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छह कविताएँ

अरुण देव
(१) जो नहीं है अब
जो नहीं है अब
कभी मोड पर मुडते हुए किसी में दिख जाता है
पीछे से पुकारती है कोई उस जैसी ही आवाज

सूखे पत्तों में कोई हरा पत्ता
असमय गिरा हुआ
कि जैसे अभी उठेगा और
उसी के लिए झुकी टहनी से वहीं लग जायेगा जहाँ
रिस रहा है उसका न होना

उसके पीछे-पीछे उसके किस्से गए
पात्र अब कथानक से विलग
किसी दूसरी कहानी में अपनी भूमिका निभा रहे हैं

उसकी प्रतीक्षा नहीं अब किसी को
उसका प्रेम कुछ दिन उसकी राह देखता रहा
और फिर विरह की सडक की दूसरी तरफ चला गया

शत्रुताएँ उसे कभी-कभी याद कर लेती हैं
कि अभी तो तमाम हिसाब बाकी है।

(२) जो अब कहीं और हैं
जो अब कहीं और हैं
किसी के लिए खिल और कुम्हला रहे हैं
मिट रहे हैं

आते हैं प्यासे
नींद में चलते हुए रेत में धँसे गलते हुए किसी शिला पर
हिलाते हैं हाथ परिचय में

चुभते हैं काँटे
उग आये हैं तमाम हथेलियों पर

अब क्या है उनका यहाँ

जो चले गए
उनकी जगहें बुझ गयीं
उनके लिए बहती हवा ने भी मुँह मोड लिया

उनकी बस लौटती तो है
पर पहुँचती नहीं वहीं।

वे इंतजार करने लगते हैं वापसी की पहली बस का।

(३) नहर के किनारे एक दृश्य
नहर में पानी है
कुछ कच्चे बच्चे तैर नहा रहे हैं
उनकी त्वचा पर पानी की खुशी दूर से ही हँस रही है
दोनों तरफ हरियाली है

कुछ खेतों में कट गए हैं गेहूँ
अनाज और भूसे को एक साथ बैलगाडी में भर रहा है
एक परिवार

किनारे-किनारे एक आदमी चला जा रहा है
वह धीरे-धीरे गुम हो जाता है बिना कोलाहल के।

(४) खुशी
खुशी से उसका याराना था
कभी भी कहीं भी वह हो लेता खुश

वह खुश था कि धरती की पीठ पर आसमान के नीचे चल रहा है बादलों से झाँकता सूरज उसे अपार खुशी से भर देता
जैसे रात में सोया बच्चा दिन चढे उठे और
इतनी सारी धूप देखकर विस्मित हो आँखें भी न ठीक से खोल पाये

मिट्टी में छिपा बीज बारिश में भीगकर अँखुआया
उसकी खुशी रोज उसके हरे पत्तों की तरह पसरती रही
वह पानी देता
मिट्टी में पानी का जब्त होना भी उसके लिए
एक औचक था

पत्तों पर जब उसने हरे रंग के कीडे देखे
जो नाजुक पत्तों में छेद कर उसे खा रहे थे
वह कीडों के लिए खुश हुआ

कीडे को लिए-दिए उड चली चिडया उसकी खुशी में
बहुत दूर तक उडान भरती रही

वह सडक के उस पार पहुँचकर खुश होता
घर वापस लौटकर खुश हो लेता
पुलिया के नीचे बहता पानी उसकी प्रसन्नता में कलकल करता

उसने एक प्रौढ आदमी को हँसते देखा
एक भद्र स्त्री को मुस्कुराता
एक स्कूल जाते बच्चे की शरारत देखी
एक रिक्शे वाला फिर भी तसल्ली में था

एक दिन उसने शव देखा
उसके पीछे खुशी खुशी वह मुँह लटकाए श्मशान तक गया
कुछ हिजडे समूह में गा नाच रहे थे
जैसे धरती की सबसे बेफिक्र कौम हो
तालियाँ तवे पर मक्के की तरह फूट रही थीं
मोहक था उनका पहनावा रंगों से भरा

उसके पास खुश होने के हजार कारण थे
और वह इसलिए भी खुश था।

(५) देशद्रोही
उनके पास गालियाँ हैं अतीत के लिए
महापुरुषों के लिए अपशब्द

उनके एक हाथ में छेनी है एक में हथौडा
वे घूम घूम ध्वंस कर रहे आदमकद मूर्तियाँ

वे किताबों को जला रहे हैं
चित्रों को फाड रहे हैं
आजाद आवाजों को दबा रहे हैं
कर रहे हैं शब्दों की निगरानी

नष्ट कर रहे हैं संग्रहालयों को
भ्रष्ट संस्थाओं को
शब्दों के मायने बदल रहे हैं

उन्हें एक ही रंग पसन्द है
एक ही राग
एक जैसे कद और पहनावा एक जैसा

वे अब बाहर निकल आये हैं
संक्रमित कर तैयार कर रहे हैं अपनी प्रतिकृतियाँ
भविष्य के मुहाने पर उनका जमावडा है

नदी के वेगवती होने का यही समय है।

(६) कोई किसी को क्या देगा
मुझे अपना हाथ दो
घडी भर का ही सही साथ दो

मेरे दुर्दिन में मेरे घर आओ
मेरी खुशी*में भी आ जाओ
वैसे भी जब मन करे आ जाओ
न मन करे तो जरूर आओ

कुछ खरी कहो बेलाग
मैं जब कहूँ तुम भी उसे समझो मेरे यार

इतनी बडी दुनिया उससे भी बडी उसकी बातें
कुछ दिन कहीं रहें बे-फिक्र

कुछ तुम पढो कुछ मैं
और आओ उनसे जूझे कुछ देर
कुछ दूर

कुछ चीजें हमेशा के लिए बुझने को हैं
कहीं आग लगी है
कहीं धुआँ उठ रहा है

इस बार बैराज पर कुछ नये परिंदों ने डेरा डाला है
कुछ ने रास्ते बदल लिये
कुछ गुम गए अबकी गर्मी से

महानगरों से लौटती ट्रेनों के अनारक्षित डिब्बों में
आदमी की जगह कंकाल लौट रहे हैं
क्या कर सकते हो तुम
और क्या हो सकता है मुझसे
युवा कवि और आलोचक। ’क्या तो समय‘ और ’कोई तो जगह हो‘, कविता संग्रह प्रकाशित। ’कोई तो जगह हो‘ के लिए २०१३ का राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान। ९ वर्षों से हिन्दी की चर्चित वेब पत्रिका ’समालोचना‘ का सम्पादन कर रहे हैं।