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आज का सत्य ’आलू का तला‘ है

यशोधन शुक्ल ’अल्पेश‘
श्री प्रभाकर उपाध्याय के व्यंग्य संकलन ’बेहतरीन व्यंग्य‘ के पैंतीस व्यंग्य आलेख वर्तमान भारतीय परिवेश की विभिन्न विसंगतियों व तज्जन्य विकृतियों पर तीखा व्यंग्यात्मक प्रहार करते हुए पाठक को स्थितियों का सार्थक मूल्यांकन करने के लिए विवश कर देते हैं। ’बेहतरीन व्यंग्य‘ को पढने से यह तथ्य अप्रतिम रूप से प्रमाणित हो जाता है कि साहित्य की अन्यान्य विधाओं यथा कविता, कहानी, गीत, गजल की अभिव्यक्ति सरल है, वहीं व्यंग्य के लिए व्यंग्यकार की दृष्टि इनसे अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध तथा व्यापक होती है। व्यंग्यकार की दृष्टि मानव व्यवहार की सहज प्रचलित विसंगतियों को मार्मिक रूप से उजागर करते हुए पाठक को सोचने के लिए विवश कर देती है।
’कहाँ गया स्कूल‘ व्यंग्य कथा में राजनीतिक प्रभुत्व की विकृति पर तीखा व्यंग्य करते हुए उपाध्याय जी ने विधायक, मंत्री और कार्यकर्त्ताओं के राजनीतिक लाभ की लिप्सा में अभिव्यक्त किया है। उन्हें धरातल की सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं होता। वहीं प्रशासनिक कार्यप्रणाली भी इतनी नकारा है कि जहाँ स्कूल खोलने की मंत्री जी स्वीकृति प्रदान कर चुके हैं, वह स्थान वास्तविक रूप में है भी या नहीं। परिणामस्वरूप नवनियुक्त शिक्षक की मिट्टी पलीद हो जाती है।
’नाश्ता मंत्री का गरीब के घर‘ में राजनीतिक विद्रूपता पर कडा प्रहार किया गया है। मंत्रीजी की महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति में बेचारा गरीब जयराम हलाल होकर कंगाल हो जाता है। दूसरी ओर सत्ता के साथ उद्योगपति के गठजोड में सेठ मुरारीलाल की बल्ले-बल्ले हो जाती है। यहाँ मीडिया भी बडी चतुराई से उस गठबंधन का साथ देता है।
’आज दराज! वाह दराज!‘ में कार्यालयी कार्यशैली पर करारा व्यंग्य है। ’एक अदद घोटाला‘ में लेखक को स्वप्न में भी घोटाला आकर्षित करता है। यह रचना भ्रष्टाचार निरोधी लचर व्यवस्थाओं की पोल खोलकर, मीडिया द्वारा घोटालेबाजों के महिमामंडन पर कटाक्ष करती है।
’गर चाणक्य बनें, प्रधानमंत्री‘ अप्रतिम कूटनीतिज्ञ कौटिल्य की नीतियों की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विभिन्न दृष्टिकोण से पडताल करते हुए, उन्हें आज अप्रासंगिक घोषित करते हुए, प्रार्थना की गई है कि सुधारो इस देश को कृपानिधान! क्योंकि चाणक्य सूत्र कहता है कि जल में निमग्न मछलियाँ, सरोवर का कितना पानी पी जाती हैं?, इसका भान नहीं होता। उसी प्रकार राज कर्मचारियों की काली कमाई का आंकलन करना अत्यन्त कठिन होता है अर्थात् यहाँ भी कौटिल्य को आँख मूँदकर अंधा ही बनना पडा।
’बिन पढे घोटाला कथा, होवे न पूरण ज्ञान‘ में लेखक ने बडे ही सहज भाव से घोषित किया है कि भ्रष्टाचार का भाव मानव मन की नियति में नियत है, जो पद व पावर से जुडी हुई है। भ्रष्टाचार के अथाह जलाशय में ऐसे-ऐसे मगरमच्छ निवास कर रहे हैं, जो समूचे जल को उदरस्थ कर लेने के आकांक्षी हैं। ’दास्तां-ए-ठंडा बस्ता‘ में नामुराद ठंडे बस्ते के आगे भगवान भी हार चुके हैं। उपाध्याय जी बताते हैं कि जिसके पास अधिकार है, वह किसी भी मसले को सरलतापूर्वक ठंडे बस्ते में सरका देता है। दुर्भाग्य है कि अवाम के पास इसके इस्तेमाल का हुनर नहीं अन्यथा वह भय, भूख, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और नेताओं की नाकारापंथी को ठंडे बस्ते में सरका देती।
हम हिन्दुस्तानी डुप्लीकेट वस्तुओं के विकास में अग्रणी हैं। इस प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य करते हुए ’सिंथेटिक खाओ-सिंथेटिक पीओ‘ आलेख में व्यंग्य के उत्कृष्ट प्रतिमान स्थापित करते हुए यह कहा गया है कि भारत में प्रत्येक प्रतिष्ठित उत्पाद का डुप्लीकेट चंद दिनों में ही उपलब्ध हो जाता है। मानव की इस अनूठी विशेषता से ईश्वर भी सृष्टि की शुरुआत से ही सशंकित रहा है। तभी तो उसने हवा, पानी को उत्पन्न करने के पश्चात् ही इंसान को पैदा किया अन्यथा मानव उन्हें स्वयं बना लेता।
’फिक्सिंग से क्या डरना प्यारे‘ जीवन में हर जगह फिक्सिंग का खेल फिक्स है। कोई भी क्षेत्र फिक्सिंग से अछूता नहीं है। इसलिए फिक्सिंग से डरो मत बल्कि हर तरह की फिक्सिंग में फिक्स होने का हुनर हासिल कर लो और उच्चतम शिखर पर पहुँचने की सफलता फिक्स कर लो। तत्त्वज्ञान चर्चा के माध्यम से वर्तमान परिवेश पर प्रहार करते हुए लेखक ने गहरी पकड करते हुए बताया है कि दोगलेपन को धारण करने वाला ही सही अर्थों में तत्त्वज्ञानी है। साथ ही ये सत्य स्थापित किए हैं, सत्ताधारियों के मन को वशीभूत करने वाला ही परमयोगी है। कलयुगी मानव का अंतिम ध्येय राजनीति में प्रवेश कर येन-केन-प्रकारेण विधायक या सांसद बन जाना है। भ्रष्टाचार सर्वव्यापी है। भारतीय सरकारी आंकडों की लक्ष्यप्राप्ति सर्वाधिक कठिन है। भ्रष्टाचार और महंगाई अमरबेल है, जो निरन्तर पल्लवित हो रही है। विलासिता के सागर में आकंठ डूबकर आध्यात्मिक प्रवचन करने वाला ही सफलतम आधुनिक संत है।
वर्तमान चिकित्सा क्षेत्र के नंगे सत्य पर ’हतभाग! मानुस तन पावा‘ में प्रहार करते हुए उपाध्याय जी व्यंग्य करते हैं कि आज मानव तन का किंचित् भी मूल्य नहीं है। वर्तमान परिदृश्य में कटा-पिटा मानव यदि जन्दा बच गया तो अस्पतालों और डॉक्टरों के चंगुल से नहीं बचेगा और इनके शिकंजे से बच भी गया तो उसे नकली दवाईयाँ ही मार देंगी।
’हेड ऑफिस माहात्म्य‘ में मृतप्राय प्रशासनिक व्यवस्था का सत्य उजागर करते हुए लेखक ने कटाक्ष किया है कि पैंतीस साल की नौकरी के बाद भी न तो वेतनवृद्धि ही मिली और अब पशन मिलना भी असम्भव है क्योंकि तथाकथित कर्मचारी की ज्वाइनिंग रिपोर्ट हैडऑफिस में है ही नहीं। फलस्वरूप उसे कर्मचारी नहीं माना जा सकता है। सूतजी कहते हैं, ’’शौनक! यह तो हैड ऑफिस की कारगुजारी का एक लघु आख्यान है और भी न जाने कितनी प्रकार के प्रकरण हैड ऑफिस में घटित हुए हैं और होते रहेंगे।
’अथ डेली पैसेंजर्स गाथा‘, दर्शित करती है कि अपने स्वार्थों तथा हितों को सर्वोपरि रखना मानवीय नियति है। फिर डेली अप-डाउन करने वाले यात्रियों में अनूठा सामंजस्य और सहयोग भी होता है। सफर के दौरान वे एक-दूसरे के सुख-दुःख के भागीदार भी होते हैं। इसी प्रकार ’अश्वत्थामा का दंश‘ द्वारा व्यंग्य करते हुए लेखक ने अभिव्यक्त किया है कि आज व्यक्ति अश्वत्थामाओं से पीडत प्रतीत होता है। अश्वत्थामा सदियों से शापित जीवन जी रहा है और समूचे संसार को अपने असंख्य घावों से अनंत दंश देकर मानव जाति को अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर किए हुए है। अंत में व्यंग्यकार इस रचना को विश्वव्यापी आतंकवाद से सम्बद्ध करते हुए यह प्रश्न खडा कर देता है कि जाने कब पूर्ण होंगे, अश्वत्थामा के शाप के पाँच हजार वर्ष? मानवता के प्रति यह झिंझोड देने वाली रचना है।
’वाह, भई नूरबख्श‘, वर्तमान व्यवस्था की चिरजीवी अव्यवस्था की जुगलबंदी की कथा है कि बस कंडक्टर नूरबख्श किस प्रकार पथ परिवहन विभाग के चैकिंग-दल को धत्ता बताकर, बेटिकट यात्रियों को बचा ले जाता है? ’मजे यस मैन‘ को पढते हुए प्रतीत होता है कि किसी भी परिस्थिति में यस मैन सदैव मजे ही मारता रहता है। वर्तमान परिवेश में यस मैन का भविष्य बेहद उज्ज्वल नजर आता है।
प्रभाशंकर उपाध्याय की पैनी दृष्टि से फिल्मी क्षेत्र भी नहीं बचा है। ’हे खलनायक!‘ आलेख में फिल्मी कलाकारों पर उत्कृष्ट व्यंग्य है। हतभागी खलनायक किसी भी प्रकार अपनी मंजल तक पहुँचने वाला होता है कि हर बार हीरो भांजी मार ही देता है। पटकथा लेखकों की एक ही परिपाटी पर चली आ रही मानसिकता को उजागर करती है, यह रचना। नयी पीढी की लक्ष्यहीनता पर तीखा व्यंग्य है, ’वाह लाडले!‘
’शातंता, ऑडिट चालू आहे!‘ सरकारी ऑडिट प्रणाली पर गहरा व्यंग्य है, ’’सरकारी दफ्तरों में तो ऑडिट रूपी साँड खुल्लम-खुल्ला विचरण करता है और अनुभवी बंदे इस साँड की पूँछ पकडकर भ्रष्टाचार की वैतरणी तर जाते हैं।‘‘ ’’ऑडिटर की दृष्टि को कृपापूर्ण बनाने के नानाविध तीर इनके तरकश में सदा रहते हैं। यथा सुरा-सुंदरी, मुर्ग-मुसल्लम और मेवा-मिष्ठान के साथ दर्शनीय और अदर्शनीय स्थलों की सैर आदि।‘‘ ’’एक छूटे हुए विश्वगुरु की प्रेसवार्त्ता‘ आधुनिक संतों-स्वामियों- बाबाओं पर प्रखर प्रहार करता है और साथ ही उनकी कथनी-करनी के भेद को भी उजागर करता चलता है। ’पियत तमाकू लाल‘ को पढकर तंबाकू सेवन के दुर्व्यसनों और नयी पीढी म गुटखे की लगती लत के प्रति रोचक ढंग से चिंता व्यक्त की गई है।
’भागो रे भागो!‘ व्यंग्य रचना में मानव की स्वार्थपरता को देव-देवियों के वाहन के साथ तुलनात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है। रचना यह सोचने को मजबूर करती है कि आखिर क्यों देवों-देवियों ने मनुष्यों को उतनी नजदीकियाँ प्रदान नहीं की जितनी जानवरों और पक्षियों को प्रदान की हैं? व्यंग्यकार लिखता है कि लक्ष्मी पुत्रों ने हर शाख पर उल्लू बैठा है तथा सरस्वती साधकों ने पद व पुरस्कार की लोलुपता में अवनति की पराकाष्ठा पा ली है। एक दिन ऐसा आएगा, जब देवगणों को भी चीख कर कहना पडेगा, ’’भागो रे भागो, मानुस आया।‘‘
’करजा लेकर मरजा‘ भी मजे ही मजे में लिए गए ऋण की भयावहता को प्रकट करता है। कर्ज संस्कृति की ओर हमारी अंधयात्रा के प्रति यह रचना सचेत करती है। इसी प्रकार ’आह! हमारी अंतर्यात्रा‘ भी मानव मन की विकृतियों को सफलतापूर्वक अभिव्यक्त करती है। आधुनिक जीवनशैली और भौतिक सुख-सुविधा पर अत्यधिक आधारित हो गए, हमारे जीवन की गहरी पडताल करता हुआ रोचक व्यंग्य है, ’रामराज दिवस‘। किसी भी आधुनिक सुविधा के बाधित होते ही हम कितने व्यथित हो जाते हैं, इसे यह आलेख प्रस्तुत करता है। हम कितना भी कुनमुनाएँ, चंदाबाजों की चाँदी तो होती ही रहेगी। कहीं जाने की जल्दबाजी में अपनी जान हथेली पर रखकर, ओवरलोड हुए वाहनों में यात्रा करने के प्रति सचेतक रचना है, ’तू धन्य है, जीप चालक!‘ यह अप्रस्तुत प्रशंसा शैली में लिखी ऐसी रचना है, जिसमें वाहन चालकों तथा यात्रियों की मानसिकता पर गहरा व्यंग्य किया गया है।
’रहिमन जिव्हा बावरी‘ के तो कहने ही क्या? इसमें लेखक ने लिखा है, ’’जूता और जुबान में जोर हो तो फिर किसी दूसरे अस्त्र-शस्त्र की जरूरत नहीं रह जाती है। जुबां की नोंक को दिखाकर टंटा किया जा सकता है और किसी को जूते की नोंक पर रखकर भी। ’बयानों की सेल‘ में बयानवीरों के बयानों का रोचक वर्गीकरण, ’फुलझडी बयान, पटाखा बयान, चकरघिन्नी बयान और गारंटीड बयान‘ करते हुए उन्हें आधुनिक तकनीक के साथ जोडा गया है। ऐसा गारंटीड बयान जो आपकी पहचान को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दे।
आज के विज्ञान-सम्मत युग में अंधविश्वास की धारणाएँ भी टी.वी. तथा इंटरनेट के माध्यम से फलीभूत हो रही हैं, ’’एक नहीं, अनेक चैनल्स द्वारा भाँति-भाँति के यंत्र-तंत्र-मंत्र तथा टोटके बेचे जा रहे हैं। इंटरनेट पर ऐसी स्कीमों की भरमार है।‘‘ ऐसे ही पाखण्डों को उजागर करती है, यह रचना। तांत्रिकों-ज्योतिषियों-बाबाओं के बे-सिर-पैर के दावों के पर्चों को पढते हुए, अंत में लेखक का मन भी ललचा जाता है कि क्यों न ऑल वर्ल्ड फ्री सेवा देने वाले तांत्रिक बाबा के सहयोग से नोबेल, मैग्सेसे अथवा साहित्य अकादमी पुरस्कार हडप लिया जाएँ।
’कचरा उवाच‘, यह इस संकलन का अंतिम व्यंग्य है। यूँ भी हम अपने जीवन में कचरे के बारे में सबसे अंत में ही विचार करते हैं। जबकि जीवन में इसके निष्पादन को वरीयता देना अति आवश्यक है। इस व्यंग्य लेख में कचरा खुद अपने सर्वनाश को आमंत्रित करता हुआ कह रहा है कि मैं सदा विद्यमान था, हँं और रहूँगा। मेरी जल-नभ-थल में समान गति है। मैं सर्वव्यापी हूँ। अतः जब मेरा नाश ही करना है तो समूल करो।
कुल मिलाकर व्यंग्यकार के तौर पर उपाध्यायजी की दृष्टि समग्र है। विषयों और शैलीगत प्रस्तुति में विविधता और पठनीयता है, किन्तु कुछ लेख अत्यधिक ज्ञान भार से बोझिल हो गए हैं। यद्यपि ये हमारी जानकारी में इजाफा करते हैं, किन्तु अति तो वर्जित है। आशा है, भविष्य में उपाध्यायजी इस ओर अवश्य ध्यान देंगे। अब लम्बे नहीं, बल्कि छोटे लेखों का जमाना है।
और अंत में इस संकलन की एक छोटी-सी भूल की ओर संपादक प्रमोद सागर का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। ’करजा लेकर मरजा‘ लेख को उन्होंने अनुक्रमणिका में मार ही दिया है। कहीं वे इस प्रकार पाठकों की सतर्कता पर व्यंग्य तो नहीं कर गए हैं
पुस्तक ः बेहतरीन व्यंग्य, लेखक ः प्रभाशंकर उपाध्याय, प्रकाशक ः किताबगंज प्रकाशन, राधाकृष्ण मार्केट, गंगापुर सिटी (राज.)-३२२००१, पृष्ठ ः १६०, मूल्य ः सजिल्द रु. ३९५/-, पेपरबैक रु.१९५/-
समीक्षक हैं, हिन्दी में लिखते हैं। गद्य में रुचि है।