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पद्मिनी

नीरज दइया
ताने की सवारी
जिससे विवाह को आता है पति
शतरंज की गोटियों के बल
तय होता है जिसका जीवन
वह अपनी माँग म
सिंदूर नहीं
अग्नि भरा करती हैं
यह मुझे जान लेना था
गोटियों के बिछते उस क्षण ही।

जमीन बदलने से
काठ नहीं बदलता अपना गुण
राज बदलने से
क्रोध नहीं बदलता अपनी तासीर
सम्बन्ध बदलने से
मर्द नहीं बदलता अपना गुमान,
अपने पुरुषत्व के मद में
जिसने लिए थे फेरे
वह मर्द
किस घडी हो जाए निस्तेज
यह मुझे जान लेना चाहिए था
उससे मिलते ही
आने वाली पहली साँस से ही।
क्या आईने में आने पर
चेहरा हो जाता है दूसरा
क्या आईने में आने से
औरत नहीं रहती औरत
मैं थी तुम्हारा आईना
जिसमें सिर्फ तुम दिखाई देते थे
पर तुम
नहीं जान सके
इस आईने का मन
तुमने इस शीशे को रख दिया
दूसरे के सामने।
शीशे को शीशे के सामने करने पर
होती है एक चमक
उस चमक की क्रांति
हजारों वर्षों तक फैली रहती है
समय के साक्ष्यों पर।
हजारों ज्वालामुखी भी
उससे नहीं कर सकते प्रतिस्पर्धा
अपने समय के साथ लिपटी
वह कालिमा
बनाती है जो रोटियाँ
आने वाली पीढयाँ
उसको इतिहास कह कर
चबाती रहती हैं।

अपने चारों तरफ
ऊँचे-ऊँचे परकोटे बनवाने वाला
क्यों नहीं जान सका
यह रहस्य
कि एक छोटी-सी खिडकी
मिटा देती है
बडे-बडे दुर्गों का गुमान
फिर उस सुलतान को
वह खिडकी तुमने क्यों दिखाई
तुमने तुम्हारे दुर्ग के
लगवाए लोहे के दरवाजे
पर मेरे झरोखे की खिडकी
बिना कपाटों के क्यों छोड दी
खुले दरवाजों
घर में प्रवेश कर जाते हैं
साँप, बिच्छू, कुत्ते, गधे
चोर-लूटेरे
क्या तुम
नहीं जानते थे यह बात
तुमसे मिलकर
खुले मेरे भाग्य के दरवाजे
मैंने माना अहोभाग्य
हृदय के दरवाजे खोल कर
ले लिया तुमको भीतर
और बंद कर दिए शेष सभी दरवाजे।

मेरे छत्तीस गुण
छत्तीस जाति की औरतों की
ईर्ष्या की लपटों
और
छत्तीस जाति के मर्दों के मुँह
टपकती लारों से बचने को
किसके द्वारे जाते
पानी से बुझती होगी
मंदिम ज्योति
इन लारों की बौछारें
यह अग्नि द्विगुणित होती है।

ईश्वर ऐसा रूप किसी को ना दे
जिसे देखकर
आँखों में प्रीति नहीं
भोग जन्मे
जहाँ पीछे छूट जाए
सभी संबोधन
माँ, बेटी, बहन, लडकी
ना जाने किस लोक के
रिश्ते थे
जिनके स्पर्श से
मनुष्य पूर्ण पद को प्राप्त होता था
इस देह की परिक्रमा के लिए
व्यग्र
बंद आँखें
आकाश का अनंत विस्तार
कैसे देखती।

मुझे जान लेना चाहिए था
उम्र की सीढयाँ चढते हुए
कि रूप-वृक्ष के पुहुप
सिर्फ बिछाने के काम ही आते हैं
मैंने किसी के श्ाृंगार की इच्छा
मन में क्यों लगाईर्।

मैंने
मेरे रूप की ज्योति से
रंग दिया था तुम्हारा पहनावा
केसरिया
कि इसी बहाने
तुम्हारी सुगंध से लकदक
रहेगा मेरा चित्त
लेकर तुम्हारा क्रोध
अंगीकार कर लूँगी मैं
और तुम धारण करोगे मेरा रंग।

मैं जानती हूँ कि इस जन्म में
मैंने नहीं किया ऐसा कुछ
जिसका प्रत्युत्तर अग्नि की लपटों से देना था
पर औरतें तो अपने कर्मों से बँधी होती हैं राजा
फिर मेरे कर्मों का दोष
तुम्हें कैसे दे दूँ
तुम पिता के कर्मों से बँधे
मेरे कर्मों को कैसे अंगीकार करते।
वह मुझे
हरम में बंद करने आया था
तुमने मुझे आईने में बंद कर
परोस दिया उसके समक्ष,
दोनों जगह चौखट है
जडाव है
और है बाँधने की लालसा।

मैं तुम्हारे लिए
हमेशा रही एक ’सौंदर्य‘
मुझे घर चाहिए था
तुमने मुझे दीया
बावडी छलछलाती हुई
जिस में डूब जाएँ हाथी-घोडे
पर जहाँ से पनिहारियाँ
हमेशा खाली जाया करती हैं।

यदि अलाउद्दीन आया था
दूसरे के उकसाए
तो तुम्हें क्रोध क्यों आया
तुम भी तो आए थे
दूसरे के उकसाए
लेने को मुझे।
मेरे जीवन में
तुम्हारा और अलाउद्दीन का पलडा
एक जैसा ही है।

मुझे जान लेना चाहिए था
हथलेवा जोडते समय
कि मेरा यह रूप
और मेरे छत्तीस गुण
हमेशा उकसाएँगे दूसरों को
और
दूसरों के उकसाए
दूसरे ही आएँगे
मेरे जीवन में।

मुझे जान लेना चाहिए था
कि मैं
मर्दों के उकसाने का
एक साधन हूँ।
मेरी साध थी
कि मैं बनूँ साध्य
पर साधन कभी
साध्य नहीं बन सकता
यह मुझे जान लेना चाहिए था
पहली ही रात।

अग्नि को
कोई कब सौंपता है
अपनी देह
पर जब भाई सौंप देते हैं
बाप सौंप देते हैं
पति सौंप देता है
तब कोई क्या करे
मैंने
फेरे खाए अग्नि से
मुझे
जो लेने आया था
उसके हृदय में भी
लगी हुई थी अग्नि
अपनी पटरानी के शब्दों से
ऐसे
अग्नि अग्नि के बीच
हुआ था एक वचन।

पीढयाँ वर्णित करेंगी मेरा यश
जिसने अपना पति धर्म निभाने के वास्ते
सौंप दी अपनी देह अग्नि को
पर कोई नहीं पूछेगा
कोई सवाल मेरे पति से
जिसकी मर्यादा रखने
मरना पडा मुझे।
मूल लेखक परिचय ः डॉ. अर्जुनदेव चारण राजस्थानी के प्रख्यात नाटककार, आलोचक- कवि। अनेक पुस्तकें प्रकाशित। साहित्य अकादमी नई दिल्ली तथा राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर के सर्वोच्च पुरस्कारों से सम्मानित। वर्तमान में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अध्यक्ष हैं। सम्फ ः १८०-बी, लक्ष्मीनगर, पावटा, जोधपुर (राज.), मो. ९८२९१०७७५१
अनुवादक का परिचय ः डॉ. नीरज दइया, विगत तीस वर्षों से राजस्थानी और हिन्दी में निरन्तर सृजन-अनुवाद-संपादन। विभिन्न विधाओं में लगभग तीस पुस्तकें प्रकाशित।