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साहित्यिक परिदृश्य

भारतीय बाल साहित्य पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
जयपुर। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास नई दिल्ली के तत्त्वावधान में राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी के सभागार में ३ एवं ४ जून २०१९ को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति एवं जनसत्ता के पूर्व संपादक ओम नवीन ने ’भारतीय बाल साहित्य ः नवीन आयाम‘ पर चर्चा करते हुए कहा कि ’’अच्छे साहित्य से अच्छी भाषा आती है। लोककथाएँ जितनी बडों के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं, उतनी ही बच्चों के लिए भी उपयोगी हैं। अच्छा साहित्य बच्चों को गढने में अच्छे निवेश जैसा है। अच्छा साहित्य संस्कारों का निर्माण करता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बडे साहित्यकार बच्चों के लिए नहीं लिख रहे हैं और बडे सम्पादक अपनी पत्र-पत्रिकाओं में बाल साहित्य क स्थान नहीं देते।‘‘
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी के निदेशक डॉ. बी.एल. सैनी ने कहा कि ’’बाल्यकाल से ही बच्चों के जीवन निर्माण को प्राथमिकता देनी चाहिए।‘‘
प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार एवं ’देवपुत्र‘ पत्रिका के संपादक विकास दवे (इंदौर) ने ’नई पौध की घटती स्वाध्याय वृत्ति‘ पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ’’यदि हमने समय रहते हमारी बाल पीढी को पठन-पाठन की परम्परा से नहीं जोडा और समय रहते नहीं चेते तो परिणाम बहुत भयावह होंगे। हम अपने घर में बच्चों के लिए वाचनालय विकसित करें।‘‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, विशेषज्ञ एवं वर्ल्ड बैंक के सलाहकार विनय पट्टनायक (पटना) ने कहा कि ’’भारतीय व स्थानीय परिवेश को केन्द्र में रखकर रचा गया साहित्य ही बच्चों को अधिक प्रभावित करता है। हमें आदिवासी भाषाओं के साहित्य को भी प्रकाश में लाना चाहिए।‘‘ उपन्यासकार, लेखक, समीक्षक मोहम्मद अलीम ने भारतीय उर्दू बाल साहित्य के परिवेश में बालकों को नवीनतापूर्ण, तार्किक बाल साहित्य प्रदान करने पर बल दिया। ख्यातनाम वरिष्ठ साहित्यकार फारूक आफरीदी (जयपुर) ने सम्पूर्ण बाल साहित्य के उद्भव व विकास का परिदृश्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि ’’देश की ४० प्रतिशत से अधिक आबादी १८ वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की है, जिनके लिए उपयुक्त पठन सामग्री का अभाव है।
मोहनलाल सुखाडया विश्वविद्यालय, जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के प्रमुख एवं साहित्यकार डॉ. कुंजन आचार्य (उदयपुर) ने वर्तमान परिदृश्य में बाल साहित्य लेखन व सम्भावनाएँ विषय पर बोलते हुए कहा कि ’’बच्चों के लिए लेखन व प्रकाशन के लिए अभी कई चुनौतियों से निपटना है, साथ ही सरकारी एवं गैर-सरकारी प्रयासों में गति लाने की आवश्यकता है। इस दिशा में सकारात्मक काम किये जा सकते हैं।‘‘ वरिष्ठ साहित्यकार गोविन्द शर्मा (संगरिया) ने ’’बाल साहित्य में बाल कथाओं और लोक कथाओं का घालमेल‘‘ विषय पर अपने उद्बोधन में कहा कि ’’आज कई लेखक लोक कथाओं का ही पुनर्लेखन कर अपने आपको बाल साहित्यकार कहलाने के मोहपाश में जकडे हुए हैं, जो बाल साहित्य की सेहत के लिए ठीक नहीं है। आज वर्तमान परिवेश को समझकर बाल साहित्य रचने की जरूरत है।‘‘
सुपरिचित बाल साहित्यकार, संपादक, प्रकाशक, आयोजक राजकुमार जैन राजन (आकोला) ने ’’वर्तमान परिवेश में बाल साहित्य की महत्ता‘‘ विषय पर बोलते हुए कहा कि ’’आज बच्चों की रुचियाँ तेजी से बदल रही हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से बच्चों में एक ओर जहाँ रिश्तों-नातों के प्रति सोच में यांत्रिकता व संवेदनहीनता का विकास हुआ है, वहीं वह एकाकी, चिडचिडा, हिंसक एवं आक्रामक होता जा रहा है।‘‘
भारतीय जीवन बीमा निगम में प्रशासनिक अधिकारी एवं ख्यातनाम बाल साहित्यकार संगीता सेठी (जोधपुर) ने ’’भारतीय बच्चों के लिए पुस्तकों का संसार एवं रचनाकारों की पीडा‘‘ विषय पर अपना उद्बोधन दिया। बाल फिल्म निर्देशक/निर्माता नारायण परशुराम (मुम्बई) ने बाल कहानियों के फिल्मांकन और आज के बालकों की पसंद पर प्रकाश डाला। सुविख्यात लेखक राजीव तांबे (पुणे) ने ’’वर्तमान परिवेश में बाल साहित्य का परिदृश्य‘‘ विषय पर अपनी बात रखी। ’’बच्चों का देश‘‘ पत्रिका के सम्पादक, लेखक, चिंतक संचय जैन (उदयपुर) ने ’’बच्चों और पुस्तकों के बीच बढती दूरी ः कारण और निवारण‘‘ विषय पर अपनी बात कही तो एन.सी.ई.आर.टी. की प्रोफेसर एवं समन्वयक डॉ. उषा शर्मा (नई दिल्ली) ने ’’बाल साहित्य ः सरकार और सम्भावनाएँ‘‘ पर अपना वक्तव्य देते हुए ’’बाल साहित्य कैसा होना चाहिए‘‘ विषय पर विचार प्रकट किए। अभिषेक बजाज, प्रभात आदि ने भी वर्तमान समय में बाल साहित्य की जरूरत और महत्ता पर प्रकाश डाला। दो दिवासीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में लघु बाल फिल्में भी प्रदर्शित की गईं।
प्रस्तुति ः राजकुमार जैन ’राजन‘
लंदनवासियों ने दी गिरीश कर्नाड को श्रद्धांजलि
लंदन। नेहरू सेंटर-लंदन और वातायन पोएट्री ऑन साउथ बैंक द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुत स्वर्गीय श्री गिरीश कर्नाड के बहुआयामी व्यक्तित्व पर दिल को छू लेने वाली झलकियों ने दर्शकों का मन मोह लिया। नेहरू केन्द्र के उपनिदेशक श्री बृजकिशोर गुहारे के संक्षिप्त परिचय और स्वागत के बाद कुछ गणमान्य लोगों द्वारा गिरीश कर्नाड को श्रद्धांजलि दी गई, जो उन्हें करीब से जानते थे। शास्त्रीय संगीत के जानकार और सामा-आर्ट्स के कलात्मक निर्देशक जय विश्वदेव के अनुरध पर युवा संगीतकार अनुराग ढौंडियाल (कुली ओडिसी के कलाकार) ने कबीर का एक भावभीना भजन सुनाकर इस राजसी संध्या के मंच को अलंकृत किया। उनका साथ दिया डैनी आर्बिटर (गिटार) और गेर्ग कुक (सेलो) ने।
८० के दशक के बाद से चैनल ४ टीवी के लिए वार्षिक भारतीय फिल्म-सीजन को क्यूरेट करने वाली फिल्म निर्माता नसरीन मुन्नी कबीर ने राधा और रघु के ’अप्पा‘ के बारे में उनके अंतिम दिनों के संदेशों को पढा। ’’हालाँकि बहुत से लोगों के लिए वह बहुत कुछ थे, पर हमारे लिए वह अपने चतुर हाथों द्वारा बनाए साए बनाने वाले अप्पा/थाथा थे; जिनमें झपकी लेने की अद्भुत क्षमता थी। उनके चमकीले कुर्ते और बैग्गी-पजामे‘ उनके हरी कलम का वृहद् संग्रह जो उनकी जेबों पर स्याही के दाग छोड जाते थे। जब हम उनके आसपास रहकर बातें करते थे तो वह आराम से बैठे सपने देखते हुए बेहद खुश होते थे। जब वह आराम कर रहे होते तो उनके पोते उनके कमरे के फर्श पर लेटकर चित्रकारी कर रहे होते थे।‘‘ पुरस्कृत ब्रिटिश लेखक और किंग्स कॉलेज लंदन में पोएट्री की प्रोफेसर डॉ. रूथ पडेल ने बताया कि कैसे गिरीश जी ने उनकी पुस्तक ’टाइगर्स इन रेड वेदर‘ में उनकी मदद की और उनकी कुडीअट्टम-केरल यात्रा की व्यवस्था की। रूथ ने गिरीश कर्नाड के सम्मान में अपनी मशहूर कविता ’टाइगर ड्रिंकिंग एट फॉरेस्ट पूल‘ का पाठ किया।भारत के लोकप्रिय इतिहास, सुदूर पूर्व और चीन के इतिहास के पुरस्कृत विशेषज्ञ, जॉन के., जो ऑक्सफोर्ड में उनके साथ पढे और रहे थे, ने अपने कॉलेज के दिनों के कई आस्य प्रसंग के हवाले से कर्नाड के जीवन के एक और चरण का खुलासा किया कि कैसे ऑक्सफोर्ड पहुँचते ही कर्नाड वहाँ के सभी क्लब्स के चहेते सदस्य बन गए थे और कैसे वह निर्विरोध सचिव अथवा अध्यक्ष चुन लिए जाते थे। भारत और विदेश में नृत्य कलाकार के रूप में पहचानी जाने वाली डॉ. चित्रा सुंदरम ने गिरीश कर्नाड के विशेष संदर्भ में गोल्डस्मिथ कॉलेज में नृत्य और रंगमंच के शिक्षण के विषय में बताया। लेखिका, फल्म इतिहासकार, टैगोर गायिका और फल्म निर्माता डॉ. संगीता दत्ता, जिन्होंने अपनी पुरस्कृत फीचर फल्म लाइफ गोज ऑन में गिरीश कर्नाड को निर्देशित किया था, बताया कि कैसे वह युवा कलाकारों को प्रेरित करते थे और कैसे देर रात गए तक वह नए कलाकारों के साथ फल्म के दृश्यों का अभ्यास किया करते थे। सौंदर्य एवं भावना-शास्त्र की इतिहासकार, अनुवादक और पटकथा लेखक डॉ. नसरीन रहमान ने गिरीश कर्नाड और अपनी लम्बी मित्रता के संदर्भ में सभा को बताया कि गिरीश कर्नाड साउथ-एशिया में शांति के लिए कितने लालायित रहते थे और कहा करते थे कि यह तभी सम्भव है जब दोनों देशों के लोग आपस में मिलें-जुलें। जब नसरीन ने उनसे अपनी माँ के चल बसने पर अपनी बेबसी का इजहार किया तो उन्होंने कहा कि ’’...पर मृत्यु अनंत से मिलने का केवल एक ही जरीया है।‘‘
अलकनंदा समर्थ, जो १९५९ में पहली बार गिरीश कर्नाड से मिली थीं, जब कर्नाड ने उन्हें अल्काजी की प्रसिद्ध थिएटर यूनिट रिपर्टरी-बॉम्बे में ’स्ट्राइंडबर्ग की मिस जूली‘ के रूप में देखा और उनके अभिनय की सराहना की थी। अलकनंदा ने दर्शकों के साथ अपनी बहुत-सी खुशनुमा यादें साझा कीं। प्रकाशक, साहित्यकार, फिल्म-निर्माता और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस-चैन्नई में गिरीश कर्नाड के एक सहयोगी मार्टिन पिक ने अपना ओ.यू.पी. (चैन्नई) में पेशा आरम्भ करने वाले, मार्टिन पिक ने गिरीश कर्नाड के साथ उस समय काम किया, जब वह ’संस्करा‘ में अभिनय कर चुके थे और मद्रास प्लेयर्स के बहुत से नाटक निर्देशित करने के कारण अच्छा अनुभव अर्जित कर चुके थे। उन्होंने मार्टिन का परिचय रामानुजन से करवाया और ओ.यू.पी. को राजी किया कि वे उनके ’दि स्ट्राइडर्स‘, चोलामंडलम में रहने वाले कलाकारों के अतिरिक्त वासुदेव को भी ऑक्सफोर्ड मॉडर्न पोएट्स में सम्मिलित करें। कवि, फल्म इतिहासकार, वृत्तचित्र फल्म निर्माता और दक्षिण एशियाई सिनेमा फाउण्डेशन के संस्थापक निदेशक-संपादक, ललित मोहन जोशी ने अपनी संस्था और नेहरू-केन्द्र में अपने कार्यक्रमों में गिरीश जी की मदद के बारे में बात की। हाल ही में श्याम बेनेगल ने उन्हें फोन पर बताया था कि कैसे उनके घर पर गिरीश कर्नाड और ओमपुरी रात-रात भर गरमागरम बहस करते रहते थे और कैसे अगली सुबह बेनेगल परिवार को वे फर्श पर सोते मिलते थे।
नेत्र-सर्जन, निर्माता-निर्देशक, फल्म-निर्माता और कवि डॉ. निखिल कौशिक ने गिरीश जी के साथ अपनी पहली मुलाकात का खुलासा किया कि कैसे उन्होंने अपने परिवार के चिकित्सीय सम्बन्ध के बारे में बताया कि उनके पिता और अब उनकी बेटी भी डॉक्टर है। निखिल ने इस अवसर पर किशन सरोज द्वारा रचित एक प्रासंगिक गीत ’वो देखो कोहरे में चन्दन-वन डूब गया‘ भी प्रस्तुत किया, जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। नेहरू सेंटर की पूर्व प्रशासनिक अधिकारी नीलम सिंह ने गिरीश जी की पारदर्शिता, ईमानदारी और कर्मचारियों को अपने परिवार समान मानने का जक्र किया और कहा कि २००३ में लंदन छोडने के बाद भी कैसे उन्होंने सबसे सम्फ बनाए रखा और कैसी निडरता से वह स्टाफ का साथ दिया करते थे। लेखक और प्रख्यात कहानीकार डॉ. वायू नायडू, जिन्होंने यू.के. में नोना शेफर्र्ड द्वारा निर्देशित गिरीश कर्नाड के नाटकों - ’हयवदन‘ और ’बाली-द सैक्रिफाइस‘ को प्रोड्यूज किया, ने बताया कि कैसे गिरीश कर्नाड सेट्स पर और बाहर भी सबके साथ सुंदर व्यवहार करते थे, चाहे वह कार-पार्क अटेंडेंट ही क्यों न हो।
अंत में, लेखक और वातायन की संस्थापक, दिव्या माथुर ने आयोजकों की ओर से सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद देते हुए कहा कि गिरीश कर्नाड जैसे एक बडे कद की हस्ती का तीन वर्षों का साथ उनके लिए एक सपने की तरह है, इसमें शंका की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए कि क्यों आज भी हम सबके दिलों में रहते हैं और सदा रहेंगे। अंत में उन्होंने नेहरू केन्द्र के समक्ष एक प्रस्ताव भी रखा कि गिरीश कर्नाड के जीवन और कार्यों को समर्पित एक तीन-दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाना चाहिए।
कार्यक्रम में कई विद्वानों, कलाकारों और मीडियाकर्मियों ने भाग लिया, बहुत-से लोग लंदन के बाहर से एक लम्बा सफर तय करके अपनी श्रद्धांजलि देने वहाँ पहुँचे थे। आयोजन के दौरान गिरीश कर्नाड की उपस्थिति स्पष्ट महसूस की गई; कार्यक्रम के अंत तक थिएटर में एक आध्यात्मिक ऊष्मा छाई रही।
प्रस्तुति ः शिखा वार्षणे द्वारा अनूदित
’लेखक से मिलिए‘ कार्यक्रम
जोधपुर। ’’प्रत्येक रचनाकार की रचना प्रक्रिया अपने परिवेश से प्रभावित होती है, किन्तु वह अपनी कल्पनाशीलता द्वारा परिवेश की संकल्पना को बदल देता है। एक ही परिवेश में रहने वाले रचनाकारों की रचनाओं में इसी कारण भिन्नता होती है। इसे लेखक अपनी अनुभूति को विस्तार देकर कविता, कहानी, प्रबन्ध अथवा उपन्यास का रूप प्रदान करता है। रचना-प्रक्रिया की सफलता इसी बात में निहित होती है कि लेखक अपने अनुभवों को प्राणवान व जीवंत बनाकर प्रस्तुत करे।‘‘ ये विचार गाँधी भवन में अंतरप्रांतीय कुमार साहित्य परिषद् के तत्वावधान में आयोजित ’लेखक से मिलिए‘ कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. आईदान सिंह भाटी ने व्यक्त किए। आगे आपने कहा कि ’’रचना प्रक्रिया को समकालीनता, मौलिकता, तकनीक और जातीय स्मृतियाँ भी प्रभावित करती हैं। आज की कहानियाँ मध्यमवर्ग की कहानियाँ हैं, जिनमें तकनीक और आधुनिक शब्दावली का व्यामोह सर्वत्र परिलक्षित होता है। समकालीनता के यथार्थ से परे जाकर लेखक मानवीय व्यवहार के बिन्दुओं में आधुनिकता की तलाश करता है। इस तरह रचना-प्रक्रिया किसी एक मनःस्थिति पर नहीं रुक कर, कई-कई स्तरों से गुजरती है और तब एक सुसंगत विमर्श तक पहुँचती है।‘‘
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए परिषद् के अध्यक्ष जाने-माने आलोचक मोहनकृष्ण बोहरा ने कहा कि ’’रचना की प्रक्रिया हर रचनाकार की अलग होती है और इसी तरह हर विधा की रचना की प्रक्रिया अलग होती है। कविता की रचना प्रक्रिया में कवि के अवचेतन की भूमिका भी उतनी ही होती है, जितनी उसकी सजगता की होती है। जबकि कहानी की रचना-प्रक्रिया में परिवेश का दखल कुछ विशेष रूप से रहता है। ऐसा नहीं है कि कविता की प्रक्रिया में समाज की भूमिका नहीं रहती है और न ऐसा है कि कथात्मक रचना में रचनाकार का विजन न रहता हो, लेकिन प्रमुखता का जहाँ तक प्रश्न है कथात्मक रचनाओं में सामाजिकता का दखल अपेक्षया अधिक होता है। अनुवाद में भाषा की भूमिका इस अर्थ में विशेष रहती है कि अनुवादक का अधिकार दोनों भाषाओं पर समान रूप से अपेक्षित रहता है।‘‘
परिषद् की महामंत्री डॉ. पद्मजा शर्मा ने बताया कि कार्यक्रम के ’प्रश्नोत्तर सत्र‘ में सत्यदेव संवितेंद्र, दशरथ सोलंकी, संतोष चौधरी, गौतम खंडप्पा, जगदीश बारासा, डॉ. हेमंत शर्मा, प्रवीण मकवाना, रतन सिंह चौहान, एम.आई. जाहिर, मधुर परिहार, डॉ. प्रमोद कुमार शाह आदि के प्रश्नों के जवाब डॉ. आईदानसिंह भाटी ने दिए। कार्यक्रम के प्रारम्भ में माँ सरस्वती को अतिथियों ने पुष्प अर्पित किए। कार्यक्रम में शाइर शीन. काफ निजाम, प्रो. एल. राजपुरोहित, हबीब कैफी, मीठेश निर्मोही, मनोहरसिंह राठौड, प्रो. सरोज कौशल, डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित, कमलेश तिवारी, डॉ. छैलसिंह राठौड, भानुमित्र, नीना छिब्बर, डॉ. चाँदकौर जोशी, डॉ. संध्या शुक्ला, डॉ. उषारानी माहेश्वरी, दिनेश जोशी, अनिल अनवर, तारा प्रजापत, लीला कृपलानी, बृजेश अंबर, ओमप्रकाश बैरवा, डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय, संगीता सेठी, डॉ. शालिनी गोयल, किरण राजपुरोहित ’नितिला‘, डॉ. हितेन्द्र गोयल, वाजद हसन काजी, प्रमोद वैष्णव, सूर्यप्रकाश भार्गव सहित कई साहित्यकार उपस्थित थे। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. भावेन्द्र शरद जैन ने किया। संतोष चौधरी ने कार्यक्रम का संचालन किया।
प्रस्तुति ः डॉ. पद्मजा शर्मा
विश्व मैत्री मंच के तहत ’तुमसे मिलकर‘ पर चर्चा का आयोजन
’मुक्त छंद में लिखे गीत हैं ये कविताएँ‘
भोपाल। आर्य समाज भवन में आयोजित कार्यक्रम में प्रसिद्ध गीतकार नरेन्द्र दीपक ने कहा कि कहते हैं मुक्त छंद की समकालीन कविताएँ बहुत अच्छी हो ही नहीं सकती, लेकिन संतोष श्रीवास्तव ने मुक्त छंद में लिखकर यह सिद्ध कर दिया कि यह मु क्त छंद में लिखे गीत हैं।
दिल्ली से आए वरिष्ठ लेखक सुभाष नीरव ने कहा कि इस संग्रह की कमाल की बात यह है कि पहली कविता जो पाठक की उँगली थामती है तो अंतिम कविता तक का सफर करा देती है। जिसे पढकर पाठक बंध जाए, डूब जाए व संवाद करे, वही कविता की सार्थकता है। इन कविताओं ने छीजती संवेदना को उठाकर प्रेम के बीज बोए हैं।
संतोष श्रीवास्तव ने अपनी चुनिंदा कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि कविता में जो घटता है वह अवधारणा में बदल जाता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने संग्रह की कविताओं का उल्लेख करते हुए ’नमक का स्वाद‘, ’बदलाव‘ और ’बचा लेता है‘ कविता को सर्वश्रेष्ठ कविता बताया। उन्होंने इन तीनों कविताओं का विस्तार से जक्र किया। ’बचा लेता है‘ कविता का जक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कागज जब नोट बनता है तो पावर में आते ही नष्ट कर डालता है मानवीय रिश्तों को, संवेदनाओं को, जीवन मूल्यों को। ज्ञानवर्धन की कविता पिकासो में इसी पावर का जक्र है कि दुनिया की किसी भी करेंसी से महँगा वह चार इंच का कागज है, जिस पर पिकासो के हस्ताक्षर हैं।
लेकिन किताब का पन्ना बनते ही वह सब कुछ को सहेज लेता है। मैं संतोष जी को साधुवाद देता हूँ कि उन्होंने कागज को किताब का पन्ना बनाने की महत्त्वपूर्ण कोशिश की है। डॉ. राजेश श्रीवास्तव, डॉ. स्वाति तिवारी, हीरालाल नागर, बलराम अग्रवाल, युगेश शर्मा ने भी संग्रह पर अपनी बात रखी।
समारोह में भोपाल के सम्पादकों, लेखकों, पत्रकारों सहित झांसी, रतलाम, ग्वालियर से आए लेखक भी शामिल थे। समारोह का जीवंत संचालन धर्मेन्द्र सोलंकी ने किया।
प्रस्तुति ः संतोष श्रीवास्तव
सृजना संस्था, जोधपुर द्वारा आयोजित साहित्य सम्मान समारोह
जोधपुर। सृजना संस्था, जोधपुर द्वारा २ जून, २०१९ को होटल चन्द्रा इन में आचार्य लक्ष्मीकांत जोशी की स्मृति में आयोजित सम्मान समारोह कई मायनों में स्मरणीय रहेगा। प्रसिद्ध कहानीकार प्रियंवद और सुविख्यात साहित्यकार नन्दकिशोर आचार्य की क्रमशः मुख्य अतिथि और अध्यक्ष के रूप में, साथ में सुरुचिपूर्ण रूप से सज्जित मंच पर पुरस्कृत और सम्मानित कहानीकार ओमप्रकाश भाटिया तथा संस्था की अध्यक्षा सुषमा पंडित की उपस्थिति एक आह्लादकारी आलेख की भूमिका लिख रहे थे, वहीं डॉ. हरिदास व्यास द्वारा मंच संचालन का अवलोकन एक अद्भुत वातावरण का सृजन कर रहा था। जिस प्रकार की त्रिपथगा प्रवाहित थी, उसे कोई शिव की जटा ही समाहित कर सकती थी। डॉ. व्यास ने जिस आत्मीयता और गरिमा से मंचस्थ रचनाकारों का परिचय कराया, वहीं अपनी बारी में विद्वान वक्ताओं ने अपनी वाणी से जिस प्रकार रसवर्षा की, उससे वे अपने परिचय से बढकर ही सिद्ध हुए। सुषमाजी का स्वागत, श्री ओमप्रकाश भाटिया की और डॉ. हरिदास व्यास की पुस्तकों का लोकार्पण, सम्मानित और पुरस्कृत लेखक ओमप्रकाश भाटिया का व्याख्यान और राठी जी का आभार ज्ञापन भी इसी सागर की लहरों की तरह थे।
प्रियंवद खूब बोले और क्या खूब बोले, खुलकर बोले। बिल्कुल बेलाग, बिंदास और बेलौस था उनका वक्तव्य, ’’रचनाकार को चारों सत्ताओं के विरोध में होना चाहिए, जटिल होना चाहिए, साहित्य को अंततः दर्शन में समाहित होना चाहिए, जेम्स जोयसे के उपन्यास यूलिसिस को किसी ने नहीं पढा होगा, आलोचक की क्या जरूरत है?‘‘ जैसे वक्तव्यों से लैस उनका व्याख्यान तीखा और खुरदरा भले होगा, लेकिन विचारों को जगाने वाला था, जिसका प्रमाण प्रश्नोत्तरी संवाद के दौरान मिला।
प्रियंवद ने उसी अंदाज में अपने समाधान दिए। अध्यक्ष के रूप में नन्दकिशोर आचार्य ने जो उद्बोधन दिया, मेरे विचार से वह एक इस प्रश्न का उत्तर था ’अध्यक्षीय वक्तव्य कैसा होना चाहिये?‘ उन्होंने अपनी पूरी बात वक्ताओं के विचार बिन्दुओं के सूत्र पकड कर की। यहाँ तक कि संचालन की बातों और श्रोताओं के प्रश्नों को भी स्पर्श किया। कई वक्तव्यों को दिशा दी और कई बातों और प्रश्नों की चुभन को थोडा मृदुल भी बनाया।‘‘ यूलिसिस को पढ चुके लोग हॉल में उपस्थित हैं, कहकर उन्होंने हॉल में शीन. काफ निजाम की सम्मानित उपस्थिति की ओर इंगित भी किया (अपनी खुद की भी)। ’चौथा सप्तक‘ के कवि ने जब इस बात पर अपनी वाणी को विराम दिया कि ’’ठीक है, साहित्य में कई वाद बन गए हैं, लेकिन असली तो रचनावाद ही है‘‘ तो पूरा हॉल करतल ध्वनि से गूँज उठा। वह क्षण पूरे समारोह का तार सप्तक था।
प्रस्तुति ः डॉ. अरविन्द कुमार पुरोहित
१९वां आचार्य निरंजननाथ सम्मान समारोह सम्पन्न
राजसमन्द। हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार एवं राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष आचार्य निरंजननाथ की स्मृति में दिये जाने वाले सम्मान इस वर्ष हिन्दी की तीन विधाओं उपन्यास, कहानी तथा कविता पर प्रदान किये गये। इन तीनों राष्ट्रीय सम्मानों में उपन्यास ’अकाल में उत्सव‘ के लिए पंकज सुबीर, सीहोर, मध्यप्रदेश को कहानी संग्रह ’हवा में ठहरा सवाल‘ के लिए गोपाल सहर, कपडवंज, गुजरात को तथा कविता संग्रह ’विज्ञप्ति भर बारिश‘ के लिए ओम नागर, कोटा को इक्कीस-इक्कीस हजार रुपये नकद भेंट कर सम्मानित किया गया।
साथ ही संभाग स्तर पर दिया जाने वाला ग्यारह हजार रुपये का पुरस्कार मुरलीधर कनेरिया, नाथद्वारा को उनके समग्र साहित्यिक अवदान पर प्रदान किया गया।
आचार्य निरंजननाथ स्मृति सेवा संस्थान की ओर से होटल स्वागत में आयोजित भव्य समारोह में ९ जून २०१९ को उक्त पुरस्कार प्रदान किये गये। ज्ञात रहे कि १९९५ से आरम्भ इन राष्ट्रीय पुरस्कारों में अब तक १८ विख्यात लेखकों को उक्त पुरस्कार दिये जा चुके हैं और इस वर्ष तीन लेखकों को उक्त पुरस्कार प्रदान किये गये। साथ ही छठा आचार्य निरंजननाथ विशिष्ट साहित्यकार सम्मान मुरलीधर कनेरिया को भेंट किया गया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि प्रतिष्ठित साहित्यकार वेद व्यास अपरिहार्य कारणों से नहीं पहुँच पाये लेकिन उन्होंने समारोह की सफलता की कामना करते हुए अपने संदेश में कहा कि अकादमी एवं सेठों द्वारा स्थापित साहित्यिक पुरस्कार एक अभियान की तरह दिये और प्रचारित किये जाते हैं। जबकि कर्नल देशबंधु आचार्य द्वारा अपने पिता श्री आचार्य निरंजननाथ के साहित्यिक अवदान की स्मृति में स्थापित यह पुरस्कार हिन्दी जगत् में अत्यन्त प्रतिष्ठित माना जाता है।
सम्मान समिति के संयोजक वरिष्ठ साहित्यकार कमर मेवाडी ने सम्मानों की पारदर्शी चयन प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज जहाँ देश के बडे साहित्यिक पुरस्कार विवादास्पद हो गए हैं, वहाँ आचार्य निरंजननाथ सम्मान को बडे आदर के साथ देखा जाता है एवं साहित्य जगत् में इस पुरस्कार की बडी चर्चा रहती है। कमर मेवाडी ने आचार्य साहब से जुडे कई संस्मरण भी सुनाए और यह भी बताया कि उनकी हिन्दी साहित्य में ७ महत्त्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हैं।
आचार्य निरंजननाथ सम्मान समिति के अध्यक्ष कर्नल देशबंधु आचार्य ने अपने उद्बोधन में कहा कि अब यह सम्मान साहित्य की तीन अलग-अलग विधाओं में प्रदान किया जाता रहेगा। साथ ही संभाग स्तरीय लेखक को उसके समग्र साहित्यिक अवदान पर विशिष्ट साहित्यकार सम्मान जारी रहेगा।
समारोह की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात कवि, कथाकार, डायरी लेखक एवं समीक्षक माधव नागदा ने कहा कि आज साहित्य की त्रिवेणी का सम्मान किया गया। सोशल मीडिया के इस दौर में जबकि पाठकों की संख्या कम होती जा रही है। श्रेष्ठ साहित्यकारों को सम्मानित करना समाज को साहित्य से जोडने का महत्त्वपूर्ण उपक्रम है। प्रसन्नता का विषय है कि आचार्य निरंजननाथ सम्मान समिति बरसों से इस सामाजिक भूमिका का निर्वहन करती आ रही है।
समारोह के प्रारम्भ में स्वागताध्यक्ष और साहित्यिक पत्रिका ’अभिनव सम्बोधन‘ के सम्पादक मधुसूदन पाण्ड्या ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। सुप्रसिद्ध शायर शेख अब्दुल हमीद ने अपनी ताजा गजल से समारोह को ऊँचाइयाँ प्रदान की।
इस अवसर पर श्रीमती सुधा आचार्य की दूसरी कविता पुस्तक ’है कुछ और भी‘ का सभी अतिथियों ने लोकार्पण किया। इससे पूर्व विद्वान समीक्षक नगेन्द्र मेहता ने कविता पुस्तक पर अपना सारगर्भित आलेख प्रस्तुत किया। लोकार्पण के बाद श्रीमती सुधा आचार्य ने अपनी कुछ कविताओं का वाचन किया, जिसे श्रोताओं ने खूब पसन्द किया।
इसके साथ ही सभी पुरस्कृत साहित्यकारों का परिषद् सदस्यों त्रिलोकी मोहन पुरोहित, अफजल खां अफजल, डॉ. नरेन्द्र निर्मल तथा किशन कबीरा की परिचय प्रस्तुति के पश्चात् स्वागताध्यक्ष मधुसूदन पाण्ड्या द्वारा शॉल, सम्मान समिति के अध्यक्ष कर्नल श्री देशबधु आचार्य द्वारा प्रशस्ति पत्र, समारोह अध्यक्ष माधव नागदा द्वारा प्रतीक चिह्व, सम्मान समिति के संयोजक कमर मेवाडी द्वारा स्मृति चिह्व, कर्नल देशबंधु आचार्य तथा श्रीमती सुधा आचार्य द्वारा पुरस्कार राशि एवं परिषद् अध्यक्ष श्री राधेश्याम सरावगी मसूदिया द्वारा श्रीफल भेंट किया गया।
सभी पुरस्कृत साहित्यकारों ने अपनी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए आचार्य निरंजननाथ सम्मान की प्रशंसा की और कहा कि हिन्दी संसार में इस सम्मान की जबरदस्त प्रतिष्ठा है और पुरस्कृत साहित्यकार उक्त सम्मान प्राप्त कर अत्यन्त गौरवान्वित महसूस करता है।
मंच पर विराजमान सभी अतिथियों, पत्रकार साथियों, पत्रवाचनकर्ता तथा समारोह में उपस्थित पूर्व पुरस्कृत रचनाकारों को शॉल, श्रीफल एवं स्मृति चिह्व भेंट कर सम्मानित किया गया।
समारोह में ईश्वरचन्द्र शर्मा, जीतमल कच्छारा, डॉ. धर्मचन्द मेहता, श्रीमती दुर्गा शर्मा, कल्याण सिंह पगारिया, प्रमोद सनाढ्य, चतुर कोठारी, नारायण सिंह राव, फतहलाल गुर्जर ’अनोखा‘, किशन धीरज, दुर्गाशंकर मधु, सूर्यप्रकाश दीक्षित, सुधा मेहता, कुसुम लता अग्रवाल, गणपत धर्मावत, हरकलाल बापना आदि शताधिक साहित्यकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की महत्त्वपूर्ण भागीदारी रही।
कार्यक्रम का सफल संचालन प्रसिद्ध कवि एवं विचारक डॉ. नरेन्द्र निर्मल द्वारा किया गया।
प्रस्तुति ः डॉ. नरेन्द्र निर्मल