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छह कविताएँ

शिवराज छंगाणी
(१)
कविता
बनायी नहीं जाती है
रची जाती है -
मैं कविता रचता हूँ
मेरे इस रचाव में
अन्तस की गहराई में
साँसों की डोर में -
सविता की रश्मियों के कण
बिखरते नजर आते हैं
शब्दों का उजास
प्रत्यक्षतः दिखाई देता है
जो
चीरता तिमिराच्छन्न
जगत् को
और वहाँ पहुँचता है
जहाँ न पहुँचे रवि
वहाँ पहुँचे कवि -
अवधारणा स्पष्ट है
कविता - कविता ही होती है
मात्र शब्दों का खिलवाड नहीं।

(२)
यह कविता ही है
जो सतत प्रवाहिनी
प्रयागराज को संगम का
दर्जा दिलाती है
जहाँ गंगा-यमुना औ‘
सरस्वती का अन्तर्मेल होता है -
हिमालय से लेकर
सभी नदियों के संग
तैरती कविता -
संस्कृत सहित सभी भाषाओं में
प्रवहमान होती हुई
अपनी संस्कृति की पहचान
कराती है।
कविता वड्र्सवर्थ से
लेकर कालिदास की
परम्परागत शैली में,
और
निराला से अज्ञेय जी तक
मुक्तछंद में
कलात्मकता की दृष्टि से
प्रवहमान है -
कविता में
मेघ गर्जन
बरसात की झडी
औ‘
सरसों के पीले खेत
रंगों की सृष्टि उडती हुई
तितलियाँ दर्शाती है।

(३)
कविता
व्याख्यायित होती है
कथ्य, भाव, शिल्प,
भाषा, संवेदनात्मक
सूझबूझ से,
कविता को
पश्चिम औ‘ पूर्व के
विद्वानों, चिन्तकों
मनीषियों औ‘ मतिमानों ने
समीक्षात्मक एवं समालोचनात्मक
दृष्टि से निरखा है परखा है
बिम्ब, प्रतिबिम्ब औ‘
प्रतीकों के सहारे
कविता रची जाती है
कविता समग्र को समेटे हुए
दिव्य दृष्टि प्रदान करती है
औ‘ सोच के
अभिनव क्षितिज खोलती है
व्याख्याकार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं
किन्तु नीर-क्षीर-विवेकिता करना तो
हंस ही जानता है -
कविता - कविता होती है।

(४)
ढाई आखर प्रेम का
कबीरा ने कहा -
मैंने अढाई के पहाडे पढे
प्रेम कहीं नहीं था
मैं - तुम
मेरा - तेरा
अपना - पराया
सब कुछ प्रचलित
मैं - तुम को ’हम‘ से मिला दें तो
ढाई आखर प्रेम समझ में
आ सकता है।

(५) मेरा शहर
मेरे शहर की
पूर्वी-पश्चिमी
बस्तियों में
दूरियाँ बढती जा रही हैं -
इधर की बस्ती में
बसे घर-गलियारों में
मलमली सफेद कुर्ते
औ‘
ब्रासलेटी धोतियाँ
पहने
चाँदी की चमकती
तश्तरियों में
जीमते हैं भोजन,
गुलाब और केवडा की
महकती गंध के सहारे
स्वर्गिक सुख लेते
लोग -
उधर की बस्ती में
सफेद राती
माटी के घरौंदे
गोबर-सनी अंगुलियों के निशान
साधारण
फूल गुलाबी धोतियाँ पहनती
ऊपर कसूंबल पल्लू
जो कि जीर्ण-शीर्ण है
ओढती हुई -
फटे-पुराने बिस्तर
बिछाती हुई
महिलाएँ
काष्ठ की थालियों में
छाछ-राबडी
औ‘ सूखी चपातियाँ
परोसे हुए अरोगती हैं
उनके चेहरों पर
मेहनत, मजदूरी
औ‘
पसीने की सच्ची कमाई का
उत्साह झलकता है -
पूरब की बस्ती में
रातभर कुछ न कुछ
होता रहता है
और जागते रहते हैं लोग,
किन्तु
पश्चिम की बस्ती में
थके-हारे
सुख की नींद
सोते हैं लोग
यह जानते हुए कि
आज तो लगाय खाय
काल बैजनाथ है।

(६)
बिन खम्भे आकाश खडा है
ऐसा तो नहीं
दिशाएँ इसके कंधे हैं
जो एक-दूसरे से जुडे हैं
ठीक मानव सम्बन्धों की
पहचान भी इसी तरह
अन्तर्निहित जुडी रहती है -
किन्तु कथनी-करनी के भेद को
जानना परमावश्यक है -
दुमुँहे संवेदनाओं को
जीवन्त नहीं रख सकते -
श्रेष्ठ कवि जो
भावुक, संवेदनशील
कारुण्य भाव का
रखवाला होता है
वह शब्द की महिमा-गरिमा
औ‘ अर्थवत्ता को जानने में
सक्षम है
श्रेष्ठता ही श्रेयस्कर है।
राजस्थानी-हिन्दी के कवि-गीतकार, रेखाचित्रकार शिवराज छंगाणी विगत छह दशकों से सृजनरत हैं। बीकानेर में रहते हैं।