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तीन कविताएँ

गोविन्द माथुर
(१) अनलिखे पोस्टकार्ड
एक पुराने रजिस्टर में
जिसमें लिखी हुई थीं
अधूरी कविताएँ
पुरानी फिल्मों के गीतों के मुखडे
शेर‘ओ शायरी

उसी पुराने रजिस्टर में
मिला एक पीला लिफाफा
भूले हुए लिफाफे को
उत्सुकता से खोला
उसमें मिले कुछ खाली पोस्टकार्ड
जिन पर न पाने वाले का नाम था
न ही भेजने वाले का

मैंने ही रखे होंगे सहेज कर
मित्रों, सम्पादकों या प्रशंसकों को
लिखने के लिए
पोस्टकार्डों पर नहीं लिखे गए
प्रेम पत्र, भेजे गये बन्द लिफाफों में

किसे लिखने थे पोस्टकार्ड
याद नहीं आ रहा
अब न पोस्टकार्ड आते हैं
न ही जाते हैं

मोबाइल पर आते हैं संदेश
कुछ क्षणों बाद
मिटा दिए जाते हैं
किसी संदेश की न अपेक्षा होती है
न ही प्रतीक्षा

अनलिखे पोस्टकार्डों को
देखकर मुझे
ऐसा महसूस हो रहा है
किसी शहर में कोई
प्रतीक्षा कर रहा है
पोस्टकार्डों की।

(२) अनचाही सूचनाएँ
इतनी सूचनाएँ मिलती हैं
प्रतिदिन कि -
कोई सूचना चौंकाती नहीं है
इतने मिलते हैं संदेश
प्रतिदिन कि -
कोई संदेश उत्साहित नहीं करता

जब आते थे घर में
पोस्टकार्ड या लिफाफे
उत्सुकता रहती थी पढने की
किसी सूचना की
प्रतीक्षा रहती थी कई दिनों तक

किसी दिन अचानक
आ जाता कोई तार
पूरे घर की साँस ठहर जाती थी
तार खोलते हुए थरथराते थे हाथ
चाहे उसमें कोई
शुभ संदेश ही क्यों न रहा हो

स्तब्ध रह जाते थे
किसी की मृत्यु की सूचना पर
अब मृत्यु की सूचना भी
सूचना भर होती है
उदास तो करती है स्तब्ध नहीं

बधाई! शुभकामना
विवाह का निमंत्रण
व्हाट्सएप पर देख कर
प्रफुल्ल नहीं होता मन
औपचारिकता
उधर से भी इधर से भी

दिन में कई एक बार
डिलीट करते रहने के बावजूद
शाम होने तक
दब जाता हूँ सूचनाओं के नीचे।

(३) अन्तहीन बातें
इतनी होती हैं बातें
कोई इंतिहा ही नहीं
सारा देश बातें कर रहा है

बातूनी तो पहले भी थे लोग
गलियों, चौराहों, चौपालों में
होती रहती थी बातें

अब हर वक्त तनहा
कानों पर मोबाइल लगाए
न जाने क्या-क्या बातें
करते रहते हैं लोग

बातों से निकलती रहती हैं बातें
कई बार बातों बातों में
होती हैं घातें
कौन बोल रहा है
ये मालूम होने पर भी
ये मालूम नहीं होता
कहाँ से बोल रहा है

घर में बैठा हो या महफल में
पैदल चल रहा हो या वाहन पर
किसी न किसी से बात
कर रहा होता शख्स
कुछ सुनता है
कुछ अनसुना रह जाता है

इतनी होती हैं बातें
किन्तु सार नहीं होता
सुनने - सुनाने के बावजूद
हर सिम्त
तकरार ही तकरार है

हिन्दी परिदृश्य की चर्चित पत्रिका अकसर का संपादन करते हैं। कवि, गद्यकार और आलोचक भी हैं।