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छह कविताएँ

प्रेमशंकर शुक्ल
(१) मन
हमारी आँखों में
हमारे आँसुओं के यात्रावृत्तान्त लिखे हुए हैं
सब एक दिन में तय नहीं होता
लेकिन कभी-कभी
एक क्षण ही तय कर देता है
अपने सब दिन
टूटने में मन से अधिक नाजुक कुछ नहीं है
मन को जोड-जोड कर ही
जीते हैं हम अपनी आयु
सुना नहीं आज तक कभी
बिना टूटा हुआ मन है किसी के पास
देश-देशान्तर या पृथ्वी में कहीं भी
कितना अजब है यह कि टूट-टूट कर मन
मन को घडता रहता है।

(२) पार-संसार
आँख से अधिक आँख के परे देखता हूँ
कान के बाहर सुनता हूँ
कान से अधिक
जीभ के कहे से जआदा है बहुत
बिना जीभ के कहा
त्वचा ने नहीं छुआ है सब कुछ
त्वचा की छुअन से कहीं गुना अधिक है
हमारा स्पर्श संसार
अथाह-असीम है जीवन राग
चिह्वित चिन्ता है जो उससे इधर-उधर भी है कविता
करती हुई जीवित-अजीवित का सूक्ष्म अन्वेषण
जीवन मृत्यु का निषेध है
उम्र के पार भी
हमारी उम्र चलती रहती है।

(३) अपना शोकगीत
कविता में हम अपने पाप गाते हैं
प्रायश्चित्त भी
विडम्बनाओं में ही उलझती है
हमारी पुकार
देवता के छल में
हाँफता रहता है भरोसा
हम अपने लपट खाए अधखिले को बिसूरते हैं
हम जीवन में सबसे अधिक
अपने ही शव पर रोते हैं
एक दिन ऐसा भी आता है
कुछ नहीं माँगते हम किसी से
दुख में निर्भय खडे हो जाते हैं हम
गाते हुए अपना शोकगीत !!

(४) ईश्वर
ईश्वर सब भाषाएँ जानता है
लेकिन रोता वह अपने शून्य में ही है
हँस-हँस कर अपने को गमशून्य करना
सबसे पहले ईश्वर ने ही आजमाया
ईश्वर का भी अपना ही
संघर्ष है इस समय
पाखण्डियों के चुंगल से
अपने को बचाकर रखना
ईश्वर को लगातार मिल रही है चुनौती
परेशान है आजकल ईश्वर बहुत
सो नहीं पा रहा एक भी याम
सिसक-चीख रहा है वह कब से
कल उसकी करुणा पर कोई
बच्चों का रक्त उलीच कर
चला गया!!

(५) सीधी बात
सीधी बात की एक बडी खासियत होती है
कि वह टेढे आदमी को
अक्सर समझ में नहीं आती
छलछिद्र से चिढती है सीधी बात
मासूमियत और साफगोई पर फिदा रहती है
निश्छल मन सीधी बात का रहवास है
आँख के पानी में तैरना सहज गुन
तमाम जाल-जंजाल तर्कजाल फैलाते
फिर रहे हैं जब खुराफाती दिमाग
तब हमें सीधी बात की
बहुत जरूरत आन पडी है
गाँधी बाबा से ही मिली है यह सीख कि -
छल प्रपंचों के घटाघोप में
सीधी बात ही
असली बात होती है!

(६) प्रश्नशैय्या
सही समाधान की अन्दरूनी जीवन-आकांक्षा में
प्रश्न पर एक प्रश्न रखा
फिर रखा एक प्रश्न
रखता रहा प्रश्न पर प्रश्न
लेकिन मिला नहीं बहुतेरे प्रश्नों को
उचित उत्तर या माकूल समाधान
आँखों में गडते आँसू
पूछते हैं यह भी सवाल
कि क्यों मिले उन्हें गलत जवाब
फिर भी जीते हुए जारी रहा
रखना प्रश्न पर प्रश्न
प्रश्नों के रखने के सिलसिले में ही
बीत चली अब कितनी उमर
अर्थात् जीकर पार आ गए हम
कितनी सारी राह
अनुभवी आँखें अपनी पूरी गहराई से
निकालती है निगाह
सोचते हुए कि बतर्ज पितामह भीष्म
प्रश्नों की नोंक या प्रश्नशैय्या ही
क्या हमारी मृत्युशैय्या
नहीं बनती है
चर्चित कवि सम्पादक हैं। पूर्वग्रह के सम्पादन से जुडे हैं।