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दो कविताएँ

अर्चना भटनागर
(१)
सजते हैं कई ख्वाब
अरमानों की
इस बंजर धरती पर
हर ख्वाब पूरा हो जाए
ये जरूरी तो नहीं
तनकर खडे देखा है
सूखे दरख्त को
तूफानों में और
हरे-भरे पेड को
भरभराकर गिरते देखा है
हर कोई टकरा जाये
तूफानों से
ये जरूरी तो नहीं
बस जाते हैं
वो नाम दिलों में
जो रेत पर
लिखे होते हैं
पत्थरों पर
लिखे नाम
अमर हो जाएँ
ये जरूरी तो नहीं।
लैला-मजनूँ, हीर-राँझा
प्यार सच्चा है
केवल इनका क्या
जो रोशन ना हुआ
दुनिया में
प्यार उनका हो झूठा
ये जरूरी तो नहीं
आँसुओं से कागज पर
बने निशान भी
कविता हो सकते हैं
स्याही से उकेरी
इबारत ही कविता हो
ये जरूरी तो नहीं।

(२)
यादें क्या हैं,
जैसे एक,
पवन का झोंका,
जो छूकर मेरे तन को,
हौले से सहलाता है।
तेरे साथ बिताया,
हर पल,
जाने कब, कैसे,
बीत गया,
खट्टी-मीठी यादों का
वो हर क्षण,
हाँ वही याद
कहलाता है।
वक्त जो बीता,
बदल गया सब,
हँसना-रोना,
भूल गए अब,
तेरे साथ बिताया,
हर मंजर,
अब मेरा मन,
बहलाता है।
बीत गया अब,
पूरा जीवन,
एकांत पडा है,
ये बंजर मन,
यूँही खाक हो जाएगा,
अब तो यादों का,
ये किस्सा,
मेरा मन,
दहलाता है।
पूर्व अध्यापिका हैं। साहित्य पठन व पाठन कर रही हैं। साहित्य अनुरागी हैं।