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सर्वेश्वर और उनका साहित्य

रमेश ऋषिकल्प
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से मेरी मुलाकात 1975 में हुई। उस समय मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदु कलेज में पढ रहा था। मैंने उसी समय हिन्दी साहित्य परिषद् के तहत एक कार्यक्रम में सर्वेश्वर जी को अपने कॉलेज में आमंत्रित किया था। उन दिनों दिल्ली के मंडी हाउस में स्थित श्रीराम सेंटर लेखक और कलाकारों के बैठने का शानदार अड्डा था। हर रोज शाम को ‘श्रीराम सेंटर’ में नेमिचंद जैन, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मणि मधुकर एवं अन्य बहुत सारे नाटककार, चित्रकार, पत्रकार, साहित्यकार सभी इट्ठे होते थे। यह वो समय था जब हिन्दी जगत् के सभी क्षेत्रो में नए-नए प्रयोग हो रहे थे। नया नाटक हिंदी जगत् में अपनी उपस्थित दर्ज करा रहा था। इसी समय समान्तर सिनेमा अपने नए परिवेश के साथ नए आयाम प्रस्तुत कर रहा था। मंडी हाउस इस पूरी गहमागहमी का केंद्र था। मैं हर रोज यहाँ जाया करता था और यहीं पर सर्वेश्वर जी से भेंट होती थी। सर्वेश्वर उन दिनों टाइम्स ऑफ इन्डिया की मशहूर पत्रिका ‘दिनमान’ में वरिष्ठ पत्रकार थे और साहित्य, कला, संस्कृति, नाटक सब पर लिखा करते थे और इस पत्र के इन्चार्ज थे। जल्दी ही सर्वेश्वर जी के आग्रह पर मैं भी दिनमान के इस कॉलम में लिखने लगा। उन दिनों दिनमान में लिखना बडी बात मानी जाती थी। इस सब के चलते सर्वेश्वर जी और उनके परिवार से मेरे घनिष्ठ संबंध हो गये। मैं शाम को सर्वेश्वर जी के घर जो बंगाली मार्केट में बाबर रोड पर था, हर रोज पहुँच जाया करता था। शाम को सर्वेश्वर जी ‘दिनमान’ से घर लौटते तो हम सब यानी विभा, शुभा, दुर्गावती सिंह, अर्चना वर्मा सब बैठकर चाय पीते। विभा और शुभा सर्वेश्वर जी की बहुत ही संस्कारवान बेटियाँ हैं जिनसे अब बहुत दिनों से बात नहीं हुई है। दुर्गावती सिंह ‘दूरदर्शन’ में थी। यह ऐसा समय था जब सभी साहित्यकार, कलाकार, फिल्म निर्माता, नाटककार, और नाट्य निर्देशक सब एक साथ बैठकर खूब बहसें करते थे। मेरे जैसे साधारण विद्यार्थी के लिए यह एक माहौल था, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता था। कई बार सर्वेश्वर के घर विजयदेव नारायण साही इलाहाबाद से आकर ठहरते थे। उनसे कविता, नयी कविता पर खूब बातचीत होती थी और मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता था।

सर्वेश्वर जी ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत इलाहाबाद से की। इलाहाबाद में ‘परिमल’ की गोष्ठियाँ हुआ करती थी। जो अब इतिहास बन गयी हैं। ‘नयी कविता’ की शुरुआत अगर हम ‘अज्ञेय’ की कविता से मानें तो उसका विकास ‘परिमल’ की गोष्ठियों में ही हुआ जिसमें सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीकांत वर्मा, जगदीश गुप्त, विजयदेव नारायण साही, रघुवंश रामस्वरूप चतुर्वेदी एवं अन्य बहुत से साहित्यकार शामिल हुआ करते थे। सर्वेश्वर जी की सक्रियता इन गोष्ठियों में काफी हुआ करती थी। सर्वेश्वर जी की कविताएँ नयी कविता आंदोलन को निरंतर नयी दिशा देती रही। प्रो.जगदीश गुप्त ने एक जगह लिखा है कि ‘मैंने सर्वेश्वर की कविताओं के बूते पर नयी कविता आंदोलन की लडाई लडी।’ परिमल की इन गोष्ठियों में न केवल काव्यपाठ ही हुआ करता था, बल्कि नये संदर्भों में कविता की चीर-फाड बडी निर्ममता से हुआ करती थी। यह वो समय था जब हिंदी में नए परिवेश की कविता जन्म ले रही थी। इलाहाबाद से ही नयी कविता नाम से पत्रिका के अंक प्रकाशित हुए। इस पत्रिका का सम्पादन जगदीश गुप्त, राम स्वरूप चतुर्वेदी और विजयदेव नारायण साही ने किया जो अब पुस्तक के रूप में तीन खंडों में उपलब्ध है। सर्वेश्वर जी की कविता अपने बिम्ब और प्रतीकों के लिए अलग से ही जानी जाती है और नयी कविता आंदोलन का सर्वश्रेष्ठ ढंग से प्रतिनिधित्व करती है। सर्वेश्वर का कवि और साहित्यकार बनना उनके जीवन संघर्ष की देन है। उनके साहित्य में उनके जीवन का संघर्ष परिलक्षित होता है, जो जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त जारी रहा। असल में सर्वेश्वर को जन्म से ही ऐसे संस्कार मिले थे जो व्यवस्था विरोधी थे और साहित्य की ओर ले जाने वाले थे।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जिला के गाँव पिकौरा में 15 सितंबर 1927 को हुआ। माता-पिता दोनों स्कूल में शिक्षक थे। ऐेंग्लो संस्कृत हाई स्कूल, बस्ती और क्वींस कॉलेज, वाराणसी तथा प्रयाग विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की । 1949 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही एम.ए. किया। कुछ समय तक एक स्कूल में मास्टरी की। इसके बाद पाँच वर्ष तक दफ्तर में क्लर्की की। कुछ वर्ष आकाशवाणी के कई केंद्रो में असिस्टेंट प्रोड्यूसर रहे। दिल्ली आने पर कुछ वर्ष दिल्ली आकाशवाणी के समाचार विभाग में कार्य किया। जब ‘अज्ञेयजी’ ने दिल्ली के टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन से दिनमान पत्रिका निकाली तो सर्वेश्वर जी दिनमान में पत्रकार के रूप में आ गए और 1963 से 1982 तक दिनमान के सम्पादक विभाग में रहे। इसके बाद 1982 से 1983 तक बच्चों की चर्चित पत्रिका ‘पराग’ के सम्पादक रहे। हम कह सकते हैं कि सर्वेश्वर का कार्यक्षेत्र ज्यादातर इलाहाबाद और दिल्ली ही रहा लेकिन वो जहाँ भी रहे अपनी रचनात्मक ऊर्जा के कारण सदैव चर्चित रहे। दिल्ली में कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उनका बडा सम्मान था। मुझे याद है कि होली पर प्रत्येक वर्ष कथक केंद्र उनके ही लिखे हुए गीति-नाट्य ‘हारी धूम मचो रे’ को आलीशान ढंग से बिरजू महाराज के निर्देशन में प्रस्तुत किया करता था। दिल्ली में उनका बहुचर्चित नाटक बकरी जब पहली बार कविता नागपाल के निर्देशन में खेला गया तो प्रेस ने उसे बहुत ही महत्त्वपूर्ण ढंग से लिया। बाद में उनकी यह ‘बकरी’ नाटक पूरे देश में बडे-बडे नाट्य निर्देशकों के द्वारा खेला गया। ‘बकरी’ में सर्वेश्वर ने गाँधीवादी विचारधारा के दुरुपयोग पर जबरदस्त प्रहार किया। सर्वेश्वर की मानसिकता हमेशा ही गरीब और पिछडे हुए लोगों को उठाने और उनके दर्द को पहचानने और समझने की रही। यह काम वो सिर्फ कविता में या साहित्य में लिखकर ही नहीं करते थे बल्कि व्यावहारिक रूप में भी लोगों की मदद करते थे। मुझे याद है कि एक दिन शाम को मैं उनके साथ इंडिया गेट की तरफ सडक पर पैदल घूमने जा रहा था तो सडक के किनारे एक भुट्टे वाला गरम-गरम भुट्टे भून रहा था। हम लोगों का मन भुट्टे खाने का हुआ। सर्वेश्वर ने उससे पूछा तुम्हारा काम ठीक चल रहा है? भुट्टे वाले ने अपना दुःख दर्द बताया। सर्वेश्वर जी ने कहा - ‘क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ,’ भूट्टे वाला रो पडा। उसने कहा- ‘साहब मेरी मदद तो ईश्वर ने भी नहीं की, आप क्या करेंगे? असल में उस गरीब भुट्टेवाले को पुलिस बहुत तंग करती, रिश्वत मांगती थी, उसकी पत्नी सख्त बीमार थी। वह असहाय हो गया था। अंततः सर्वेश्वर जी ने कारपोरेशन वालों से बात करके उसे एक अच्छा ठैला दिलवाया और ‘एम्स में उसकी पत्नी का इलाज भी करवाया। सर्वेश्वर और मैं अक्सर शाम को साथ-साथ घूमते और साथ-साथ नाटक, नृत्य और अन्य पेटिंग की प्रदर्शनियों में जाते। सर्वेश्वर जी का सब जगह सम्मान होता था। और मुझे इसका बडा लाभ मिलता था। सर्वेश्वर जी की वजह से मेरा परिचय, बडे-बडे पेंटर और कलाकारों से हो जाता था और मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता। सर्वेश्वर अपने जीवन और साहित्य में खुलेपन को पसंद करते थे। यह खुलापन उनकी कविता में ही नहीं, उनके सम्पूर्ण लेखन और व्यवहार में भी दिखाई देता है। उन्होंने कविताओं के साथ- साथ उपन्यास नाटक और कहानियाँ भी लिखीं जिनमें लोक जन-जीवन की पीडा और दर्द हमें हर जगह उभरता हुआ दिखाई देता है। उनकी कविताओं में हमें अपने समय की बदलती हुई वह संवेदना है जो ‘नयी कविता’ आंदोलन को एक खास रुख प्रदान करती है।

‘नयी कविता’ में सर्वेश्वर ने संवेदना के स्तर पर अपना एक विशिष्ट व्यक्तित्व बनाया, उन की सभी कविताओं को जब हम पढते हैं तो साफ दिखाई देता है कि उनकी संवेदना का स्तर एक पक्षीय या एकरसता पूर्ण नहीं है। जीवन के अनेकानेक संघर्षों ने जिसे मुक्तिबोध ‘नयी कविता का आत्मसंघर्ष’ कहते हैं सर्वेश्वर की संवेदना को बहुआयामी और बहुस्तरीय बनाया। मानव जीवन के मार्मिक पलों का संवेदनात्मक आकलन सर्वेश्वर में हमें भरपूर मिलता है। उनकी कविता में रस और राग है तो विरोध और विद्रोह भी है। वो किसी बनी बनाई लीक पर चलने को तैयार नहीं हैं। और यह बात वो साफ-साफ कहते भी हैं-

लीक पर वे चलें जिनके

चरण दुर्बल और हारे हैं

हमें तो जो हमारी यात्रा से बने

ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं।

सर्वेश्वर की कविताएँ चाहे वो रस और राग की हों या व्यवस्था के विरोध की हों, एक नयी जमीन तलाशती हैं। जब सर्वेश्वर की संवेदना रोमानी होती है तो खुल कर अपने आप को अभिव्यक्त करती है, वहाँ कोई छल नहीं है। इसलिए वो कह पाते हैं कि-

तुम्हारा तन

एक हरी भरी झाडी है

जिसमें मैं मेमने-सा

अपना तन रगडता हूँ।



मैं तुम्हारे भद्दे होठों की

काली दरारों में भी जी सकता हूँ।

हो सकता है कुछ नैतिकतावादियों और जनवादियों को उनकी ऐसी कविताएँ अच्छी न लगें पर हमें जान लेना चाहिए कि एक मुकम्मल कवि की संवेदना में ऐसे आवेग प्रवाहित होते रहते हैं क्योंकि प्रेम क्रांति का दूसरा पहलू ही है। विद्रोह के लिए भी आवेग की आवश्यकता होती है। यह आवेग कोमलता के प्रति समर्पित होता है और विद्रोह के प्रति आक्रामक। जब सर्वेश्वर की संवेदना कोमलता को निहारती है तो कहती है-

घास की एक पत्ती के सम्मुख

मैं झुक गया

और मैंने पाया कि

मैं आकाश छू रहा हूँ।

असल में सर्वेश्वर की संवेदना का आवेग विद्रोह में भी इसी ढंग से अभिव्यक्त होता है। उनकी कविता ‘कुआनो नदी’ में जगह - जगह यह आवेग हमें दिखाई देता है जो समाज को सचेत करते हुए कहता है-

पानी चढ रहा है

खून खौल रहा है

बहुत करीब आ गया है

खतरे का निशान।

असल में सर्वेश्वर अपने समय के जिस परिवेश से घिरे हुए थे उनकी कविता उसी परिवेश की बेचैनी को बयान करती है क्योंकि कवि के लिए यह बहुत जरूरी है कि वो जिस परिवेश में जी रहा है उसका उसे बोध होना भी जरूरी है। ‘अज्ञेय’ ने एक जगह लिखा है ‘परिवेश जो मेरे आस-पास है- वह केवल काल नहीं है, उसका होना जितना जरूरी है- उसका आस-पास होना भी उतना ही जरूरी है। परिवेश केवल देश भी नहीं है उसका आस-पास होने का बोध भी जरूरी है।’ सर्वेश्वर की खासियत ही यही है कि उन्हें अपने परिवेश का पूरा बोध है और यह बोध ही उनकी कविता बनता है-

यह बन्द कमरा

सलामी मंच है

जहाँ मैं खडा हूँ

पचास करोड आदमी खाली पेट बजाते

ठठरियां खडखडाते

हर क्षण

मेरे सामने से गुजर जाते हैं।

झाँकियाँ निकलती हैं

ढोंग की विश्ववासघात की

बदबू आती है हर बार

एक मरी हुई बात की।

सर्वेश्वर की कविताएँ पढते हुए मुझे उस में उत्तर आधुनिकता की अनुगूँज भी सुनायी देती है जिसमें कहा जा रहा हैं कि अब लेखक की मृत्यू हो चुकी है, इतिहास, संबंध और बहुत कुछ मर चुका है। असल में यह बोध लेखक में तभी जन्म लेता है जब वह एक निराशा में से गुजर रहा होता है या उसमें जी रहा होता है। यह निराशा कवि और लेखक को बहुत अकेला भी कर देती है। सर्वेश्वर अपने समय में जिस अनुभव से गुजर रहे थे वह वही था जो 1990 में अल्विन कर्नान ने अपनी किताब ‘दि डैथ ऑफ लिटरेचर’ में अनुभव किया था जिसमें उन्होंने अमेरिकी साहित्य के खत्म होने की बात कही थी क्योंकि अमेरिकी जीवन और संबंधों में क्षरण दिखाई दे रहा था। सर्वेश्वर का कवि भी क्या उसी मानसिकता से गु*ारता नहीं दिखाई दे रहा है जब वो अपनी कविता में कहता है-

शब्द जिन्हें मैं बुनता हूँ

मर चुके हैं,

शब्द जिन्हें मैं सुनता हूँ

मर चुके हैं

सम्बन्ध जिन्हें मैं जीता हूँ

मर चुके हैं,

सम्बन्ध जिनमें मैं बीता हूँ

मर चुके हैं

हर क्षण एक दर्पण टूटता है

एक आकृति मरती है

चाहे वह ईश्वर की हो

या आदमी की।

इस कविता को पढकर लगता है जैसे कवि समकालीन जीवन के नरक में अपने आपको असहाय पा रहा है और उसे लग रहा है कि सब कुछ मर गया है। सर्वेश्वर नयी कविता के कवि हैं। यह समय आधुनिक भावबोध का समय था जो धीरे-धीरे आधुनिकता के धरातल को होड रहा था और इस आधुनिकता के कलेवर में से कुछ ऐसा तलाश कर रहा था जो आधुनिकता में से ही जन्म लेना चाहता था। एक बेचैनी हमें यहाँ साफ दिखाई देती है जहाँ आधुनिकता से मोह भंग हो रहा हैं। सर्वेश्वर की कविता जो शुरू सम्भावनाओं से होती है और कहती है-

तुम्हारे साथ रहकर

अक्सर मुझे लगा है

कि हम असमर्थताओं से नहीं

सम्भावनाओं से घिरे हैं ः

आखिर क्या कारण है कि सर्वेश्वर के अंदर का साहित्यकार सम्भावनाओं से शुरू होता है पर धीरे-धीरे उसे लगता है कि सब कुछ मर गया है। मुझे बार-बार सर्वेश्वर के साहित्य में उत्तर आधुनिकता के लक्षण दिखायी देने लगते हैं। यानी सर्वेश्वर आधुनिकता के निरर्थकता बोध से बेचैन होने लगते हैं। ‘जंगल का दर्द’ कविता संग्रह की कविता में यह उत्तर आधुनिकता भरपूर दिखाई देने लगती है। कुछ लोगों को मेरी बात चौंका सकती हैं जिस प्रकार हम मनोहर श्याम जोशी के उपन्यासों में उत्तर आधुनिकता का बोध देख सकते हैं वैसे ही हम सर्वेश्वर की कविताओं में यह उत्तर आधुनिक भावबोध साफ तौर पर देख सकते हैं। उनके उपन्यास ‘पागल कुत्तों का मसीहा’ तो और भी इस बात को प्रमाणित करता है। असल में आधुनिकता से यह मोह पूरे विश्व में 1958 के आस-पास से ही होने लगता था। 1958 में ही हन्ना एरेन्डर में अपनी किताब ‘ ।।ह्वद्वड्डठ्ठ ष्टश्ाठ्ठस्रद्बह्लद्बश्ाठ्ठ’ में लिखा है कि ‘आधुनिक युग जो मनुष्यय की सृजनात्मक शक्ति की इतनी अपूर्व और उत्साहपूर्ण उपलब्धियों से आरम्भ हुआ, उसका अंत इतनी निरर्थक तथा घातक निष्त्रि*यता में हुआ कि इतिहास में इसका दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है।’ भारत की आजादी के बाद यहाँ के साहित्यकारों ने पश्चिम से आती हुई जिस आधुनिकता को हाथों हाथ लिया उसी आधुनिकता से वो जल्दी ही ऊब गये क्योंकि वह आधुनिकता हमारी मानसिकता का हिस्सा आज तक नहीं पायी। उसने हमारी जीवन शैली में कई प्रकार के विकार पैदा किए और आज हम उसके फल भोग रहे हैं। सर्वेश्वर की चेतना में हमें ठहराव नहीं दिखायी देता। वो विकसित चेतना के कवि हैं। वो अपने सांस्कारिक मन पर प्रयोग करते चलते हैं और फिर जिस नतीजे पर पहुँचते हैं, वह यह है-

कभी-कभी लगता है

यह वह दुनिया नहीं है जहाँ मेरे पूर्वज रहते थे,

या जहाँ रहने के लिए मैं पैदा हुआ हूँ।

कैसी विचित्र है *ान्दगी

जिसे मैं जीता हूँ।

एक सडा कपडा जो फटता जाता है

ज्यूं-ज्यूं सींता हूँ।

असल में सर्वेश्वर के पूरे साहित्य में ही हमें यह मोहभंग की स्थिति दिखायी देती है। वो अक्सर कहा करते थे कि जो बात मैं कविता में नहीं कह पाता उसे शायद मैं नाटक में कह पाऊँ। उनकी यह छटपटाहट उनके ‘बकरी’ नाटक में खुल कर दिखायी देती है। वैसे उन्होंने बच्चों के लिए भी नाटक लिखे हैं लेकिन ‘बकरी’ उनका एक ऐसा सशक्त नाटक है जिसमें अपने समय से उनका विद्रोह हमें साफ-साफ दिखाई देता है। नाटक के शुरू में ही नाटक के परम्परागत मंगलाचरण को लेकर ही नाटककार अपनी असहमति इस प्रकार व्यक्त करता है ‘नट विद्रोही है। उसे मंगलाचरण पर यकीन नहीं। सारी मंडली मंगलाचरण गाना शुरू करती है। नट चुप रहता है। नटी के आँखें तरेरने पर वह गाता है पर उसे राजनीतिक संदर्भ से जोड देता है। नाटक का नट मंगलाचरण में गाता है -

पाँच देव सम पाँच दल, लगी-ढोंग की रेस।

जिनके कारण हो गया, देस आज परदेस।।

‘बकरी’ नाटक में सर्वेश्वर ने अपने समय के ऐसे प्रश्न उठाए हैं जो तत्कालीन देश-काल और व्यवस्था को चुनौती देते हैं और गाँधीवादी विचारधारा का दुरुपयोग करने वालों को कटघरे में खडा कर देते हैं। गाँधी की बकरी का प्रतीक इस ढंग से प्रस्तुत किया गया है जहाँ धूर्तों ने उसे अपने स्वार्थों की सिद्धी के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। ऐसा करके गाँधी की बकरी को गरीब जनता से छीन लिया जाता है और समाजद्रोहियों ने पूरे इतिहास को नेस्तनाबूद कर दिया है। ‘बकरी’ का एक पात्र कहता है - ‘जो इतिहास को झुठलाता है वह समाजद्रोही है, देशद्रोही है। समय उसे कभी माफ नहीं करेगा। यह युग झूठे दावों का युग नहीं है। अधिकारों का दावा करने के पहले देखना होगा कि आफ कर्त्तव्यों की बुनियाद क्या है।’ असल में इस नाटक में गाँधी अपनी बकरी के माध्यम से गरीब और सत्ताधारियों के बीच बढते हुए दिखायी देते हैं और हम देखते हैं कि जो गाँधी गरीबों का था, गरीबों के लिए लडा था अब उसी को सत्ताधारी अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रहे हैं। नाटक का एक अन्य पात्र कहता है- ‘यह बकरी सबकी है। इसीलिए किसी की नहीं है। इससे मोह का मतलब अपने प्रति निर्ममता है। ऐसे लोगों की दुनिया में कमी नहीं जो कहेंगे यह बकरी उनकी है। पर इतिहास को झुठलाया नहीं जा सकता।’ सर्वेश्वर का यह पूरा नाटक ऐतिहासिक संदर्भ मंद लिखा हुआ नाटक है जहाँ इतिहास हमें बताता है कि असामाजिक तत्त्व किस प्रकार सचाई और वास्तविकता को कैसे हाईजैक कर लेते हैं। अगर हम गंभीरता से सोचें तो हम पाएँगे कि आजादी के बाद से हमारा पूरा इतिहास असामाजिक तत्त्वों ने कैसे हाइजैक कर लिया और गाँधी की बकरी भी माफियाओं के द्वारा छीन ली गयी। नाटक में वह गरीब औरत गुहार लगाती है कि वह बकरी उसके यहाँ पैदा हुई है, उसने ही उसकी परवरिश की है और वह उसके परिवार का जीवन आधार है, वह उसे लौटा दी जाय- ‘हुजूर ई बकरी हमार है। हम गरीब आदमी हैं, आप किसी और बकरी को गाँधी की बकरी बनाय लें। हमार बच्चे एही के दूध से रूखी रोटी खात हैं। एही के सहारे हम जीय रहे हैं।’ औरत की यह गुहार सत्ताधारी माफिया नहीं सुनता। औरत को मार पीट कर भगा देते हैं। सर्वेश्वर के इस नाटक को पहली बार ‘जन नाट्य मंच’ द्वारा 13 जुलाई,1974 को दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में खेला गया और फिर भारत की कई भाषाओं में अनूदित होकर भारत के दूसरे शहरों में भी खेला गया।

सर्वेश्वर के पूरे साहित्य में हमें ऐसे भारतीय समाज के दर्शन होते हैं जो आजादी के बाद भी एक ऐसी परतंत्रता में जी रहा है जिसे वह खुद नहीं जानता, सिर्फ उसे जिये जा रहा है। सर्वेश्वर ने ‘दिनमान’ में अपने ‘चर्चे’ और चरखे’ कॉलम में जिसे वो नियमित रूप से लिखा करते थे, अपने समय के अनेकानेक प्रश्नों को उठाया। उनका यह कालम उन दिनों बहुत पढा जाता था। इसमें सर्वेश्वर सत्ता समाज के बडे से बडे लोगों का पर्दाफाश निडर होकर किया करते थे। मिसाल के तौर पर उनका यह चरचे और चरखे पढने लायक है। इसका शीर्षक है ‘प्रधानमंत्री की झोंपडी’- ‘विधान नगर में 50 लाख के कांग्रेस अधिवेशन में आठ लाख रुपये की झोंपडी बनाने पर खर्च हुआ। पडी नजर हटती ही नहीं। यह झोंपडी आधे एकड में है 333 प्रधानमंत्री के शयनकक्ष में वातानुकूलित यंत्र लगे हैं - मर्जी मुताबिक ठंडा और गरम कीजिए। कक्ष को विष्णुपुर की चटाइयों से सजाया गया है। 333 यह झोंपडी देश के गरीबों से जुडने का प्रतीक है। हर क्षण उनकी याद बनाये रखने के लिए बनी है। 333 प्रधानमंत्री की झोंपडी देखकर ‘गरीबी हटाओ’ के रोमांटिक समाजवादी मुहावरे का परिचय हो जाएगा। सुनते हैं झोंपडी आगे सरकारी मेहमानों के काम आएगी।’

सर्वेश्वर ने साहित्य की कई विधाओं में लिखा है। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास, बाल-साहित्य, नाटक, यात्रा-संस्मरण सभी विधाओं में नए प्रयोग किए हैं। ‘शमशेर’ ‘नेपाली कविताओं का और रूसी भाषा की कविताओं के संकलन संपादित भी किए हैं। सर्वेश्वर हिन्दी साहित्य में एक अग्रणी लेखक के रूप में हमेशा जान जायेंगे।