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हाशिये के जीवन की व्यथा-कथा : कामाख्या और अन्य कहानियाँ

माधव नागदा
’कामाख्या और अन्य कहानियाँ, कवि-कहानीकार भरतचन्द्र शर्मा का दूसरा कहानी-संग्रह है। इसके पूर्व प्रकाशित उनके संग्रह ’अपना-अपना आकाश‘ की कई कहानियाँ काफी चर्चित हो चुकी हैं। भरत जी के संग्रह चाहे कम प्रकाशित हुए हैं लेकिन वे लम्बे समय से सतत रूप से कहानियाँ लिखते आ रहे हैं और प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।
भरतचन्द्र शर्मा की विशेषता यह है कि वे आसपास के घटनाक्रम से अपनी कथावस्तु उठाते हैं और रफ्ता-रफ्ता किस्सागोई के अंदाज में आगे बढते हुए अंजाम तक पहुँचाते हैं। इससे उनकी कहानियाँ न केवल पठनीय बल्कि विश्वसनीय भी बन पडती हैं। संग्रह की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वे कहानियाँ हैं, जो उनके परिवेश से जुडी हुई हैं। इनमें समूचा आदिवासी अंचल बोलता है। नातरा, वीर बालक हंस, वसूली नोटिस, लापता, मुआवजा, आखर कौन कहानियाँ इसी परिवेश से जुडी हुई हैं। इनमें एक तरफ आदिवासियों की ईमानदारी, जिजीविषा और जिंदादिली का (लापता, वीर बालक हंस) भरोसेमंद उभार दिखाई देता है तो दूसरी तरफ इनकी अबखाइयों, अभावों और जीवन संघर्ष का (नातरा, वसूली नोटिस, मुआवजा) मर्मस्पर्शी चित्रण सामने आता है। इन कहानियों में आदिवासी अंचल की संस्कृति और परम्पराओं के चित्र आटे में नमक की तरह रचे-बसे हैं, जो कहानी के प्रवाह में सहयोगी होकर उसे अलग ही स्वाद प्रदान करते हैं। ये परम्पराएँ अपने में खामियाँ और खूबियाँ दोनों समेटे हुए हैं और दोनों ही पर कहानीकार की बराबर नजर है। ’नातरा‘ कहानी में भरतचन्द्र नातरा प्रथा की गहराई से पडताल करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ऊपर-ऊपर से यह प्रथा भले ही नारी के हित में लगे परन्तु अंततः यह उसके शोषण का ही बायस बनती है। चाहे पीहर पक्ष के लोग हों या फिर ससुराल पक्ष के रिश्तेदार, सभी इस प्रथा की आड में नारी को एक वस्तु की तरह इस्तेमाल करते हैं, जिससे वह जीवन के उस कँटीले मोड पर पहुँचने को मजबूर हो जाती है, जहाँ ’नातरा‘ की भूरी पहुँचती है। इस प्रथा की शिकार स्त्री के बच्चों का भी वही हश्र होता है जो भूरी के बेटे मूला और बेटी काली का होता है।
’वीर बालक हंस‘ तथा ’वसूली नोटिस‘ बैंकों की ऋण तथा वसूली व्यवस्था का जायजा लेती हैं। भरतचन्द्र शर्मा स्वयं एक बैंक अधिकारी रह चुके हैं। इसलिए बैंककर्मियों की द्विविधा को अच्छी तरह जानते हैं। एक तरफ विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत जरूरतमंदों को ऋण देने की मजबूरी तो दूसरी तरफ उनसे वसूली के दबाव के चलते बैंककर्मियों की क्या स्थिति हो जाती है, यह इन दोनों कहानियों में यथार्थपरक ढंग से उभरकर सामने आया है। ’वीर बालक हंस‘ कहानी प्रत्येक पूर्णमासी को नियमपूर्वक ऋण की किस्त जमा करवाने वाले निम्नवर्गीय वेस्ता भाई के बहाने यह सवाल खडा करती है कि करोडों का लोन लेकर डकार जाने वाले वेस्ता की तरह ईमानदार क्यों नहीं होते हैं? वेस्ता मूसलाधार बारिश और बाढ की परवाह किए बगैर अपनी किस्त चुका जाता है। यदि इस कोटि की नैतिकता कॉर्पोरेट जगत् में भी आ जाए तो देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ सकती है तथा आम उपभोक्ता का बैंकों पर से डगमगाते विश्वास को जीवनदान मिल सकता है। ’वसूली नोटिस‘ में ग्रामीणों द्वारा ऋण न जमा करा पाने की विवशताओं को दर्शाने के लिए लेखक ने अलग ही तकनीक का प्रयोग किया है। यहाँ बैंक अधिकारी जब वसूली के लिए दौरे पर जाता है तो उसे तीन भिन्न-भिन्न स्थितियों का सामना करना पडता है। सबसे त्रासद स्थिति अध्ययन के लिए ऋण लेने वाले रमेश की सामने आती है। वह उधार के पैसों से इंजीनियरिंग तो कर लेता है परन्तु नौकरी नहीं लगती। बैंक के तकाजे पर तकाजे, बेरोजगारी का दंश, गरीब माँ की अपेक्षाएँ; इन सबसे घबराकर एक दिन वह नहर में डूबकर प्राणांत कर देता है। माँ विक्षिप्त हो जाती है। एक तरफ हमारा देश विकास के पावण्डे बढा रहा है तो दूसरी तरफ गरीब ग्रामीणों को अर्थाभाव के कारण त्रासद स्थितियों से गुजरना पड रहा है। यही हाल ’मुआवजा‘ के सोमला का भी होता है। ’मुआवजा‘ में उन आदिवासियों का दुःख-दर्द बडी शिद्दत के साथ सामने आया है, जिनकी उपजाऊ जमीन माही बाँध निर्माण के समय डूब क्षेत्र में चली जाती है। बदले में मिलती है बंजर जमीन, वह भी इतनी-सी कि झोपडी बनाकर रह सके। सोमला मुआवजा तो ले लेता है मगर जमीन चली जाने से इतना आहत होता है कि महुडी (देसी शराब) पी-पीकर जिगर खराब कर बैठता है और अंततः मौत को गले लगा लेता है। प्रकारान्तर से यह कहानी देश के विभिन्न हिस्सों के उन सभी बेबस लोगों की छटपटाहट को बयाँ करती है, जिनकी जमीनें डूब में चली गई हैं। इनके हालात पर ’मुआवजा‘ के रमाशंकर जी सार्थक टिप्पणी करते हैं, ’क्या बात है, गरीब आदमी ज्यादा गरीब होता जा रहा है? रामला (सोमला का बेटा, जो कुलीगिरी करने को मजबूर है) जैसे लोग तो विकास के दावों पर करारा तमाचा है। विकास गंगा न जाने किन सगर पुत्रों का उद्धार कर रही है। डूब क्षेत्र के लोग तो डूबते ही जा रहे हैं, हाशिये के लोग तो जल समाधि ले रहे हैं।‘
भरतचन्द्र शर्मा की अधिकांश कहानियाँ हाशिये के लोगों की व्यथा-कथा बयान करती हैं। चाहे ’लापता‘ का गंगाराम हो या ’रेगिस्तानी नदी‘ की गंगा बुआ अथवा ’इच्छामृत्यु‘ के नरेश जी। अलबत्ता ’रेगिस्तानी नदी‘ और ’इच्छामृत्यु‘ परिवार में बुजुर्गों की असहाय स्थिति के दंश को दर्ज करती हैं। इसमें भी ’रेगिस्तानी नदी‘ की गंगा बुआ तो आजीवन नारी होने का दंड भी भोगती है।
’बच्चा‘, ’मैत्री‘ और ’कामाख्या‘ आधुनिक जीवन की विसंगतियों का जीवंत लेखा-जोखा है। अपने फिगर्स की हिफाजत के लिए मातृत्व की बलि देने वाली वंदना (बच्चा) हमेशा के लिए मातृत्व सुख से वंचित रह जाती है और उसे हारकर अनाथालय से बच्चा गोद लेना पडता है। ’मैत्री‘ में फेसबुकिया फ्रेंडशिप की आशंकाओं और विश्वास का रोचक ब्योरा है। ’कामाख्या‘ में एक ऐसी आधुनिक स्त्री के चरित्र के साथ न्याय किया गया है, जो सफलता की सीढयाँ चढने के लिए हर चीज को जायज मानती है। इस प्रकार की महिलाओं के लिए नेरेटर की तरफ से एक सटीक टिप्पणी की गई है, ’बस इतना समझ लीजिये, आज की उर्वशी किसी इन्द्र का मोहरा नहीं है, जो ऋषि के उपभोग में भी आए और शाप भी भोगे। आज की अप्सरा इन्द्र और ऋषि दोनों को साधकर इन्द्रासन स्वयं प्राप्त करने का सामर्थ्य रखती है।‘ कहना न होगा कि कामा उर्फ कामाख्या आधुनिक महत्त्वाकांक्षी स्त्री का प्रतिनिधि रूप है।
’आखिर कौन?‘ संग्रह की सर्वाधिक उल्लेखनीय कहानी है। इसमें आजादी के बाद सत्ता से दूर रहने वाले उसूल पसन्द स्वतंत्रता सेनानियों की विषम स्थिति का जायजा लिया गया है। कहानी जनजाति क्षेत्र के आदिवासी नेता रघु बापा की हत्या के रहस्य से आरम्भ होती है, जो उत्तरोत्तर गहराता जाता है। यह विडम्बना ही है कि त्याग, तपस्या और परोपकार की जीती-जागती मूर्ति, जिसकी लोकप्रियता अपने क्षेत्र में शिखर पर है, अपने ही घर में उपेक्षित है। रघुनाथ घरवालों के सपनों और अरमानों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। वे सत्ता के पीछे नहीं भागते हैं, अन्य नेताओं की तरह ग्लेमर की जदगी जीना उनकी आत्मा को गवारा नहीं है, न ही वे स्वतंत्रता सेनानी के नाम कोई पेंशन उठाते हैं। नतीजा यह होता है कि घोर अभावों में जी रही पत्नी लड-झगडकर कुएँ में कूद जाती है। बेटा आजाद लंपटों, भूमाफियों के चंगुल में फँसकर आवारगी का शिकार हो जाता है। बेटी सादगी सेक्स रेकेट का शिकार हो जाती है, जिसके बारे में रघु बापा तो अनजान हैं मगर आजाद को पता चल जाता है। शक की सुई आजाद, सादगी, आश्रम के चौकीदार और अन्य सेवकों के इर्द-गिर्द घूमती है। परन्तु हत्यारा निकलता है एक भूमाफिया, जो आश्रम की बेशकीमती जमीन हडपना चाहता है। यह कहानी आजादी के पश्चात् धीरे-धीरे क्षरित होते जा रहे गाँधीवादी मूल्यों को लेकर एक सार्थक टिप्पणी है। राजनेता रघुनाथ से इसलिए डरते हैं क्योंकि वे एक बहुत बडा वोट बैंक ह। प्रशासनिक अधिकारी उनसे इसलिए खौफ खाते हैं कि यह आदमी कभी भी क्षेत्र में अराजकता फैला सकता है। मदनमोहन इस ’आखिर कौन?‘ पर ठीक ही टिप्पणी करते हैं, ’यह कहानी गाँधी-विनोबा के दर्शन से अनुप्राणित सच्चे समाजसेवी की हत्या से जुडी है, जो आजादी के बाद की पूँजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था की पोल खोलती हुई गाँधीवादी मूल्यों-आदर्शों के नष्ट होते जाने की गहरी विडम्बना प्रस्तुत करती है। कहन में सस्पेंस का इस्तेमाल खूबसूरती से हुआ है।‘
भरतचन्द्र शर्मा की भाषा सहज है, लेकिन कई स्थानों पर उन्होंने ऐसे उपमान गढे हैं, जो कहानियों की सम्प्रेषणीयता में वृद्धि करते हैं, जैसे -
- लगभग पचीस-तीस वर्ष पहले मैत्री के जीवन की गाडी दांपत्य जीवन में प्रवेश कर नकुलरूपी प्लेटफार्म पर रुकी थी।
- जिला तो दौड रहा है, हम लोग पिछड रहे हैं।
- मेरा गाँव रेल सर्वे में पटरियों के नीचे दबने जा रहा है।
- आजादी मिलने तक टोपी सिर पर रखनी थी, उसके बाद उसी टोपी की नाव बनाकर पार उतरना था।
- सिद्धान्त होना तो अच्छी बात है, पर कभी-कभी ये टूटते भी हैं। जैसे बाएँ चलने का सिद्धान्त।
- भूरी की स्थिति बिफरी हुई गाय की तरह हो गई जो अपने अभी-अभी जन्मे बछडे के पीछे भागती है।
आदिवासी परिवेश की कहानियों में यथास्थान प्रयुक्त स्थानीय शब्दावली कहानियों की खूबसूरती और विश्वसनीयता में अभिवृद्धि करती है, यथा पाँजरे, डोरा, भाँजगडा, लुगाई, सूपडा, थिकडा, धूजना, खूटना, खोणा आदि।
सभी कहानियाँ रोचक हैं तथा अपने समय और परिवेश के दस्तावेज की तरह हैं। पाठक इन्हें जरूर चाव से पढेंगे और साहित्य जगत् में इनका स्वागत होगा।
पुस्तक ः कामाख्या और अन्य कहानियाँ, लेखक ः भरतचन्द्र शर्मा, प्रकाशक ः बोधि प्रकाशन, जयपुर, प्रकाशन वर्ष ः २०१८, पृ.ंसं. १५२, मूल्य ः २२५/-
समकालीन साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर माधव नागदा हिन्दी के अच्छे समीक्षक भी हैं।