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कन्हैयालाल सेठिया की सृजनात्मक अवधारणाओं का परिप्रेक्ष्य

जयश्री सेठिया
शूरमाओं, संतों, साधकों एवं कर्मशील मानवों की लीलास्थली राजस्थान के प्रतिभा-सम्पन्न कवि, मनस्वी, साधक, भारतीय दर्शन के इन्द्रधनुषी रंगों से काव्य को चित्रित करने वाले युग तूलिका के धनी, मंच की स्पर्धा से दूर रहने वाले, समाज सेवी सृजन साधना में आजीवन तल्लीन रहने वाले, समन्वय, श्रद्धा और स्त्री महत्ता के शाश्वत मूल्यों के गायक, राजस्थानी के साथ-साथ हिन्दी भाषा में अमर काव्य सृजन करने वाले करुणा, निष्ठा, कर्तव्यबोध राष्ट्र प्रेम तथा विसंगतियों के प्रति तीव्र विरोधी पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया आज 100 वर्षों के काल का अतिक्रमण कर अमर रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

सेठियाजी समाज सेवी, राष्ट्रहित चिन्तक, स्वतन्त्रता सेनानी, गांधी के अनुयायी, जाति प्रथा को समूल

नष्ट करने के समर्थक, प्रगतिवादी विचारक, मानव मूल्यों के पक्षधर, पर्यावरण चेतना के अग्रणी, बालिका शिक्षा के पुरजोर समर्थक जैसे अथक कार्यों के अग्रणी तो थे ही साथ ही राजस्थानी काव्य उन्हें राजस्थान ही नहीं अपितु विश्व के कवियों में अग्रणी सिद्ध करता है। सम्पूर्ण विश्व का कोई कोना ऐसा नहीं है जहां राजस्थान व राजस्थानी का पर्याय ‘धरती धोरां री’ गीत से कोई अनभिज्ञ है।

राजस्थानी भाषा के साथ-साथ सेठिया जी ने चिन्तन व दर्शन के वैचारिक धरातल पर हिन्दी काव्य सृजन की नींव डाली और हिन्दी के बहुआयामी 18 काव्य कृतियों के सृजन ने कन्हैयालाल सेठिया को आधुनिक चिन्तकों की प्रथम पंक्ति में प्रतिष्ठित किया। एक ऐसे शब्द साधक जिनका व्यक्तित्व सृजन के माध्यम से अनन्त अस्तित्व को अर्पित है। हर क्षण सृजन की ओर उन्मुख रहना ही उनकी प्रकृति थी, सृजन की इस प्रक्रिया के मध्य जो कुछ उन्होंने रचा उसमें ‘स्व’ की विश्व छवि प्रतिभाषित हुई है।

‘साहित्यकार घटनाओं को नहीं देखता चरित्र पढता है’ सेठियाजी के सृजन दर्पण में झांक कर देखने पर इसी सत्य से साक्षात्कार होता है। मरुधरा के शुष्क प्रान्त में जन्म लेने के पश्चात् भी अपने कालजयी साहित्य के माध्यम से रसधार बहाते कन्हैयालाल सेठिया का काव्य शाश्वत अर्थों में समकालीन संवेदनाओं को संस्पर्शित करने की क्षमता रखता है, प्रत्येक प्रश्नचिह्न को पूर्ण विराम देने की प्रतिभा है। वर्तमान की पीडाओं, मातृभाषा प्रेम, दार्शनिक चिन्तन, विसंगतियों को सार्थक समाधान देने की क्षमता, जाति, संप्रदाय, क्षेत्रीयता से परे व्यक्तित्व निर्माण की प्ररणा, प्रेम, राष्ट्र भक्ति, जागरूकता, उद्वेलन, प्रकृति प्रेम, शिक्षा, जाति प्रथा, रूढियों को मिटाने की प्रतिबद्धता जैसे अनेकानेक आयामों से ओतप्रोत सेठिया जी का हिन्दी साहित्य प्रकाश पुंज की भांति प्रेरणादायी है। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में सेठिया जी की ‘निर्ग्रन्थ’ काव्य कृति पर भारतीय ज्ञान पीठ द्वारा मूर्ति देवी पुरस्कार (1989 में) प्रदान किया जाना उनके गहन चिन्तन एवं अद्भुत रचना कौशल का ही प्रमाण है।

सेठियाजी द्वारा रचित हिन्दी, राजस्थानी एवं उर्दू की रचनाएं जीवन मूल्य, युग बोध, राष्ट्र प्रेम, राजस्थानी भाषा-संस्कृति का अकाट्य संरक्षण व मान्यता हेतु संघर्ष, प्रकृति, गतिशीलता, चिरन्तरता, गांधी विचारधारा, जैन दर्शन जैसी अनेकानेक विशेषताओं को उद्घाटित करती है। सामान्यतः राजस्थान में कन्हैयालाल सेठिया के काव्य का जिक्र भी किया जाये तो उन्हें राजस्थानी भाषा व काव्य का पर्याय माना जाता है, किन्तु जब तक सेठिया जी के हिन्दी काव्य का समग्र मूल्यांकन व समीक्षा नहीं की जाएगी तब तक एक प्रतिभासम्पन्न कवि जो प्रसिद्धि की दौड में शामिल नहीं हुआ उसी का खामियाजा भुगतना प्रतीत होगा। मेरी बात का तात्पर्य है कि परद्श्री कन्हैयालाल सेठिया का हिन्दी काव्य सृजन का परिप्रेक्ष्य भी सर्वोत्कृष्ठ है। उनकी हिन्दी रचनाएं वनफूल (किशोर सुलभ भावुकता व प्रकृति चित्रण), अग्निवीणा (राष्ट्रीय भावों का ताण्डव नृत्य), मेरा युग (चरमता व निम्नता की स्वाभाविक अनुकृतियां), दीप किरण (विसंगतियों के बीच संगति की खोज), प्रतिबिम्ब (आत्मानुभूति का समष्टि चित्रण), आज हिमालय बोला (दायित्व बोध की सजगता), खुली खिडकियां चौडे रास्ते (जीवन सत्य का मार्मिक चित्रण), प्रणाम (विरोधी धाराओं के मध्य विराजित सत्य की खोज), मर्म (चिन्तन व दर्शन के धरातल पर हिन्दी काव्य का नया युग), अनाम (जीवन का गहन रहस्य), निर्ग्रन्थ (महावीर का अनेकान्त दर्शन), देह-विदेह (अध्यात्म चिन्तन), आकाश गंगा (दर्शन), स्वगत (आत्म बोध), निष्पत्ती (दर्शन), श्रेयष (बेहतर मनुष्यता की तलाश) एवं त्रयी (जीवन का अतीत

वर्तमान और भविष्य जीवन दर्शन) के द्वारा हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है।

जब सेठिया जी की हिन्दी रचनाओं का समग्र अध्ययन करते हैं तो स्वाभाविक रूप से पाठक गहन रस

धारा में अवगाहन करने लगता है। वो सोच ही नहीं पाता कि साधारण शब्दों में छोटे-छोटे वाक्यों में जीवन व जगत् से जुडे कितने सार्थक तथ्य कवि उद्घाटित करता है। कवि के साहित्य की सृजनात्मक अवधारणाओं का परिवेश एवं कालानुसार मूल्यांकन करें तो वास्तव में एक दुश्कर कार्य है। किसी रचनाकार के विराट् व्यक्तित्व व कृतित्व के गहन अध्ययन व विश्लेषण के बावजूद भी उसकी विराटता को शब्दों के माध्यम से भावाबद्ध करना निःसन्देह हिमालय की ऊंची चोटी को छूने के बराबर है। हालांकि कवि के सृजन पर प्रत्यक्षतः किसी भी विशेषवाद, परिस्थिति एवं दर्शन का प्रभाव नहीं पडा है। परन्तु कोई भी कवि अपने युगीन परिवेश से प्रभावित हुये बिना नहीं रहता है। बाह्य परिस्थितियों की विसंगतियों से कवि का मन व्याकुल होता ही है। सेठिया जी ने अपने साहित्य में जीवन के अनुभूत सत्यों का ही उद्घाटन किया है। निज चिन्तन को प्राथमिकता देने के बाद भी कवि का काव्य समकालीन परिवेश से प्रभावित हुये बिना नहीं रहा। 1962 में भारत व चीन युद्ध के समय ‘आज हिमालय बोला’ जी कृति का सृजन तथा 1942 में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अग्निवीणा के तार झंकृत किये।

मानवीय बोध के साथ युगबोध का चित्रण देखना हो तो ‘खुली खिडकियां चौडे रास्ते’ की मार्मिक अभिव्यक्ति

देखी जा सकती है। सेठिया जी ने हिन्दी काव्य सृजन उस समय किया जब स्वाधीनता संग्राम चरम पर था। ऐसे में गांधी के भारत छोडो आन्दोलन, सर्वोदय, जीवन मूल्यों के संरक्षण, अहिंसा, समानता, छुआछूत को मिटाने के लिये प्रबल समर्थन उनकी रचनाओं का प्राण है।

सेठिया जी का समस्त जीवन साहित्य को समर्पित रहा है, साहित्य के माध्यम से मानवीय संवेदना को समर्पित रहा है। साहित्य के माध्यम से मानवीय संवेदना की गहनतम अनुभूति विराट् निज चिन्तन के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है। आप मानव जीवन की अन्तर्तम अनुभूतियों को समाज के समक्ष लाना काव्य रचनाओं का जैसे करुणा, अन्तः स्रावित दया, मन द्रवित प्राण मानते थे।

कन्हैयालाल सेठिया एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसने तत्कालीन समाज, राजनीति, धर्म, लौकिक सभी क्षेत्रों की विसंगतियों के प्रति विरोध का स्वर मुखर किया है। आत्मीय व्यक्तित्व के धनी होने पर विषमता के थपेडों से विलग होने वाले, संकीर्णता को जीवन में अत्यल्प भी स्थान नहीं देने वाले थे। उनकी काव्य रचनाओं में कुप्रथाओं के प्रति विरोध व्यक्त किया ही है, साथ ही व्यक्तिगत स्तर पर समान अधिकार, शिक्षा, अस्पृश्यता, सामन्ती जैसे अधिकारों के प्रति सजगतापूर्वक प्रयास किये।

उच्च नारी शिक्षा के लिये सुजानगढ जैसे शहर में आज से 53 वर्ष पूर्व सोना देवी सेठिया स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय की स्थापना की प्रेरणा आज भी प्रमाण प्रस्तुत करती प्रतीत होती है। इसके अतिरिक्त अपनी दार्शनिक ऋांतियों प्रणाम, अनाम, मर्म, श्रेयस द्वारा अध्यात्म के क्षेत्र में फैली असंगतियों को दूर कर नवीन सिद्धान्तों की स्थापना की- यथा -‘फल मूल्यपरक, गुठली अमूल्य, मूल्य मुक्ति, गुठली मुक्ति’।

निष्कपट, निश्छल, निर्व्याज व्यक्तित्व के पक्षधर कन्हैयालाल सेठिया जितने बडे कवि हैं उतने की बडे लोक सेवक हैं। वे सदैव गुगर बन्दी और दलगत राजनीति से दूर रह कर अपने जीवन व साहित्य के माध्यम से ‘महावीर इन्टरनेशनल’ जैसी संस्था के संरक्षक रहे। विकलांगों हेतु जयपुर फुट उपलब्ध करवाना, नारी जागरण, राजस्थान के जल संकट निवारण हेतु सरकार को कोल या तार से जागरूक करना, समाज के हर वर्ग के युवाओं से सम्फ में रह कर समाज के उत्थान की प्रेरणा देना कोई आसान कार्य नहीं था। तत्कालीन परिवेश में अर्थ युग में जन्म ले कर अर्थ से दूर रहना ही सेठिया जी की साधना थी।

गांधी के आदर्शों को जीवन व आचरण में उतार कर सेठिया जी शोषित वर्ग के पक्ष में आवाज उठा कर सदैव वर्गहीन, समान समाज की स्थापना पर बल देते, मद्यपान, साम्प्रदायिकता स्त्रियों के प्रति व हरिजनों के प्रति अमानवीय व्यवहार को समाज का कोढ मानते थे। मैं उनकी ‘अपस्त नारी’ कविता की कुछ पंक्तियां

उद्घृत करती हूं-

अपना अन्तर ज्ञान टटोलो

अपनी मूंदी आंखें खोलो

अपहृत नारी वह कालिख है

देश धर्म के जाति मुक्ति से

मुख पर जिसको धो न सकोगे....।’’

सेठिया जी का जो साहित्य सृजन, विसंगतियों के प्रति तीव्र आक्रोश, राष्ट्रीय चेतना का मुखर स्वर, बदलाव लाने की तत्परता, राजस्थान इसी धरा का सर्वतोमुखी विकास की अनुगूंज से प्रारम्भ हुआ था, वह मानवीय संवेदना, सत्य, दया, ममता, करुणा, स्वप्न, अध्यात्म, अनेकान्त, दर्शन, महावीर की वाणी, मोक्ष, अहिंसा जैसे दार्शनिक मूल्यों तक पहुंच कर अनवरत एक दृष्टिपथ पर विचरण करने लगा। वे कहते हैं-

खतम हुआ जाता है मेला

तुम भी एक खिलौना ले लो

तो फिर सच का मन बहलाने

कोई स्वप्न सलोना ले लो।

अहिंसा अपने आप में समृद्ध दर्शन

नहीं बचाने का बचने का निर्देशन।

वहीं जीवन सत्य की महत्ता को स्वीकार करते हुये कवि कहते जो सत्य नहीं समझेगा वह सृजन के महत्त्व को भी नहीं समझेगा। संसार का प्रत्येक व्यक्ति सत्य से साक्षात्कार कर के ही सृजन का अर्जन करता है-

‘नहीं देती दैनिक चर्या कोई चिन्तन

देती घटनाएं प्रेरणा (जीवन सत्य)।’

मानवीय चिन्तन को क्षण का, सत्य का, संयम का, प्रार्थना का, करुणा का महत्त्व समझना ही होगा दान व श्रद्धा के बिना यह सब अकल्पनीय है। कवि ‘देह विदेह’ में कहते हैं-

‘बन जाएगा यह स्वयं छूकर सूर्य

हृदय की श्रद्धा की एक अकिंचन तीली।’

दान सकाम

त्याग निष्काम ...................।’

अन्तिम चरण की रचनाओं में सेठिया जी की जीवन दृष्टि मोक्ष की तरफ दार्शनिक व्याख्या करने लगी

थी। वे मानते थे कि जब तक कामना शेष रहेगी व्यक्ति विषयों के प्रति आसक्ति नहीं त्याग सकेगा और अहंकारवादी मनुष्य कभी भी विराट को अपने अन्तर में समाहित नहीं कर सकता है-

अहम भावना वही महत है,

जो प्रणाम सी दीखे ...........।

जब तक शेष कामना की

दहक नहीं जाएगी।

रचनाओं के माध्यम से कहते हैं सुख-दुःख व उदारता को अपनाने से ही प्रेम द्वारा मनुष्य अपने मनुष्यत्व को बचा सकता है।

अतः हम दृढतापूर्वक कह सकते हैं कि पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया एक विराट् जीवन दृष्टि फलक को लेकर उच्चतम भावों, उदात्त काव्य चिन्तन, वैश्विक फलक को आत्मसात् करने वाली कार्यशैली के वाहक तो थे ही, साथ ही भारत भूमि के ऐसे सपूत थे जिन्होंने हिन्दी, राजस्थानी व उर्दू भाषा में एक समान साहित्य सृजन करते हुये काव्य कृतियों को अद्वितीय रत्न मंजुषाओं के रूप में ज्ञान, दर्शन व चरित्र के रत्न भरे हैं।

सारांशतः महाकवि सेठिया द्वारा राजस्थान के प्रति समर्पित भाव से जो कार्य किये गये उन्हें हम में से कोई कदापि नहीं नकार सकता है। सामन्ती व्यवस्था से मुक्ति, राजस्थानी भाषा की मान्यता हेतु, संघर्ष, राष्ट्रीय चेतना व ओजस्वी अभिव्यक्ति, पेयजल समस्या के निस्तारण हेतु भारत सरकार का ध्यानाकर्षण ही नहीं उसे मूर्त रूप प्रदान करना, राष्ट्रीय जल ग्रिड के गठन के प्रेरक, वन संवर्धन, पर्यावरण चेतना, हरिजन उद्धार, बालिका शिक्षा, उच्च शिक्षा में नारी का वर्चस्व, आर्थिक समानता, सामाजिक रूढियों से मुक्ति, कोटा में चाय की संभावना, पेट्रोल सर्वे, चन्दन वन लगाने का आह्वान, अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण, तकनीकी विकास, राजस्थानी गौरव की अक्षुण्णता हेतु सार्थक प्रयास और अमूल्य साहित्यिक थाती हमें दे कर विदा होने वाले महामानव की जन्मशती पर मैं हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ।