fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

आज का आदमी

फूलचन्द मानव
सुबह जब मैं उठा तो चारपाई के पास ही डेली अखबार पडा था। सिर्फ जागने के लिए मैंने अखबार लगाया है। जैसे टाइम का अलार्म कुछ भी प्रभाव नहीं देता। निरर्थक है मेरे लिए। हाकर से शर्त यह हुई है कि अखबार फेंकने से पहले वह दरवाजा थपथपाकर मुझे जगा देगा। दरअस्ल एक भ्रम-सा बना रहता है सुबह उठ सकने का। रात को, पहले देर-देर तक पढता था, तो भी नींद सुबह समय पर टूट जाती थी। पर जब से घर हो आया हूँ, सारी सैटिंग ही गलत हो गई है। सैटिंग गलत हो गई है या खुद ही गलत हो गया हूँ, इसका निर्णय कभी खुलकर नहीं हुआ। मुक्त निर्णय के लिए, दरअस्ल, अपने आप का पुनर्मूल्यांकन करना होता है। इसका इधर समय ही नहीं मिलता। समय मिलता तो जरूर सुबह उठ सकता, फिर सोते समय रात को पक्का विश्वास भी तो नहीं होता कि ऐसे ही उठा भी जाएगा अथवा... काँपते हाथों और चुँधियाते नेत्रों से खबरों की ख्ाबर लेता हूँ। आज कहीं कोई ट्रेन डी-रेल नहीं हुई। सम्भावना बलहीन हो जाती है। अमूक प्रांत के मंत्रिमंडल में फेरबदल...तीसरे पेज पर शब्दों में छपा है। मुझे इसमें कुछ भी नया नहीं लगता। बहुत स्वाभाविक है, अब ऐसे ही चले। बेपैर के बैल कहीं, किसी तरफ भी घसीटे जा सकते हैं - कागज पर उतारकर। अंतिम पेज पर एक बार फिर किसी पार्टी के हारने का अहसास होता है। सत्रह में से देश के आठ राज्यों में कांग्रेस रह गई... शंख फूट चुके हैं। सीपियाँ लुढक रही हैं।
साथ की चारपाई पर जी.एल. जम्हाई लेता है। लेटे-लेटे करवट बदल कर वह अंगडाई तोडता है और दोहरी चादर ओढकर सोने का फिर से प्रयास करता है। जी.एल. का सोना अब मुझे कतई नहीं खलता। वह दस बजे तक आसानी से तैयार हो सकता है। फुर्ती से दफ्तर पहुँच सकता है, तेजी से घर लौट सकता है। जी.एल. को कुछ भी कठिन नहीं लगता इधर। मैं साढे सात तक भी लाइब्रेरी पहुँचूँगा तो हाजरी रजिस्टर पर बडा-सा लाल क्रॉस हँसता मिलेगा - एब्सेंट। जैसे मुझे चिढाया गया हो, एक चैलेंज देकर - काफी कोशिश के बावजूद, समय पर लाइब्रेरी पहुँचने में असमर्थ रहता हूँ। क्रॉस आगे आते ही एक बडी-सी गाली मुँह में बिलोता हूँ और रिडक कर छोडते-छोडते रह जाता हूँ। आखर दिखा ही दी न जात...।
लाइब्रेरी में लोग आना शुरू हो गए हैं। मुझे उच्चाधिकारियों पर रोष है - तिमंजली सीढयाँ चढने का रोष। रूम नीचे भी तो बनाया जा सकता था। किसी ने यदि एक रिसाला भी देखना हो तो साँस फुलाते ऊपर चढो - पूरी सवा सौ सीढयाँ।
जी.एल. ज्यों का त्यों लेटा है। हाथ-मुँह धोकर मैं माचिस खोजता हूँ, स्टोव में तेल खत्म, एक बार फिर अपने आलस्य का सर्टिफिकेट मिलता है। पडोस वाली भैणजी की मुन्नी ने आकर सीधा प्रश्न किया - अंकल जी, मम्मी ने कहा है, चीनी का एक गिलास उधार दे दो।
अच्छा, मम्मी ने कहा है? मैं दोहराता हूँ। जैसे, यदि मम्मी ने न कहा होता तो चीनी ही न मिलती। चीनी देकर थोडा सुस्ताता हूँ।
छह पैंतीस पर रेडियो ऑन किया है तो फिर वही स्यापा झेलना पड रहा है - यह आकाशवाणी है। अब आप... से हिन्दी में समाचार सुनिए। राबर्ट कैनेडी की हत्या का उपक्रम... और तभी लाइट चली गई है। एक खीझ उभरकर तैरती है, स्विच ऑफ कर देता हूँ। भाषा स्थिति पर चिंतन चलता है। क्षणिक अभ्यस्त समस्याओं से फूटते बिंब जेह्व से टकराते हैं - भाषा, रंग, लिंग का झगडा। राजनीति में भारी बदलाव, साझे इरादों पर जूझते सामयिक संदर्भ।
साइकिल को हाथ डाला है तो पिछला टायर पंक्चर। ऐन मौके पर साली साइकिल की हवा भी निकल जाती है। आदमी की हवा भी ऐसे ही तो निकलती होगी। आकांक्षाओं से भरा दुर्बल मन लोकल बस की बात सोचता है। तीन नम्बर अभी देर में आएगी। पाँच नम्बर निकल चुकी है, चलो, डबल डैकर ही सही।
कंडक्टर को दस पैसे देकर दो पैसे वापस लेने की बात न सोची है और न मिलने की सम्भावना ही रहती है। कंडक्टर के पास छुट्टे हों तो भी वह नहीं लौटाता। अभी तो शुक्र है कि क्यू नहीं झेलनी पडी। कल डिपु पर खडे-खडे पाँवों में खून उतर आया था। इतनी लम्बी लाइन में ठहरकर भी आया कोटा मिला था चीनी का।
बस में पीछे से नई सवारियाँ चढ रही हैं, अगले स्टैंड पर। एक ओर खिसक गया हूँ। दूसरी किसी सवारी के लिए जगह छोडकर। सेक्टर उन्नीस, ए.आई.आर. स्टैंड से तीन सवारियाँ चढी हैं नई। तीनों देवियाँ। यहाँ पहुँचते ही आकाशवाणी अनुबंध याद आ जाता। केवल एक दिन शिव मंदिर में गया था दर्शनार्थ। अगले दिन ही रेडियो कांट्रेक्ट मिल गया, डाक से। एक बार तो आस्था ठहर गई थी आशुतोष भगवान के प्रति।
मेरे साथ बैठना, शायद किसी को भी गवारा नहीं। पीछे की सीट पर दो कॉलिजिएट छोकरे किरण सिनेमा में मैटनी शो का प्रोग्राम तय करते हैं। इन्हें औरत की अपेक्षा गुनाहों का देवता अधिक पसन्द है। विलप्स्सो के चौराहे पर ट्रैफिक साइन की बत्तियाँ काम करने लगती हैं। रेड लाइट ऑन देखकर हाजरी रजिस्टर पर लाल स्याही से लगा क्रॉस उभर आता है। बस वहीं छोड कर क्यू शार्ट कट तय करने की बात बना ली है। कोई पीले फूलों वाली लडकी गलत सडक पार कर रही थी। संतरनी ने उसे सीटी तक नहीं दी। पहले दिन एक कार भी ऐसे ही गलत क्रॉस कर गई थी। लडकी और कार - एक-सी ही चीजें हैं दोनों।
सीट पर बैठे-बैठे शीशे की विंडों से नीचे झाँकना पड रहा है। बरबस एक सामूहिक मुद्रा भंग कर रही है। आवाज में आक्रोश है। सिर उठाकर एक बार सुनता हूँ -
आग लगाओ, आग लगाओ। कम्प्यूटर को आग लगाओ।
जैसे दफ्तर बंद किया है - ऑटोमेशन बंद करेंगे।
मजदूर से जो टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा।
रिसीट ब्र्रांच का चपरासी। गंगाराम, डाक का बंडल मेज पर टिकाते हाँफ रहा है। शायद दो सौ सीढयाँ एक साथ लाँघता आया है। साँस ऊपर-नीचे हो रही है। वह कुछ बतलाने की कोशिश करता है - स्पष्ट कुछ भी नहीं कह सकता, फूले साँस के कारण। थोडा ठहर कर कहता है - हडताल हो रही है मेहता साब, एल.आई.सी. वालों की। पीट रहे हैं जी। ये क्यों हडताल करते हैं जी? साथ में बीवियाँ भी हैं जी।
रोजी-रोटी छीन रही जो - वह सरकार निकम्मी है।
जो सरकार निकम्मी है - वह सरकार बदलनी है।
शब्द कानों पर टकराते हैं। स्थितप्रज्ञ-सा विचार आता है। डाक में सब से ऊपर धर्मयुग का नया अंक है। पहला पेज पलटते ही स्वतंत्रता विशेषांक का विज्ञापन है - आजादी के बीस वर्ष सन् सैंतालीस से अडसठ। पन्द्रह अगस्त - भारतीय इतिहास का एक रेखांकित दिन। बीस वर्षीय स्वतंत्रता कुमारी की उपलब्धियाँ मुझे घेर लेती हैं। भूख-महंगाई, जुलूस, बंटवारे, हडतालें, घेराव, बेचैनियाँ और...और क्या नहीं? जैसे मेरी बीस वर्षीय बहन मुझे उलाहने देने लगी हो - तिक्त-तीक्ष्ण ताने। योजनाएँ - एक अट्टहास मानो तीसरे रिश्ते वाल भी मेरी पितृहीन बहिन को नापसंद कर गए हों और वह... उसकी स्थिति। एक जोरदार चपेड मेरे मुँह पर पडती है जैसे।
थोडा सम्भलकर चपरासी को पानी के गिलास के लिए कहता हूँ। हाथ में ज्ञानोदय के व्यवस्था विभाग का लिफाफा है। एक साल का चंदा इसी अंक से समाप्त हो रहा है। अगले साल का चंदा इसी सप्ताह न पहुँचा तो नया अंक वी.पी. द्वारा भेजा जाएगा।
गुड मॉर्निंग सर। सामने जी.एल. है, हाथ में युद्ध और शांति थामे, नीचे से रिन्यू करवाकर आया है। बतला रहा है - ऑल इंडिया बेसिस पर हडताल कर रहे हैं हम लोग आज। जी.एल. जीवन बीमा निगम से सम्बद्ध है। आगे कहता है - ऑटोमेशन पॉलिसी के खिलाफ जिहाद है हमारा। कम्प्यूटर को लागू नहीं होने देंगे। मैं फिर सोचने लगता हूँ - मशीन ः आदमी ः आदमी ः मशीनें। अनुपात बाँध लेता है मुझे। आदमी मशीन बनाता है। दिमाग मशीनों का निर्माता है। मशीनें आदमी को नचाती है। आदमी मशीनों को नचाता है। मशीनों को जन्म देने वाला दिमाग बेकार बना दिया जाता है।
सामने, दूर सडक पर उछलते-कूदते युवक अब भी हाय-हाय के नारे लगा रहे हैं। भंगडा डालते, कूद रहे हैं। जी.एल. पर मुझे हैरानी होती है। कह भी टिककर न बैठने वाली जान कैसी शांत है। सीरियस भी। रोटी आदमी को सीरियस बना देती है। चपरासी बुलाने के लिए घंटी दी है। जी.एल. को चाय के लिए पूछा है। क्या खाओगे साथ में
मुझे आज भूख नहीं है। सुबह घर से चलते बाप की कसम खाई थी। वैसे अब कुछ भी नहीं खाना है। क्या अजीब आदमी है। मेरे पूछते-पूछते उठकर भाग निकलता है।
मुझे न जाने क्यों अपने चपरासी का स्मरण हो आता है। सुबह पहुँचते ही बोला था - दुबला गया हूँ हुजूर। देश गया था वह। अपने घर से दो महीने की छुट्टी काटकर लौटा है। खाने-पीने की तो कभी कमी नहीं रखता जी। पर बाऊजी, मेरी घडी का चैन खुला हो गया है। एकदम मोकला। पहले सारा भिडता था जी।
उधर हमारे गाँव की तरफ नाज मंगा (महंगा) है मेहता साब। एक रुपए का चौदह छटांक। भूखों मरते हैं जी लोग। दिहाडी का एक रुपया मजूरी पाते हैं। वहाँ शरीर। पाँच आदमी इधर ही साथ लाया हूँ जी। कहीं काम लग जाएँगे न बाऊजी*? मैं स्तब्ध सुन रहा हूँ।
क्या जमाना आ गया है। मैं फिर जोर देकर सोचता हूँ। सत्तावन की याद आ जाती है। स्कूल में मास्टर थे। दस साल पहले। घर की दीवारों में। सवा सौ मिलते थे। हीर-रांझा गाते थे। सेहत भी तो कप्तान की तरह।
आज मूल्य बढ गए हैं। बदल गए हैं। हर काम में टरकालाजी चलती है। उपलब्धि के नाम पर कटुता है, क्लेश है। हीनता, कलुषता, आशंका और क्या नहीं है आज। मेरे देश के किसी भाग में सूखा पडा है। शायद तभी जी.एल. जैसों को बाप की कसम खानी पड रही है। कितने बाप रोज खा लेता है आदमी? तभी तो खाना कम शुरू कर दिया है लोगों ने, हवा खाते हैं युवक - बेकारी की हवा।
विदेशों से हर साल करोडों टन अनाज आता है। सूखा पीडतों की सहायता के नाम पर वर्षा की मिन्नतें की जाती हैं और पानी है कि पडने लगता है तो थमता ही नहीं।
पन्द्रह दिन बारिश न हुई तो दो रुपए किलो हो जाएगा आटा। किसी ने एक दिन कहा था। मैं फिर सोचता हूँ, यदि कहीं बारिश हो जाए तो भाव गिरेंगे तो नहीं, बल्कि पानी की बाढ आएगी, पीडतों की सहायता होगी, कभी सूखा, कभी बाढ। कभी मशीन, कभी दिमाग।
बारह बजे ही कैंटीन जाना चाहता हूँ। अचानक हाथ गालों पर जा टिका है। शेव करना आज फिर भूल गया हूँ। पर अपनी तो क्रीम ही चुक गई। जी.एल. ही जाग रहा होता तो उसी से माँग ली होती। तभी ध्यान आता है कि आज वीरवार है और वीरवार को शेव न करने को माँ ने कहा है। फिर विद्रोह फूटता है - यह क्या? मंगलवार को कपडे नहीं धोने, शनिवार को हजामत नहीं करनी। पर चढते हुए भाव और बढती हुई महंगाई तो कभी यह नहीं देखती कि वीरवार है या शनिवार। दंगे, फसाद, घेराव, भूख भी तो कभी दिन नहीं देखते।
दूर जा रहे हुजूम से अभी भी कानों पर तैरकर आती आवाजें महसूस होती हैं।
रोजी-रोटी छीन रही जो,
वह सरकार निकम्मी है।
जो सरकार निकम्मी है,
वह सरकार बदलनी है।
कवि, कहानीकार और अनुवादक हैं। कई अलंकरणों से विभूषित हैं। विदेश यात्राएँ भी कर चुके हैं।