fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

दो बोल मोहब्बत के

हरदर्शन सहगल
प्यासा आदमी, नाम : मसरूफ अली, उम्र कोई चालीस-पैंतालीस के दरम्यान, अपनी प्यारी, ठीक-ठाक नैन-नक्श वाली, बमुताबिक मसरूफ अली ’लडाकू‘ बीवी जांनिसां, उम्र लगभग पैंतीस साल की डाँट खा कर अधपिया पानी बीच में छोडकर, पायजामा, फटे कुर्ते ही के साथ बडे बरगद के नीचे, बने थडे पर आ बैठा था।
एक तो प्यासा, ऊपर से जबान में भरी चख-चख की वजह से गला, हद से ज्यादा सूख रहा था। जेब में हाथ डाला तो कदरे खुशी हासिल हुई। पचास का नोट उसकी मुट्ठी में था। सबब से सामने ठर्रा था। झट से दो जामे जम। प्रसिद्ध है कि ईरान के शासक के जमशेद ने एक प्याला बनवाया था, जिससे संसार का हाल ज्ञात होता था। यानी कि प्याले में कोई भांग जैसी मादक वस्तु पिलाई जाती होगी, जिसे पीने वाला हलक के नीचे उतार ले गया। तरावट महसूस हुई। वाह क्या बात है। अरी मेरी बचपन की सहेलियो! या खुदा क्या बात है। पहले बिमला आँखों के सामने से गुजर गई। फिर पाकीजा मुँह में पहले ही की तरह मुँह में हँसी भरे, उर्मिला का हाथ थामे निकली। इर्द-गिर्द चक्कर काटने वाली वही पहले वाली, मुहल्ले वाली थी। स्कूल में साथ पढने वाली चुलबुली बहुसंख्यक लडकियाँ, शर्मीले मिजाज के मसरूफ अली को छेडे जा रही थीं, क्यों कोई पसन्द आई। हम तो दो-दो एक साथ रह लेंगी, तुम इशारा तो करो। ’खीं-खीं-खीं‘, घुँघरुओं वाली हँसी। मसरूफ अली की छाती को धोंकनी बना जाती। एक पढने के बहाने आने लगी। एक की मुर्गी रोज खो जाती। ढूँढने आ जाती। एक के कबूतरों का झुण्ड उसके घर में घुस आता। मसरूफ निहायत खूबसूरत, गोरा-चिट्टा, तोते जैसी नाक वाला मनमोहक... मसरूफ के मुँह से आह निकली। ’मसरूफ बाबू उल्लू, तुम मौका चूक गए उस्ताद। हाय! उर्मिला, शारदा, रेहाना, रहमत, पाकीजा। तुम इस वक्त न जाने कहाँ होंगी। अब तक भी तुम्हारी यादें सीने में ज्यों की त्यों बरकरार हैं।
...तो बच्चू उन्हीं दिनों, उन्हीं में से किसी से क्यों न फँस गए। झेंपू आदमी किसी को फाँस नहीं सकते। कुदरत का यह कायदा चला आया है। इस तरह कम से कम, इस बेगैरत औरत जांनिसां के पल्ले तो न पडता। शादी के बाद से, इस रूखी-रूखी जबान वाली से, आखिर दो बोल मोहब्बत के सुनने को क्यों तरसता। बात-बेबात पर उद्दण्डता, उज्जडता, अक्खडपन। बैठे-बिठाए इसे तो दूसरों को बेइज्जत करने में पलभर भी नहीं लगता।
मसरूफ साहब अभी ऑफिस से लौटे ही थे। पैंट उतार पायजामा पहना था। मटके से पानी का गिलास निकाल कर बमुश्किल आधा घूँट ही पी पाए थे कि तभी जांनिसां ने प्रवेश किया। मसरूफ साहब से गलती यह हुई कि उन्होंने उसके विभागीय इम्तहान के रिजल्ट के बारे में पूछ लिया, बस फिर क्या था। सब अगली-पिछली तमाम कसरें मसरूफ साहब के सिर माथे पर जूती की तरह चेपने लगीं - शर्म आनी चाहिए। न रात को ठीक से पढने देते हो। न दिन में चैन। आखर कोई औरत कितना कुछ करे... तुमने सब पता लगा रखा होगा। बस दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते...
बकाया लैक्चर को बीच में छोड, अनछुए से पानी के गिलास को जमीन पर रखकर, हाथ जोडते हुए, उन्हीं कपडों में भाग खडे हुए। समझ गए, मैडम फेल हो गई हैं। उसकी सारी भडास इस गरीब पर बरसा रही है। तौबा तौबा...
आदमी आखिर, आदमी है। आदमी गलतियों का पुतला होता है। बंदे से उस दिन गलती हुई थी। गलती से उर्मिला शायद मुर्गियाँ ढूँढने वाली, कबूतरों का पीछा करने वालियों का नाम ले बैठा। नाम से सारे घर की दीवारें हिल गईं। छत उडते-उडते बच गई - गलती हो गई तो अब भी कुछ नहीं बिगडा । जिस कमीनी को चाहो ले आओ। फिर मर्दे खुदा को पता चलेगा। यह तो मैं ही हूँ जो जहर का प्याला पीकर तुम जैसे गुस्सैल, आलसी आदमी के साथ निभाए चली आ रही हूँ। मेरी जगह कोई दूसरी होती तो न जाने तीन तलाक कहकर रवाना हो जाती।
इन जमीन आसमानों की लम्बी होती कहानी के बीच, ............................................................................... ’ओह परवीन! जरूर युवावस्था वाली परवीन ही है। अब जिस्म थोडा ढुल-मुला गया है। न भी हो तो इसे ट्राई करने में हजर् भी क्या है।‘ बस मि. मसरूफ धीरे से पुकार उठे - परवीन!
वह औरत अनदेखा-अनसुना कर आगे निकलने लगी तो मसरूफ साहब न अब की बार जरा ऊँची आवाज लगाई - परवीन जी! इस पर वह औरत सामने आ खडी हुई। खा जाने वाली निगाहों से देखा। गरज कर बोली - कौन परवीन? दोराहों-चौराहों पर बैठकर इश्क-मिजाजी करते शर्म नहीं आती
इस पर मसरूफ साहब को ’सॉरी‘ कहना पडा। साली जामे जम धोखा दे गई। चलो जो हुआ सो हुआ। अब अपमान का घूँट चढा जाओ प्यारे। वे मरी हुई निगाहों से सूने से रास्ते को आबाद करने लगे।
बमुश्किल सात एक मिनट गुजरे होंगे तो देखते क्या हैं कि वही औरत सामने खडी मुस्करा रही है, बस इतने ही में घबरा गए? जनाब का डरू-झैंपू मिजाज अब तक जीवित है। देख लो परवीन ही हूँ। परवीन।
मसरूफ अली पुलकित हो उठे, तब ऐसा मजाक क्यों किया?
मजाक नहीं। मजबूरी कहिए। मिस्टर शोहर पीछे-पीछे आ रहे थे। हम दोनों को बतियाते देख, आग बबूला हो जाते। तंग आ गई, हर वक्त चख-चख, शक्की फितरत। अब कुछ देर के लिए उन्हें टरका कर आई हूँ। इससे अच्छा होता, किसी और का हाथ थाम लेती।
किसी और का या मेरा? कम से कम इस नरक से तो मुझे मुक्ति मिलती। चलो अपन दोनों कहीं भाग चलें।
दोनों तरफ से हँसी छन-छन करने लगी।
तभी मसरूफ को ढूँढती वहाँ जांनिसां आ पहुँची; जल-भुन गई लेकिन शराफत का ओढना ओढ लिया - आप....
मैं परवीन हूँ। इनके साथ पढती थी।
हाँ-हाँ समझ गई। आपका नाम बहुत लेते रहते हैं। फिर पति की तरफ एक गुलाबी रंग का लिफाफा बढाती हुई बोली - यह देखो, संशोधित लैटर। मैं पास हो गई। अब उसकी खुशी आसमान को छू रही थी।
बधाई हो। निकालो पचास रुपए। जांनिसां ने पर्स में से नोट निकाल दिया। उसी दम वह दो कुल्हड जामे जम चढा गया। परवीन के कंधे पर हाथ रखकर, स्वर निकाला ’जाएँ तो जाएँ कहाँ।‘
छोडए, हमें बात करने दीजिए, जांनिसां ने मसरूफ का हाथ ......................................................................... मसरूफ ने झपट लिया, अच्छा तो परवीन कब आ रही हो
अपना घर समझ कर कभी भी आ जाऊँगी।
बात लम्बी होते देख, जांनिसां ने मसरूफ का हाथ खींचा - अब चलो, बहुत देर हो रही है।
रास्ते में मसरूफ ने जामे जम में देखा, फिर से वही लडकियाँ। वह पुकारने लगा - उर्मिला, शारदा, रहमत, उर्वशी मेरा इस औरत जांनिसां से पिंड छुडवाओ। अरे परवीन, तुम तो हमारे घर चल रही हो ना। उसने जांनिसां का हाथ दबाते हुए कहा।
जांनिसां चीख सी पडी - सत्यानाश हो इन सबका। मुझे सब पता है। इनमें से कोई भी अपने घर खुश नहीं हैं। न औरतें, न मर्द। सब अपने-अपने खूंटे से बँधे हैं।
अच्छा तो यह बात है। तब ठीक है। तुम बडी अच्छी हो जांनिसां। मसरूफ ने उसके हाथ को इस बार कदरे जोर से दबाया कि उसके मुँह से या अल्लाह निकल गया।
घबरा गई मसरूफ का स्वर भर्राया हुआ था। वह फिर से उन लडकियों का नाम लेने लगा, जो अब तक बच्चों की माँएँ बन चुकी थीं...उर्मिला, शारदा।
जांनिसां ने अबकि कोमल स्वर में कहा - छोडो इन सबको। यह तुम्हें उल्लू बनाती थीं। फिर निकल भागी, जहाँ उन्हें जाना था। सब छंटी हुई धूर्त चालाक लफंगी थीं। सिफर् मैं ही तुमसे सच्ची मुहब्बत करती थी। तुम्हें बाजार से आता देख, अपने आँगन की सीढयाँ चढ छत से तुम्हें निहारती थी।
सच? यह बात पहले क्यों नहीं बताई। शादी के इतने सालों के बाद आज कह रही हो।
जरा शर्म आती थी। यह भी डर था कि कहीं तुम बिगड नहीं जाओ। जांनिसां ने बडे नखरे के हाव-भाव से जरा शरमा कर कहा।
अच्छा जरा फिर से बताना। मेरा कैसे इंतजार करती थी ताकि हमें भी तो अपनी अहमियत का पता चले।
जब आप हमारे मकान के रास्ते आते-जाते थे तो मैं फौरन छत पर चढ जाती थी, आपको देखने। खुश!
एक बार और बताओ।
अब बस घर आ गया है। पहुँच कर चौका-बर्तन करना है।
वरिष्ठ कहानीकार गद्य सर्जक हरदर्शन सहगल बीकानेर में रहते हैं। अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं।