्णरूपेण सार्थक और विकसित तभी माना जा सकता है जब यह रचनात्मक अनुभूति कुछ व्यक्तियों या विशेषज्ञों तक सीमित न रहकर समग्र समाज में हर स्तर पर व्याप जाये । प्रसार साधनों की प्रौद्योगिकी मिश्रित और केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति ने इन सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के साथ हमारा रिश्ता रचनात्मक नहीं रहने दिया है। कलाएं और साहित्य धीरे-धीरे विशेषज्ञों की सम्पत्ति बनते जा रहे हैं।
हम न केवल स्थानीय प्रतिभाओं की अवहेलना करने लगे हैं, बल्कि निजी स्तर पर इस प्रकार की सर्जनात्मक अनुभूति के मार्ग भी हमारे लिए रुद्ध होने लगे हैं। मीडिया के माध्यम से बडी उपलब्धियों का हम पर छाया हुआ सांस्कृतिक आतंक इसका कारण है।
आचार्य एक सटीक तर्क प्रस्तुत करते हैं, दस-बीस अच्छे वैज्ञानिक पैदा करने से या आधुनिक उपकरणों के प्रयोग से ही कोई समाज वैज्ञानिक प्रवृत्ति का समाज नहीं कहला सकता। इसके लिए पूरे समाज के आचरण में अन्धविश्वासों का निराकरण और विवेकमूलक चिन्तन पद्धति का प्रतिबिम्बन होना आवश्यक है। वैज्ञानिकता के साथ किसी समाज का यही रचनात्मक रिश्ता हो सकता है। इसी भांति एक सांस्कृतिक समाज के लिए आवश्यक है कि समाज में हर स्तर पर कला और साहित्य के प्रति एक रचनात्मक लगाव हो। इसके लिए आचार्य जी पुनः सरल तकनीक और विकेन्द्रीकृत व्यवस्था का उपाय सुझाते हैं।
सारांशतः आचार्य का संस्कृति-चिंतन समकालीन जीवन के पराश को समग्रता में आवेष्टित करता है और उसकी तत्त्व-मीमांसा प्रस्तुत करता है। यह प्रकार्य इसीलिए भी और मूल्यवान हो जाता है कि इसने अकादमिक जडता और हदबंदी को अतिक्रमित कर संस्कृति-चिंतन को एक सहज प्रवाह और खुलापन दिया है जो अपनी प्रकृति में संवादधर्मी अर्थात् समावेशकारी है।