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विपुलता, विविधता और सूक्ष्मता का संगम

डॉ. सुचित्रा कश्यप
लेखन में उद्धरण की उपस्थिति किसी आदर्श कक्षा के उस छात्र की उपस्थिति की तरह होती है, जिसकी मौजूदगी कक्षा को वैचारिक रूप से रोचक, उत्तेजक और सम्पन्न बना देती है। उस छात्र की विशिष्टता यह होती है कि वह समय पर आता है, यथास्थान बैठता है और अवसर पर अपनी प्रामाणिकता से हमारे बोध में कुछ जोड देता है। बहुत बार यह भी होता है कि उस छात्र के द्वारा दिए गए बोध से हम जाग्रत् हो जाते हैं और हम एक नयी यात्रा पर निकल पडते हैं।
हम अक्सर देखते हैं कि उद्धरण के आते ही विषय का मर्म, गहराई और दृष्टि का तेज स्वयमेव ही हमें उसे पढे जाने से पूर्व की तुलना में अधिक सजग और सक्रिय बना देता है। इसलिए ऐसे छात्र की उपस्थिति से कक्षाकक्ष गरिमामय रहता है। ठीक यही बात किसी भी पुस्तक में आए उद्धरणों पर भी पूरी तरह खरी उतरती है।
उद्धरण का आना इस बात का भी संकेत होता है कि विषय की गम्भीरता और प्रामाणिकता असंदिग्ध है। यह असंदिग्धता उस विषय का प्राणतत्त्व होती है, क्योंकि वह विषय को मूल विचार से जोडती भी है। ऐसे में शोधार्थियों, पाठकों और अध्येताओं के लिए इनका महत्त्व निर्विवाद है। उद्धरण अपने कलेवर में सूचना, जानकारी के साथ-साथ तथ्यों का भी समावेश किए होते हैं। यही कारण है कि किसी भी अध्ययन में उद्धरणों की सघन उपस्थिति उस अध्ययन को उतना ही अधिक प्रामाणिक बना देती है।
उद्धरण का सामान्य अर्थ होता है - किसी अन्य के मत का अधिग्रहण। अंग्रेजी का कोटेशन इसका पर्याय है। अवतरण अंग्रेजी कोटेशन का हिन्दी अनुवाद है। उद्धरण सामान्यतः दो तरीकों से ग्रहण किए जा सकते हैं - एक लिखित और दूसरा मौखिक। उद्धरण की प्रक्रिया में अन्य समर्थ विद्वान के कथन या मत से स्वयं को पुष्ट करना होता है। बहुत बार तो इनका प्रयोग किसी पूर्व प्रचलित धारणा अथवा मत के खण्डन हेतु भी होता है।
आज के भागमभाग समय में, जिसमें सब कुछ पीछे छूटता जा रहा हो और मूल से हमारे संवेदनात्मक रिश्ते से लेकर अकादेमिक रिश्ता दिन-ब-दिन कम होता जा रहा हो तो हमारे लिए ऐसी पुस्तकों का महत्त्व और अधिक हो जाता है, जो न केवल प्रामाणिक हो वरन् किसी एक कृति-कृतिकार के विचारों के सागर को गागर में भर दें।
क्योंकि जीवन पर बढते दबाव, तनाव अक्सर हमें ऐसी किसी राह पर ले आते हैं, जहाँ हम जानना तो बहुत चाहते हैं, पर उन तनावों, दबावों की वजहों के कारण हम आगे अधिक बढ नहीं पाते। परिणामस्वरूप आवश्यक विचार, कथन, कवितांश आदि का प्रयोग करते समय उनके ठीक-ठीक संदर्भ नहीं बता पाते। ’अज्ञेय के उद्धरण‘ पुस्तक इन्हीं तरह की समस्याओं से उबारने का बहुत ही दृष्टि-सम्पन्न और वैज्ञानिक सोच से किया गया कार्य है। स्थूल दृष्टि से देखें, तो इस तरह की पुस्तकों का कोई विशेष महत्त्व नहीं जान पडता पर गहराई से विचारें तो इस तरह की पुस्तकें हमें कृति, कृतिकार या विचार को उसकी समग्रता के साथ केन्द्रीय चिंतन के उजले आलोक से भर देती हैं। शोध क्षेत्र में तो ऐसी पुस्तकों का होना बडे महत्त्व का है। उस दृष्टि से हम देखें तो पाएँगे कि इस पुस्तक में स्रोत और प्रयोजन वाले उदाहरण मौजूद हैं, जो चयन एवं संपादन की निष्णातता के साक्षी हैं।
गौर से देखेंगे तो पाएँगे कि इस पुस्तक में क्रमशः तथ्य निरूपक, सिद्धान्त निरूपक और आनुषंगिक तीनों ही प्रकार के उद्धरण मौजूद हैं।
इस चयन एवं समपादन की एक मुख्य विशेषता यह रही है कि अज्ञेय के विचार संसार को समेटने के साथ-साथ उनके संस्कृति चिंतन के जरिये जीवन में प्रवेश की विधि के मार्ग का भी उद्घाटन करती है। पुस्तक के अनुक्रम में आए शीर्षक एक ऐसा आदर्श क्रम विधान है, जिसमें साहित्य संसार के सभी नागरिकों के साहित्य को देखा परखा जा सकता है। इस तरह सुचिन्तित, तार्किक, गहन वैचारिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि का विधान सामान्यतः कम देखने में आता है। खास किसी बडे रचनाकार को समझने में आने वाली उलझनों को यह पुस्तक कितने सरल तरीके से हमारे सामने रखती है। यह दृष्टि अपने आप में काबिले-तारीफ है। संपादक का प्रयास सराहनीय है।
इस चयन से गुजरने पर पाठक/अध्येता के मन में अज्ञेय के चिंतन से सम्बन्धित प्रमुख प्रश्नों का समाहार स्वयमेव हो जाता है। यह अज्ञेय के चिंतन के व्यवस्थित रूप की आदर्श बानगी भी है। यह पुस्तक एक साथ अध्येता, प्रश्नाकुल और अन्वेषक के साथ-साथ कृतिकार के मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया को भी अपने कलेवर में समेटे है।
इसकी अकादेमिक उपयोगिता हेतु ठीक होता कि उसमें सम्पादक महोदय परिशिष्ट में उद्धरणों के प्रयोग और तरीकों के प्रकार पर भी अपना दृष्टिसम्पन्न विचार रखते तो अध्येताओं को शोध आदि क्षेत्र में उद्धरण की उपस्थिति और गम्भीरता से रूबरू होने का अवसर मिल जाता परन्तु उनका मूल विषय अज्ञेय विचार का व्यवस्थित चिंतन प्रस्तुत करना था। अतः इस पर उनका ध्यान नहीं जा पाया या उन्हें जरूरी भी नहीं लगा होगा।
सारतः यह सम्पादन हिन्दी और हिन्दीतर दोनों ही मुख्यधारा के वैचारिक आधार को गति देगा और हिन्दी में इस तरह के कामों की एक नई परम्परा का आगाज भी होगा।
पुस्तक ः अज्ञेय के उद्धरण, संपादन ः नन्दकिशोर आचार्य, प्रकाशक ः राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, वर्ष ः २०१९
अध्यापन-अन्वेषण से जुडी हैं। सम्पादन में भी दखल रखती हैं। गद्य में गहरी रुचि है।