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आसमाँ और भी हैं....

सुदेश बत्रा
नवीन रात भर करवटें बदलता रहा। जब से गाँव से लौटा था, अपने मित्र गोपाल को ही याद करता रहा। वह कुछ साल पहले फौज में भर्ती हो गया था। फौजी वर्दी में सजी उसकी तस्वीर सदा उसे लुभाती रही है। सुदूर बर्फीले पहाडों की उसकी पोस्टिंग उसे सदा प्यार के नगमे सुनाती रही। उसे हमेशा लगता कि गोपाल का कद उससे बहुत ऊँचा हो गया है। कभी उसे गोपाल के साथ बिताये गाँव की सैर के खूबसूरत लम्हे याद आते हैं, कभी वहाँ की हवाओं में गूँजती वीरों की गाथाएँ याद आती हैं। लेकिन वह कभी भी भविष्य को लेकर कोई निर्णय न ले पाता।
एक दिन समाचार मिला कि गोपाल सीमा पर आतंकियों से मुठभेड में शहीद हो गया है। एकबारगी वह बिलख उठा। अपने आँसू पोंछकर वह उसे श्रद्धांजलि देने गाँव पहुँचा। पूरा गाँव उमडा था वहाँ, सब उसे सलामी दे रहे थे। गोपाल के पिता भरी-भरी आँखों से कह रहे थे - ’मुझे अपने पुत्र पर गर्व है। अगर मेरा एक और बेटा होता तो उसे भी मैं फौज में भेजता।‘ नवीन सुनकर सिहर उठा। गोपाल की माँ और बहिन आशा की आँखें गहरे दर्द से लाल तो थीं, मगर उनमें गर्व की दीप्ति थी।
’आशा! कभी भी मेरी जरूरत हो तो संकोच मत करना। मुझे फोन कर देना।‘ नवीन ने विदा होते हुए आशा से कहा।
आशा ने निर्द्वन्द्व भाव से उसे देखा, फिर सधे स्वर में कहा, ’काश! मैं भी फौज में जा पाती तो दुश्मनों के दाँत खट्टे कर देती।‘
जाने क्या था उन शब्दों में, नवीन स्थिर-सा उसे देखता रह गया। १७-१८ वर्ष की आशा ने अभी-अभी बी.ए. प्रथम वर्ष में कदम रखा था। गाँव की हवा, पानी, मिट्टी से बनी उसकी छरहरी देह सतर तनी हुई थी। उसकी बडी-बडी निश्छल आँखों में छुईमुईपना नहीं, बल्कि दृढता भरी हुई थी।
दूसरे दिन सुबह-सुबह उठकर वह घूमने के लिए निकल गया। पार्क में दौडते-दौडते और फिर प्राणायाम करते हुए वह निरन्तर स्वयं से संवाद करता रहा। ’मन को साधे सब सधे‘ - बस यही मूलमंत्र उसके भीतर गूँज रहा था। वह आँखें बंद कर एक बैंच पर बैठ गया। सूर्योदय हो चुका था। सुनहरी किरणें उसके मुख पर सीधी पड रही थीं। बहुत देर बाद जब वह घर लौटा तो उसके साथ उसका निश्चय भी था। उसके कदम सधे हुए थे, आँखों में एक सुनहरी स्वप्न झिलमिला रहा था।
घर पहुँचते ही उसने घोषणा की - ’पापा, मैं फौज में भर्ती होऊँगा।‘
पापा के हाथ से कप की चाय छलक गई, माँ के हाथ से नाश्ते की ट्रे झनझना कर नीचे गिर गई। लगा, जैसे भूकम्प आ गया हो। पापा ने नवीन को देखा, उसके स्वर के तापमान को भाँपा और उठकर उसे कंधों से पकडकर कुर्सी पर बैठाया। माँ की जबान तो तालू से ही चिपक गई थी। छोटा भाई प्रभास मेडिकल की तैयारी कर रहा था।
’भैया! आपकी आई.ए.एस. की परीक्षा का क्या होगा?‘ ’प्रभास! यूँ तो सारी दुनिया ही जी लेती है, लेकिन सच्ची और सार्थक जन्दगी तो एक फौजी ही जीता है।‘
सबको ऐसा लगा, जैसे यह आवाज किसी गहरे कुएँ से आ रही है, जैसे अचानक बहुत तेज हवाएँ चलने लगी हैं।
’पापा! इमरजेन्सी कमीशन की ओर से फौज की वेकेन्सीज निकली हैं। मैं आज ही एप्लाई कर दूँगा। माँ, नाश्ता दे दो, मुझे जल्दी जाना है।‘ स्वर में अनुरोध या निवेदन नहीं था, सिर्फ सूचना थी। वह तेजी से अपने कमरे की ओर बढ गया।
नवीन के पापा अरुण माथुर एक कम्पनी में एकाउन्टेंट थे। नवीन को प्रशासनिक पद पर देखना उनका बहुत बडा सपना था। वे निश्चेष्ट से बैठे थे। नवीन की माँ की आँखों से झरझर आँसू बह रहे थे। प्रभास तैयार होकर बाहर निकल गया था। अरुण जी ने स्वयं को संयत किया और पत्नी से बोले, ’सुनीता, मन छोटा न करो। जाने दो उसे परीक्षा देने। उसे तसल्ली हो जाएगी। फौज में भर्ती कोई आसान थोडे ही होती है और फिर विधि के विधान को कौन बदल सकता है।‘
कुछ दिन बाद नवीन चेन्नई रवाना हो गया था। माता-पिता पहली बार असमंजस में थे - बेटे की सफलता की दुआ करें या न करें। फौज के नाम से ही रूह काँपती है। सारा देशप्रेम और आदर्श धरे रह जाते हैं, जब अपने बच्चों की बात होती है।
अरुण माथुर जानते थे - फौज की परीक्षाएँ बहुत कठोर होती हैं - कभी घुटनों के बल रेंगना, कभी सीधी दीवारों पर चढना, कभी जंगली रास्तों से गुजरना और भी न जाने क्या-क्या। माँ को लगता - उसके बेटे के हाथ-पैर छिल जाते होंगे या हाथों में छाले पड जाते होंगे। एक सप्ताह की दुर्गम प्रतियोगिताओं के बाद एक दिन नवीन का फोन आया। उसका स्वर आसमान की ऊँचाइयाँ छू रहा था - ’पापा! मेरा सलेक्शन हो गया है। मैं कल लौट रहा हूँ।‘
फोन सुनकर नवीन की माँ गीली मिट्टी की दीवार की तरह फर्श पर ही ढह गई थी।
देहरादून की कठिन ट्रेनिंग के बाद कमीशन मिलने के दिन के समारोह में अरुण माथुर सपरिवार देहरादून गए थे। बेटे को फौजी वर्दी में देखकर उनका सीना चौडा हो गया था। सुनीता ने बेटे की सुदर्शन छवि को आँखों में भर लिया था और अदृश्य ईश्वर के सामने हाथ जोड दिये थे। प्रभास भी जैसे गर्व से भर गया था।
नवीन की पहली पोस्टिंग राजस्थान की सीमा पर हुई थी। बाडमेर के सुदूरवर्ती रेगिस्तानी इलाके में तपती गर्मी में कभी जीपों में, कभी ऊँटों पर उसने इधर-उधर छितरी हुई झाडयों और रेत के टीलों में जीवन के कई रंग देखे थे। दिन में रेत जितनी तपती थी, रात उतनी ही शीतल हो जाती थी। एकांत क्षणों में कभी-कभी आशा का चेहरा झलक मार जाता था। काश! वह उसे वर्दी में देख पाती।
रेगिस्तान में पानी की किल्लत अक्सर होती थी। भोर तडके ही ढाणियों से स्त्रियाँ मटकी लेकर कतार बाँधकर दूरदराज के कुओं से पानी लाती थी। रेगिस्तान जितना सूखा और बेरंग था, वहाँ का जनजीवन उतना ही रंगीन और संगीतमय था। मानव मन का ताना-बाना जैसे स्वयं ही संतुलन बिठा लेता है।
पहली छुट्टी में जब वह घर आया तो उसने गोपाल के बापू को फोन किया और स्वयं के फौज में भर्ती होने की सूचना दी। उसे पता चला कि आशा उसी के शहर में हॉस्टल में रहकर एम.ए. कर रही है। वह शाम को फौजी वर्दी में उसके हॉस्टल पहुँचा। आशा उसे एकदम पहचान ही नहीं पाई। फिर उसकी मुस्कान देखकर बेसाख्ता दौडती हुई उसके गले लग गई। दो मिनट बाद ही वह सकुचाई-सी अलग होकर धीरे से बोली - ’सॉरी‘। आशा की खुशी उसके शरीर पर थरथराहट और आँखों की स्निग्ध आँख-मिचौली से कतरा-कतरा टपक रही थी।
जल्दी ही संयत होकर बोली, ’आपने तो कोई खबर ही न दी।‘
नवीन शरारत से बोला - ’फिर यह सरप्राइज कैसे देता।‘ दोनों खिलखिलाकर हँस दिए।
नवीन की दूसरी पोस्टिंग आसाम बॉर्डर पर हुई। जहाँ बाँसों की झोपडयों में उडते साँप अक्सर हाल पूछने आ जाते थे। फौज में नवीन को कई तरह के दायित्व सम्भालने पडते थे। दुश्मन से बचने के लिए वे न केवल टैंकों आदि को घने पत्तों से ढक देते थे, बल्कि सैनिकों को भी स्वयं को वर्दी के ऊपर से पत्तों में छुपाना पडता था। बहुत-सी बातें गोपनीय होती थी, यहाँ तक कि शहर का नाम भी। बस एक कोड नम्बर होता था।
नवीन की अक्सर आशा से बात होती रहती थी। आशा की आँखों में नवीन के लिए एक ’ओज‘ जगमगाया करता था।
आशा ने एम.ए. करके पीएच.डी. का रजिस्ट्रेशन करवा लिया था, साथ ही लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी आरम्भ कर दी थी। परिवार की तरफ से उस पर शादी का दबाव बढने लगा था, किन्तु वह तो कुछ और ही ठाने बैठी थी।
देश में युद्ध के बादल मंडराने लगे थे। सीमा पर आतंकवाद का बोलबाला बहुत बढ गया था। आये दिन शत्रु सेना सीमा रेखा का उल्लंघन करने लगी थी। सभी सेनाओं को सचेत सावधान रहने के आदेश मिल गए थे। उन्हीं दिनों नवीन की नई पोस्टिंग कश्मीर की ठण्डी वादियों में हो गई।
धरती का स्वर्ग कश्मीर सबका मन ललचाता है। कश्मीर की नैसर्गिक सुषमा और हरीतिमा देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है, किन्तु फौजियों की कश्मीर पोस्टिंग सबके दिलों की धडकनें बढा देती है। एक तरफ देशप्रेम का जज्बा, दूसरी तरफ आतंकवाद का मुकाबला - पता नहीं, कौन सा पल मौत की अमानत बन जाए। अकेलेपन में कवियों की शायरी दूर से ही सुहानी लगती है। यहाँ नवीन आशा को बहुत कम फोन कर पाता था। वह भी स्थिति की नजाकत को समझती थी। नवीन कश्मीर आकर खुश तो बहुत था, किन्तु उसके पास वहाँ के सौन्दर्य का आनन्द लेने की फुर्सत न थी। कश्मीर के सीमावर्ती गाँवों में दहशत और गरीबी का माहौल था। शिक्षा की कोई नियमित व्यवस्था न थी। लोग शत्रु और मित्र के जंजाल में फँसे हुए थे। पुलिस और फौज के दबदबे में उनकी आँखों में सदा भय की छाया मंडराती रहती थी। पता नहीं - कल हो न हो। सारी घाटी भय की कालिमा से आवृत थी।
नवीन केवल वर्तमान के सच में जी रहा था, अतीत और भविष्य उससे बहुत दूर थे। उनके आर्मी कैम्प में सबको हर वक्त ’अलर्ट‘ रहना पडता था। बला की सर्दी और बर्फ ढके पहाडों की घाटियों में सीमा की चौकसी। नवीन को अक्सर गोपाल की याद आती। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में जीवन के सब रंग सिर्फ सफेद रंग में बदल जाते हैं या सफेद बर्फ पर शहीदों के खून के लाल छींटे बिखर जाते हैं। कडी मेहनत और अधूरी नींद से मन-मस्तिष्क को फौलादी बनाना पडता है। घर, परिवार, प्रेम सबकी रेखाएँ धूमिल होकर एक योगी की भूमिका में बदल जाती हैं। लक्ष्य सिर्फ एक - सिर्फ देश की रक्षा, उसकी स्वतंत्रता की रक्षा।
उस रात ३-४ घण्टे की नींद में ही नवीन ने करवट बदली थी कि उसे कुछ आहट सुनाई दी। वह एकदम उठ खडा हुआ। निःशब्द उसने अपनी टोली के सदस्यों को जगाया। दबे पाँव वे अपने टैंट से बाहर आये और हल्की सी ध्वनि को लक्षित कर गोली दाग दी। ’हाय-अल्लाह‘ का हल्का-सा स्वर उभरा और दो-तीन लोगों के भागने की पदचाप सुनाई दी। नवीन और उसके साथियों ने उनका पीछा किया, वे अपने बंकर से गोलियाँ बरसा रहे थे। नवीन ने उस दिशा का अनुमान लगाया और बारूद के गोले बरसा दिये। घने अंधकार में एक भयंकर धमाका हुआ और आग के शोले लपकने लगे। तभी उसे अपने सीनियर अफसर का संदेश मिला - ’फौरन पीछे लौटो‘। अपने साथियों को टर्न करते ही वह घूमा ही था कि एक जोर का धमाका हुआ। उसका बायाँ पैर बारूद की एक माइन पर पड गया था। ब्लास्ट होते ही घुटने तक उसका पूरा पैर उड गया था। उसके साथी उसको कंधों पर लादे सीधे कैम्प की तरफ दौड पडे थे। वह बेहोश था, लहुलूहान था। वह अपाहिज हो चुका था।
माँ-पापा उसे देखने अस्पताल आये थे। उनके गुमसुम चेहरे देखकर वह हँस पडा - ’पैर कटा है, मुँह तो सलामत है। हँसना बोलना तो मुँह से ही होता है न।‘ नवीन तीन महीने की सघन चिकित्सा के बाद अपने शहर लौट आया था।
पिता एकदम चुप हो गए थे, माँ की आँखें अक्सर बरसती रहती थीं, शब्द जैसे गूँगे हो गए थे। प्रभास ने पिता से कहा था - ’आपको अपने बेटे पर गर्व होना चाहिए। वह अकेला दस को मारकर और बीसियों को बचाकर आया है। मैं भी आर्मी डॉक्टर बनकर घायल सैनिकों की सेवा करना चाहता हूँ।‘
अरुण माथुर उसका चेहरा देखते रह गए। सबको देश की फौज पर गर्व होता है, पर अपने घर के बेटे की इस स्थिति या शहादत पर कलेजा मजबूत करना बडा कठिन होता है।
आशा सूचना पाकर नवीन से मिलने आई थी। उसका हँसकर स्वागत करते हुए बोली, ’आओ, वीर सैनिक! तुम्हारा स्वागत है। रही तुम्हारे पैर की बात तो ’जयपुर-फुट‘ है न।‘
नवीन को वीर-चक्र के लिए नामित किया गया था।
सभी जानकार लोगों ने नवीन को परामर्श दिया था कि ऐसे युद्ध वीरों को बडी-बडी सुविधाओं और अच्छे वेतन वाली सरकारी नौकरियाँ प्राप्त हो जाती हैं, किन्तु नवीन ने एक एन.जी.ओ. खोलने का निश्चय किया था, जहाँ अशक्त और असहाय लोगों की सहायता का संकल्प ही उसका ध्येय होगा।
आशा ने उसके हाथ पर हाथ रखते हुए कहा - ’मैं इस संकल्प की पूर्ति के लिए आजीवन तुम्हारे साथ हूँ।‘
प्रदेश की प्रतिनिधि वरिष्ठ कथाकार। गद्य साहित्य में गहरी रुचि रखती हैं।