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लोक और जीवन की जुगलबन्दी

हरीश बी. शर्मा
सामंतों की ऐशगाह से निकलकर राजनीति के गलियारों तक ऊबाऊ सफर तय करते हुए यह उपन्यास ’हसीनाबाद‘ आखरकार लोक में विश्रांति लेता है। यह एक ऐसी माँ की कहानी है, जिसमें अपनी बेटी को उसके वास्तविक पिता का नाम नहीं दिला पाने की कसक है और इस वजह से ही ठाकुर के किसी कारिंदे की बजाय एक साजिंदे की दूसरी पत्नी होना कबूल करती है ताकि बेटी को पिता का नाम और बेहतरीन परवरिश मिल सके। अभिलाषा और नियति के बीच रचे इस आख्यान में रखैल की बेटी को एक मध्यम मार्ग मिलता है, उसे भले ही ठाकुरों के हसीनाबाद से मुक्ति मिल जाती है, लेकिन नाच-गाना नहीं छूट पाता और यही नाच-गाना कालांतर में उसकी प्रसिद्धि का कारण बनता है। लेखिका ने इस नाच-गान को लुप्त हो रहे लोकगीतों से जोडकर उपन्यास को सोद्देश्य बनाने का भरसक प्रयास किया है।
देश-दुनिया में होने वाले परिवर्तनों को न सिर्फ दरकिनार बल्कि खारिज करते प्रख्यात लेखिका गीताश्री का ’हसीनाबाद‘ यह बताने का प्रयास करता है कि लोक जितना आनंद कहीं नहीं है। अगर लोक को बचा लिया तो आनन्द बचा रहेगा और यही वजह है कि उपन्यास की नायिका को सब कुछ मिलने के बाद भी वह सारा राजपाट न सिर्फ सलीके से ठुकराती है बल्कि एक गुंजाइश भी छोडते हुए अपने अंदर बैठे कलाकार को प्राथमिकता देती है। अच्छा तब लगता है, जब उपन्यासकार महिला होते हुए भी नारी-विमर्श से बच निकलती है, लेकिन दलित-विमर्श के एक संकेत का लोभ-संवरण नहीं कर पाती। सवाल उठता है कि बिहार का पहला दलित महिला बैंड वाक्य दलित के बगैर पूरा नहीं हो सकता था, लेकिन महज इस छोटे से सवाल से इस उपन्यास की सार्थकता कम नहीं हो जाती। आज के समय में यह उपन्यास हथियार बनती नारी को विरोध का तरीका समझाने, महत्त्वाकांक्षा से बचाते हुए अपने मन को तरजीह देने का तरीका भी सिखाता है।
हालाँकि इसी जगह पर इस उपन्यास में पूरी गुंजाइश है कि इस पर नारी-विमर्श का लेबल चिपकाकर इसमें उठाए गए दूसरे सारे सवालों को दरकिनार करते हुए क्योंकि उपन्यासकार एक स्त्री है, इसे नारी-विमर्श का उपन्यास होने के साधारणीकरण से जोड दिया जाए, लेकिन इससे इस उपन्यास की दूसरी सारी वे विशिष्टताएँ जो दृष्टि चाहती हैं, अनदेखी का शिकार हो जाएँगी। यह उपन्यास भले ही नारी-पात्रों के इर्दगिर्द घूम रहा हो, लेकिन वस्तुतः यह समकालीन राजनीति और कला के बीच बन रहे संबंधों को देखने का एक जरीया है।
यह समय जब न सिर्फ फिल्मी कलाकार बल्कि बहुत सारे टीवी से जुडे कलाकार और रंगकर्मी, गायक और ऐसे ही कला माध्यमों से जुडकर सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोग राजनीति में आ रहे हैं, तब ’हसीनाबाद‘ की गोलमी उनका प्रतिनिधित्व करती-सी प्रतीत होती है। एक कलाकार यह तो जान सकता है कि उसकी शोहरत से प्रभावित होकर नये लोग कौन-कौन उससे जुडना चाहते हैं, लेकिन उसके लिए यह जानना दुःखद होता है कि जो लोग उसके साथ थे, वे किस तरह अवसरवादी हो चुके हैं। एक कलाकार के लिए यह यातना होती है और इस त्रासदी की शिकार गोलमी होती है।
उपन्यास ’हसीनाबाद‘ की संवेदना यही है। बिहार की जमीन पर बसाए ’हसीनाबाद‘ की स्त्रियाँ सामंतों की रखैलें हैं और उनसे जन्मी संतानों को नाम मिलता है सामंतों के यहाँ काम करने वाले कारिंदों का। यहाँ के एक सामंत सजावलसिंह की सुंदरी से आसक्ति का परिणाम रमेश और गोलमी नाम के दो बच्चे होते हैं। सुंदरी को लगता है कि उसकी बेटी को यही सब करना होगा तो वह वहाँ से एक मंडली के साजिंदे सगुन महतो के साथ निकल जाती है। महतो पहले से ही शादीशुदा है, लेकिन एक नाटकीय घटनाक्रम के बाद सुंदरी बतौर प्रेमिका उसके साथ रहने लगती है। इधर, गोलमी लोक कलाकारों का एक दल तैयार करती है। सोन चिरैया बैंड बनता है और देखते ही देखते यह बैंड राजनीतिक दल के लिए गीत-संगीत के कार्यक्रम करने लगता है। राजनीतिक दल जीत जाता है, लेकिन अगले चुनाव में गोलमी को प्रत्याशी के रूप में सामने लाया जाता है। गोलमी जीत जाती है, लेकिन उसके बैंड में शामिल खेचरू और रज्जो ज्यादा होशियार निकलते हैं, वे मंत्री बनी गोलमी के नाम से वसूली करते हैं, जबकि गोलमी को इन सब बातों का पता ही नहीं चलता। इस बीच गुरु स्वरूप में रामबालक और सखी स्वरूप में अढाई सौ ही ऐसे हैं, जो गोलमी के सहायक हैं, इन दोनों के आसपास रहने पर ही गोलमी सहज रह पाती है। गोलमी और रामबालक तथा गोलमी और अढाई सौ के साथ के दृश्य इसी वजह से अनुभूतिपरक बन पडे हैं।
लेखिका ने अढाई सौ का नाम भले ही उसके पैदा होने पर लगे अढाई सौ रुपए से जोडा है, लेकिन वह गोलमी के लिए ढाई आखर प्रेम का ही है, जो अंततः उसे हासिल भी होता है। खेचरू की बुरी नजर से हालाँकि गोलमी अनभिज्ञ नहीं है, लेकिन वह उसे अवसर नहीं देती और जब-तब भी वह सीमाएँ लाँघने की कोशिश करता है, प्रतिरोध भी करती है, लेकिन रज्जो का बदलना उसके लिए असहनीय होता है। रज्जो और खेचरू के कारनामों से विचलित गोलमी अपना त्यागपत्र देती है और तय करती है कि वह लोक कला के विकास और संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन लगा देगी। उपन्यास का यह अंत इसलिए आदर्श बन जाता है, क्योंकि सुंदरी की यही ख्वाहिश थी कि उसे इस नर्क से मुक्ति मिले। हालाँकि सुंदरी को गोलमी का नाच-गान पसंद नहीं है, लेकिन सुंदरी के जीवन और गोलमी के जीवन में महीन भेद को व्यक्त करते हुए लेखिका ने कला को जो प्रतिष्ठा दी है, वह काबिले-तारीफ है। पूरे उपन्यास में कहीं भी गोलमी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करती, सम्भवतया यह गोलमी के बालमन में अपनी माँ की छवि से उपजा संकल्प है, जो उसे हर बार फिसलन से बचाता है। खेचरू के प्रयासों का विरोध, रामबालक के प्रति गुरु-भाव और अढाई सौ के साथ उसका सखी-भाव उसके मन में बैठे निर्दोष कलाकार का प्रतिबिम्ब है। इस उपन्यास का कालखण्ड ११वीं व १२वीं लोकसभा है। १९९६ और १९९८ का यह समय भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में उठा-पटक के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है, इस कालखण्ड को अपने उपन्यास का समय बनाकर गीताश्री ने बहुत सारे संदर्भ उद्धरित नहीं करके भी कर दिए हैं।
कुल मिलाकर यह उपन्यास स्त्री को स्त्री रहते हुए उसके कर्त्तव्य का निर्वहन करने की सीख देता है तो दूसरी ओर रज्जो के चरित्र से यह भी समझाने की कोशिश करता है कि स्त्री की पहली शत्रु स्त्री ही है तो यह भी संकेत करता है कि पुरुष अगर स्त्री को आगे बढाता है तो उसके पीछे उसका कोई न कोई स्वार्थ जरूर होता है। रामबालक से लेकर प्रधानमंत्री के साथ संवाद में यह बात बार-बार उभर कर आती है और यही वजह है कि महिला लेखन के साथ होने वाली आम दुर्घटना से यह उपन्यास बच जाता है। हम इस उपन्यास में नारी-विमर्श की तलाश करते हुए न सिर्फ नाकामयाब होते हैं, बल्कि औंधे मुँह पडे होते हैं।
उपन्यास की शुरुआत बहुत ही ढीली है। बहुत ही धीरे-धीरे यह उपन्यास रोचक बनता है, ऐसे में इस बात की बडी आशंका है कि जिस पाठक वर्ग के लिए यह उपन्यास लिखा गया है, उसे नहीं जँचे। वाणी प्रकाशन ने इस उपन्यास के आवरण और जल्द को लेकर जो प्रयोग किया है, उसमें रेल-बस में सफर करने वाले पाठकों का खासतौर से ध्यान रखा गया है जबकि यह उपन्यास साहित्य के संजीदा पाठकों के लिए भी उतना ही जरूरी है। अच्छा होता लेखक के परिचय को लेकर प्रकाशक कुछ उदार होता। उपन्यास में कुछ चरित्रों को औपचारिकता वश लाया गया है और इस जल्दबाजी में रमेश नाम के चरित्र को उभरने का मौका दिए बगैर ही उसे खत्म कर दिया गया है। उसका अपने पिता सजावल के साथ रहने का फैसला इस उपन्यास को एक नये फलक पर ले जा सकता था, लेकिन यह उपन्यास गोलमी के इर्द-गिर्द ही चलता है, ऐसे में रमेश क्या सजावल सिंह, सगुन महतो, सुंदरी, रज्जो, मंजू, खेचरू, इशाक, उस्मान, रामबालक, रामखिलावन, प्रधानमंत्री आदि भी गोलमी के पात्र को उभारने के लिए आते-जाते रहते हैं। कुछ अंक अगर इन पर भी खर्च किए जाते तो उपन्यास की आवश्यकताएँ पूरी करते हुए यह उपन्यास एक समग्रता को प्राप्त कर सकता था। ऐसा लगता है जैसे उपन्यासकार अपनी जरूरत से पात्रों को ला-ले जा रही है। ऐसा नहीं होना चाहिए था। जितने बडे फलक पर उपन्यास को फैलाया गया है, इन सभी का चरित्र-चित्रण किसी न किसी रूप में होना चाहिए था। इन सभी के अभाव में उपन्यास का प्रभाव वैश्विक नहीं रह पाता। ठाकुरों की स्थिति, रखैलों की रवायत, लोक का महत्त्व और किसी देश के प्रधानमंत्री की अहमियत को लेकर उपन्यास में कोई बडे संदर्भ नहीं हैं, जो इस उपन्यास को दुनिया के किसी कोने में बैठे पाठक को अपने से जोड सके। बल्कि आशंका तो इस बात की है कि नई पीढी को भी यह शब्दावली समझ नहीं आएगी। कुछ स्पष्ट हो जाता तो लेखकीय अध्ययनशीलता का भी परिचय मिलता रहता। यह सम्भव है कि उपन्यासकार के मन में कहीं न कहीं यह आग्रह रहा है कि इतना तो लोग जानते ही होंगे और ऐसे में जो नहीं जानते हैं, उसे व्यक्त करने का प्रयास करती हैं, जबकि यह कथानक भी ज्यादा नयापन लिए हुए नहीं है।
आरोही क्रम में उपन्यास विश्लेषण करते हुए आगे बढता है। कई स्थानों पर दृश्यात्मकता भी प्रभावी बन पडी है, लेकिन अवरोही क्रम में ऐसा लगता है जैसे अचानक से उपन्यास समेटने की जल्दबाजी है। बहुत सारी बातें नरेशन में होते हुए इतना जल्दी सबकुछ होता है कि बहुत कुछ समझते हुए पढना पडता है।
वस्तुतः यह उपन्यासकार की अपनी यात्रा के कुछ पडाव हैं। गीताश्री स्वयं एक पत्रकार रही हैं तो उन्होंने देश के बदलाव और खासतौर से सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों को बहुत करीब से देखा है। उन परिवर्तनों को स्वीकारने और अस्वीकारने के बीच सशंकित मन की थाह इस उपन्यास की ताकत है। सुंदरी के सजावल सिंह से मिलने वाले प्रसंग और फिर प्रधानमंत्री से गोलमी के वार्त्तालाप के बीच एक गुंजाइश को छोडने की कला इस मनगत को अभिव्यक्त करने के महत्त्वपूर्ण पडाव साबित हुए हैं।
उपन्यास के अंत में तब गोलमी और गीताश्री एकमेक होते लगते हैं, जब ओशो का एक उद्धरण गोलमी को सूझता है।
वैसे भी गोलमी की ओशो तक पहुँच का सवाल ही नहीं उठता, लेकिन ओशो का यह उद्धरण समकालीन राजनेता और राजनीति पर तीखा तंज है। उपन्यास में कहीं भी गोलमी के पढने-समझने का जक्र नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री से उसका संवाद उसके बुद्धि-कौशल का एक अनूठा प्रकटीकरण है। ऐसा लगता है कि इतनी देर किसी परकाया में जी रही गीताश्री अचानक से सारे लबादे उतारकर प्रधानमंत्री के सामने आ खडी होती है। ऐसा सम्भव भी है, वैसे भी पात्र को जीना ही रचनाकार को अभीष्ट होता है। किसी चरित्र को इस तरह से जीना ही उपन्यास को सत्य के समीप ले जाता है। बिहार की पृष्ठभूमि पर रचे हुए इस उपन्यास में लोकगीतों का मोह सिर चढकर बोलता है। गीताश्री ने लोकगीतों को बचाने के लिए न सिर्फ एक कथानक का सहारा लिया है, बल्कि बहुत सारे लोकगीतों को संगृहीत करने में भी महती भूमिका निभाई है। यकीनन, लोक है तो हम हैं। अगर लोक नहीं बचा तो कुछ भी नहीं बचेगा। समूचे उपन्यास की अंतर्धारा यही है और इस अंतर्धारा के मौन को समझने के बाद यह कहा जा सकता है कि एक पुराने कथानक को गीताश्री ने महज एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया है ताकि लोक का निनाद सुना सके। यहाँ इस बात से मैं सहमत हूँ कि पुराने पड चुके इस कथानक के अलावा ऐसा कोई भी साधन नहीं था, जिससे इतने बडे विषय को सहजता से जन के बीच में रखा जा सके। इस रूप में मैं यह स्वीकार करता हूँ कि गीताश्री ने समाज को ऐसी रचना दी है जिससे प्रेरित, प्रभावित होकर अगर दस लोगों में भी लोकगीतों को बचाने की उत्कंठा जाग गई तो ’हसीनाबाद‘ सार्थक हो जाएगा। एक उद्देश्यपूर्ण उपन्यास की रचना के लिए गीताश्री जी को बधाई।
पुस्तक ः हसीनाबाद, लेखिका ः गीताश्री, प्रकाशक ः वाणी प्रकाशन, पृष्ठ ः २३४, मूल्य ः २५० रु.
पत्रकार, साहित्यकार और प्रकाशक हैं। तीनों क्षेत्रों में गहरी रुचि और दखल है। अनेक अलंकरणों से अलंकृत हैं।