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चार कविताएँ

उमेश कुमार चौरसिया
(१) अम्मा
एकांत
अच्छा ही होता होगा
शायद
तभी तो अम्मा
जब भी होती
त्रस्त, विचलित, उदास
तो आ बैठती
अपने उस
घुप्प अंधकार में डूबे
कोठरीनुमा कमरे में
एकमात्र दरवाजे को भी
भीतर से बन्द कर
खो जाती
विचारों की अनन्त गहराई में -
मुन्नी का ब्याह
छुटके की पढाई
बडके की नौकरी
कैसे हो पाएगा
बिन पिता के
अभावग्रस्त
इस घर में,
सम्पत्ति के नाम पर
सहेजे चन्द जेवर
बिकते जा रहे
एक-एक कर
हर बार
कैसे होगा
लालन-पालन
कैसे चलेगा
ये घर-बार,
ऐसे अथाह प्रश्नों का हल
खुद ही में खोजती
देर तक बैठी रहती
अकेली अम्मा,
उस बन्द
सियाह कमरे में
कोई भी
नहीं आ सकता
बस, केवल हवा
ही घुस आती है
जबरन
या फिर
उसे ही दी है अनुमति
अम्मा ने
भीतर आने की,
क्योंकि -
सब कुछ
देखते, बूझते, समझते
हुए भी वह
कुछ नहीं कहती
चुप ही रहती है
अम्मा की तरह।

(२) अम्मा
नई नवेली सी
नाजुक, छुईमुई
बने रहने के
सुखद अहसास को
कभी
जान ही नहीं पायी
बस,
घर-परिवार की
जिम्मेदारियों
कष्ट और
परेशानियों में ही
उलझी रही
जीवन भर,
सब सहने
कुछ न कहने
की विवशता
सबको
सहेजने-संभालने में
दिन-रात
मेहनत-मशक्कत
करती
कभी न थकती,
अपनी
पसन्द-नापसन्द
उमंग-विचार
और भावनाओं को
दबाये रखती
भीतर
कुछ न करती
कभी
खुद अपने लिए
सदैव
औरों के लिए
जीती रहती
खटती रहती
रोज-रोज
मरती रहती
अम्मा!

(३) अम्मा
बच्चे
पढ-लिख कर
हासिल कर लें
बडी योग्यता
जम जाएँ
किसी
अच्छी नौकरी
या
व्यवसाय में अपने,
बेटा
ब्याह कर
ले आए
सुन्दर-सयानी
बहू,
बेटी को मिले
ऊँचा खानदान
योग्य वर
और
स्वर्ग सा ससुराल,
नाती-पोतों के संग
फिर
खूब मचे
धमा-चौकडी
हँसी-खुशी से
जीएँ सभी
जीवन अपना
प्रौढ होती
आँखों में
संजोये हुए
ऐसा ही
एक सपना,
खुशी में
झूमती रहती
बच्चों को
कभी गोद
कभी झूले में
हुलराती रहती
सारा-सारा दिन
सारी-सारी रात
दुलारती रहती
अम्मा!

(४) अम्मा
बडे होते
बच्चे
उनके बच्चे
बढता परिवार
नित नए
खर्चों का अम्बार
सब कुछ
अकेले ही
भुगतने को लाचार,
छोटे-बडे
ओहदे पाकर
खुश हैं बेटे
अपनी-अपनी दुनियाँ में
दमडी देने को भी
नीयत
नहीं किसी की
माँ की
अज्ञात सम्पदा पर
गिद्ध सी नजर
सभी की,
ईर्ष्या-द्वेष
परस्पर तकरार
क्या यही है
मेरा घर-संसार
जितने सपने
जिनके लिए
संजोए थे
वे ही
सपनों को रौंदकर
दौडते जा रहे हैं
दिशाहीन
और
मोतियाबिंद के
धुँधलके में
अपने सपनों को
टूटते-बिखरते
चुपचाप
देखने को विवश है
अम्मा!
कवि, गद्यकार उमेश कुमार चौरसिया अजमेर में रहते हैं। निरन्तर सृजनशील हैं। अनेक सम्मान प्राप्त हैं।