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प्रवासन और भोजपुरी लोकगीत

प्रियंका कुमारी
आमतौर पर प्रवासन एक भौगोलिक सीमा से दूसरी भौगोलिक सीमा में जाकर बसने की प्रक्रिया को कहा जाता है; लेकिन आज के संदर्भ में उपर्युक्त प्रवासन की परिभाषा समाज की संवेदनशीलता और असंवेदनशीलता दोनों को दर्शाता है। संवेदनशीलता इस अर्थ में कि जो व्यक्ति या समूह इस प्रक्रिया से गुजरता है; वह इसके असल निहितार्थ को समझता है और असंवेदनशीलता इस अर्थ में कि पूँजीवाद के मसौदा के अनुसार प्रवासन की प्रक्रिया कोई जटिल प्रक्रिया नहीं है। क्योंकि हमारे सामने ’विश्व ग्राम‘ नाम की एक अवधारणा है, जिसकी आड में पूँजीवाद समग्र मानवता के विकास को बाधित करना चाहता है। पूँजीवादी भूमंडलीकरण श्रम के बाजार को विभाजित करके फलता-फूलता है। प्रवासी श्रमिकों को उनकी कुशलता के अलावा भाषा, लिंग, नस्ल, जाति, धर्म और राष्ट्रीयता के आधार पर विभाजित किया जाता है। इस तर्क के आधार पर प्रवासन की प्रक्रिया से जब सामाजिक इकाई गुजरती है, जिसका गहराई से अध्ययन आज के समय की जरूरी मांग मालूम पडता है।
वास्तव में प्रवासन मनुष्य की सामाजिक विकास की प्रक्रिया के साथ चलने वाला एक क्रम है। मनुष्य को जब अपनी बुनियादी जरूरतों का अहसास हुआ, तब वह इसकी पूर्ति के लिए प्रयास करने लगा। इस प्रयास के क्रम में वह अपने में श्रम की शक्ति विकसित करने लगा, जिससे गतिशीलता का भाव उसमें अपने आप आ गया। आरम्भिक प्रवासन के संदर्भ में राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है - ’’जीविकार्जन के लिए परिवार को एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते ही नहीं रहना पडता था, बल्कि आजकल के खानाबदोशों की भाँति अर्जन क्षेत्र के लिए दो परिवारों में झगडा होने का भी डर था।‘‘१ इस तरह से मानव की उत्पत्ति से लेकर आज उत्तर औपनिवेशिक युग में प्रवासन साथ-साथ चलता हुआ प्रतीत होता है। आदिमयुग में जहाँ एक ओर मनुष्य अपनी उदरपूर्ति के लिए एक भौगोलिक क्षेत्र से दूसरे भौगोलिक क्षेत्र में भटकता था, वहीं दूसरी ओर आज उत्तर औपनिवेशिक युग में समाज के विकास के साथ-साथ मानव अपनी बुनियादी आकांक्षाओं तथा अर्थ और सुख-सुविधा से लैस जन्दगी पाने के लिए एक देश से दूसरे देश में प्रवास कर रहा है।
भारत में व्यापक स्तर पर प्रवासन की मनोवृत्ति लगभग एक ही है। इसे समझने के लिए हम इसको दो कालखण्डों में रखकर समझ सकते हैं। प्रथम औपनिवेशिक प्रवासन और द्वितीय उत्तर औपनिवेशिक प्रवासन। हालाँकि उपनिवेश पूर्व राष्ट्रीय स्तर पर प्रवासन का छिटपुट रूप दिखाई देता है परन्तु यह प्रवासन किसी दबाव या मजबूरी में न आकर स्वेच्छा से किया जाता था। उपनिवेशवादी दौर के प्रवासन में श्रमिकों की संख्या अधिक थी।
भोजपुरी भाषा का क्षेत्र इस प्रक्रिया से गुजरता रहा और गुजर रहा है। भारतीय इतिहास में भोजपुरी प्रदेश के लोगों द्वारा सामंती तथा औपनिवेशिक शोषण के कारण आई भीषण गरीबी से मुक्ति तथा रोजगार की तलाश के लिए कभी स्थाई और कभी मौसमी प्रवास-प्रक्रिया को अपनाने का साक्ष्य मिलता रहा है। इस संदर्भ में बद्री नारायण ने लिखा है कि - ’’सामंती वर्गों द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए जुलूस निकाले जाते हैं। इन जुलूसों में मलमल का कुरता पहने, पान खाए, गले में सोने की चैन डाले, नारे लगाते लोगों की अधिकता होती है। इनके नारों में प्रायः विकृति बोध के नारे होते हैं। इनके हाथों में तख्तों, बैनरों की जगह राइफलें एवं बंदूकें होती हैं। दूसरी तरफ किसान जनता द्वारा निकाले जाने वाले जुलूसों में फटे-मैले कुचैले कपडे पहने औरतों, पुरुषों एवं बच्चों की बहुतायत होती है। उनके हाथों में तख्ते-बैनर, लाठी, गोजी, हँसिया, इत्यादि पारम्परिक हथियार होते हैं, इनके नारे सचेत, एकजुट एवं तर्कपूर्ण होते हैं। ये परिदृश्य दोनों के मध्य राजनीतिक संस्कृति के अंतर को वस्तुतः सांस्कृतिक तनाव, सांस्कृतिक द्वन्द्व, सांस्कृतिक संघर्ष तीनों सांस्कृतिक ध्वनियों के भिन्न-भिन्न प्रतिघातों को रूपायित करते हैं।‘‘२ ऐसी परिस्थितियाँ गुलामी के बाद या कमोबेश समसामयिक हैं। लेकिन गुलामी के दौर में या उससे पहले इस क्षेत्र में छोटे-बडे सामंतों या उनके द्वारा स्थापित कारखानों में रोजगार सस्ती दरों पर उपलब्ध हो जाते थे। इसमें भी जाति आधारित रोजगार थे जिससे निम्न तबके के लोग वंचित रह जाते थे। ऐसी परिस्थितियों में उन्हें कलकत्ता, आसाम, झरिया, धनबाद तथा नेपाल आदि जगहों में प्रवासन को अपनाना पडता था।
भोजपुरी लोकगीत समाज के असल यथार्थ से पैदा हुआ है। इन लोकगीतों का अध्ययन करते हुए प्रवासन की पीडा को शिद्दत के साथ महसूस किया जा सकता है। जो बनिजिया, सिपहिया, बिदेसिया और गिरमिटिया इत्यादि लोकगीतों के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है। भोजपुरी के लोक साहित्यकार भिखारी ठाकुर ने ’बिदेसिया‘ नामक लोकनाट्य की रचना कर, इस लोक पीडा को जनता में प्रचलित किया।
’’पियवा गइलन कलकातावा ए सजनी!
तुरि दिहलन पति-पत्नी-नातवा ए सजनी,
किरिन भीतरे परातवा ए सजनी! पिया...।‘‘३
एक अन्य भोजपुरी लोकगीत में अपने पुत्र के परदेश जाने पर उसकी माँ उससे संदेश भेजते रहने और दुश्मनों से डटकर सामना करने के लिए कहती है -
’’...जाहु तुहु जाहू बबुआ मगह रे देसवा।
आपन कुसल सब भेजिह नु रे।।
मरले जनि मरहि बबुआ कटले जनि कटइह। आरे मुदई बबुआ रिह जरि छारवा रे।।‘‘४
अपने लिए रोजगार एवं रोजी-रोटी की तलाश के लिए भोजपुरिया मजदूर परदेश में तमाम तरह के कष्ट और अपमान को बर्दाश्त करके रहता है। घर के लोग भी दो पैसे आने की उम्मीद में उसे सपोर्ट करते हैं। परन्तु परदेशी की पत्नी जो अभी-अभी ब्याह कर आई है, पति वियोग को सह नहीं पाती, उसे अपने पति का संग-साथ चाहिए*-
’’पहिले ही चिट्ठी चाचा भेजायो;
बबुआ नोकरि जनि छोड।
रुपया बडा ही चीज।।
दूसरी ही चिट्ठी चाची भेजायो;
बचवा नोकरि जनि छोड।
तीसरी चिट्ठी आमा भेजायो;
बबुआ नोकरि जनि छोड।
रुपया बडी ही चीज।।
चौथी ही चिट्ठी पिता भेजायो;
बबुआ नोकरि जनि छोड।
रुपया बडा ही चीज।।
पाँचवीं चिट्ठी धनिया भेजायो;
सईयाँ नोकरि तुम्म छोड।
रुपया है ना कुछ चीज।।‘‘५
१९वीं सदी में पूँजीवाद के आगमन के फलस्वरूप रेल, डाक तथा संचार के अन्य माध्यमों का विकास हुआ। रेल ने भोजपुरिया लोगों के जीवन को काफी हद तक प्रभावित किया। जिसे उस समय के प्रसिद्ध भोजपुरी लोकगीत ’रेलिया बैरन पिया को लिये जाए रे‘ तथा भिखारी ठाकुर के लोकनाट्य ’बिदेसिया‘ में देखा जा सकता है। औपनिवेशिक शासन द्वारा रोजगार देना तथा आवागमन के साधनों के विकास के कारण गाँवों से शहरों की ओर जाकर कमाने की स्थितियाँ पैदा हुईं। प्रवासन की इस उत्तरोत्तर बढती प्रक्रिया और समस्याओं के और जटिल होते जाने से स्थितियाँ भयावह होती गईं। जिसे यह समाज जल्द ही भाँप गया -
’’रेलिया ना बैरी जहजिया ना बैरी
से पइसवा बैरी ना
सइयां के ले गइल बिदेसवा
से पइसवा बैरी ना।‘‘६
उपरोक्त गीत के सम्बन्ध में मैनेजर पाण्डेय का कहना है, ’’इस गीत में पूँजीवाद के बाहरी रूप अर्थात् उसके साधनों से अधिक उसके असली चरित्र का विरोध है। पूँजीवाद रुपये-पैसे पर टिकी लाभ-लोभ की ऐसी व्यवस्था है, जो मानवीय सम्बन्धों को भी प्रभावित करती है। इसी प्रवृत्ति का विरोध इस गीत में है। इस अमानवीय स्थिति की अत्यन्त मार्मिक अभिव्यक्ति भिखारी ठाकुर के मशहूर नाटक ’बिदेसिया‘ में हुई है। पूँजीवाद के ऐसे प्रभावों का विरोध हिन्दी साहित्य में बहुत बाद में आया।‘‘७
औपनिवेशिक दौर में अनुबंधित श्रमिकों के रूप में बडे पैमाने पर भारतीयों को देश से बाहर सुदूरवर्ती औपनिवेशिक बागान क्षेत्रों में ले जाया गया। औपनिवेशिक प्रवासन के बारे में लिखते हुए पुष्पिता अवस्थी का कहना है - ’’यहाँ से अधिक सस्ते मजदूरों का मिलना असम्भव था। अट्ठारहवीं सदी के आरम्भ से ही भारत से भारतीय मजदूरों का उपनिवेशों में जाना शुरू हो चुका था। सन् १८३० ई. में फ्रांस देश से जोसेफ आरगोंट व्यापारी मजदूरों की खोज में भारत पहुँचा था। इस तरह पुरानी दासप्रथा को शर्तबंदी प्रथा के मजदूरों के नाम से थोडा सा पाश्चात्य सभ्यता का रंग देकर उसे पुनर्जीवित किया गया। १८३४ ई. से इसे कार्यान्वित किया गया। पराधीन भारत से आये मजदूरों के लिए शर्तबंदी अर्धगुलामी का कानून सन् १८३४ ई. में राजसम्मत हो गया और इसके आधार पर सर्वप्रथम भारी संख्या में भारतीय मजदूर बनाकर मॉरीशस भेजे गये। फिर भारतीय मजदूर सन् १८४५ ई. में ब्रिटिश गयाना, त्रिनिडाड, जमैका और ग्रनाज में भेजे गये।‘‘८ इन देशों में रह रहे गुलाम भोजपुरी मजदूरों के खून-पसीने से बनी इसकी मिट्टी के कण-कण में गुलामी का दर्द समाया हुआ है। दास गुलामी के किस्सों के साथ शर्तबंदी मजदूरों की बंधुआ दास्तान की कहानियाँ यहाँ की मौखिक परम्परा में मौजूद है। प्रवासी भारतीय मजदूरों की दयनीय दशा का चित्रण फीजी में प्रचलित प्रस्तुत भोजपुरी लोकगीत में देखा जा सकता है -
’’फिरंगिया के रजुआ मा छूटा मोरा देसुआ हो, गोरी सरकार चली रे बिदेसिया
भोली हमें देख आरकारी भरमाय हो,
कलकत्ता पार जाओ पाँच साल रे बिदेसिया... दिन रात बीती हमरी दुख में उमरिया हो,
सुखा सब नैनूवा के नीर रे बिदेसिया।‘‘९
सूरीनाम के कवि अमर सिंह रमण की कविता ’प्रवासी विरह‘ में भी कुछ इसी तरह के दर्द और स्मृतियों को देखा जा सकता है -
’’श्रीराम टापू के बदले पकडा हमें दलाल,
यहाँ तो चींटी-चूंटा काटे बुरा हो गया हाल। दिन-भर मेहनत करते-करते सूख गया मोरा गाल।। रे मुन्ना भेंट ना होइहैं हमार।।‘‘१०
भारतीय प्रवासी की यह विशेषता है कि वे विदेश में रहते हुए भी अपने देश की सांस्कृतिक परम्पराओं को निभाते रहे हैं। वास्तव में भारतीय प्रवासी समुदाय केवल गिरमिटिया उत्पादनकर्ता ही नहीं होते हैं। वे सूक्ष्म को वृहत्तर और स्थानीयता को वैश्विकता से जोडते हुए एक अंतरमहाद्वीपीय बहुआयामी ’प्रवासी मानवता‘ को जन्म देते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि इनकी अभिव्यक्तियों का अध्ययन किया जाए जो कि एक सांस्कृतिक संक्रमण के बीच से पैदा हो विकसित हुआ है। साथ ही गिरमिटिया मजदूरों के सम्बन्ध में जो इतिहास लिखा गया, उसे तथ्यपरक नहीं कहा जा सकता। परन्तु वहाँ रह रहे लोग अपने पुरखों से जो किस्से-कहानियाँ सुनते हैं, उसे विभिन्न विधाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं जो ज्यादा प्रमाणिक हो सकता है। मैनेजर पाण्डेय ने ’लोकगीतों और गीतों में १८५७‘ की भूमिका में लिखा है कि ’’इतिहास तथ्यों की चर्चा करता है, लेकिन दारुण और दर्दनाक स्मृतियों की नहीं, जबकि पराजित और पराधीन मनुष्यों की स्मृति बहुत लम्बी होती है। ऐसी स्मृतियों को सजीव, प्रभावशाली और दीर्घजीवी बनाने का काम साहित्य करता है, विशेष रूप से लोकसाहित्य; क्योंकि लोकसाहित्य की रचना लोक करता है और इस तरह वह अपनी स्मृतियों को दीर्घजीवी बनाता है।‘‘११
उत्तर औपनिवेशिक दौर में विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों में प्रवासन होता है। उत्पीडतों, व्यापारियों और श्रमिकों तीनों का प्रवासन इस दौर में होता है। रोजगार के क्षेत्र में एक तरफ तो देश से विदेश तक प्रतिद्वंद्विता बढने के साथ देश के अंदर दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, बैंगलोर तथा चैन्नई आदि जगहों पर औने-पौने मजदूरी पर काम करने के लिए प्रवासी बेबस हुए। वहीं विदेशों में सऊदी अरब, अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, रूस और जर्मनी आदि जगहों पर इनका प्रवासन देखने को मिलता है। औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक काल के प्रवासन में यही फकर् है कि औपनिवेशिक काल में मजदूर जहाँ मजदूरी के लिए ले जाये गये, वहीं उत्तर औपनिवेशिक काल में मजदूरी करने के लिए विवश किये गये। गोरख के गीत में इसकी अभिव्यक्ति दिखाई देती है*-
’’कंकड चुनि-चुनि महल बनवलीं हम भइलीं परदेसी तोहरे कनुनिया मारल गइलीं कहवों भइल ना पेसी कनुनिया अइसन हम नाहीं मनबो
महलिया हमरा के भावेले
दिनवां खदनिया से सोना निकरलीं
रतिया लगवलीं अंगूठा
सगरो जिनगिया करजे में डूबलि
कइल हिसबवा झूठा
जिनगिया अब हम नाहीं डूबइबो
अछरिया हमरा के भावेले।‘‘१२
एक अन्य गीत में भी कुछ इसी तरह की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है -
’’हमरा के छोडिके न जइहऽ बिदेसवा
जइहऽ त भूलिहऽ न भेजल सनेसवा
तू हवऽ नेहिया के पतिया हो,
हम अछरिया तोहार.....
तोहरे हथौडवा से कांपे पूंजीखोरवा
हमरे हंसुअवा से हिले भूंइखोरवा
तू हवऽ जूझे के पुकरवा हो, हम तुरहिया तोहार, तू हवऽ श्रम के सुरुजवा हो,
हम किरिनिया तोहार।‘‘१३
आजादी के इतने सालों बाद भी प्रवासन की प्रक्रिया में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। इसके क्या कारण हैं? भोजपुरी मौखिक परम्परा इसकी अभिव्यक्ति छिटपुट प्रयासों के अलावा अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। स्वीकृत सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध आलोचनात्मक विवेक इन अभिव्यक्तियों में समाप्त होते जा रहा है। प्रवासन के नाम पर स्त्री की यौन जरूरतों को ’बॉलीवुडिया टच‘ देकर अश्लीलता के साथ परोसा जा रहा है। देवी और खेसारी लाल यादव के गीतों में इसे देखा जा सकता है - देवी के भोजपुरी गीत - ’’जब आए होली दिवाली/तू ले अइह चुनरी लाली/चुनरी ना लेअइयो तो ना लाइयो/सजन राजधानी पकड के आ जइयो।‘‘१४ खेसारीलाल यादव के गीत - ’’अबकी परब भउजी, केकरा खातिर करबू। सईंया अरब गइले ना, सेज पर केकरा संगे लडब। सईंया अरब गईले ना...।‘‘१५ दूसरा गीत -’’पियवा रहेला हमार सउदी र भउजी।‘‘१६
हाल में आए आंकडों के आधार पर यह देखा जा सकता है कि ज्यादातर भोजपुरिया मजदूर दक्षिण भारत की तरफ प्रवास कर रहे हैं। भाषा एवं संस्कृति के आधार पर वे किस तरह के भेदभाव से गुजर रहे हैं, ध्यान देने योग्य है। इसी तरह देश के बाहरी ठेकेदारी के जरिये खाडी देशों में गए मजदूर दो वर्ष से पहले घर नहीं आ पाते। इस बीच वे अनेक अमानवीय शोषण के शिकार होते हैं। बुनियादी सुविधाओं का अभाव तथा सस्ती दरों पर काम कराना आम बात है। प्रवास से घर आते समय छेडछाड तथा पासपोर्ट छीन लेना वर्तमान समाचारों की सुर्खियाँ बन गई हैं।
प्रस्तुत विषय व्यापक गहराई एवं विस्तार की माँग करता है। यह कालातीत से संवेदनशील मुद्दा रहा है, जिसे अब तक ’दूर के ढोल सुहावन‘ कहावत के माध्यम से समझा एवं चरितार्थ किया जाता रहा है। समाज की बेहतरी के लिए यह ठीक नहीं है। आखर कौन-सी ऐसी परिस्थितियाँ रही हैं, जिससे भोजपुरिया समाज प्रवास को अपनाने के लिए मजबूर है। इसकी गंभीरता से पडताल की आवश्यकता है।
संदर्भ ग्रंथ सूची ः
१. मानव समाज, राहुल सांकृत्यायन, पृ. १४
२. लोकसंस्कृति और इतिहास, बद्रीनारायण, पृ. ६३
३. भिखारी ठाकुर रचनावली, सम्पादक ः नागेन्द्र प्रसाद सिंह, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २०११, पृ. २७
४. भोजपुरी लोकगीत, भाग-१, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, पृ. १९५
५. वही, पृ. २७५
६. तोताराम सनाढ्य, भेतेलन की कथा, सं. योगेन्द्र यादव व ब्रिज वी लाल, पृ. २०
७. आलोचना की सामाजिकता, मैनेजर पाण्डेय, पृ. १२१
८. सूरीनाम, पुष्पिता अवस्थी, पृ. ४
९. लोकगीतों और गीतों में १८५७, संकलन एवं संपादन मैनेजर पाण्डेय, पृ. ३९
१०. सूरीनाम का सृजनात्मक हिन्दी साहित्य, संपादक विमलेश कांति वर्मा/भावना सक्सैना, पृ. ४१
११. लोकगीतों और गीतों में १८५७, संकलन एवं सम्पादन मैनेजर पाण्डेय, भूमिका
१२. गोरख पाण्डेय की समग्र कविताएँ, पृ. १५१
१३. वही
हैदराबाद विश्वविद्यालय में शोधार्थी है। लोकसाहित्य पर कार्य कर रही हैं।