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गांधी की दिल्ली

कुमार प्रशांत
दिल्ली भी अजीब है! यह देश की राजधानी है लेकिन देश यहां कहीं नजर नहीं आता है। यह रोज-रोज देश से बेगाना होता जा रहा शहर है। हर महानगर का कुछ ऐसा ही हाल है लेकिन दिल्ली तो कोई वैसा महानगर नहीं है। देश की राजधानी है। मतलब एक ऐसा आईना होना चाहिए इसे जिसमें देश खुद को देख सके। लेकिन दिल्ली के हुक्मरान रात-दिन इसी जुगत में लगे रहते हैं कि दिल्ली का चेहरा देश से कितना अलग बना दिया जाए! हवा में चर्चा, और चर्चा तेज है कि हमारी संसद छोटी पडती जा रही है और हमें दिल्ली की शान के अनुकूल एक नई व आधुनिक संसद चाहिए! हम भी पता नहीं कब से कहते रहे हैं कि हमारी संसद छोटी पडती जा रही है लेकिन संसद के छोटे होने से हमारा मतलब इसके बौनेपन से हुआ करता था, इसके रूप-स्वरूप से नहीं ! अब तो फिक्र संसद के बौनेपन की है ही नहीं, सारी फिक्र उसकी बाहरी आभा को चमकाने की है। हवा में यह भी चर्चा है कि नॉर्थ और साउथ ब्लोक की अद्भुत स्थापत्य वाली इमारतें, वहां का वह ऐतिहासिक लैंडस्केप सब बदला जाएगा, क्योंकि यह सारा कुछ भूकम्प के खतरों को ध्यान में रख कर नहीं बनाया गया है। यह भूकम्प आए इससे पहले हम याद कर लें कि कितने साल पहले लुटियन की यह दिल्ली बनी थी? उतने सालों में कितने ही भूकम्प इन इमारतों ने पार कर लिए। ये इमारतें हमारे राजनीतिक-सामाजिक जीवन में आए भूकंपों का तो प्रतीक है।
मुझे तो बहुत भद्दा लगता है कि इंडिया गेट के पास की सारी खुली जगहें बंद होती जा रही हैं। हरियाली खत्म हो रही है। वहां के विस्तार का, खुलेपन का, हरियाली का दम घोंट कर कोई युद्ध-स्मारक या वार मेमोरियल बनाया गया है। क्या पूरा इंडिया गेट और वहां का सारा विस्तार युद्ध-शहीदों की स्मृति में ही खडा हुआ नहीं है? अमर जवान ज्योति और पत्थरों पर दर्ज शहीदों के नाम, उलटी राइफल पर टिकी शहीद की फौजी टोप- सब हमें बांधते भी हैं, गहरे कहीं छूते भी हैं। फिर यह अलग से वार मेमोरियल क्या हुआ? क्यों हुआ? आपने कभी सोचा है कि देश की राजधानी दिल्ली में कहीं एक जगह भी ऐसी है नहीं कि जहां पीस मेमोरियल हो। गांधी की शांति-अहिंसा-सिविल नाफरमानी की उस जंग में अनजान जगहों पर, अनजान और अनाम लोगों ने ऐसे-ऐसे करतब किए हैं साहस के, विवेक के, संगठन के और अहिंसक प्रतिबद्धता के कि सहसा विश्वास न हो। मैं महात्मा गांधी की बात नहीं कर रहा हूं, उन्हें महात्मा मान कर चलने वाले करोडों अनाम-अनजान लोगों की बात कर रहा हूं। इनका इतिहास कहीं दर्ज हो, स्कूल-कॉलेज के युवा, देश भर से दिल्ली घूमने आए लोग उसे देखें-समझें तो देश का भविष्य एक नई दिशा ले सकता है। लेकिन शासन का मन और उसका ध्यान तो कहीं और ही है।
कभी गहरी पीडा और तीखे मन से जयप्रकाश नारायण ने कहा था ः ‘दिल्ली एक नहीं कई अर्थों में बापू की समाधि-स्थली है!’ आइए, हम देखें कि यह समाधि कहां है और कैसे बनी है। एक तो यही कि गांधी की हत्या इसी दिल्ली में हुई थी। लेकिन कहानी 30 जनवरी 1948 के पहले से शुरू होती है।
यही दिल्ली थी कि जहां प्रार्थना करते गांधी पर, 20 जनवरी 1948 को बम फेंका गया था लेकिन वह बम उनका काम तमाम नहीं कर सका। हत्या-गैंग के मदनलाल पहवा का निशाना चूक गया। उसका फेंका बम गांधीजी तक पहुंच नहीं पाया। गांधी की हत्या की यह पांचवीं कोशिश थी। गांधी इन सबसे अनजान नहीं थे। उन्हें पता था कि उनकी हत्या की कोशिशें चल रही हैं, कि उनके प्रति कई स्तरों पर गुस्सा-क्षोभ-शिकायत का भाव घनीभूत होता जा रहा है। लेकिन वह दौर था कि जब इतिहास की आंधी इतनी तेज चल रही थी कि हमारी नवजात आजादी उसमें सूखे पत्तों-सी उड जाएगी, ऐसा खतरा सामने था। इसकी फिक्र में जवाहरलाल, सरदार और पूरी सरकार ही रतजगा कर रही थी। गांधी भी अपना सारा बल लगा कर इतिहास की दिशा मोडने में लगे थे और यहां भी वे सेनापति की अपनी चिर-परिचित भूमिका में थे।
ऐसे में ही आई थी 29 जनवरी 1948! नई दिल्ली का बिरला भवन! सब तरफ लोग-ही-लोग थे। थके-पिटे-लुटे और निराश्रित!! दिल्ली तब संसार की सबसे बडी शरणार्थी नगरी बन गई थी। बापू जब दिल्ली आए तो सरदार ने बताया उन्हें कि वे जिस हरिजन कॉलोनी में रहते रहे हैं, वह शरणार्थियों से भरी पडी है। वे वहीं रहने का आग्रह करेंगे तो शरणार्थियों को हटाना पडेगा, सुरक्षा का संकट भी खडा होगा। हरिजन कॉलोनी से निराश्रितों को फिर निराश्रित करने की कल्पना से ही बापू परेशान हो गये इसलिए उन्हें बिडलाजी के इस शानदार भवन में लाया गया। बापू ने उसके एक कोने में अपना निवास बनाया- लेकिन लोगों ने भी वहीं अपना आश्रय खोज लिया। इतने लोग यहां क्यों हैं? क्या पाने आए हैं? क्या मिल रहा है यहां?- ऐसे सारे ही सवाल यहां बेमानी हैं- कोई किसी से ऐसा कोई सवाल पूछ नहीं रहा है! बस, सभी इतना जानते हैं कि यहां कोई है कि जो खुद से ज्यादा उनकी फिक्र करता है! - आजाद भारत की पहली सरकार के सारे सरदार भी यहां, इन्हीं साधारण लोगों के बीच बैठे-भटकते-बातें करते मिल जाते हैं। वे यहां क्यों हैं ? उन्हें यहां से क्या मिलता है ? उनमें से कोई भी ऐसे सवाल नहीं करता है? वे भी यहां इसी भाव से आते हैं और खुद में खोये, खुद को खोजते रहते हैं कि यहां कोई है जिसे उनसे ज्यादा उनकी फिक्र है। ईमान की शांति और परस्पर भरोसे से पूरा परिसर भरा है....
और जो यहां है वह 80 साल का बूढा-जिसका क्लांत शरीर अभी उपवास के उस धक्के से संभला भी नहीं है जो लगातार 6 दिनों तक चल कर, अभी-अभी 18 जनवरी को समाप्त हुआ है.... 20 जनवरी को उस पर बम फेंका जा चुका है... तन की फिक्र फिर भी हो रही है लेकिन ज्यादा गहरा घाव तो मन पर लगा है। वह तार-तार हो चुका है.... 29 जनवरी 1948.... अपना तार-तार मन लिए वह अपने राम की प्रार्थना-सभा में बैठा, वह सब कुछ जोडना-बुनना-सीना चाहता है जो टूट गया है, उधड गया है, फट गया है। यह प्रार्थना-सभा उसके जीवन की अंतिम प्रार्थना और अंतिम सभा बनने जा रही है, यह कौन जानता था?
और फिर उसकी वही थकी लेकिन मजबूत ः क्षीण लेकिन स्थिर आवाज उभरी ः ‘कहने के लिए चीजें तो काफी पडी हैं, मगर आज के लिए 6 चुनी हैं। 15 मिनट में जितना कह सकूंगा, कहूंगा। देखता हूं, मुझे आने में थोडी देर हो गई है, वह नहीं होनी चाहिए थी... एक आदमी थे, मैं नहीं जानता कि वे शरणार्थी थे या अन्य कोई, और न मैंने उनसे पूछा ही। उन्होंने कहा ः ‘तुमने बहुत खराबी कर दी है। क्या और करते ही जाओगे? इससे बेहतर है कि जाओ। बडे महात्मा हो तो क्या हुआ! हमारा काम तो बिगडता ही है। तुम हमें छोड दो, हमें भूल जाओ, भागो!’ मैंने पूछा ः ‘कहां जाऊं?’ तो उन्होंने कहा; ‘हिमालय जाओ!’... मैंने हंसते हुए कहा ः ‘क्या मैं आफ कहने से चला जाऊं? किसकी बात सुनूं ? कोई कहता है, यहीं रहो, तो कोई कहता है, जाओ! कोई डांटता है, गाली देता है, तो कोई तारीफ करता है। तब मैं क्या करूं ? इसलिए ईश्वर जो हुक्म करता है, वही मैं करता हूँ। आप कह सकते हैं कि हम ईश्वर को नहीं मानते, तो कम-से-कम इतना तो करें कि मुझे अपने दिल के अनुसार करने दें... दुखियों का वली परमेश्वर है लेकिन दुखी खुद परमात्मा तो नहीं है.... किसी के कहने से मैं खिदमतगार नहीं बना हूं। ईश्वर की इच्छा से मैं जो बना हूं, बना हूं। उसे जो करना है, करेगा.... मैं समझता हूं कि मैं ईश्वर की बात मानता हूं। मैं हिमालय क्यों नहीं जाता? वहां रहना तो मुझे पसंद पडेगा। ऐसी बात नहीं कि वहां मुझे खाना-पीना, ओढना नहीं मिलेगा। वहां जा कर शांति मिलेगी। लेकिन मैं अशांति में से शांति चाहता हूं। नहीं तो उसी अशांति में मर जाना चाहता हूं। मेरा हिमालय यहीं है।’
अगले दिन हमने उनकी हत्या कर दी! हमने अपने गांधी से छुटकारा पा लिया। उसके बाद शुरू हुई आजाद भारत की एक ऐसी यात्रा जिसमें कदम-कदम पर उनकी हत्या की जाती रही। यह उन लोगों ने किया जो गांधी के दाएं-बाएं हुआ करते थे। कम नहीं था उनका मान-स्नेह गांधी के प्रति और न कम था उनका राष्ट्रप्रेम! लेकिन गांधी का रास्ता इतना नया था, और शायद इतना जोखिम भरा था कि उसे समझने और उस पर चलने का साहस और समझ कम पडती गई, लगातार छीजती गई और फिर एकदम से चूक ही गई! इसलिए विकेंद्रीकरण के धागे कातते गांधी के देश में केंद्रित पंचवर्षीय योजनाओं का सिलसिला शुरू हुआ। गांधी ग्रामाधारित विकेंद्रित योजना, स्थानीय साधन व देशी मेधा की शक्ति एकत्रित करने की वकालत करते हुए सिधारे थे। सरकार ने उसकी तरफ पीठ कर दी। गांधी ने कहा था कि सरकार क्या करती है, इससे ज्यादा जरूरी है यह देखना कि वह कैसे रहती है और किसका काम करती है। इसलिए गांधी ने सलाह दी कि वाइसरॉय भवन को सार्वजनिक अस्पताल में बदल देना चाहिए और देश के राष्ट्रपति को मय उनकी सरकार के छोटे घरों में रहने चले जाना चाहिए। सारा मंत्रिमंडल एक साथ होस्टलनुमा व्यवस्था में रहे ताकि सरकारी खर्च कम हो और मंत्रियों की आपसी मुलाकात रोज-रोज होती रहे, वे आपस में सलाह-मश्विरा करते रह सकें। लेकिन हमने किया तो इतना ही किया कि नामों की तख्ती बदल दी ः वाइसरॉय भवन का नाम बदल कर राष्ट्रपति भवन कर दिया, प्रधानमंत्री समेत सभी मंत्री सेवक कहलाने लगे और सभी सार्वजनिक सुविधा का ख्याल कर, बडे-बडे बंगलों में रहने चले गये। सरकार ने कहा ः देश की छवि का सवाल है ! उस दिन से सरकारी खर्च जो बेलगाम हुआ सो आज तक बेलगाम दौडा ही जा रहा है।
विनोबा ने गांधी की याद दिलाई कि उद्धार में उधार रखने की बात न करे सरकार, लेकिन सरकार ने ‘चाहिएवाद’ का रास्ता पकडा। जिसे करना था और कर के दिखाना था, वह चाहने लगा; जिसे चाहना था वह गूंगा हो गया। और फिर एक-दूसरे पर जवाबदेही फेंकने का ऐसा फुटबॉल शुरू हुआ कि असली खेल धरा ही रह गया। सामाजिक समता और आर्थिक समानता की गांधी की कसौटी थी। समाज का अंतिम आदमी ! उन्होंने सिखाया था ः जो अंतिम है वही हमारी प्राथमिकताओं में प्रथम होगा। हमने रास्ता उलटा पकडा ः संपन्नता ऊपर बढेगी तो नीचे तक रिसती-रिसती पहुंचेगी ही- थ्योरी ऑफ परकोलेशन! बस, ऊपर संपन्नता का अथाह सागर लहराने लगा और व्यवस्था ने उसके नीचे रिसने के सारे रास्ते बंद कर दिए। गांधी का अंतिम आदमी न तो योजना के केंद्र में रहा और न योजना की कसौटी बन सका। गरीबी की रेखाएं भी अमीर लोग ही तय करने लगे। गांधी ने कहा कि शिक्षा सबके लिए हो, समान हो और उत्पादक हो। हमने किया यह कि सभी को अपनी आर्थिक हैसियत के मुताबिक शिक्षा खरीदने के लिए आजाद कर दिया और सबसे अच्छी शिक्षा उसे माना जो सामाजिक जरूरतों से सबसे अधिक कटी हुई थी। भारतीय समाज का सबसे बडा और सबसे समर्थ वर्ग उसी दिन से दूसरों के कंधों पर बैठ कर, पूर्ण गैर-जिम्मेवारी से जीने का आदी बन गया। आज हाल यह है कि हमारी शिक्षा करोडों-करोड युवाओं को न वैभव दे पा रही है, न भैरव! दुनिया का सबसे युवा देश ही दुनिया का सबसे बूढा देश भी बन गया है।
गांधी के विद्रूप का यह सिलसिला अंतहीन चला। वह सब कुछ आधुनिक और वैज्ञानिक हो गया जो गांधी से दूर व गांधी के विरुद्ध जाता था। 2 अक्तूबर और 30 जनवरी से आगे या अधिक का गांधी किसी को नहीं चाहिए था। यह मोहावस्था जब तक टूटी, बहुत पानी बह चुका था।
और आज? आज तो हमने गांधी की आंखें भी छोड दी हैं। रह गया है उनका चश्मा भर कागज पर धरा हुआ। गंदे मन से लगाया स्वच्छता का नारा सफाई नहीं, सामाजिक गंदगी फैला रहा है। अब नारा ‘मेड इन इंडिया’ का नहीं, ‘मेक इन इंडिया’ का है; अब बात ‘स्टैंडअप इंडिया’ की नहीं, ‘स्टार्टअप इंडिया’ की होती है। अब आदमी को नहीं, ‘एप’ को तैयार करने में सारी प्रतिभा लगी है। ‘नया गांव’ बनाने की बात अब कोई नहीं करता, सारी ताकतें मिल कर गांवों को खोखला बनाने में लगी हैं, क्योंकि बनाना तो ‘स्मार्ट सिटी’ है। देशी व छोटी पूंजी अब पिछडी बात बन गई है, विदेशी व बडी पूंजी की खोज में देश भटक रहा है। खेती की कमर टूटी जा रही है, उद्योगों का उत्पादन गिर रहा है, छोटे और मझोले कारोबारी मैदान से निकाले जा रहे हैं और तमाम आर्थिक अवसर,संसाधन मुट्ठी भर लोगों तक पहुंचाए जा रहे हैं। देश की 73 प्रतिशत पूंजी मात्र 1 प्रतिशत लोगों के हाथों में सिमट आई है। सामाजिक समरसता नहीं, सामाजिक वर्चस्व आज की भाषा है। अब चौक-चौराहों पर कम, राजनीतिक हलकों में ज्यादा असभ्यता-अश्वलीलता-अशालीनता दिखाई देती है। लोकतंत्र के चारो खंभों का हाल यह है कि वे एक-दूसरे को संभालने की जगह, एक-दूसरे से गिर रहे हैं; टकराते-टूटते नजर आ रहे हैं। सारा देश जैसे सन्निपात में पडा है।
ऐसे में गांधी को कहां खोजें और क्यों खोजें?
खोजें इसलिए कि इस महान देश को अपनी किस्मत भी बनानी है और अपना वर्तमान भी संवारना है। आज गांधी भूत-भविष्य और वर्तमान के मिलन की मंगल-रेखा का नाम है। और गांधी को हम सब खोजें अपने भीतर! जो भीतर से आएगा वही गांधी सच्चा भी होगा और काम का भी होगा। दिल्ली ने गांधी का बलिदान देखा है, हम निश्चय करेंगे तो यही दिल्ली उनका निर्माण भी देखेगी। (17/09/2019)