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याद आते हैं मटियानी

प्रकाश मनु
आज से कोई छत्तीस बरस पहले, सन् १९८३ में जंदगी के तमाम बेतरतीब मोडों, आकस्मिक पडावों, यहाँ-वहाँ की भटकन और सुख-दुःख भरी स्थितियों से गुजरकर मैं दिल्ली आया। तब भी जीवन की अजीबोगरीब मुश्किलों का सिलसिला तो खत्म नहीं हुआ, पर दिल्ली में साहित्य-जगत् की एक से एक बडी विभूतियों व दिग्गज नक्षत्रों से मिलने और उनके सान्निध्य का सुख जरूर मिला। वही मेरे जीवन का सबसे बडा आनन्द, सबसे बडा उत्सव था। जीवन में इससे अधिक पाने का कभी सपना न देखा था।
मुझे याद है, शुरू में दिल्ली आया तो इस उच्च-भ्रू दिल्ली से मैं बहुत डरा-डरा सा रहता था। तभी लोकगीतों के फकीर देवेन्द्र सत्यार्थी जी से मुलाकात हुई और मुझे लगा, ’अरे, ये तो मुझसे भी ज्यादा सीधे-सरल और गैर-दुनियादार हैं। जब ये दिल्ली में रह सकते हैं और खूब मजे में रह सकते हैं तो मैं क्यों नहीं रह सकता?‘ उसके बाद तो सत्यार्थी जी से अंतहीन मुलाकातों का सिलसिला ही चल निकला और उन पर बहुत काम मैंने किया। महात्मा गाँधी और कवि गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर के निकट रहे सत्यार्थी जी की सरल और निरभिमानी शख्सयत और लोक साहित्य में उनके बडे, ऐतिहासिक कामों से हिन्दी जगत् को परिचित कराते हुए बहुत पुस्तकें मैंने लिखीं, जिनमें उनकी पूरी जीवन-कथा ’देवेन्द्र सत्यार्थी ः एक सफरनामा‘ भी शामिल है।
ऐसे ही दिग्गज आलोचक, चिंतक और साहित्य-मनीषी रामविलास शर्मा को व्यास सम्मान मिलने पर मैं हिन्दुस्तान टाइम्स की ओर से उनका इंटरव्यू करने गया था और हमेशा-हमेशा के लिए उनके परिवार का सदस्य बन गया। हर क्षण अपने काम में लीन रहने वाले रामविलास जी पूरे हिन्दी जगत् का गौरव थे। यह मेरे लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं कि उनका असीमित स्नेह मुझे मिला। हिन्दी के दिग्गज कथाकार शैलेश मटियानी जी से बडी आकस्मिक मुलाकात हुई और मैं हमेशा-हमेशा के लिए उनकी खुद्दारी का कायल हो गया। इतना अद्भुत आकर्षण था उनमें कि मैं उनके निकट खिंचता ही चला गया। इसी तरह दिल्ली सरीखे शहर में भी अपनी गँवई शख्सयत के कारण अलग से पहचाने जाने वाले, सीधे-सरल रामदरश जी के निकट आकर मैंने जाना कि जीवन में सरलता और सादगी से बडा सौंदर्य कुछ और नहीं होता। मेरे जीवन और लेखन दोनों पर उसकी गहरी छाप पडी। उन्होंने मुझे पढाया नहीं, पर आज भी मन ही मन मैं उन्हें गुरु कहकर प्रणाम कर लेता हूँ। दूसरी ओर, हिन्दी के बडे ही विलक्षण कवि और सम्पादक विष्णु खरे जी से मैंने निर्भीकता, हिम्मत और दिलेरी से अपनी बात कहना सीखा... और लगता है, वे कहीं गए नहीं, मेरे भीतर ही हैं। जब चाहूँ, उनसे बात कर सकता हूँ।
पर दिल्ली में आकर साहित्य जगत् की जिन बडी विभूतियों से मैं मिला, उनमें शैलेश मटियानी सबसे अलग हैं। एक लेखक के मान-सम्मान की बात आते ही वे जिस तरह तनकर खडे हो जाते थे, वो निर्भीकता, वह खुद्दारी और वह निष्कंप लेखकीय स्वाभिमान मैंने कहीं और नहीं देखा। बेशक वे हिन्दी कथा-जगत् के गौरव थे और देश के कोने-कोने में फैले असंख्य पाठकों और प्रशंसकों के चहेते कथाकार भी। हालाँकि अफसोस, पाठकों का जितना असीमित प्यार उन्हें मिला, उसकी तुलना में आलोचना जगत् से एक सोची-समझी ठंडी उपेक्षा ही उनके हिस्से आई। हालाँकि मटियानी जी ने कभी इसकी बहुत ज्यादा परवाह नहीं की, पर कभी-कभी बडे विषादपूर्ण स्वर में वे इसका जक्र करते थे, तो मेरे भीतर कहीं कुछ टूटता था। इतना बडा लेखक, जिसे पढते हुए गोर्की का सा यथार्थ-चित्रण और तुर्गेनेव सी विलक्षण कला, दोनों एक साथ आँखों में कौंधते हैं, हिन्दुस्तान के घर-घर में जिसे आज भी इतने प्यार और आदर से पढा जाता हो, उसके हिस्से आई यह अक्षम्य आलोचकीय उपेक्षा क्या यों ही थी? मैं याद करता हूँ तो मर्माकुल हो जाता हूँ।
मटियानी जी एकदम खरे लेखक और खरे आदमी थे। किसी की बिना बात लल्लो-चप्पो करना उन्हें पसन्द नहीं था। लेखकीय खुद्दारी उनमें कूट-कूटकर भरी हुई थी। उसी के नाते किसी आलोचक को उन्होंने जरूरत से ज्यादा भाव नहीं दिया। आम जनता के आदमी बनकर हमेशा जनता के बीच रहे और आम आदमी के दुःख, तकलीफों और जीवन त्रासदियों की कहानियाँ और उपन्यास लिखे। क्या यह सब पर्याप्त न था? इसके साथ ही आलोचकों या आलोचना-जगत् के महानों को प्रसन्न करने की कोशिशें और उपादान भी क्या उनके लिए जरूरी थे? क्यों जरूरी थे
मैं अपने जीवन में निराला से तो नहीं मिला, पर अगर किसी लेखक में निराला को देखा, निरालापन देखा, तो वे मटियानी जी ही थे और अफसोस, जैसे इलाहाबाद में रहते निराला के हिस्से उपेक्षा और विक्षिप्तता आई, वैसे ही मटियानी भी अंत में मानसिक विक्षेप और विचलन के शिकार हुए और एक अंतहीन त्रासदी में घिर गए और अंत में इसी हालत में दिल्ली में उनका निधन हुआ, तो भी उनकी जीवन-त्रासदी का मानो अंत नहीं हुआ।
उनकी जीवन-कथा का आखरी अध्याय तो शायद अभी लिखा जाना बाकी था।
इस दारुण दशा में दिल्ली में मटियानी जी के निधन का समाचार मेरे एक पत्रकार साथी को मिला, तो उसने उस पर बडे साहित्यकारों की टिप्पणी जानने के लिए उन्हें फोन किया। ऐसे ही एक महान् आलोचक जी के पास जब उसका फोन गया तो आलोचक जी का बेहद संवेदनशून्यता से भरा जवाब था, ’’मैं इस समय दूरदर्शन पर समाचार देख रहा हूँ।‘‘ और फोन रख दिया गया।
उस पत्रकार साथी के लिए यह दुख और हैरानी की बात थी। उसने सोचा, शायद फोन बीच में कट गया होगा। उसने फिर से फोन मिलाकर आलोचक जी को बताया कि दिल्ली में इस हालत में मटियानी जी का निधन हो गया है, ’’...लिहाजा आप इस पर अपनी...!‘‘ सुनकर वे गरम हो गए। क्रोध में आकर बोले, ’’आपको बताया न, मैं इस समय दूरदर्शन पर समाचार देख रहा हूँ।‘‘
उस पत्रकार साथी के लिए यह किसी सदमे से कम न था। उसने अपने अखबार के लिए खबर बनाते हुए सभी साहित्यकारों के शोक-संदेशों के साथ ही आलोचक जी की उस संवेदनशून्य टिप्पणी का भी जक्र कर दिया। अगले दिन यह समाचार छपा। फिर तो कई दिनों तक उन महान आलोचक जी की जिस तरह भीषण लानत-मलानत पाठकों ने की, वह सब नहीं कहने जा रहा। कह भी नहीं सकता। ...हाँ, पर इतना जरूर है कि वे अपनी इस असंवेदनशील टिप्पणी पर ताउम्र शर्मिन्दा रहे और यह जरूर समझ गए कि वे आलोचक चाहे कितने ही बडे हों, पर वे किसी लेखक के भाग्य-विधाता नहीं हैं और मटियानी जैसे लेखक बडे हैं तो देश के कोने-कोने में फैले हिन्दी के उन हजारों-हजार पाठकों के निश्छल प्यार के कारण, जो किसी भी लेखक की सच्चाई और संवेदनशीलता की कद्र करते हैं। असली लेखक वही है, जिसे देश की जनता प्यार करती है, पढती और सराहती है और इसीलिए उसका दरजा किसी आलोचक से कमतर नहीं, बडा ही है। सच पूछिए तो किसी लेखक को बडा भी असल में जनता ही बनाती है, आलोचक नहीं।
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खूब अच्छी तरह याद है, मटियानी जी से मेरी पहली मुलाकात राजेन्द्र यादव ने करवाई थी। मैं ’हंस‘ के दफ्तर गया था, राजेन्द्र जी से मिलने। उन्होंने सामने सोफे पर विराजमान एक भव्य ’काया‘ की ओर इशारा करते हुए कहा, ’’इनसे परिचय है आपका?‘‘
’’नहीं।‘‘ मैंने अचकचाकर कहा।
’’आप शैलेश मटियानी...!‘‘
’’ओह!‘‘ मैं खडा हुआ, दोनों हाथ जोडकर नमस्कार किया और शायद बेतुके ढंग से हाथ भी मिलाया।
मेरी खुशी ऐसी है, जैसे इस अपार संसार में किसी को एकाएक किसी मोड पर अपना हमसफर, नहीं-नहीं, ’हमशक्ल‘ जरूर होता है, और किसने कहा कि वह उम्र में बडा नहीं हो सकता? यों मटियानी जी से पहली ही बार मिला तो लगा, किसी और से नही, खुद अपने आप से मिल रहा हूँ।
’’इधर आप लगता है, साहित्य के मैदान की सफाई में जुटे हैं। बडे-बडे युद्ध लड रहे हैं, एकदम खड्गहस्त होकर।‘‘
यह उनसे मिलने पर मेरा पहला वाक्य था। मुझे आज भी याद है, खूब अच्छी तरह।
’’अच्छा, तो पढ लिया आपने?‘‘ वे हँस रहे हैं। किसी भोले-भाले गोलमटोल बच्चे की तरह, जो जरा-सी बात पर खुश हो जाता है, जरा-सी बात पर तिनक जाता है, लेकिन अपने भीतर कुछ नहीं रखता।
मुझे वह हँसी बडी प्यारी मालूम देती है-एकदम निर्मल, निष्कलुष। जैसी बेलाग बातें, वैसी बेलाग हँसी। क्षणभर में जैसे हम ’संवाद‘ की स्थिति में आ गए हों।
’’सारा कुछ तो शायद नहीं पढा होगा। हाँ, अभी-अभी ’अमर उजाला‘ में एक उत्तर-आधुनिक जी को जो जवाब दिया है आपने, उनके गुलशन नंदाई मेनिया के जवाब में, वह देखा है।‘‘
’’गुलशन नंदाई मेनिया!‘‘ वे फिर हँसे हैं। यह एक्सप्रेशन शायद उन्हें खासा जोरदार लगा होगा।
फिर जो बातें शुरू हुईं तो कहीं रुकने का नाम ही नहीं।
’’देवेन्द्र सत्यार्थी पर इनकी किताब आई है - देवेन्द्र सत्यार्थी ः चुनी हुई रचनाएँ।‘‘ राजेन्द्र यादव जो हमें भिडाकर उत्सुकता से सुन रहे थे, किताब के साथ-साथ बातचीत का एक सिरा पकडा देते हैं मटियानी जी को।
’’अच्छा, यह तो बहुत अच्छा काम है।‘‘ पुस्तक पलटते हुए मटियानी जी कह रहे हैं।
’’आपने पढा है सत्यार्थी जी को? मिले हैं उनसे...?‘‘ मैं उत्सुकता से पूछ लेता हूँ।
’’उन दिनों जब किशोरावस्था में साहित्य के संस्कार हम बटोर रहे थे, तब सत्यार्थी जी की बहुत पुस्तकें पढी थीं। हमारे शहर में पुस्तकालय में थीं, ’धरती गाती है‘, ’बेला फूले आधी रात‘, ’बाजत आवै ढोल‘, ’ब्रह्मपुत्र‘!‘‘ मटियानी याद करके बताते हैं।
’’ये काफी निकट हैं सत्यार्थी जी के, सारा साहित्य पढा है उनका।‘‘ राजेन्द्र यादव मेरे परिचय को हलका-सा गाढा करते हैं। फिर मेरी ओर मुखातिब होते हैं, ’’आप कुछ बताइए, सत्यार्थी जी के बारे में। आपको लगता नहीं कि ऐसा आदमी परिवार वालों के लिए तो बडी मुसीबत बन जाता है। लेखक के लिए सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी जरूरी है कि नहीं?‘‘
’’ऐसा है, राजेन्द्र जी, लेखक चौखटों से बाहर तो रहता ही है, रहेगा ही, वरना वह रह नहीं जाएगा। मुझे याद है, आपने लिखा था अपने एक लेख में - शायद ’प्रेमचन्द की विरासत‘ में है वह लेख, कि अगर मैं सोचूँ कि आज मैं ठीक से कमा लूँ, सेटिल्ड हो जाऊँ, यह-वह हो मेरे पास, लिख तो मैं कभी भी लूँगा, तो जाहिर है, लिखना आपका स्थगित होता चला जाएगा और आप कभी भी नहीं लिख पाएँगे। तो यह शख्स ऐसे ही लेखकों में से हैं, जिसने लिखने की कीमत पर सब कुछ छोडा और फिर भी साहित्य में कैसे बेकदरी हुई, आप देख ही रहे हैं, क्योंकि साहित्य में भी वही लोग जाने जा रहे हैं, जिनके पास पैसा, कुर्सी, दबदबा सभी कुछ है।‘‘
अब तक मटियानी जी पुस्तक उलट-पुलट चुके हैं और वह फिर से राजेन्द्र यादव की मेज पर आ गई है।
’’मैं पुस्तक की एक प्रति आपको भेंट करना चाहता हूँ। कैसे हो, बताइए? अभी तो मेरे पास है नहीं।‘‘ मैं अपनी समस्या बताता हूँ।
’’यहाँ आप छोड दें तो मुझे मिल जाएगी।‘‘ कुछ देर बाद कहते हैं, ’’वैसे हो सकता है, मैं आऊँ उधर दो-एक रोज में। खुद आकर ले लूँगा।‘‘
एक संक्षिप्त-सी मुलाकात। लगभग बेमालूम-सी। लेकिन मिलकर आया तो लगा, मटियानी जी मेरे भीतर आकर पैठ गए हैं।
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इसके दो-तीन रोज बाद की बात है। लंच में मैं दफ्तर में अकेला ही था और सामने पैर फैलाकर कोई किताब पढ रहा था। तभी अचानक दरवाजा खुला और मैंने देखा कि वही भव्याकृति जो ’हंस‘ में मिली थी, मुस्कराती हुई मेरी मेज की ओर बढी चली आ रही है। फर्क सिर्फ यही कि अब हाथ में एक छोटा-सा काला ब्रीफकेस है। दाढी कुछ-कुछ उसी तरह बढी हुई। मुस्कराहट में गहरा अपनत्व।
’’अरे, मटियानी जी, आप...?‘‘ घबराहट, उत्सुकता और सम्मान के मिले-जुले भाव से मैं खडा हो गया और सम्मान से उन्हें बैठाया, ’’आइए...आइए!‘‘
वे बैठ गए हैं, फिर भी देर तक मेरे भीतर खुदर-बुदर चलती रहती है, जैसे विश्वास न हो रहा हो कि जो शख्स सामने बैठा है, वह शैलेश मटियानी ही है। शैलेश मटियानी मुझे इतने सहज प्राप्त कैसे हो सकते हैं
यह खुशी से अवाक या सन्न रहने की स्थिति थोडी ही देर रहती है। फिर एक छोटा-सा विषाद आकर मुझे घेर लेता है, ’’अरे, पुस्तक लेने खुद मटियानी जी आए, लेकिन पुस्तक की प्रति है ही नहीं मेरे पास। एक प्रति थी, वह एक सज्जन आकर ले गए। उन्हें देते हुए शायद मैंने सोचा हो कि मटियानी जी ने कहा तो है, मगर वे कहाँ आएँगे? इतने बडे लेखक हैं, क्या याद रहेगा...?‘‘
मैं मटियानी जी को बडे संकोच सहित बताता हूँ तो वे हँसकर कहते हैं, ’’कोई बात नहीं, फिर कभी आकर ले लूँगा। मैं तो आपसे मिलने चला आया।‘‘
मैं उनकी इस सरल सादगी पर मर मिट जाता हूँ। क्या यह सच है कि मुझसे मिलने आए हैं मटियानी जी, मुझ जैसे तुच्छ आदमी से...
मैं महसूस करता हूँ, मटियानी का बडप्पन और बडा हो गया है और मेरी ’तुच्छता‘ भी उनकी निकटता से महिमामंडित हो चली है।
मैं फिर यही विषय छेड देता हूँ, मीडिया और साहित्य का, कि वह बहस चली कैसे थी? आखर क्या था, जिससे वे इतना चिढ गए? मटियानी जी विस्तार से बताने लगते हैं, तो साथ ही उनकी जीवन-कथा के बहुत से अनजाने अध्याय भी खुलते जाते हैं।
मटियानी जी को अब मैं सुन ही नहीं रहा, अपने अंतरतम तक महसूस भी कर रहा हूँ।
तभी पहले-पहल पता चला और बाद में तो बीसियों प्रसंग ऐसे बने कि यह बात खुद-ब-खुद रेखांकित होती गई कि लेखक के स्वाभिमान का जहाँ भी सवाल आता है, मटियानी मर-मिटने की हद तक जूझ पडते हैं। इस मामले में बडे-से-बडे दिग्गज की भी वे परवाह नहीं करते।
कोई डेढ-दो घंटे तक बातचीत चली। फिर मटियानी जी उठकर चलने लगे तो लगा, उनसे खूब खुलकर बात हो सकती है, एकदम बेझिझक होकर।
इस दफा मटियानी जी से मिलकर लगा, बहुत दिनों बाद एक अपने जैसे आदमी से मिला हूँ। मैं नीचे तक उन्हें छोडकर आया। इस बात के लिए फिर से माफी माँगी कि वे आए तो किताब मेरे पास न थी।
’’कोई बात नहीं। अब कि आप मेरा नाम लिखकर अलग रख दीजिएगा। फिर कोई नहीं लेगा।‘‘ चलते-चलते मटियानी हँसकर कहते हैं।
उन्हें छोडकर ऊपर आया। सीट पर बैठा तो देर तक दिमाग झनझनाता रहा। एक अजब-सा नशा था, जो पूरे दिन को, जी नहीं, आफ होने को कुछ नया-नया कर देता है।
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इसके बाद तो उनसे लगातार मिलना हुआ। कभी-कभी हफ्ते में दो-दो बार भी। कोई भी विषय हम उठा लेते और उस पर मटियानी जी के विचार, जो यह तय था कि सौ प्रतिशत मटियानी जी के ही विचार होते और पूरे हिन्दी-जगत् में वैसा सोचने वाला लेखक शायद ही कोई और हो, सुनने को मिलते।
जल्दी ही पता चल गया कि बातचीत में मटियानी जी ’दीर्घसूत्री‘ हैं और उनसे बातचीत करते हुए न समय का अंदाजा आपको रहता है, न उन्हें। अगर पन्द्रह-बीस मिनट में आपको कोई बात करनी है तो हो सकता है, दो-ढाई घंटे हो जाएँ और बात फिर भी अधूरी ही रहे। फिर अचानक घडी पर आपकी नजर पडे और आप अचकचा जाएँ, ’’अच्छा, ढाई घंटे हो गए, कुछ पता नहीं चला। ...कमाल है।‘‘ मुझे अच्छी तरह याद है, एक बार दफ्तर का समय खत्म होने के बाद कोई आठ बजे चौकीदार के खटखटाने पर हम उठे थे।
एक बार लेखक-सम्पादक सम्बन्धों की चर्चा चली तो स्वभावतः ’हंस‘ की ओर मुड गई, जिससे मटियानी जी उन दिनों कुछ नाराज चल रहे थे। उन्हें लग रहा था, राजेन्द्र जी सम्पादक के रूप में अब भटकने लगे हैं। ...पर लेखक और सम्पादक के आदर्श सम्बन्धों को मटियानी जी क्या समझते हैं? यानी आदर्श सम्पादक की तसवीर उनके जेह्व में क्या है? मैं पूछना चाहता था। पर इससे पहले ही वे शायद मेरी जिज्ञासा समझ जाते हैं और समझाने लगते हैं -
’’मान लीजिए कि मैं सम्पादक हूँ। हूँ नहीं, लेकिन कल्पना में तो हो ही सकता हूँ। तो मैं सम्पादक हूँ और सडक पर जा रहा हूँ। सामने से कोई लेखक आ रहा है। मान लीजिए, उस लेखक से रास्ते में मेरी बहस होने लगती है। होते-होते झगडा शुरू हो जाता है। अब वह लेखक, कल्पना कीजिए, गुस्से में आकर रास्ते में पडा पत्थर उठाकर मेरे सिर पर दे मारता है और मैं खूनमखून हो जाता हूँ। इस पर मुझे गुस्सा न आए, ऐसा नहीं हो सकता। लेकिन अगर मैं सच में सम्पादक हूँ तो उससे कहूँगा, भाई, तुमने मेरा सिर फोड दिया, यह अलग बात है। लेकिन तुम अच्छे लेखक हो। अपनी कोई बढया रचना लिखो तो पहले पहल मुझी को देना।‘‘
यानी आदर्श सम्पादक मटियानी के हिसाब से भिखारी हैं। जो आदर्श भिखारी होगा, वही आदर्श सम्पादक हो सकता है...। औरों का तो पता नहीं कि मटियानी जी की यह टीप उन्हें कैसी लगे, पर कुछ समय के लिए मैंने ’साहित्य अमृत‘ के संपादन का कार्यभार सँभाला तो अपनी झोली मैंने खूब फैलाई और उसका आनन्द भी जाना। आज भी जब लोग कहते हैं कि आफ दौर में निकले ’साहित्य अमृत‘ के अंक, और खासकर विशेषांक बेमिसाल थे, तो मैं मन ही मन मटियानी जी को प्रणाम करके, अपनी कृतज्ञता प्रकट किए बिना नहीं रहता। आखर उन्होंने ही तो बरसों पहले एक आदर्श संपादक की उदारता की तसवीर मेरे जेह्व में बैठा दी थी और उसे मैं आज तक भूल नहीं पाया।
इन्हीं दिनों उनके बृहत् कहानी-संग्रह ’बर्फ की चट्टानें‘ पर मैंने ’दैनिक हिन्दुस्तान‘ में एक लम्बा आलोचनात्मक लेख लिखा। इसमें संग्रह की अच्छी कहानियों, ’छाक‘, ’अर्द्धांगिनी‘, ’दो दुखों का एक सुख‘ और ’प्रेत-मुक्ति‘ की विस्तार से चर्चा के साथ-साथ जो कमजोर कहानियाँ थीं, उन पर भी टीप थी कि ये कच्ची कहानियाँ हैं, इन्हें हरगिज इस संग्रह में नहीं होना चाहिए था।
लेख छपा तो मुझे आशंका थी, हो सकता है, मटियानी जी बुरा मान जाएँ। उनके बारे में चारों तरफ इसी तरह की बातें कही-सुनी जाती थीं। पर जब उन्होंने पढा तो उस पर खुशी ही प्रकट की। बोले, ’’इतने विस्तार से मेरी कहानियों पर कम ही लोगों ने लिखा है। जो लेख लिखे भी गए, वे छपे नहीं - किसी राजनीति के कारण। ऐसा भी हुआ कि लेख छपने गया और आखरी वक्त पर रोक लिया गया। डॉ. रघुवंश का मुझ पर लिखा गया ऐसा ही एक लेख अब भी मेरे पास पडा होगा। ...और हाँ, तुमने जिन कहानियों को कमजोर बताया है, वे मेरी भी प्रिय कहानियाँ नहीं हैं। बस, आ गईं किसी तरह।‘‘
मटियानी जी के शब्द नरम फाहे की तरह थे। मुझे हैरानी थी, लोग उन्हें ’झगडालू‘ क्यों कहते हैं? क्या यह वही चालाकी है, जिसमें झूठ में लपेटकर किसी को खत्म कर दिया जाता है
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कुछ समय बाद प्रसिद्ध कथाकार अमर गोस्वामी ’संडे ऑब्जर्वर‘ में आ गए तो मटियानी जी से मुलाकातों का सिलसिला और बढ गया। ’संडे ऑब्र्जवर‘ का दफ्तर हमारे दफ्तर के पास ही था। अमर गोस्वामी मटियानी जी के परम आत्मीय और निकटस्थ लोगों में से थे और मुझसे भी उनका कुछ-कुछ परिचय आकार ले रहा था।
अब मटियानी जी को जब भी समय मिलता होता, वे मुझे वहीं बुला लेते। कभी भी फोन पर उनकी गूँजती हुई आवाज सुनाई दे जाती, ’’मनु, मैं इतने बजे आ रहा हूँ। तुम ’संडे ऑब्जर्वर‘ में आ जाना। वहीं इंतजार करूँगा।‘‘
और जब उनसे बात हो रही हो तो समय का कोई दखल नहीं होता था। एकाध दफा जब चर्चा ज्यादा लम्बी खिंच गई तो अमर जी ने थोडी समझदारी की। एक अलग केबिन में, जो उस समय खाली नजर आया, हमारे बैठने की व्यवस्था कर दी और खुद काम में लग गए। रात उतरने के साथ ही जब मुझे फरीदाबाद की ओर जाने वाली अपनी आखरी गाडी का खयाल आता, तभी यह चर्चा खत्म होती।
इसी बीच मैं जब सत्यार्थी जी के लिए ’तीन पीढयों का सफर‘ किताब पर काम कर रहा था, मैंने उनसे सत्यार्थी जी की कहानियों पर कुछ लिखने को कहा। उन्होंने ’हाँ‘ की और उसे निभाया। सत्यार्थी जी की कहानियों के बारे में उनका लेख इस किताब के बेहतरीन लेखों में से एक हैं। इसकी खासियत यह है कि सत्यार्थी जी की केवल दो कहानियाँ ’जन्मभूमि‘ और ’कबरों के बीचोंबीच‘ को लेकर पूरा लेख तैयार किया गया है और इसमें सत्यार्थी के कहानीकार व्यक्तित्व की कमाल की व्याख्या है।
कुछ रोज बाद भाषा पर मटियानी जी के लेखों की किताब ’राष्ट्रभाषा का सवाल‘ आई। ये लेख अखबारों में छपकर खूब चर्चित हो चुके थे और एक शब्द में कहा जाए तो दुस्साहसी लेख थे। मुझे हिन्दी के सवाल पर इतनी बेबाकी से लिखने वाला कोई दूसरा लेखक नहीं नजर आता, मटियानी के सिवाय।
लेकिन किताब आई तो हिन्दी में समीक्षा की जो हालत है, उसे देखते हुए यह तय ही था कि उसकी उपेक्षा होगी और सचमुच यही हुआ भी। कुछ समय बाद अमर गोस्वामी के कहने पर मैंने उस किताब पर एक टिप्पणी लिखी थी, ’भाषा के मोरचे पर एक खतरनाक किताब‘। इसमें मैंने खुलकर मटियानी के विचारों की चर्चा की थी कि ये विचार दूसरों से कितने अलग और समस्या से सीधा-साधा मोरचा लेने वाले हैं।
जाहिर है, ’राष्ट्रभाषा का सवाल‘ किताब में मटियानी जी का स्वर बहुत तीखा है, लेकिन इसके ठोस कारण भी हैं। हिन्दी की जो हालत उन्होंने अपनी आँखों से देखी है और उससे जितना विचलित हुए हैं, उसे भला वे भुलाएँ कैसे
मटियानी जी से हुई मुलाकातों को याद करूँ तो उसमें कहानी की मौजूदा हालत, लेखक के सरोकार और सामाजिक प्रश्नों से लेकर मटियानी जी के अतीत, घर-परिवार, मौजूदा हालत आदि उनकी कहानियों की चर्चा की याद ही ज्यादा आती है।
मटियानी जी के कथा-संग्रह ’बर्फ की चट्टानें‘ के अलावा ’त्रिज्या‘ में छपी कहानियाँ और लेख मैंने पढ लिए थे। उनकी ’लेखक और संवेदना‘ वगैरह किताबें भी। कुछ रोज बाद मटियानी जी अपने उपन्यासों का एक सेट भेंट करके गए। दिल्ली के एक प्रकाशक ने उनके चार उपन्यास एक जल्द में छापने की योजना बनाई थी। मटियानी जी ने अपनी पसन्द के चार उपन्यास छाँटने से लेकर भूमिका के रूप में उन पर एक विस्तृत आलोचनात्मक लेख लिखने का जम्मा मुझ पर डाला था। उन्हीं दिनों एक के बाद एक मटियानी जी के उपन्यास पढने का सिलसिला चला, ’बोरीवली से बोरीबंदर तक‘, ’गोपुली गफूरन‘, ’मुठभेड‘, ’बावन नदियों का संगम‘, ’रामकली‘, ’बर्फ गिर चुकने के बाद‘.... वगैरह।
मटियानी जी जब भी मिलते, मैं इन उन्यासों के रचना-काल और उनके लिखे जाने के समय की मनःस्थिति के बारे में उनसे खोद-खोदकर पूछता। कभी-कभी मुझे हैरानी होती, इतने अच्छे उपन्यास हैं ये, पर इनकी ज्यादा चर्चा नहीं हुई। क्यों भला? ’मुठभेड‘ और ’बावन नदियों का संगम‘ का तो मुझे बिल्कुल पता नहीं था, हालाँकि ये बिल्कुल अपने ढंग के अनूठे उपन्यास हैं।
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बहुत समय से मटियानी जी के लेख ज्यादा पढने को मिल रहे थे, कहानियाँ नह। हर बार मिलने पर वे किसी नए लिखे गए या अभी हाल में छपे या छपने जा रहे लेख की चर्चा करते। कोई एक मुद्दा जो उनके मन में छा जाता, एक के बाद एक उसी पर लेख लिखते जाते। ये स्वतंत्र लेख होते हुए भी लेखों की एक श्ाृंखला का आभास कराते।
कभी-कभी मैं आजिज आकर पूछता, ’’आप लेखों में ही क्यों खुद को उलझाए हैं? कहानियाँ क्यों नहीं लिखते?‘‘ और कभी चिढकर कहता, ’’आप लेख, टिप्पणियाँ कुछ भी लिखिए, लेकिन आपको जाना तो एक कहानीकार के रूप में ही जाएगा।‘‘
इस पर वे कहते, ’’ठीक है, आपकी बात मैं मान लेता हूँ। यह सब नहीं लिखता, लेकिन फिर कहानी लिखने के लिए जो अनुभव चाहिए, वे कहाँ से आएँगे? यह जो बहसों में शामिल होना है, साफ, खरी बात कहना और दूसरों को भी प्रतिक्रियाएँ देने के लिए आमंत्रित करना है, इन्हीं के बीच से वह ऊर्जा मिलती है, जो आगे नया लिखने को प्रेरित करती है। फिर लेख तुरन्त छप जाते हैं, पैसा भी मिल जाता है, जिससे घर चलता है। कहानियाँ लिखने पर आजकल तो छपने का ही संकट है, पारिश्रमिक तो बाद की बात है।‘‘
फिर थडी देर बाद कहते हैं, ’’कोई एडवांस पैसा दे तो जितनी चाहे कहानियाँ, उपन्यास लिखवा ले। असल में तो कितनी ही कहानियों, उपन्यासों के प्लॉट दिमाग में तैरते रहते हैं। थोडा-सा मौका मिले, थोडी-सी शांति, थोडी-सी आर्थिक सुरक्षा तो वह सब लिखा जा सकता है, मगर अब तो भागमभाग है। ...देखिए, उम्मीद रखिए, अभी तो बहुत-कुछ लिखना है। लेकिन अब छोटी रचना लिख पाना मेरे बस की बात नहीं रह गई। कुछ बडी और सघन रचनाएँ ही लिखी जाएँगी। उन्हें लिखने के लिए अब भी मेरे पास बहुत शक्ति है।‘‘
एकाध दफा मैंने पूछ लिया, ’’इन दिनों ’हंस‘ में क्यों नहीं छप रही आपकी कहानी?‘‘ इस पर बडा तिलमिलाता हुआ जवाब मिला, ’’मैंने एक पत्र भेजा था, वह उन्होंने नहीं छापा। मैंने फैसला कर लिया है, जब तक वह नहीं छपेगा, मैं ’हंस‘ के लिए कुछ नहीं लिखूँगा। वैसे भी मेरा निश्चय है, जब तक कोई संपादक लिखकर मुझसे कहानी नहीं माँगता, मैं नहीं लिखता।‘‘
बात बदलने के लिए मैं कहता हूँ, आपका ’बम्बई ः खराद पर‘ वाला संस्करणों का सिलसिला बहुत अच्छा जा रहा था, फिर वह अचानक बंद कैसे हो गया? इस पर मटियानी जी कहते हैं, ’’मुझे शुरू से ही आशंका थी कि ऐसा होगा। पाठकों के खूब पत्र और अच्छी प्रतिक्रियाएँ आ रही थीं। पर राजेन्द्र जी यह कैसे पसन्द कर सकते हैं? उन्होंने सम्पादकीय में मेरे खलाफ टिप्पणी लिखी - ये तमाम तरीके थे मुझे निरस्त करने के। आखर मैंने फैसला किया कि नहीं लिखूँगा।‘‘ कहते हुए एक अनबुझी कडवाहट उनकी आवाज में उभर आती है।
कुछ देर रुककर कहते हैं, ’’यह अब आएगा कभी आत्मकथा की शक्ल में। तैयारी चल रही है। देखिए, कब तक हो पाता है?‘‘ कहते हुए मटियानी जी के चेहरे पर पस्ती नजर आती है। मुझे ’सारिका‘ के ’गर्दिश के दिन‘ के लिए लिखी गई उनकी टिप्पणी ’लेखक की हैसियत से‘ याद आती है, जिसमें उन्हने दूसरों की तरह आत्मदया से ग्रस्त हकर अपने अतीत के दुखों को ग्लोरीफाई कराने के बजाय अपने भीतर की उस ताकत के बारे में लिखा है, जो बुरे से बुरे हालात में उन्हें लडने की ताकत देती रही। सिर्फ उनके संघर्षपूर्ण जीवन के कुछ संकेत उसमें हैं, ’’मुंबा देवी के मंदिर के सामने भिखारियों की कतार है और अन्न की प्रतीक्षा है। चर्च गेट, बोरीवली या बोरीबंदर से कुरला थाना तक की बिना टिकट यात्राएँ हैं और अन्न की प्रतीक्षा है और इस अन्न की तलाश में भिखारियों की पंगत में बैठने से लेकर जान-बूझकर ’दफा चौवन‘ में भारत सरकार की शरण में जाना और जूते-चप्पलों तक का चुराना ही शामिल नहीं, राष्ट्रीय बेंतों और सामाजिक जूते-चप्पलों से पिटना भी शामिल है।‘‘
काश, मटियानी जी उस दौर के अनुभवों पर विस्तार से कलम चलाते। तब वह ’महाभारत‘, जिससे वे निकलकर आए हैं लेकिन जो समय की ओट है, वह हम सबके सामने आ पाता। वह किसी उपन्यास से ज्यादा सजीव और रोमांचक होता। पर मटियानी जी सब ओर से खुद को समेटकर उसे लिख नहीं सके। उनकी ’मुड-मुडके मत देख‘ सरीखी आत्मकथात्मक पुस्तकें महत्त्वपूर्ण हैं, पर वे अपने पूरे जोम में लिखते, तो सचमुच कोई बडी और यादगार कृति सामने आ पाती।
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अब तक मन बन गया था कि मटियानी जी का एक लम्बा इंटरव्यू लिया जाए। इतने बीहड आदमी को अपने सामने इतनी अंतरंगता के साथ खुलते देखकर बार-बार लगता था, मैं उनके गहरे अंतर्द्वन्द्व का गवाह हूँ। उसे लिखना मेरी जम्मेदारी है।
एक दिन बात करते-करते बीच में टोककर अपनी इच्छा कही तो बोले, ’’हाँ, इच्छा मेरी भी है। लेकिन वह आप बाद में कभी करें, उसके लिए टेपरिकॉर्डर होना जरूरी है। एक-एक शब्द टेप हो, फिर लिखा जाए और कुछ मुद्दे तय कर लिए जाएँ। वे साहित्य के हो सकते हैं, लेखक और समाज के सम्बन्ध में या लेखक और सत्ता के सम्बन्ध में हो सकते हैं। मेरी रचनाओं पर भी अलग से बात हो सकती है, आज के लेखक के सामने खडे संकट पर बात हो सकती है। रचना और पुरस्कार तथा रचना और पारिश्रमिक को लेकर भी बात हो सकती है और विषय भी लिए जा सकते हैं। कोई हफ्ता या पन्द्रह दिन यह सिलसिला चले। फिर इस पर चाहें तो एक किताब भी हो सकती है। शर्त यह है कि उसकी रॉयल्टी आधी-आधी रहेगी।‘‘
इस शर्त को मानने में तो भला क्या आपत्ति हो सकती थी? लेकिन उनकी इतनी बडी योजना सुनकर मैं भीतर से कुछ हिल गया। योजना मुझे बुरी नहीं लगी थी, लेकिन इसके पूरा होने की उम्मीद बहुत कम नजर आती थी। खासकर जिस तरह वे भागते हुए आते, भागते हुए जाते थे और तीन-चार घंटे का समय मुश्किल से मिलता था, (अगली मुलाकात तो अनिश्चित होती ही थी।) उससे यह सपना भी देख पाना कि वह हफ्ता-पन्द्रह दिन मेरे यहाँ आकर ठहरेंगे, असम्भव लगने लगा था।
तो हारकर एक तरकीब मैंने निकाली। जब-जब वे मिलते, मैं उनके जीवन-इतिहास का कोई पन्ना खोल देता था और वे बताना शुरू करते तो बताते चले जाते। इसी सिलसिले में उनके परिवार की पृष्ठभूमि का पता चला। पता चला कि उनका बचपन घोर नरक जैसी गरीबी में बीता। स्कूल की फीस एक-दो आने होती थी, लेकिन उतना देने को भी घर में पैसे नहीं थे। माता-पिता छोटी उम्र में अनाथ छोडकर गुजर गए थे। चाचा के पास पल रहे थे। चाचा खिला रहे थे तो काम भला कैसे न लेते? लिहाजा मटियानी जी बकरियाँ चराने के लिए जाते तो एक स्कूल के सामने एक पेड के नीचे बैठ जाते। बच्चों को साफ कपडे पहने स्कूल में जाते देखते रहते, लालसा थी करुण आँखों में। स्कूल के बच्चों की गिनती-पहाडे याद करने की आवाजें आतीं तो वे पेड के नीचे बैठे-बैठे दोहराते जाते। इस तरह उन्होंने वर्णमाला, गिनती और पहाडे थोडे-थोडे सीख लिए।
एक दिन स्कूल के हैडमास्टर गैलाकोटी जी तेजी से बाहर निकले और स्कूल के पिछवाडे की ओर चल पडे। एक आदर्श और संवेदनशील अध्यापक थे वे। किसी छात्र ने उन्हें स्कूल के पिछवाडे बैठे उस दीन-हीन बच्चे के बारे में बताया था, जो वहीं बैठा-बैठा बडे ध्यान से उनकी बातें सुनता था और जमीन पर लकीरें खींच-खींचकर उन्हें लिखता जाता था। फिर उन्हें याद भी कर लेता था।
’’अच्छा ऐसा...?‘‘ गैलाकोटी जी को यकीन नहीं हुआ। एक-दो छात्रों को साथ लेकर वे वहाँ पहुँच गए, जहाँ यह अद्भुत बालक रमेश मटियानी जमीन पर लकीरें खींच-खींचकर पाठ याद करने में लगा था।
अब चकित होने की बारी मास्टर जी की थी। वे धीरे से चलकर बच्चे के पास पहुँचे तो सामने भव्य छवि वाले अध्यापक जी देख, बच्चा चौंककर उठ खडा हुआ।
गैलाकोटी जी ने धीरे से बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए बडे प्यार से पूछा, ’’क्यों, पढोगे?‘‘ और बालक की आँखों से आँसुओं का झरना फूट पडा। वह बिलख-बिलखकर रो पडा। भला यह बात वह कैसे कहे कि वह पढना चाहता है। यह तो उसके जीवन का सबसे सुन्दर सपना था। पर क्या वह यों पूरा हो जाएगा?...
बच्चे की रुलाई वह सब कह रही थी, जो वह खुद कह पाने में असमर्थ था। एक अनाथ बच्चे की सारी लाचारी उन आँसुओं की शक्ल में सामने आ गई थी।
मटियानी जी इस प्रसंग को सुनाते हुए बहुत भावुक हो जाते हैं। खुद मेरी हालत यह है कि वह रोता हुआ बच्चा मेरे अवचेतन का एक जरूरी हिस्सा हो गया है। फिर उन्होंने भागकर मुम्बई चले जाने और एक होटल में बैरागीरी करने की ’कथा‘ सुनाई। वहीं होटल में ’छोटू‘ की भूमिका निभाते हुए, मैले बरतन घिसने के साथ-साथ उन्होंने कहानियाँ लिखीं। एक कहानी ’धर्मयुग‘ में छपने भेज दी और साथ में अपनी हालत भी बयान कर दी।
’धर्मयुग‘ सम्पादक सत्यकाम विद्यालंकार ने वह पत्र पढा तो वे अपने सहयोगियों के साथ उस असाधारण प्रतिभाशाली बालक से मिलने के लिए आए। किशोर रमेश मटियानी ’शैलेश‘ ने (तब शैलेश मटियानी इसी नाम से लिखा करते थे।) उन्हें चाय पिलाई और बाद में बात चलने पर उसे ’धर्मयुग‘ सम्पादकीय परिवार में लिए जाने की भी चर्चा चली। लेकिन रमेश मटियानी ’शैलेश‘ हाईस्कूल पास भी नहीं था, जो सम्पादकीय परिवार में शामिल किए जाने की न्यूनतम शर्त थी। तो भी उसकी रचनाएँ ’धर्मयुग‘ में स्थान पाने लगी। अब मटियानी ने अपने जीवन की वह पहली और आखरी नौकरी छोड दी और रचनाओं के पारिश्रमिक के आधार पर अपना गुजर-बसर करने लगे। फिर तो धीरे-धीरे यह हुआ कि उनकी कहानियों की धूम मच गई और पाठकों ने उन्हें इतना पसन्द किया कि देखते ही देखते वे हिन्दी के पहली कोटि के कहानीकारों की पाँत में आ गए।
पहले शैलेश मटियानी कविताएँ भी लिखा करते थे, बल्कि उनके लेखन की शुरुआत कविताओं से ही हुई। फिर धीरे-धीरे कविताएँ छूट गईं और वे कहानीकार के रूप में ही ख्याति पाते चले गए। मटियानी जी यह बता रहे थे तो मैंने उत्सुकता से पूछा, ’’क्यों...क्यों?‘‘ इस पर अपनी ’भव्य‘ काया की ओर इशारा करके वे बडे जोर से हँसे, ’’भई, एक तर्क तो शरीर का तर्क भी था... कि इतने बडे शरीर वाले आदमी को कुछ जरा जमकर बडी रचनाएँ लिखनी चाहिए। सोलह-बीस पंक्तियों की कविता लिखते शर्म आती थी।‘‘
इतना बडा जीवन उन्होंने बगैर नौकरी के कैसे निकाल दिया? कैसे उनके घर-परिवार का खर्च चला? जीवन में उन्हें क्या-क्या मुसीबतें, कैसे-कैसे अपमान झेलने पडे? इसे शायद ही किसी ने समझने की कोशिश की हो।
’’एक फ्रीलांस राइटर के लिए डाकिए का क्या महत्त्व होता है,‘‘ मटियानी जी एक बार बता रहे थे, ’’इसे कोई दूसरा जान ही नहीं सकता। कई बार तो हालत यह होती है कि घर में एक दाना तक नहीं है। पैसे के नाम पर एक फूटी चवन्नी तक नहीं और घर में कोई मेहमान आया बैठा है। आप बाहर सडक पर चहलकदमी कर रहे हैं कि शायद डाकिया आए और मनीऑर्डर लेकर आए। उस वक्त कभी-कभी तो यह हालत होती है मनु, कि अगर डाकिया खाली हाथ आता दिखाई दे तो इच्छा होती है कि इसका सिर फोड दिया जाए।‘‘
’’हालाँकि चिट्ठी लाना क्या उसके बस की बात है?‘‘ मैं कहता हूँ तो वे हँस पडते हैं और कहते वक्त चेहरे पर इकट्ठा हुआ तनाव बिखर जाता है। पर उनकी पूरी जीवन-कथा की विडम्बना मेरे भीतर दजर् हो चुकी है। अब मुझे समझ में आता है कि गोर्की की तरह हमारी दुनिया के अज्ञात गली-कूचों, तंग अँधेरी गलियों और जिंदगी की तलछट के अंतहीन दुःखों और त्रासदियों तक उनकी पहुँच कैसे है और ’दो दुःखों का एक सुख‘, ’मैमूद‘ और ’इब्बू मलंग‘ सरीखी महान कहानियाँ कैसे लिखी गई होंगी
इतना सब करने के बाद भी आखर क्या मिला मटियानी जी को - पूरा जीवन साहित्य के लिए झोंक देने के बाद? मैं सोचता हूँ और थरथरा उठता हूँ।
’’और साहित्य की दुनिया में भी मैं कहाँ हूँ?‘‘ कभी-कभी निराश होकर वे कहते हैं, ’’मुझे कहाँ रहने दिया गया? इनका बस चलता तो मुझे मिटा ही डालते।‘‘
थोडी देर से समझ में आता है कि ’इनका‘ से उनकी मुराद आलोचकों से है। ’’आलोचना की हालत बहुत बुरी है। इतनी किताबें मेरी छपी हैं, लेकिन शायद ही मेरी किसी किताब पर आपने कोई समीक्षात्मक लेख या टिप्पणी देखी होगी। किसी की रुचि इसमें नहीं है कि मैं जिन्दा रहूँ। मैं तो खत्म ही हो जाता, बस किसी तरह अपनी इच्छा-शक्ति के सहारे जी रहा हूँ। स्थितियाँ मुझे लगातार खत्म करने पर तुली हैं। मुझे खुद ताज्जुब होता है, मैं जीवित कैसे हूँ?‘‘
उस दिन इस बात पर विश्वास नहीं हुआ था। आज भी पूरी तरह तो नहीं ही है। लेकिन क्या बात है कि हमारे साहित्यिक परिदृश्य में मटियानी जी सरीखे बडे लेखक, जो हिन्दी कहानी की सबसे बडी शख्सयतों में से हैं, एकदम अलग-थलग खडे हो जाते हैं। क्यों भला
क्या मटियानी जी के ’व्यक्तित्व‘ में ही ऐसा खोट था या हमारे सोचने-समझने के ढंग में, इस सवाल का जवाब मैं आज तक खोज नहीं पाया? हो सकता है, असहमतियों का सम्मान न कर पाने का हमारा जो स्वभाव है, उसी के चलते ये स्थितियाँ पैदा हुई हों? और मटियानी जी का अपराध तो यही था कि अपनी असहमतियों को छिपा लेना उन्हें ’पाप‘ लगता था।
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इस बीच एक मर्माहत कर देने वाला समाचार सुनाई पडा। मटियानी जी के युवा बेटे मनीष... यानी मनु की इलाहाबद में गुंडों ने दिनदहाडे हत्या कर दी। यह ऐसा समाचार था कि जिसने भी सुना, वह सन्न रह गया। असलियत क्या थी, क्या नहीं, किसी को पता नहीं चला। यह भी सुनने में आया कि वे किसी और की हत्या करने आए थे और गलती से उसकी हत्या करके चले गए।
घटना के बारे में आधे-अधूरे समाचार इधर-उधर से मिलते रहे। उसके कोई दो-एक महीने बाद दरियागंज से मटियानी जी का फोन आया। उन्होंने मिलने के लिए बुलाया था। मटियानी जी के भाई प्रेम मटियानी दिल्ली के लोक संस्कृति, संगीत और नाट्य विभाग में निदेशक के पद पर नियुक्त हुए थे। उसी दफ्तर का पता उन्होंने दिया था।
उस वक्त वे एकदम टूटे हुए थे, भग्न-हृदय मटियानी जी की शक्ल अब भी मेरे सामने है, लेकिन मैं उसे शब्दों में कह नहीं सकूँगा। लगता था, किसी ने उनकी सारी ताकत निचोड ली हो और सिफर् छिलका बचा रहा हो। इतना बडा शरीर, लेकिन सफेद, बिल्कुल रक्तहीन। वे ठीक से बात तक नहीं कर पा रहे थे, लेकिन इतने बडे सदमे को झेलने और खुद को बिखराव से बचाने की कोशिश लगातार जाहिर हो रही थी। वे एक विभक्त व्यक्ति थे, जो सिर्फ टुकडों में छोटी-छोटी बातें कर पा रहे थे। उनका आत्मविश्वास उनका साथ छोड गया था और वे थककर बार-बार लेट जाते थे। एक मरी हुई सी कराह बार-बार उनके होठों पर आती और डूब जाती थी। इस हालत में भी अपनी कराह या रुदन को वे बाहर आने नहीं देना चाहते थे, गो कि आँखों से भाप निकलती महसूस होती थी।
’’मनु, मैं तो जीते जी खत्म हो गया। घर में एक यही था जो मुझे सबसे ज्यादा समझता था और...।‘‘ एक ठंडी साँस लेकर उन्होंने कहा।
’’लेकिन यह सब हुआ कैसे?‘‘ मैं डरते-डरते पूछता हूँ। वे बहुत थोडा-सा बताते हैं, टुकडों-टुकडों में। फिर जैसे अपने आप से कह रहे हों, वे अपने में खोए हुए-से कहते हैं, ’’परमात्मा ने मुझे अपने जीवन की सबसे कठिन परीक्षा में डाल दिया है। पता नहीं, जीवित रहूँगा या नहीं? जीवित रहा तो फिर से कुछ लिखूँगा।‘‘ फिर थोडा सँभलते हुए कहा, ’’मनु, अब मैं इलाहाबाद में रहना नहीं चाहता। मैं इलाहाबाद छोड दूँगा।‘‘
’’कहाँ जाएँगे फिर...?‘‘
’’कहीं न कहीं तो जाऊँगा ही। अभी तय नहीं किया। लेकिन इलाहाबाद नहीं, हरगिज नहीं।‘‘
कुछ देर बाद चाय आई। चाय के बाद बोले, ’’मनु, अब तुम जाओ, मैं अगली बार आऊँगा तो फोन करूँगा। तभी बातें हो पाएँगी।‘‘
मेरी समझ में नहीं आ रहा था, मैं क्या कहूँ, कैसे कहूँ? शब्द साथ छोड गए थे।
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पीछे इस बात की चर्चा हुई है कि दिल्ली के एक प्रकाशक ने मटियानी जी के चार उपन्यासों को एक जल्द में छापने का निर्णय किया था। उपन्यास चुनने का निर्णय मुझे करना था और उस पर एक विस्तृत भूमिका लिखनी थी। जो चार उपन्यास मैंने चुने, वे थे, ’मुठभेड‘, ’बावन नदियों का संगम‘, ’गोपुली गफूरन‘ और ’रामकली‘। कई रोज की मेहनत के बाद भूमिका के रूप में जाने वाला लेख लिखा गया। कोई साठ पेज लम्बा। लेकिन वह इन चार उपन्यासों के बारे में ही न था। मटियानी जी के सभी उपन्यासों की व्यापक छानबीन इनमें की गई थी।
लिखने के बाद मुझे सचमुच संतोष मिला। मटियानी जी के दूसरे उपन्यासों की तुलना में ’मुठभेड‘ और ’बावन नदियों का संगम‘ मुझे अलग ढंग के, बेहतरीन उपन्यास लगे और आज भी लगते हैं। इसी तरह ’गोपुली गफूरन‘ में उस स्त्री की मनःस्थिति है, स्थितियाँ जिसे मुसलमान होने को मजबूर कर देती हैं, लेकिन उसका मन नहीं बदलता और अपने परिवार के लोगों के लिए जिसकी तडप नहीं जाती। एक ही स्त्री के इन दोनों पहलुओं को इतने असरदार ढंग से और इतनी पूर्णता के साथ उठा पाना मटियानी जी सरीखे किसी ’महाप्राण‘ लेखक के बस की ही बात थी। इसकी तुलना में ’रामकली‘ उपन्यास थोडा हलका लग सकता है, पर उसके केन्द्रीय पात्र रामकली के चरित्र में मौलिकता गजब की है।
ये उपन्यास किसी ऐसे लेखक के होते जिसके साथ ’वाद‘ और उस वाद के पुछल्ले में बँधे सौ-पचास ’जुलूस निकालने वाले‘ लोग होते तो आज हिन्दी में इन उपन्यासों का हल्ला होता। मगर मटियानी बिल्कुल दूसरी मिट्टी के लेखक थे। अपनी लीक बनाकर चलने वाले खुद्दार लेखक। इतना ही नहीं, अपनी ईमानदारी और साफगोई से दुश्मन बनाने की ऐसी विशेषता हिन्दी में उनके सिवा शायद ही किसी और में हो। इस मामले में वे अकेले ही थे, नितांत अकेले और अपनी मिसाल खुद।
अलबत्ता, अगली दफा मटियानी जी मिले तो मैं उनके उपन्यासों पर लिखे गए इस लम्बे लेख की प्रति लेकर गया। उन्होंने थोडा यहाँ-वहाँ से देखकर रख लिया। कहा, ’’मनु, मैं पढूँगा, थोडी फुर्सत होगी तब।‘‘
तभी पता चला कि उन्होंने अपना प्रकाशन ’प्रकल्प प्रकाशन‘ चलाना तय कर लिया। इस सवाल का भी कि इलाहाबाद छोडने के बाद वे कहाँ टिकें, दिल्ली या हल्द्वानी - समाधान उन्हें मिल गया था। अंततः उन्होंने हल्द्वानी में ही रहने का फैसला किया। वहाँ संयोग से उनके एक पूर्व-परिचित मिल गए, जिन्होंने मकान ढुँढवाने से लेकर हर तरह की दूसरी परेशानियों में उनकी मदद की। न जाने क्यों, उनका यह फैसला (दिल्ली के बजाय हल्द्वानी रहने का) मुझे सही लगा, क्योंकि दिमाग में बार-बार यह खट-खट हो रही थी कि न दिल्ली मटियानी जैसों के लिए बनी है और न मटियानी जी दिल्ली के लिए।
इस समय अपनी आर्थिक स्थिति को, जो पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई थी, फिर से लाइन पर लाना उनके लिए एक बडी चुनौती थी और उनकी हालत - उन्हीं के शब्दों में - लगभग एक अँधे आदमी की तरह हो गई थी, जिसे आगे-पीछे कुछ नजर नहीं आ रहा था। बस, चलना है, चलते जाना है - यही जीवन है।
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मटियानी जी हिन्दी कहानी के शीर्ष पुरुषों में से एक हैं। हिन्दी साहित्य को जितनी अच्छी कहानियाँ उन्होंने दी हैं, उतनी शायद ही किसी और लेखक ने दी हों। इस मामले में न कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव जैसे कहानी के दिग्गज उनके आगे ठहर सकते हैं और न रेणु जैसे बडे लेखक। रेणु के उपन्यास कुछ अधिक ऊँचाई तक जाते हैं और यहाँ उनका कद बेशक बडा है। पर कहानीकार तो मटियानी ही बडे हैं। हिन्दी की कोई डेढ-दो दर्जन महानतम कहानियाँ अकेले मटियानी के खाते में दजर् हैं। सच पूछिए तो प्रेमचन्द के बाद हिन्दी को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहानियाँ देने वाला लेखक मटियानी है।
लेकिन आज हालत यह है कि कहानी की चर्चा हो तो बडे तो छोडए, अभी कल ही पैदा हुए लेखक भी मटियानी जी का नाम लेने से बचते नजर आएँगे। कारण शायद यह है कि मटियानी जी उन लेखकों में से हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा दुश्मन बनाए हैं। इस कला में उन्हें अद्भुत महारत हासिल है। हालाँकि मटियानी जी का कमाल यह है कि उनकी कहानियों का जादू हमेशा सिर पर चढकर बोलता है। चाहे ऊपर से कहें नहीं, सभा-सोसाइटी में या पत्रिकाओं में लिखकर चाहे स्वीकार न करें, लेकिन अलग से बात करो तो शायद मटियानी जी के दुश्मन भी स्वीकार करेंगे कि वे बहुत बडे लेखक हैं। सहज ही हिन्दी के सबसे बडे कथाकार!... मगर यह भी साथ ही साथ जरूर कहेंगे कि हालाँकि वे खुद ही अपने सबसे बडे दुश्मन भी हैं।
मैंने मटियानी जी के इसी स्वभाव को लेकर एक कविता लिखी थी और उन्हें एक ऐसा जुझारू शख्स बताया था, जिसे खतरों से खेलने में मजा आता है। मौत के साथ लगातार जूझते हुए भी जो अपना जीने का ढब नहीं छोडता और उसका होना मुझे दुनिया में अपनी ही तरह की एक और ’आवाज‘ का होना लगता है।
मटियानी जी को इस कविता के बारे में बताया तो वे हँसे, ’’अच्छा, कभी सुनाना।‘‘
’’लेकिन इंटरव्यू...? अब आप जल्दी से उसके लिए समय निकालिए।‘‘ मैं याद दिलाता हूँ।
इस पर वे कहते हैं, ’’हाँ-हाँ, क्यों नहीं? हालाँकि मेरा इंटरव्यू लेना इतना आसान नहीं। जाने कितने लोग पीछे पडे रहे। ’सारिका‘ ने अशोक अग्रवाल को भेजा था। वे तो एक तरह से डेरा डालकर ही बैठ गए थे। पर मूड नहीं बना। लेकिन तुमसे बात करने का तो मेरा मन है।‘‘ और फिर वह कमलेश्र तथा कन्हैयालाल नंदन के जो इंटरव्यू मैंने किए, उनकी तारीफ करने लगते हैं, ’’यह कला तुम्हें आती है, भीतर से बात निकलवाने की कला...।‘‘
लेकिन कई महीनों नहीं, बरसों की कोशिश के बाद भी उनसे इंटरव्यू करने का सुयोग नहीं मिला। हालाँकि न उम्मीद मैंने छोडी और न वे ही कभी कह सके कि... नहीं, अब यह सम्भव नहीं लगता।
समय खिसक रहा था और हम इस खिसकते हुए समय में एकाध खूँटा गाड पाने का अपना इरादा शायद कभी नहीं छोड पाते। अलबत्ता इस बहाने मटियानी जी को भीतर से जानने का एक मौका मिल गया और मैं इसे भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं मानता।
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कुछ ही समय बाद मटियानी जी के मानसिक विक्षेप की थरथरा देने वाली बात सामने आई। यों उसके बाद भी उनकी जद्दोजेहद एक क्षण के लिए भी रुकी नहीं। बेहोशी के दौरे पडते थे, सिर में मर्मांतक पीडा जैसे कोई सिर पर हथौडे चला रहा हो। लेकिन होश में आते ही फिर हाथ में कलम लेकर डट जाते। इसी हालत में बीच-बीच में कई अविस्मरणीय मुलाकातें हुईं और गोविन्द वल्लभ पंत अस्पताल में ही कई घंटे चला एक अद्भुत इंटरव्यू, जिसमें मटियानी जी ने सवालों के ऐसे सधे हुए जवाब दिए कि मैं ही नहीं, मेरे साथ पहुँचे दोस्त रमेश तैलंग और शैलेन्द्र चौहान भी स्तब्ध और सम्मोहित थे। एक यादगार इंटरव्यू, जो मन की बहुत उदात्त स्थितियों से निकला होगा। ऐसे मटियानी जी को भला कौन पागल कहेगा
पर इलाहाबाद ने निराला के बाद अंततः मटियानी जी को भी पागल बना ही दिया और वे गुजरे। भीषण यातना झेलकर गुजरे। वे टूट गए, पर एक लेखक की स्वाभिमानी जद को उन्होंने हरगिज छोडा नहीं। इसीलिए एक रचनाकार के रूप में उनका कद इतना बडा है कि उनके आगे हिन्दी के बडे से बडे कथाकार आभाहीन लगते हैं।
मटियानी उन लेखकों में से थे, जिन्हें समय ने साबित किया है। उन्हें आलोचकों ने नहीं, पाठकों ने बनाया है और वे तो इसलिए कि हिन्दी के पाठकों ने लम्बे अरसे से उन्हें अपने दिल में जगह दी है। मटियानी जी को यहाँ जो प्यार और सम्मान मिला है, वह शायद ही हिन्दी के किसी और लेखक को मिला हो। सारे विरोधों के बावजूद मटियानी जी का होना यह साबित करने के लिए काफी है कि कथा-साहित्य में अब भी ’पाठक‘ की सत्ता ’आलोचक‘ से कहीं बडी है और अंततः समय की लम्बी दौड में लेखक वही जिएगा, पाठक जिसे चाहेंगे और प्यार करेंगे और कहना न होगा, यहाँ मटियानी जी को जो जगह हासिल है, वह आगे के बरसों में शायद ही किसी और हिन्दी लेखक को हासिल हो सकेगी।
हिन्दी के वरिष्ठ गद्यकार प्रकाश मनु हमारे समय के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। अनेक अलंकरणों से अलंकृत हैं