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गाँधी : प्रबुद्ध अराजकतावादी

नन्दकिशोर आचार्य
‘राज्य संकेन्द्रित और संगठित रूप में हिंसा का प्रतिनिधित्व करता है। व्यक्ति के पास आत्मा होती है, लेकिन क्योंकि राज्य आत्मा से विहीन तन्त्र होता है, इस लिए उसे हिंसा से विरत कभी नहीं किया जा सकता-उसका अस्तित्व ही हिंसा में निहित है।’1
राज्य को एक हिंसक संस्था कहने के पीछे महात्मा गांधी का मन्तव्य हिंसा पर टिकी सम्प्रभुता की अवधारणा से है। राज्य, चाहे उसे चलाने वाले लोकतान्त्रिक तरीके से भी चुने गये हों, अपने-आप को हिंसा का एक मात्र वैध अधिकारी मानता है- इस लिए वह संकेन्द्रित और संगठित हिंसा है। राज्य के हिंसा के इस अधिकार केा सेना और पुलिस की मदद से संगठित और पोषित किया जाता है जो मूलतः और अन्ततः हिंसा बल पर टिकी संस्थाएँ होती हैं। इस लिए यह स्वाभाविक ही है कि महात्मा गाँधी की अहिंसा की अवधारणा राज्य को नैतिक संस्था नहीं मान सकती। वह स्पष्ट करते भी हैः ‘लोकतन्त्र और हिंसा साथ-साथ नहीं चल सकते। जो राज्य आज नाम से लोकतन्त्रात्मक है उन्हें या तो खुल्लमखुल्ला सर्वसत्तात्मक बन जाना होगा या अगर वे सचमुच लोकतन्त्रात्मक बनना चाहते हैं तो हिम्मत करके अहिंसात्मक रूप धारण करना होगा। यह कहना निन्दापूर्ण है कि अहिंसा पर आचरण केवल व्यक्ति कर सकते हैं, राष्ट्र नहीं, जो कि व्यक्तियों से ही मिल कर बनते हैं।’2 एक अन्य स्थल पर वह कहते हैं, ‘मैं लोकतन्त्र और सैन्य भावना को एक-दूसरे का विरोधी मानता हूँ। लोकतान्त्रिक व्यक्ति दुनिया के सामने अपने राज्य के शस्त्रों का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि दुनिया के लाभ के लिए उसे अपने राज्य का नैतिक बल उपलब्ध कराता है।’3
राजनीतिविदों का एक वर्ग है, जो यह मानता है कि राज्य संस्था और उसमें निहित हिंसा की वैधता का प्रयोजन एक विषमतामूलक समाज में वर्गीय हितों अर्थात् स्पष्ट कहें तो सम्पत्तिवानों की रक्षा करना होता है। कार्ल माक्र्स और उनके समर्थक विमर्शकार इसीलिए राज्य को उत्पादन शक्तियों पर प्रभुत्व रखने वाले वर्ग की संस्था मानते हैं और इसीलिए वर्गहीन समाज के विकास के साथ राज्यविहीन समाज की कल्पना करते हैं। उनके विचारों की प्रेरणा से हुई क्रान्तियों की विडम्बना यही रही कि उन्होंने राज्य की शक्ति को और बढा कर राज्यविहीनता का सपना देखा, जो जाहिर है, मूर्त होना सम्भव ही नहीं था क्योंकि उसकी प्रक्रिया और लक्ष्य एक-दूसरे के विरोधी हो गये।
गाँधी माक्र्सवाद की इस अवधारणा से तो सहमत प्रतीत होते हैं कि राज्य वर्गीय हितों की रक्षा के लिए है। वह माक्र्सवादी पदावली का तो प्रयोग नहीं करते, लेकिन स्पष्ट शब्दों में कह देते हैं ः ‘सादा मकानों के लिए, जिनमें चुराने की वस्तु कुछ भी न हो, पुलिस का बन्दोबस्त करने की जरूरत नहीं पडती; अमीरों के महलों को डाकुओं से बचाने के लिए भारी पहरे का इन्तजाम करना पडता है। यही बात विशाल फैक्टरियों पर भी लागू होती है।’4
राज्य को अनिवार्यतः संकेन्द्रित और संगठित हिंसा मानने के बाद यह स्वाभाविक ही है कि गाँधी एक ऐसी राजनैतिक व्यवस्था की कल्पना करते हैं जो दार्शनिक अराजकतावाद की संज्ञा से अभिहित की जा सकती है। लोकतंत्र के आदर्श में विश्वास करते हुए भी वह उसे संसदीय लोकतंत्र की जकडन से बाहर निकालना चाहते हैं, क्योंकि संसदीय लोकतन्त्र भी अन्ततः निर्वाचित होने के बावजूद सत्ता का संसद में केन्द्रीकरण करता और हिंसा पर आधारित हो जाता है। इसीलिए वह मानते हैं कि आदर्श राज्य में कोई राजनैतिक शक्ति नहीं होती, क्योंकि उसमें कोई राज्य ही नहीं होता।5 उनके अनुसार यदि प्रत्येक व्यक्ति अपना शासक स्वयं बन जाये तो किसी राज्य की *ारूरत ही नहीं रहती। उसे वह क्रोपोटकिन की भाषा में प्रबुद्ध अराजकता कहते हैं और यही उनका वास्तविक स्वराज है।
अहिंसक राज्य, प्रबुद्ध अराजकता या स्वराज मिली जुली अवधारणाएं हैं। क्रोपोटकिन का अराजकतावाद का सिद्धान्त उनके द्वारा प्रस्तावित पारस्परिक सहयोग के सिद्धान्त पर आधारित है। अपनी पुस्तक ‘म्यूचुअल एड ः ए फेक्टर इन इवोल्युशन’ में क्रोपोटकिन सहकार को जीव वैज्ञानिक आधार पर एक जैविक प्रवृत्ति के रूप में स्थापित करते हैं तथा मानव समाज के विकास में उसकी केन्द्रीय भूमिका मानते हैं। यह उल्लेखनीय है कि क्रोपोटकिन का बोल्शेविकों से मतभेद इसीलिए हुआ कि बोल्शेविक राज्य की शक्ति के सहारे समाजवाद की स्थापना करना चाहते थे, जबकि क्रोपोटकिन की स्पष्ट मान्यता थी कि वह एक प्रकार का राज्य पूँजीवाद होगा जिसमें पूंजीवाद और नौकरशाही दोनों की शक्ति में वृद्धि होगी। उनकी धारणा थी कि केवल विकेन्द्रीकरण और स्थानीय उत्पादन-उपभोग के माध्यम में ही सामाजिक समाजवाद सम्भव है। एक गैर-पूँजीवादी आर्थिकी का तात्पर्य है गैर-सरकारी व्यवस्था।
महात्मा गाँधी के लिए भी स्वराज का तात्पर्य है ‘सरकार के नियन्त्रण से मुक्त होने का सतत प्रयास- यह सरकार विदेशी हो अथवा राष्ट्रीय।’
राज्य अथवा सरकार के नियन्त्रण से मुक्ति की बात थोरो भी करते हैं। अपने प्रसिद्ध निबन्ध ‘सविनय अवज्ञा’ में वह सवाल उठाते है ः हम पहले मनुष्य हैं या किसी राज्य के नागरिक? कानून अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है या सत्य? सत्य का निर्णय बहुमत के आधार पर करना चाहिए या अपने अन्तःकरण या विवेक के आधार पर? यदि राज्य का निर्णय अन्यायपूर्ण या सत्यविरोधी हो तो हमारा कर्तव्य क्या राज्य के अन्याय से असहयोग करना नहीं है? सवाल यह भी है कि अन्याय को चुपचाप सहन करना क्या उसका सहयोग करना नहीं हो जाता? थोरो का उत्तर स्पष्ट है ः ‘मैं समझता हूँ कि हम पहले मनुष्य हैं और नागरिक बाद में। कानून का सम्मान इतना उचित नहीं है, जितना सत्य का सम्मान।8 विवेकवान व्यक्ति थोरो के इस उत्तर से असहमत नहीं हो सकता। थोरो भी राज्य को एक आत्माहीन यन्त्र मानते हैं जिसमें व्यक्ति की भूमिका एक पुर्जे से अधिक नहीं है। लेकिन, थोरो जानते हैं कि समाज में किसी-न-किसी प्रकार की व्यवस्था आवश्यक है, लेकिन वह ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति की आत्मा को मुक्त कर सके। इसलिए जब वह कहते है कि ‘‘वही शासन सर्वोत्तम है जो सबसे कम शासन करता है।’’ तो इस उक्ति की स्वाभाविक परिणति को भी स्वीकार करते हैं कि अन्ततः ‘‘आदर्श शासन वही होगा जो बिलकुल शासन नहीं करता।’’9
महात्मा भी यह मानते है कि राजनीतिक शक्ति अपने-आप में कोई लक्ष्य नहीं है बल्कि वह लोगों की दशा सुधारने का एक साधन है। वह जिस स्थिति को ‘प्रबुद्ध अराजकता’ कहते हैं, उस में प्रत्येक व्यक्ति अपना शासक स्वयं होता और उसका स्वशासन किसी अन्य के स्वशासन के लिए बाधा नहीं होता। इसलिए वह थोरो से सहमत होते हुए कहते हैं ः ‘‘आदर्श राज्य में कोई राजनीतिक शक्ति नहीं होती क्योंकि उसमें कोई राज्य ही नहीं होता। लेकिन, जीवन में आदर्श की उपलब्धि पूरी तरह कभी नहीं हो पाती इसलिए थोरो की क्लासिक उक्ति है- ‘सबसे अच्छी सरकार वह है जो सबसे कम शासन करे।’’10 एक अन्य स्थल पर वह कहते हैं ः ‘यह प्रश्ा* शेष रहता है कि आदर्श समाज में सरकार नाम की ची*ा होनी चाहिए अथवा नहीं। मैं समझता हूँ कि हमें इस समय इस बात की चिन्ता करने की अवश्यकता नहीं है। यदि हम आदर्श समाज की स्थापना के लिए कार्य करना जारी रखें तो यह धीरे-धीरे ऐसा रूप धारण करती हुई विकसित हो जाएगी, जिससे लोग लाभान्वित हो सकें। यूक्लिड की रेखा की कोई मोटाई ही नहीं है और अभी तक कोई व्यक्ति ऐसी रेखा खींचने में सफल नहीं हुआ है और न कभी होगा। फिर भी, उस आदर्श रेखा को ध्यान में रखते हुए ही ज्यामिती ने इतनी प्रगति की है। जो इस संदर्भ में सही है, वही प्रत्येक आदर्श के लिए सही है।’’11 प्रूदों को दार्शनिक ‘अराजकतावाद का पिता’ कहा जाता है क्योंकि वह पहले विचारक हैं जो स्वयं को अराजकतावादी कहते हैं। वह मानते हैं कि राज्य की उत्पत्ति संपत्ति की संस्था से है और ‘सब सम्पत्ति चोरी है।’ इसलिए वह राज्य के बजाय स्वैच्छिक संस्थाओं की कल्पना करते हैं जो व्यवस्था को सुचारू रख सकें। महात्मा गाँधी भी ईसा के इस कथन को स्वीकार करते है कि एक ऊँट सूई के छेद से गुजर सकता है लेकिन कोई धनी व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि पाप के बिना धन संग्रह संभव नहीं है। न्यासिता इसी प्रकार की एक स्वैच्छिक संस्था है, जिसके माध्यम से व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक अपनी संपत्ति समाज को अर्पित करता है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि समाज में महात्मा गाँधी के आदर्श स्वराज में भी किसी-न-किसी प्रकार की व्यवस्था तो आवश्यक होगी ही, चाहे कोई सर्वसत्तासम्पन्न राज्य न भी हो। क्या अराजकतावादी दार्शनिक और स्वयं महात्मा गाँधी इस समस्या का कोई समाधान प्रस्तुत करते हैं?
क्रोपोटकिन चाहते थे कि ‘‘भौगोलिक और कार्यात्मक विकेन्द्रीकरण इस आधार पर करना चाहिए कि स्थानीय और वैयक्तिक पहल को बढावा मिले और प्रत्येक कस्बे और कम्यून तथा क्षेत्रीय संस्था में उत्पादकों तथा उपभोक्ताओं के संगठनों के माध्यम से राज्य की शक्ति और कार्यक्षेत्र में निरन्तर कमी होती जाए।’’12 फबियन समाजवादी ग्राहम वैलेस का सुझाव है कि भौगोलिक एवं व्यवस्थागत प्रतिनिधित्व के स्थानीय संयोग के माध्यम से एक नए तरह की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। कार्लमाक्र्स भी आखिर ‘ऑल पावर टु दि कम्यून्स’ का लक्ष्य घोषित करते ही हैं। एम.एन.राय का भी प्रस्ताव है कि ‘‘लोकतांत्रिक व्यवस्था की मानववादी नींव डालने के प्रयास को आर्थिक जीवन के सहकारी पुर्ननिर्माण से सम्बन्धित किया जाना चाहिए। इस का परिणाम होगा स्थानीय गणतंत्रों की एक श्ाृंखला की रचना, जिसमें प्रत्यक्ष होने के कारण लोकतंत्र वास्तविक होगा तथा स्थानीय संसाधनों के आधार पर नागरिकों की बुद्धिमत्तापूर्ण पहल और सहकारी प्रयासों से आर्थिक समस्या भी सुलझायी जा सकेगी।’’13 प्रसिद्ध भारतीय स्वतंत्रता सेनानी देशबन्धु चितरंजन दास ने भी यही विचार प्रकट किया था कि ‘‘अत्यन्त केन्द्रीकृत संसदीय शासन भारत के आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक स्वभाव के विपरीत है।’’ उनका कहना था कि स्थानीय लघु केन्द्रों का संगठन और उनकी स्वायत्तता प्रान्तीय स्वायत्तता तथा केन्द्रीय उत्तरदायित्व से अधिक महत्त्वपूर्ण है। सी.आर.दास का मंतव्य था कि ‘‘केन्द्रीय सत्ता का वास्तविक कार्य सलाहकार का होना चाहिए तथा उस का नियन्त्रण का अवशिष्ट अधिकार विशेष परिस्थति में उचित रक्षाकवच के अनुसार ही प्रयोग में लाया जाना चाहिए।’’14
संसदीय प्रणाली की गाँधी जी की आलोचना का आधार भी वस्तुतः यही है कि व्यावहारिक रूप से, उन्हीं की शब्दावली में, ‘बाँझ’ और ‘वेश्या’ साबित होने के साथ-साथ ‘‘एक प्रणाली के रूप में केन्द्रीकरण समाज की अहिंसक संरचना के साथ मेल नहीं खाता।’’15 महात्मा गाँधी लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए उसे शासन नहीं सेवा मानते हैं ः ‘‘सार रूप में लोकतंत्र का अर्थ होना चाहिए सभी की आम भलाई के लिए सभी वर्गों के समस्त भौतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक संसाधनों के जुडाव की कला और विज्ञान।’’16 यदि इस परिभाषा को स्वराज की उनकी परिभाषा के साथ मिला कर पढा जाए तो अर्थ होगा ‘सभी की आम भलाई के लिए समस्त भौतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक संसाधनों के जुडाव का सरकार के नियंत्रण से मुक्त कला और विज्ञान।’
यह तो स्पष्ट ही है कि यह अहिंसा के विज्ञान और विकेन्द्रीकरण की कला के माध्यम से ही संभव हो सकता है। लेकिन, तब देखना होगा कि विकेन्द्रीकरण का वास्तविक तात्पर्य क्या है। अक्सर हम यह मान लेते हैं कि राज्य की योजनाओं और कार्यक्रमों को स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से क्रियान्वित किया जाना विकेन्द्रीकरण है। इस का तात्पर्य यह होता है कि ये सभी संस्थाएँ सिद्धान्ततः और व्यवहारतः राज्य के नियंत्रण में ही रहती है, जो विकेन्द्रीकरण की मूल संकल्पना से मेल नहीं खाता। यदि हम यह मान लेते है कि राज्य या संसद एक सर्वोच्च प्रभुता सम्पन्न संस्था है और सभी प्रकार की क्रियाशीलताएँ अनिवार्यतः उसके अधीन है तो इस बात का कोई वास्तविक महत्त्व नहीं रहता कि कब और किस सीमा तक राज्य अपने कार्यक्रमों और उनको लागू करने के लिए क्या अधिकार स्थानीय संस्थाओं को सौंपता है। विकेन्द्रीकरण का तात्पर्य स्थानीय संस्थाओं को राज्य का एजेन्ट बनाना नहीं है बल्कि सभी क्रियाशीलताओं को राज्य के नियन्त्रण से मुक्त करना है। इसके लिए स्थानीय संस्थाओं की इस नियंत्रण से मुक्ति अनिवार्य शर्त है। इस का वास्तविक मतलब है सभी क्रियाशीलताओं का स्थानीय से लेकर व्यापक स्तर पर स्वायत्त व स्वनियंत्रित होना। राज्य का कार्य इतना ही है कि वह इन में हस्तक्षेप किए बिना उन्हें सक्रिय होने की सुविधा और वातावरण मुहैया करे और कभी किसी गंभीर टकराव की स्थिति में कुछ निश्चित सिद्धान्तों और मर्यादाओं के आधार पर संकट को सुलझाने में संयोजकीय भूमिका का निर्वाह करें। राज्यविहीन होने का तात्पर्य है राज्य का संप्रभु होना नहीं बल्कि एक समस्तरीय समन्वयक या संयोजक हो जाना।17
समस्तरीयता की इस धारणा को महात्मा गाँधी ‘महासागरिक वलय’ - ओसिएनिक सर्किल - के रूपक के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। इस रूपक को उन्हीं के शब्दों में देखना अधिक उपयोगी होगा ः ‘‘असंख्य गाँवों से बने इस ढाँचे में एक के बाद एक विस्तारशील किन्तु कभी ऊर्ध्वगामी न होने वाले वलय होंगे। जीवन एक पिरामिड की तरह नहीं होगा, जिस में आधार को शीर्ष का भार वहन करना पडता है बल्कि एक समुद्री वलय की तरह होगा जिस के केन्द्र में व्यक्ति होगा जो सदैव अपने गाँव के लिए मर-मिटने को तैयार होगा, गाँव गाँवों के समूह के वास्ते नष्ट हो जाने के लिए तैयार रहेगा और यह प्रक्रिया वहाँ तक चलती रहेगी जहाँ सम्पूर्ण एक जीवन का रूप धारण कर लेगा; सभी व्यक्ति इस एक जीवन के अंग होंगे। वे कभी आक्रामक रुख नहीं अपनायेंगे बल्कि सदा विनम्रता का व्यवहार करेंगे और उस समुद्री वलय के ऐश्वर्य में भागीदार होंगे, जिसकी वे अंगभूत इकाईयाँ हैं। इस समुद्री वलय की बाह्यतम परिधि के पास कभी आंतरिक परिधि को कुचलने की शक्ति नहीं होगी, बल्कि वह अपने अन्दर की सभी परिधियों को शक्ति प्रदान करेंगी और स्वयं उन से शक्ति प्राप्त करेगी।’’ गाँधी जी जानते थे कि पूर्णता की एक आदर्शवादी परिकल्पना के बिना अपूर्णताओं को निरन्तर कम करते जाना संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने यह जोड दिया ः ‘लोग मुझे पलट कर उलाहना दे सकते है कि यह सब यूटोपियाई बातें हैं और जरा भी विचारणीय नहीं हैं। यदि युक्लिड के बिन्दु का, भले ही कोई भी मनुष्य उसे कागज पर न उतार सके, एक अक्षय मूल्य है तो मेरी उपर्युक्त तस्वीर का भी मानव-जाति के लिए मूल्य है।’’18
इस महासागरीय वलय की परिकल्पना में सम्प्रभुता के किसी एक स्थान पर केन्द्रीकृत होने की संभावना नहीं रहती। यह सम्प्रभुता की ऊर्ध्वाधर संरचना भी नहीं है, जो पिरामिडाकार संरचना के रूपक में दिखाई देती है, जिसमें सत्ता धीरे-धीरे एक शीर्ष की ओर जाती है। पिरामिड की संरचना ऊर्ध्वाधर है जबकि महासागरीय वलय की संरचना क्षैतिज अर्थात समस्तरीय। महात्मा गाँधी इस संरचना को एक स्वावलंबी ग्राम-गंणतन्त्र के आधार पर विकसित करते है जिसे वह ‘ग्राम स्वराज्य’ कहते हैं। ग्राम-शासन की एक रूपरेखा तो वह प्रस्तुत करते हैं जिसमें प्रतिवर्ष सभी वयस्क ग्रामवासियों द्वारा निर्वाचित पाँच व्यक्तियों की पंचायत के पास समस्त अधिकार होंगे और यह पंचायत ही अपने कार्यकाल के दौरान उस गाँव के लिए विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका तीनों को समाविष्ट करते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वाह करेगी।’’19 लेकिन वलय की अन्य इकाइयों के साथ उसके सम्बन्धों के बारे में वह इतना ही कहते हैं कि बाह्य परिधि आंतरिक परिधि को कुचलने के बजाय उसे शक्ति देगी और स्वयं उन से शक्ति प्राप्त करेंगी।
इस संदर्भ में डॉ. राममनोहर लोहिया की चौखम्भा राज्य की अवधारणा पर विचार उपयोगी होगा। ‘‘ ‘खंभा’ पद का उपयोग करने के कारण कुछ लोग इस संरचना को ऊर्ध्वाकार समझने के भ्रम में रह सकते हैं लेकिन डॉ. लोहिया यहाँ स्पष्टतः समस्तरीय विकेन्द्रीकरण की बात कर रहे हैं, क्योंकि चारों खम्भों स्थानीय, क्षेत्रीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय को समान स्तर पर रखा गया है और कभी एक विश्वराज्य जैसी कल्पना के मूर्त होने की स्थिति में एक अतिरिक्त खम्भे की कल्पना की गयी है।’’20 लोहिया प्रस्तावित करते हैं कि इन चारों ही स्तरों पर अपने-अपने क्षेत्राधिकार में कानून बनाने, योजनाएँ बनाने, चलाने और कर उगाने के संवैधानिक अधिकार होंगे और ये एक-दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर पायेंगे। इस अवधारणा को गाँधीजी के मन्तव्य के अधिक अनुकूल करने के लिए यह जरूरी होगा कि स्वदेशी की धारणा पर आधारित उनकी ग्राम-स्वराज्य की अवधारणा को इस का आधार समझा जाये क्योंकि आर्थिक विकेन्द्रीकरण के साथ अधिकतम सीमा तक एक स्वावलंबी ग्राम या ग्राम समूह के बाद बहुत कम बचा रहता है जिसे लेकर विभिन्न परिधियों में गंभीर टकराहट हो सके।’’21 जिस प्रकार गाँधी जी स्वदेशी के आधार पर विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था और स्वावलंबी गाँव से शुरू कर के कुछ मामलों में ग्राम-समूहों, बीच के छोटे उद्योगों के लिए ट्रस्टीशिप तथा बडे उद्योगों के लिए राजकीय स्वामित्व की अवधारणा करते है; उसी प्रकार राजनीतिक व्यवस्था के क्षेत्र में किया जा सकना संभव है।
लेकिन, यह आश्चर्यजनक लगता है कि सत्य को सर्वोच्च स्थान देने वाले, राज्य को संगठित और संकेन्द्रित हिंसा मानने वाले तथा अपने देशवासियों की पीडाओं से अधिक ‘मानव-प्रकृति के बर्बरीकरण’ से चिन्तित महात्मा गाँधी को संकीर्ण राष्ट्रवाद के घेरे में देखने की कोशिश की जाती है- और कभी-कभी उनके मित्रों द्वारा ही। स्वयं रवीन्द्रनाथ टैगोर असहयोग आन्दोलन में गाँधी के विदेशी माल आदि के बहिष्कार को संकीर्णता मानते हैं। कालिदास नाग को लिखे एक पत्र में वह कहते हैं ः ‘‘भारत पहुँचने पर मुझे लगा कि गाँधी ने, भले ही उनके उद्देश्य उच्च रहे हों, अपने महान आदर्श को भारतीय राजनीति के तंग दायरे में सीमित कर दिया है। मेरा विश्वास रहा है कि देश केवल बाहर से लिए गये विचारों के आधारों पर ऊँचा उठ सकता है। किन्तु नेताओं का आग्रह है कि पहले हमारा आदर्श स्वदेश होना चाहिए, तभी विश्व-बन्धुत्व का आदर्श सिद्ध किया जा सकता है।’’22 इसी पत्र में गाँधी पर व्यंग्य करते हुए वह लिखते हैं ः ‘‘किसी दिन ये विचारक कहने लगेंगे कि, जबकि बेचारे पाश्चात्य लोगों के लिए पृथ्वी सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती है, ईश्वर के भेजे गए जन-समुदाय के लिए पृथ्वी वासुकी नाग के फन पर स्थित है।’’
स्पष्टतया, यह गाँधी जी के प्रति अन्यायपूर्ण व्यंग्य है, क्योंकि वह तो अपने अहिंसा के सिद्धान्त को भी अधुनातन वैज्ञानिक शोध पर आधारित करते हैं। जिस प्रकार प्रकृति की द्वन्द्वात्मकता को माक्र्सवाद ऐतिहासिक भौतिकवाद का आधार बताता है, उसी प्रकार गाँधी मानते है कि जड प्रदार्थों में व्याप्त संसंजकबल मानवीय जीवन में प्रेम में बदल जाता है ः ‘‘वैज्ञानिक बताते हैं कि जिन अणुओं से मिलकर हमारी पृथ्वी की रचना हुई है, उन के बीच यदि संसंजक बल या संसक्तिशील बल न हो तो पृथ्वी खण्ड-खण्ड हो जायेगी और हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा; और जिस प्रकार जड पदार्थों में संसंजक बल है, उसी प्रकार सब चेतन पदार्थों में भी यह बल उपस्थित होना चाहिए, और चेतन पदार्थों में इस संसक्तिशील बल का नाम है प्रेम।’’23
स्मरणीय यह भी है कि गाँधी विज्ञान के नहीं बल्कि उस मशीनीकरण के विरोधी हैं, जो उद्योगवाद और विशाल पैमाने का उत्पादन का आधार है तथा जो ‘‘श्रमिकों को विस्थापित कर के उन्हें बेरोजगार बना देता है।’’24 टैगोर स्वयं यह मानते है कि पाश्चात्य शासन ने भारत में गाँव-गाँव में व्याप्त ‘‘सामाजिक स्वराज को नष्ट कर दिया।’’25 चरखे और ग्रामाद्योगों की सहायता से गाँधी उसी ‘सामाजिक स्वराज’ का आर्थिक आधार तैयार करना चाहते हैं, जो स्वयं टैगोर का उद्देश्य रहा है। गाँधी के आन्दोलन को ब्रिटेन के शासन से अधिक ‘पाश्चात्य सभ्यता का विरोधी’26 मानने वाले टैगोर 1941 के अपने व्याख्यान ‘सभ्यता का संकट’ में कहते हैं ः ‘‘यह विदेशी सभ्यता- यदि इसे सभ्यता कहा जाए - हम से क्या कुछ छीन चुकी है, हम जानते हैं... पाश्चात्य जातियों को अपनी सभ्यता पर जो गर्व है, उसके प्रति श्रद्धा रखना अब असम्भव हो गया है। वह सभ्यता हमें अपना शक्ति रूप दिखा चुकी है लेकिन मुक्ति रूप नहीं दिखा सकी। मनुष्य का मनुष्य के साथ वह सम्बन्ध, जो सबसे अधिक मूल्यवान है जिसे वास्तव में सभ्यता कहा जा सकता है, यहाँ नहीं मिलता।’’27 तो यही बात तो गाँधी भी कह रहे थे, जिनके लिए सभ्यता का अर्थ ही ‘सदाचार’ है। इसी व्याख्यान में टैगोर आगे कहते है ः ‘‘जीवन के प्रथम भाग में मेरा विश्वास था कि सभ्यता दान ही यूरोप की आन्तरिक सम्पत्ति है। आज जब जीवन से विदा होने का दिन समीप आ रहा है, मेरे इस विश्वास का दिवाला निकल चुका है।’’28 वह अब पूर्वी सभ्यता से ही ‘परित्राता’ के आने की उम्मीद करते हैं।
गाँधी पर संकीर्ण राष्ट्रवाद का आरोप लगाने वाले बडे आराम से इस बात की अनदेखी कर देते है कि जो विचारक आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से ही सहमत नहीं, उसे उन राष्ट्रवादियों की पंक्ति में कैसे रखा जा सकता है, जो अन्य राष्ट्रों की कीमत पर अपने राष्ट्र के लाभ को स्वीकार करने में तनिक भी नहीं सकुचाते। गाँधी तो उन विचारकों में हैं जो विश्व-कल्याण के लिए अपने राष्ट्र के बलिदान के लिए सहज प्रस्तुत हो जाते हैं ः ‘‘देश के लिए स्वतन्त्र होना इसलिए आवश्यक है कि यदि आवश्यकता हो तो वह विश्व के हित के लिए स्वयं को न्यौछावर कर सके। अतः राष्ट्रीयता के प्रति मेरा प्रेम अथवा राष्ट्रीयता की मेरी धारणा यह है कि मेरा देश स्वतंत्र हो ताकि अगर आवश्यता पडे तो मानव-जाति के अस्तित्व की रक्षा के लिए वह स्वयं को होम सके। इस धारणा में प्रजातीय घृणा का कोई स्थान नहीं है। यही हमारी राष्ट्रीयता की भावना होनी चाहिए।’’29 महात्मा गाँधी सम्पूर्ण विश्व को एक मानव-शरीर की भाँति मानते हुए कहते है कि ‘‘एक अंग में पीडा होने पर उसकी अनुभूति पूरे शरीर को होती है। एक अंग में सडन पैदा होने पर अनिवार्यतः सम्पूर्ण शरीर में विष फैल जाता है।’’30 एसिया सम्मेलन को भेजे गए अपने संदेश में उन्होंने कहा ः ‘‘मुझे आशा है कि ..... विभिन्न एसियायी देशों के सभी प्रतिनिधि केवल ‘एक विश्व’ के सपने को साकार करने के लिए भरसक प्रयास करेंगे। उन्हें इस आदर्श की प्राप्ति के लिए उपाय और साधन खोजने होंगे। यदि आप दृढ संकल्प से काम करेंगे तो इस में कोई संदेह नहीं है कि हम इस सपने को अपनी पीढी में ही सच कर दिखायेंगे।’’ वह तो यहाँ तक कह देते हैं कि ‘‘अगर दुनिया को एक नहीं होना है तो मैं इसमें रहना नहीं चाहूँगा। मैं निश्चित रूप से यह चाहता हूँ कि यह सपना मेरे जीवन-काल में ही सच हो जाये।’’31 दरअस्ल, महात्मा गाँधी यह मानते हुए प्रतीत होते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का विकास राष्ट्रीयता से गुजरकर ही हो सकता है। एक राष्ट्र के रूप में जुडे बिना हम एक समाज के रूप में अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में प्रभावी सहयोग नहीं कर सकते। वह कहते हैं ‘‘अन्तर्राष्ट्रवाद तभी संभव है जब राष्ट्रवाद अस्तित्व में आ जाये, अर्थात् जब भिन्न-भिन्न देश के लोग संगठित हो चुकें और वे एक व्यक्ति की तरह काम करने के योग्य बन जायें। राष्ट्रवाद बुरी ची*ा नहीं है, बुरी है संकुचित वृत्ति, स्वार्थपरता और ऐकांतिकता जो आधुनिक राष्ट्रों के विनाश के लिए उत्तरदायी है। इनमें से प्रत्येक राष्ट्र दूसरे की कीमत पर उसे नष्ट कर के उन्नति करना चाहता है। भारतीय राष्ट्रवाद ने एक भिन्न मार्ग चुना है वह समूची मानवता के हित तथा उसकी सेवा के लिए स्वयं को संगठित करना यानी पूर्ण आत्माभिव्यक्ति की स्थिति को प्राप्त करना चाहता है।’’32 यह राष्ट्रीयता की अन्तर्राष्ट्रीयता की ओर विकास यात्रा है। विकासवाद के सिद्धान्तकार डार्विन अपनी पुस्तक ‘डिसेन्ट ऑफ मैन’ - मानव का अवतरण - में लगभग यही बात कहते हैं ः ‘‘ज्यों-ज्यों मनुष्य सभ्यता में उन्नति करता जाता है और छोटी-छोटी जातियाँ बडे-बडे समुदाय में संगठित होती जाती है, त्यों-त्यों प्रत्येक व्यक्ति को यह बात समझ आती जाती है कि उसे अपनी सहज प्रवृत्तियों और संवेदनाओं का विस्तार अपने राष्ट्र के सब सदस्यों तक कर लेना चाहिये, भले ही वे सदस्य व्यक्तिगत रूप से उससे परिचित न भी हो। जब एक बार यह स्थिति आ जायेगी, तब उसकी संवेदना सब राष्ट्रों और जातियों के मनुष्य तक विस्तार होने में केवल एक ही कृत्रिम बाधा बच रहेगी।’’ इस पर डॉ सर्वपल्लीराधाकृष्णन की टिप्पणी है ः ‘‘सभ्यता में प्रगति की एक मानी हुई पहचान समूह की सीमाओं का क्रमशः विस्तार होते जाना ही है।’’33
इस लक्ष्य को महात्मा गाँधी निरन्तर ध्यान में रखते हैं; इसीलिए वह मानते हैं कि ‘‘राष्ट्र भक्ति की मेरी धारणा निरर्थक है यदि सम्पूर्ण मानवता की अधिकतम भलाई के साथ इस की निरपवाद रूप से पूरी-पूरी संगति न हो।’’34 उनका पूरा विश्वास है कि उन के तरीके मूलतः पूरे अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए उपयोगी हैं, पर यह उनकी सीमा है कि उन के प्रयोग पृथ्वी के एक खण्ड तक ही सीमित रह सके हैं- जो शायद सभी व्यावहारिक प्रयोगों की सीमा है- लेकिन ‘‘जो ची*ा एक खण्ड के लिए सही है, वह सम्पूर्ण इकाई के लिए भी सही है।’’35
सवाल यह भी है कि क्या कोई संकीर्ण राष्ट्रवाद अहिंसा या प्रेम के सिद्धान्त के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को सुलझाने के लिए भी सैनिक बल की जगह प्रेम पूर्ण असहयोग के रास्ते का आग्रह करेगा। यह मानते हुए कि शायद अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में प्रेम के नियम को मान्यता मिलने में अभी काफी समय लगे, वह आशान्वित हैं कि राष्ट्रों के आपसी झगडों में सेना की अपेक्षा आर्थिक असहयोग का तरीका अधिक निर्णायक और शक्तिशाली है। वह मानते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तब तक स्थापित नहीं हो सकती ‘‘जब तक बडे राष्ट्र आत्मा का नाश करनेवाली प्रतियोगिता, आवश्यकताओं के बहुलीकरण और उसके लिए अपनी भौतिक संपत्ति में वृद्धि करने में विश्वास करना बन्द नहीं कर देते।’’ इस प्रकार गाँधी जी भारत की गुलामी और विश्व-अशांति दोनों को आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का परिणाम मानते है और उसी के परित्याग में दोनों की समस्याओं का निवारण। कह सकते हैं कि गाँधी जी का तात्कालिक संदर्भ यदि भारत है तो भी उसे वह पूरी सभ्यता के परिप्रेक्ष्य में देखते है और जो विकल्प वह प्रस्तुत करते हैं, वही पूरी सभ्यता का भी विकल्प है।’’36
क्या यह विकल्प, यह अहिंसा सैनिक आक्रमणों से भी रक्षा कर सकती है? यद्यपि इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि किसी राष्ट्र ने सैनिक आक्रमण के सम्मुख केवल अहिंसक प्रतिरोध का ही सहारा लिया हो, लेकिन गाँधी जी का कहना है कि इसके पीछे यह विश्वास काम करता है कि हम ताकत के आगे ही घुटने टेकते हैं। वह कहते हैं कि यदि अहिंसक प्रतिरोध के बावजूद आक्रमणकारी को सैनिक सफलता मिल भी जाये, तब भी वह विजित पर शासन तभी कर पायेगा जब उसे उसका सहयोग मिले। यदि विजेता के सम्मुख विजित का सत्याग्रह अर्थात असहयोग पूरी मजबूती से चालू रहता है तो सैनिक सफलता भी व्यर्थ हो जाती है। लेकिन इस के लिए सत्याग्रह में अविचलित आस्था और अद्भुत धैर्य की जरूरत होती है। गाँधी जी का तर्क है कि आस्था और धैर्य यदि व्यक्ति-समूहों में कई बार देखने को मिले हैं तो कोई कारण नहीं कि राष्ट्रों में इस सामर्थ्य का विकास न हो सके- यद्यपि वह स्वीकार करते हैं कि यह असंभव न होते हुए भी अत्यन्त कठिन है। इसीलिए, वह मानते हैं कि यदि हम बलिदान के लिए पूरी तरह तैयार न हों तो ‘‘आत्मरक्षा या अरक्षितों की रक्षा के लिए की गयी हिंसा कायरतापूर्ण आत्मसमर्पण तुलना में कहीं बेहतर वीरतापूर्ण कार्य है।’’37 इसीलिए उन्होंने अहिंसक प्रतिरोध में समर्थ न होने वाले अबीसिनियाइयों, स्पेनियों, चैकों, चीनियों और पोलैण्डवासियों की सफलता की कामना की थी। म्यूनिख समझौते पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने क्षुब्ध हो कर कहा था कि ‘‘एक सप्ताह की शांति के लिए यूरोप ने अपनी आत्मा को बेच दिया है’’ क्योंकि वह यह समझ रहे थे कि समझौता करने वालों का विश्वास शांति और अहिंसा में नहीं है। लेकिन, आत्मरक्षा के लिए की जाने वाली हिंसा को भी वह संयम में ही रखना चाहते थे। वह कहते हैं ः ‘‘यदि आप में अहिंसा के मार्ग पर चलने की बहादुरी नहीं है तो आप घूँसे का जवाब घूंसे से दे सकते है। लेकिन, हिंसा के प्रयोग की भी एक नैतिक संहिता है।’’38 स्पष्ट है कि किसी अपरिहार्य स्थिति में हिंसा को अनिच्छापूर्वक स्वीकार करने पर भी गाँधी जी उसे ‘प्रेम के नियम’ से संचालित रखना चाहते हैं।
क्या ऐसे विचारक को संकीर्ण अर्थों में राष्ट्रवादी कहा जा सकता है? यदि किसी भाषिक विवशतावश राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम को, गुलामी के बन्धन से मुक्त होने के प्रयास को राष्ट्रवाद कहा भी जाये तो गाँधी का यह राष्ट्रवाद उनके अन्तर्राष्ट्रवाद की ही स्वस्थ पीठिका है, जिसका विस्तार आगे चलकर डॉ. लोहिया और विनोबा के चिन्तन में होता है।