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स्वयंप्रकाश का कहानी संसार

गौरव भारती
हिन्दी कहानी मध्यवर्गीय चरित्रों से भरी पडी है। कहानी लेखन के विकास के साथ-साथ मध्यवर्ग के चरित्रों में भी काफी बदलाव आया है। आज के भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में जहाँ सब कुछ अर्थ केन्द्रित होता जा रहा है, ऐसे में मध्यवर्ग की यथास्थितिवादी मानसिकता समाज व देश के स्वस्थ विकास में बहुत बडी बाधा बनती जा रही है। भारतीय मध्यवर्ग की स्थिति ऐसी है कि एक पैर उसका परम्परा में टिका हुआ है तो दूसरा आधुनिकता में। वैचारिक अंतर्द्वंद्व में वह कभी प्रतिक्रियावादी हो जाता है तो कभी यथास्थितिवाद का शिकार। मध्यवर्ग की अवसरवादिता, दिखावापन, भ्रष्टाचार, उच्चवर्गीय नकल आदि के कारण इसकी स्थिति त्रिशंकु वाली होकर रह गई है। लेकिन तमाम विरोधाभासों के बावजूद यही वर्ग है जिस पर देश का भविष्य टिका हुआ है। भारतीय साहित्यकारों ने भी इस वर्ग की यथास्थितिवादी प्रवृत्ति की खूब आलोचना की है, लेकिन उन्हें संभाव्य चेतना भी इसी वर्ग में दिखती है।
हिन्दी साहित्य पर दृष्टिपात करें तो हम देख सकते हैं कि मध्यवर्ग साहित्य की सभी विधाओं के लिए उर्वर क्षेत्र रहा है। हिन्दी उपन्यास के उद्भव और विकास में इस मध्यवर्ग की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही, एक पाठक के तौर पर भी और रचनाकार के तौर पर भी। ज्यादा विस्तार में न जाते हुए हम देख सकते हैं कि ’परीक्षा-गुरु‘ उपन्यास किस तरह भारतीय मध्यवर्ग के चरित्र को उद्घाटित करता है। प्रेमचन्द कृत ’गोदान‘ सिर्फ इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वह किसान जीवन का महाकाव्य है बल्कि वह इसलिए क्लासिक बन जाता है क्योंकि यहाँ प्रेमचन्द की दृष्टि व्यापक है। जिसमें वे मध्यवर्गीय चरित्रों को भी बखूबी चित्रित करते हैं। रायसाहब, मिल मालिक खन्ना जैसे पात्र इस दृष्टि से अवलोकनीय हैं। वहीं मालती और मेहता जैसे मध्यवर्गीय पात्रों में प्रेमचन्द संभाव्य चेतना देखते हुए मिल जाते हैं। ’त्यागपत्र‘ उपन्यास में मृणाल के भतीजे का अपने पद से त्यागपत्र देना केवल पद छोडना नहीं है। यह वह स्थिति है, जिसे मुक्तिबोध संवेदनात्मक ज्ञान की संज्ञा देते हैं। अज्ञेय कृत ’शेखर एक जीवनी‘, ’अपने-अपने अजनबी‘ सरीखे उपन्यास में यही मध्यवर्ग चित्रित है। ’पचपन खम्भे लाल दीवारें‘ की सुषमा मध्यवर्ग की उस कामकाजी स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है, जो अपने मध्यवर्गीय संस्कारों की वजह से अपनी इच्छा का गला घोंट देती है।
इसी प्रकार हिन्दी कविता में मध्यवर्गीय प्रवृत्ति को बखूबी चित्रित किया गया है। उदाहरण के लिए मुक्तिबोध की कविता ’अँधेरे में‘ देखी जा सकती है। मुक्तिबोध मध्यवर्गीय यथास्थितिवादी प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए लिखते हैं -
’’...ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया*?
जीवन क्या जिया !!
उदरंभरि बन अनात्म बन गए,
भूतों की शादी में कनात से तन गए...‘‘१
इसी प्रकार रघुवीर सहाय की कविता ’रामदास‘ मध्यवर्गीय तटस्थता पर चोट करती हुई नजर आती है। जहाँ खुली सडक पर रामदास की हत्या कर दी जाती है और सडक पर खडे तमाम लोग तमाशबीन की तरह सिर्फ देखते रह जाते हैं।
हिन्दी नाटकों में भी मध्यवर्ग को बहुत स्थान मिला है। मध्यवर्ग की जटिल स्थिति, इसके जीवन की विसंगति को विभिन्न रचनाकारों ने उठाया है। मोहन राकेश कृत नाटक ’आधे-अधूरे‘ इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो जाता है, जहाँ मध्यवर्गीय परिवार की विसंगत स्थिति का भयावह रूप हमारे सामने उपस्थित होता है। बांग्ला में भी नाटककार बादल सरकार ने नाटक ’पागल घोडा‘ में मध्यवर्ग की मानसिकता के खोखलेपन को उजागर किया है, जहाँ चारों पुरुष पात्र अपनी मध्यवर्गीय मानसिकता के कारण चाहते हुए भी प्रेम को नहीं स्वीकारते और अपनी प्रेमिकाओं की मृत्यु का कारण बनते हैं। वहीं मीरा कांत का नाटक ’नेपथ्य राग‘ पुरुष-प्रधान भारतीय समाज में मध्यवर्गीय स्त्रियों की समस्याओं को पौराणिक कथा के आधार पर चित्रित करता है। मीरा कांत अपने इस नाटक में तीन पीढयों के माध्यम से स्त्रियों पर हो रहे शोषण का चित्र प्रस्तुत करती हैं। मराठी नाटककार विजय तदुलकर ने अपने नाटक ’खामोश! अदालत जारी है‘ में मध्यवर्गीय पुरुषों की तथाकथित नैतिकता पर प्रश्न खडा किया है, जिसकी आड में वह स्त्रियों को छलता रहता है।
जहाँ तक हिन्दी कहानी का सवाल है, हिन्दी कहानी की विकास यात्रा के साथ-साथ मध्यवर्गीय संवेदना के विकास को देखा जा सकता है। कहानी के शुरुआती दौर से लेकर आज के दौर में लिखी जा रही कहानियों में भी मध्यवर्ग अपनी चारित्रिक विशेषताओं और खामियों के साथ उपस्थित है। कहानी आंदोलनों में ’नई कहानी‘, ’अकहानी‘, ’सचेतन कहानी‘, ’सहज कहानी‘, ’सक्रिय कहानी‘, ’समांतर कहानी‘, ’जनवादी कहानी‘ का अधिकांश परिवेश मध्यवर्गीय आशा, आकांक्षाओं, विसंगतियों, अवसरवादिता, संत्रास आदि को ही चित्रित करता है। हिन्दी कहानीकारों में प्रेमचन्द और जयशंकर प्रसाद के यहाँ भी मध्यवर्गीय चरित्र खूब मिलते हैं। बाद की कहानियों में निर्मल वर्मा कृत ’परिंदे‘, भीष्म साहनी कृत ’चीफ की दावत‘, ’खिलौने‘, उषा प्रियंवदा कृत ’आपसी‘, मन्नू भंडारी कृत ’यही सच है‘, ’क्षय‘, ’ऊँचाई‘, ’त्रिशंकु‘, हरिशंकर परसाई कृत ’भोलाराम का जीव‘, राजेन्द्र यादव कृत ’टूटना‘, ’सिलसिला‘, ’जहाँ लक्ष्मी कैद है‘, ’मेहमान‘, मोहन राकेश कृत ’सुहागिन‘, ’मिस पाल‘, अमरकांत कृत ’मकान‘, ’दोपहर का भोजन‘, ’लडकी की शादी‘, मुक्तिबोध कृत ’प्रश्न‘, शेखर जोशी कृत ’दाज्यू‘, ’बदबू‘, रघुवीर सहाय कृत ’विजेता‘ आदि कहानियों को देखा जा सकता है, जिसकी एक लम्बी फेहरिश्त है। इन कहानियों में मध्यवर्ग की चारित्रिक विशेषता उसके अंतर्द्वन्द्व को हिन्दी कहानीकारों ने बहुत अच्छे ढंग से चित्रित किया है। आज के दौर में लिखी जा रही कहानियों में भी मध्यवर्ग अपने तमाम विरोधाभासों के साथ चित्रित हुआ है। आज के बाजारवाद और भूमंडलीकरण जैसे परिवेश में इस वर्ग की चारित्रिक विशेषताओं और विसंगतियों पर विभिन्न कहानीकारों ने दृष्टिपात किया है।
’जनवादी कहानी‘ आंदोलन की प्रतिबद्धता किसान-मजदूरों के प्रति है। जनवादी कहानीकारों ने कहानी को सीधे जनसंघर्ष से जोडने का प्रयास किया। इसे प्रगतिवाद का नया एवं गद्यात्मक संस्करण माना जा सकता है। रमेश उपाध्याय लिखते हैं - ’’हिन्दी कहानी उस समय तक ’नई कहानी‘, ’अकहानी‘, ’सचेतन कहानी‘ आदि आंदोलनों से गुजरती हुई ’समांतर कहानी‘ के आंदोलन तक आ पहुँची थी, जिसमें ’आम आदमी‘ और ’चिरंतन वाम‘ की बातें की जा रही थी। तब जनवादी कहानीकारों ने ही ललकार कर पूछा था - यह ’आम आदमी‘ कौन है, किस वर्ग का है, इसकी राजनीति क्या है, यह किसका पक्षधर है, किससे प्रतिबद्ध है, और यह ’चिरंतन वाम‘ की लफ्फाजी क्या है, इसका क्या मतलब है?‘‘२ जनवादी कहानीकारों ने वर्ग-संघर्ष चेतना को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किया। हिन्दी के जनवादी कथाकार स्वयंप्रकाश भारतीय समाज की भीतरी संवेदना की पडताल करते हुए नजर आते हैं। सन् १९८० के बाद हिन्दी कहानी को समृद्ध करने में जिन रचनाकारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही, उनमें स्वयंप्रकाश का नाम मुख्य रूप से लिया जा सकता है। प्रत्येक कहानीकार अपने युग से अवश्य प्रभावित होता है। स्वयंप्रकाश उन रचनाकारों में से हैं जो हमारे समकाल को अपनी कहानियों में विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त करते हैं। गौरतलब है कि अन्य रचनाकार जहाँ शिल्पगत चमत्कार और उत्तर-आधुनिक परिवेश के प्रभाव को अपनाते हुए कहानियाँ लिख रहे थे, वहीं स्वयंप्रकाश खुद को इन सबसे अलगाते हुए प्रेमचन्द, अमरकांत, भीष्म साहनी और शेखर जोशी की कथा परम्परा से खुद को जोडते हुए निम्न और मध्यवर्ग की उन संवेदनाओं को अपनी कहानी का विषय बनाते हैं, जो आजादी के इतने वर्षों बाद भी जनता के सामने मुँह बाए खडी हैं। स्वयंप्रकाश मध्यवर्ग की तरफ बडी आशा और विश्वास भरी निगाह से देखते हैं। साथ ही वे इसकी कमजोरी को उद्घाटित भी करते हैं और उसका उपहास भी उडाते हैं। कहना न होगा कि यह उपहास उस मध्यवर्ग को उसके विसंगत चरित्र के प्रति सचेत करता है। वे अपनी कहानियों में मध्यवर्ग की नब्ज को पकडते हुए उसे समाज के उर्ध्वाधर विकास के लिए प्रेरित करते हुए भी नजर आते हैं। मध्यवर्ग में जिस तरह वे संभाव्य चेतना को देखते हैं, वह महत्त्वपूर्ण है। स्वयंप्रकाश अपनी कहानियों में अनावश्यक समाधान देने की कोशिश नहीं करते हैं। स्वयंप्रकाश की कहानियाँ हमारे अनुभवों का विस्तार करती हैं। साथ ही साथ संवेदित भी करती हैं। यह हमें मूकदर्शक की कोटि से निकालकर आवाज उठाने को प्रेरित करती हैं। मध्यवर्गीय यथास्थितिवाद और जडता से निकालकर सामाजिक चेतना से जोडती हैं। उनकी कहानियाँ अतियथार्थवाद की जगह सामाजिक यथार्थ को सहजता के साथ व्यक्त करती हैं। यहाँ हम उनकी कहानियों पर दृष्टिपात करते हुए कहानियों में उपस्थित मध्यवर्गीय चरित्रों, उसकी आशा, आकांक्षाओं, समस्याओं आदि की पडताल करेंगे।
सदाशिव श्रोत्रिय स्वयंप्रकाश की रचनात्मक प्रतिभा के ऊपर लिखते हैं - ’’ब्रेख्त ने जिस एपिक थियेटर की वकालत की थी, जिसमें कि किसी महाकाव्य के वाचन के दौरान ही जैसे उसके कुछ पात्र अचानक उठकर अभिनय करने लगते हैं, कुछ-कुछ उसी अंदाज में स्वयंप्रकाश की कहानियों के पात्र भी उनके द्वारा भीनमाल के आम लोगों और उनके सामान्य जीवन के बीच से ही उठा लिए जाते थे। स्वयंप्रकाश की सृजनात्मक प्रतिभा के सम्बन्ध में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यही है कि जहाँ अन्य लोगों को किसी व्यक्ति या किसी घटना म कुछ विशेष नहीं दिखाई दे पाता था, वहाँ स्वयंप्रकाश की कहानीकार आँखें उस घटना या उस व्यक्ति में एक आँखें खोल देने वाला मतलब ढूँढ लेती थी।‘‘३ तात्पर्य यह है कि स्वयंप्रकाश की कहानियों का जो यथार्थ है वह कोई ख्याल नहीं है। इनकी कहानियों में चित्रित यथार्थ हमारे समाज का यथार्थ है, हमारे घर का यथार्थ है। एक छोटी-सी घटना को भी स्वयंप्रकाश अपनी कहानियों में नवीन अर्थवत्ता प्रदान करते हुए नजर आते हैं।
स्वयंप्रकाश ने अपनी कहानियों में मध्यवर्गीय युवाओं की तर्कहीनता और उसकी चारित्रिक कमजोरी को चित्रित करने का भरसक प्रयास किया है। कहना न होगा कि वे अपने इस प्रयास में सफल भी हुए हैं। लेखक ने जहाँ भारतीय मध्यवर्गीय युवाओं के यथास्थितिवादी रवैये, अवसरवादिता और रूढिवादी चरित्र का चित्रण किया है, वहीं उन्होंने अपनी कहानियों में मध्यवर्गीय युवाओं के अंतर्द्वन्द्व को भी चित्रित किया है। गंगाप्रसाद विमल मध्यवर्ग को लेकर लिखते हैं - ’’वह सभ्यता का झूठा लबादा उतारकर फेंक देना चाहता है पर उसे ओढे रहने की निरर्थक गरिमा को त्यागने का साहस उसमें नहीं है और यह आवरण उसे आर्थिक संकट की चक्की में पीसे डाल रहा है। नैतिकता, आस्था, आदर्श जैसे खोखले शब्दों के मायाजाल में उसके लिए यह पहचानना भी मुश्किल हो गया है कि वह जिस डाल पर बैठा है, उसी को काट रहा है।‘‘४ स्वयंप्रकाश ने अपनी कहानियों में परम्परा और आधुनिकता के इस टकराव को भी चित्रित किया है, जो मध्यवर्ग की बहुत बडी कमजोरी है। लेखक ने आज के बाजारवादी युग में मध्यवर्गीय युवाओं पर हावी उपयोगितावादी दृष्टि की भी खबर ली है। यहाँ पर उनकी कहानियों के माध्यम से मध्यवर्गीय युवाओं के चरित्र और उनकी समस्याओं को देखना महत्त्वपर्ण होगा।
स्वयंप्रकाश की कहानी ’नीलकांत का सफर‘ मध्यवर्गीय युवाओं की मानसिकता को चित्रित करती है। गौरतलब है कि लेखक की इस कहानी को हम मध्यवर्गीय युवाओं की प्रतिनिधि कहानी भी मान सकते हैं। इस कहानी में ट्रेन में सफर करता हुआ नीलकांत एक ऐसा मध्यवर्गीय युवा चरित्र है जिसमें हम स्वयं को पा सकते हैं। उसका यह सफर सही मायने में हमारा ही सफर है। वस्तुतः यह कहानी एक रेल यात्रा के रूप में पाठकों के सामने आती है किन्तु जैसे-जैसे यह यात्रा आगे बढती जाती है, वह अपने आप में देश और समाज की पोल खोलने लगती है। नीलकांत, जो कि इस कहानी का प्रमुख पात्र है, उसकी बहुत सारी शिकायतें हैं - समाज से, देश से, व्यवस्था से किन्तु उसकी ये शिकायतें, ये विरोध उसकी अपनी सुविधाओं में पर्यवसित हो जाती हैं। इस कहानी में नीलकांत के रूप में लेखक ने मध्यवर्गीय मनोविज्ञान और विवशताओं को बहुत ही बारीकी से चित्रित किया है। कहना न होगा कि नीलकांत भारतीय समाज के उस मध्यवर्गीय युवा का प्रतीक है, जो वैश्वीकरण, बाजारवाद, राष्ट्रवाद आदि पर भले लम्बी-चौडी बहसबाजी कर ले लेकिन हकीकत यह है कि वह उसका मुद्दा है नहीं और है भी तो वह उसके प्रति उदासीन है। क्योंकि वास्तविकता तो यह है कि उसकी जन्दगी खुद द्वंद्व से भरी हुई है, जिसके लिए वह स्वयं भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। यथास्थितिवाद का शिकार यह वर्ग तभी तक विद्रोह और विरोध का हिमायती है जब तक उसे सुविधा न प्राप्त हो जाए। उसके बाद उसे किसी से कोई मतलब नहीं। यही स्थिति नीलकांत की भी है, जिसे कहानी वाचक की इन पंक्तियों में देख सकते हैं - ’’नीलकांत इन तकलीफों के बारे में तभी तक सोचेंगे, जब तक उन्हें बैठने के लिए ठीक-ठाक जगह नहीं मिल जाती या हद-से-हद जब तक यह सफर जारी है। गाडी से उतर जाने पर वह गाडी के बारे में सब भूल जाएँगे और फिर यह सोचने लगेंगे, जो सेठ लोग सोचवाना चाहते हैं। पर क्या पता? अगर कल कोई दूसरी तकलीफ आई - आएगी ही - और वे सोचने लगे कि उसका असली जिम्मेदार कौन है - तो....‘‘५ इतना ही नहीं नीलकांत ट्रेन के इस जनरल डिब्बे में बैठे हुए खुद को असहज भी पाता है क्योंकि यह डिब्बा निम्नवर्गीय लोगों से भरा हुआ है, जो तथाकथित मध्यवर्ग के लिए असभ्य होते हैं। मध्यवर्गीय नीलकांत जैसे चरित्र को लेकर ही नागार्जुन एक कविता लिखते हैं, ’घिन तो नहीं आती है?‘ कविता की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं -
’’कुली-मजदूर हैं
बोझा ढोते हैं, खींचते हैं ठेला
धूमल-धुआँ-भाप से पडता है साबका
थके-माँदे जहाँ-तहाँ हो जाते हैं ढेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धडकन
आकर ट्राम के अंदर पिछले डिब्बे में
बैठ गए हैं इधर-उधर तुमसे सटकर
आपस में उनकी बतकही
सच-सच बतलाओ,
नागवार तो नहीं लगती है?
जी तो नहीं कुढता है*?
घिन तो नहीं आती है?‘‘६
नागार्जुन की यह कविता न केवल मध्यवर्गीय चरित्र को व्याख्यायित करती है अपितु ’नीलकांत का सफर‘ कहानी के नीलकांत के चरित्र पर भी सटीक बैठती है। गौरतलब है कि नीलकांत, जो कि रेल की कुव्यवस्था से चिढा हुआ है, वह मध्यवर्गीय अंतर्द्वन्द्व का भी शिकार है। वह सोचता बहुत है लेकिन करने को कुछ नहीं कर पाता। द्वंद्व में फँसा रहता है। वह रेल के थर्ड क्लास डिब्बे में है जो खचाखच भरा हुआ है। यहाँ तक कि उसके गुसलखाने में भी मनुष्य कही जाने वाली प्रजाति भेड-बकरियों की तरह ठुँसी हुई है। ऐसे में डिब्बे की खिडकियाँ जो जाम होने के कारण बंद हैं, माहौल में और भी गर्माहट और बेचैनी पैदा करने वाली हैं। नीलकांत उसे खोलने के लिए महज काल्पनिक हाथ-पाँव मारता है, लेकिन उसे खोल नहीं पाता जो कि मध्यवर्गीय विडम्बना है। जबकि वहीं दूसरी तरफ एक मजदूर वर्ग है जो ठसाठस डिब्बे में घुसकर अपने लिए जगह तो बनाता ही है, साथ ही साथ गैंती से खिडकी को खोलकर डिब्बे के अन्दर की घुटन को भी दूर करता है। यहाँ लेखक ने मध्यवर्गीय सफेदपोशों की चारित्रिक पोल खोल कर रख दी है। इसी चारित्रिक विसंगतियों को लक्ष्य करते हुए असगर वजाहत ठीक ही लिखते हैं - ’’आज का मध्यवर्ग बीस साल पहले के मध्यवर्ग से नितांत भिन्न है। उसकी चुनौतियाँ भिन्न हैं, उसका स्वरूप भिन्न है, उसकी आकांक्षाएँ भिन्न हैं। आज के इस दौर में मध्यवर्ग का एक वो सपना-सामूहिकता को लेकर जो सपना था, देश के बारे में सपना था, समाज को लेकर सपना था, निश्चित रूप से अब वो नहीं है। आज के परिवार में, आज के मध्यवर्ग में व्यक्ति केन्द्रित चिंतन, सोच की प्रधानता बहुत ज्यादा दिखाई देती है।‘‘७
आज के साहित्यिक परिवेश को देखकर ऐसा लगता है कि आमजन कहानियों से गायब होता जा रहा है। आज मध्यवर्गीय लेखक भी डिक्लास नहीं होना चाहते, जिसके पैरोकार मुक्तिबोध हमेशा से रहे हैं। ऐसे में स्वयंप्रकाश किस्सागोई की सरलता और सहजता के बीच मौजूदा हालातों को चित्रित करने से नहीं चूकते। उन्होंने अपनी कहानियों में भारतीय जनजीवन का यथार्थ चित्रण किया है। स्वयंप्रकाश की कहानी ’संहारकर्ता‘ मध्यवर्गीय युवा सत्यकांत की कहानी है, जो कहानी की शुरुआत में मजदूर यूनियन और व्यवस्था के खलाफ आलोचनात्मक रवैया रखता है, लेकिन धीरे-धीरे खुद व्यवस्था का शिकार हो जाता है। कहानीकार ने सत्यकांत के अंतर्द्वन्द्व को बहुत अच्छे से चित्रित किया है। ध्यातव्य है कि ’संहारकर्ता‘ कहानी को पढते हुए ऐसा लगता है कि यह कहानी मजदूर यूनियन की कार्यप्रणाली को लेकर लिखी गयी है किन्तु यह कहानी अपने कलेवर में उससे कहीं आगे की बात करती है। सत्यकांत इस कहानी का नायक है, जिसके इर्द-गिर्द कहानी चलती है। वह जिस दफ्तर में कार्यरत है, मिश्राजी वहाँ यूनियन के सेक्रेटरी हैं। मिश्राजी सत्यकांत को यूनियन का नया सेक्रेटरी बनाना चाहते हैं किन्तु सत्यकांत की उसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं है और वह स्वयं को इसके काबिल नहीं मानता। वह यूनियन के दोगले रवैये को देखकर कहता है*- ’’मिश्राजी, आप कहो जो कर दूँ मैं आफ लिए, लेकिन यह काम करने को आप मत कहो। क्योंकि बुनियादी बात यह है कि मैं यूनियन का मेम्बर जरूर हूँ और सबको होना चाहिए, पर पर्सनली ऐसी मिडिल क्लास और खालेड यूनियन में मेरी आस्था एकदम नहीं है।‘‘८
गौरतलब है कि सत्यकांत एक बुद्धिजीवी मध्यवर्गीय चरित्र है, जिसमें नेतृत्व की तमाम सम्भावनाएँ मौजूद हैं। वह निस्संदेह उस व्यवस्था से लड सकता है, जो मानव विरोधी है। इस संदर्भ में उसके प्रश्न वाजिब हैं, जो वह मिश्राजी से करता है - ’’ओवरटाइम क्यों दिया जाता है? ओवरटाइम की फिलॉसफी क्या है? ओवरटाइम वेकेंट पोस्ट के अगेंस्ट में ही दिया जाता है न? काम ज्यादा है और आदमी कम हैं। काम दस आदमियों का है - उनके हिसाब से - और आदमी हैं सात। इसीलिए ओटी दिया जाता है न?‘‘९ सत्यकांत के लिए ओवरटाइम करना किसी भूखे के हिस्से की रोटी खाने जैसा ही है। किन्तु जैसे-जैसे सत्यकांत यूनियन सेक्रेटरी से सचिव पद तक बढता जाता है, उसकी भी परिणति वैसी ही होती चली जाती है, जो आमजन में मुहावरे की तरह लोकप्रिय है। उसका आत्मविश्वास कम होता चला जाता है। स्वयंप्रकाश लिखते हैं - ’’जैसे-जैसे सत्यकांत इस सबके बारे में लम्बे समय से उलझे मामलों, अधिकारी-कर्मचारी और यूनियन के परस्पर सम्बन्धों आदि के बारे में परिचय पाता गया, वैसे-वैसे उसका आत्मविश्वास कम होता गया और जैसे-जैसे उसका आत्मविश्वास कम होता गया, वैसे-वैसे यूनियन में उसकी इज्जत बढती गई। लोग उसे माटसाब और गुरुजी कहने लगे। यह सुनना उसे खूब अच्छा लगता और जितना अच्छा लगता, उतना ही वह आशंकित होता गया कि वह फिसल रहा है... पर्सनाल्टी कल्ट में। आत्ममुग्धता में। व्यक्तिवाद में। मध्यवर्गीय आदर्शवाद में।‘‘१० यहाँ पर स्वयंप्रकाश सत्यकांत के भीतर की पुकार को आवाज देते हुए नजर आते हैं। उसका अंतर्द्वन्द्व वस्तुतः मध्यवर्गीय युवा का अंतर्द्वन्द्व है, जिसका शिकार वह भी होता है। इसी उधेडबुन में वह बहुत सारे सवाल करता है। सवाल, जो खुद से हैं और पाठक से भी - ’’सत्यकांत ने माथा कूट लिया। सर पीट लिया। क्या यही...क्या यही वह पाना-करना चाहता था? क्या उसने ओटी, अंतरिम राहत, प्रमोशन, पे-कमीशन, पिटीशन रिप्रेजेंटेशन और आर्बिट्रेशन की नकली और वाहियात माँगों की दलदल में लौट रहे इन मध्यवर्गियों की सोच को जरा भी हिलाया? क्या वह भी वैसा ही नहीं हो गया, जैसा कि वह नहीं है? क्या वह खुद को चुपचाप शास्त्रीजी बन जाने देगा? एक स्वतंत्र व्यक्ति की विचार-चेतना का इससे बडा अपमान और क्या हो सकता है? क्या वह अभी, इसी वक्त इस्तीफा दे दे? लेकिन फिर? क्या यह किला अभेद्य है? या दुर्भेद्य? इसे कहाँ से और कैसे तोडा जाए?‘‘११ निश्चित तौर पर यह अंतर्द्वन्द्व सिर्फ सत्यकांत का नहीं है, अपितु हमारा भी है। हम भी ऐसी परिस्थितियों से गुजरते हैं और तमाम मानवीय सरोकारों को भूल जाते हैं। एक प्रबुद्ध मन भीतर के नेपथ्य से बार-बार हम पर झल्लाता भी है किन्तु उसकी आवाज भीतर के शून्य में गूँज कर रह जाती है। ऐसी स्थिति में सत्यकांत प्रश्न कर रहा है, यह महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह आत्मविवेचन अपने आप में संभाव्य चेतना लिए हुए है। वह व्यवस्था को समझने लगा है - ’’सत्यकांत को समझ में आया कि चुनौती बहुत बडी है। उसके अंदाज से हजार गुना ज्यादा बडी। शास्त्री जी एक सांचा है, जो अपने इर्द-गिर्द सैकडों छोटे-छोटे शास्त्री ढाल देते हैं। शास्त्री जी एक मानसिकता है, जिसकी जडें मध्यवर्गीय आदर्शवाद में से फूटती हैं और तमाम परिवर्तनकारी सोच को ढँक लेती हैं। हर पीढी एक कत्ले की तरह फूटती है और हर बार मौका ताडकर यह फफूंद उसे शास्त्री जी बना डालती है। लेकिन समस्या सांस्कृतिक है या सामाजिक या आर्थिक या राजनीतिक?‘‘१२ स्वयंप्रकाश ने यहाँ पर पूँजीवादी व्यवस्था की भी पोल खोली है। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें फँसकर सत्यकांत जैसे लोगों का वही हाल होता है, जो चक्रव्यूह में फँसकर अभिमन्यु का हुआ था। ऐसे में प्रश्न उठता है कि ऐसे हालातों में कोई क्या करे? सत्यकांत की हार उसकी स्वीकारोक्ति, उसके प्रश्न, उसका अंतर्द्वन्द्व, उसकी चारित्रिक परिणति जहाँ मन को कचोटती है वहीं सोचने पर मजबूर भी करती है। प्रश्न उठता है कि ऐसे में किसी भी प्रकार की सामाजिक क्रांति क्या सम्भव है? अगर सम्भव भी है तो उसका प्रतिनिधित्व कौन करेगा? सायरा बानो लिखती हैं - ’’कहानीकार ने पूँजीवादी सिस्टम का संहार करने के लिए यूनियन के भीतर बस गये यथास्थितिवादी सिस्टम का संहार करने की जरूरत की ओर ध्यान खींचा है। सत्यकांत में ऐसा संहारकर्ता बनने की संभावना थी, लेकिन वह भी ऐसा नहीं बन सका, सचिव या संयुक्त सचिव बनकर रह गया। इन कारणों से सत्यकांत का चरित्र महत्त्वपूर्ण बन पडा है।‘‘१३ निश्चित तौर पर सत्यकांत की यह परिणति खलती है। एक युवा, जिसमें तमाम सम्भावनाएँ थी, व्यवस्था के चरित्र को बदलने की, वह भी अन्ततः आसान रास्ता अख्तियार करता है और व्यवस्था का ही हिस्सा बन कर रह जाता है।
’गौरी का गुस्सा‘ शीर्षक कहानी में लेखक ने जहाँ मध्यवर्गीय युवा की अंतहीन लालसा को स्वर दिया है, वहीं उन्होंने पूँजीवादी छलनाओं की निस्सारता को भी व्यक्त किया है। कहानी में यह स्पष्ट रूप से व्यक्त है कि भौतिक संसाधन हमें वास्तविक सुख नहीं दे सकते। लेखक ने रूपक के तौर पर लोककथा शैली में इस कहानी को गढा है लेकिन भाषा के स्तर पर इसमें जो शहराती छौंक लगायी है, उससे रतनलाल अशांत की अति महत्त्वाकांक्षाओं और उससे उत्पन्न विसंगत स्थितियों का यथार्थ चित्रण हुआ है। बेरोजगारी की मार झेल रहे रतनलाल अशांत की दुर्दशा देखकर गौरी का दिल पसीज जाता है। वे महादेव से कहकर रतनलाल को बहुत-सी सुख-सुविधाएँ उपलब्ध करवाती हैं, लेकिन रतनलाल संतुष्ट नहीं होता, उसकी महत्त्वाकांक्षाएँ बढती रहती हैं। शंभुनाथ लिखते हैं - ’’...इन दिनों जब उपभोक्तावाद को बेइंतहा पनपने का मौका मिला है, हजारों साल की भारतीय निराशाओं और कुंठाओं के विस्फोट से एक अनोखे किस्म का भोगवाद निकला है। आदमी के कर्तृत्व पर उसका भोक्तृत्व प्रबल हो उठा। वह एक निष्क्रिय आस्वादकर्ता बन गया है। स्वयंप्रकाश ने ’गौरी का गुस्सा‘ में यथार्थ और फैंटेसी की मिलावट से उपभोक्तावादी आत्मछल का सुंदर चित्र खींचा है।‘‘१४ एक अंतहीन दौड में शामिल मध्यवर्गीय चरित्रों की यह नियति ही है। सब कुछ पाकर भी वह संतुष्ट नहीं रह पाता। ज्य-ज्यों वह समृद्ध होता जाता है, अन्दर से वह खाली होता जाता है। उसके लिए स्वयं की चिंता ही केन्द्र में होती है, अन्य सारी चीजें परिधि का हिस्सा बन जाती हैं। रतनलाल के साथ भी यही समस्या है। वह अपनी उलझनों को खुद बुनता है और खुद उसमें फँसता है। उसकी भौतिक लिप्सा देखने लायक है - ’’पार्वती ने पूछा, ’’जो तुमने माँगा, वही मिला न?‘‘... चूँकि यह बात सच थी, इसलिए रतनलाल और चिढ गया। चिढकर बोला, ’’तुम मेरे को इत्ता अच्छा घर दिए, अच्छा मोहल्ला दिए, अच्छा शहर दिए, अच्छा देश भी दिए, तो अच्छी दुनिया देने में मौत आती थी क्या? हर चीज बोलनी पडेगी क्या?‘‘१५ यहाँ उपभोक्तावादी चकाचौंध पर भारतीय मध्यवर्ग की दीवानगी को परत-दर-परत खोलने में कथाकार सफल रहा है।
आज बाजार ने जहाँ रिश्तों की आपसी नरमी को सोख लिया है, वहीं मध्यवर्गीय परिवार ही नहीं अपितु उच्चवर्गीय परिवार में भी दो पीढयों के द्वंद्व को आसानी से लक्ष्य किया जा सकता है। कहना न होगा कि यह आपसी द्वंद्व मध्यवर्ग के यहाँ बहुत ज्यादा है, क्योंकि मध्यवर्ग के यहाँ परम्परा और आधुनिकता का टकराव ज्यादा है। पुरानी पीढी अपनी क्षमता अनुसार एक स्टेज ऊपर तो उठ चुकी है, किन्तु पुरातन केंचुली उतार नहीं पाती। संस्कार रूप में वह जेह्व में बसी होती है, वहीं नयी पीढी, जिस पर बाजार ज्यादा हावी है, वह परम्परा, नैतिकता आदि को भी उपयोगितावादी दृष्टि से देखने का हिमायती है। स्वयंप्रकाश की कहानी ’नन्हा कासिद‘ इस मध्यवर्गीय द्वन्द्व को लेकर महत्त्वपूर्ण है। इस कहानी में प्रभात और मुन्ना के बीच एक पीढी का अंतराल है। मुन्ना आज के मध्यवर्गीय युवा का प्रतिनिधित्व करता है, जो तमाम जुगाड जानता है। भौतिक संसाधनों को ज्यादा से ज्यादा इकट्ठा करना ही उसकी नजर में सफलता है। मुन्ना से बातचीत के दौरान कई बार प्रभात भी प्रभावित होता है। वह भी सोचने पर मजबूर हो जाता है कि - ’’नैतिकता अकर्मण्य लोगों की इजाद की हुई आड है।‘‘१६ लेकिन अच्छी बात यह है कि अन्ततः प्रभात खुद को सम्भालता है और बाजार के प्रभाव से खुद को बचा ले जाता है। स्वयंप्रकाश प्रभात की मनःस्थिति का वर्णन करते हुए लिखते हैं - ’’प्रभात का विचार है कि वे जैसे हैं, ठीक हैं। आखिर हमने कौन से तीर मार लिए? खादी का कुर्ता-पाजामा लटकाए घूमते थे और चार कविताएँ छपवाकर सोचते थे कि हम समाज को बदल रहे हैं। बल्कि हमें भी इन लोगों जैसे बेलबॉटम सिलवा लेने चाहिए। लेकिन हमारा समाज? क्या इसके उद्धार के लिए बाहर से आदमी इम्पोर्ट किये जायेंगे? समाज? प्रभात सोचता है, यह कभी नहीं बदलेगा। बल्कि प्रभात तो सोचता है कि, मारो लात साले को। क्या प्रभात हार गया है? नहीं, प्रभात समय के साथ चलने में यकीन रखता है।‘‘१७ सोचने वाली बात यह है कि आज की पीढी के लिए समाज के बारे में सोचना महत्त्वपूर्ण नहीं रह गया है। उपयोगितावादी दृष्टि उस पर इस कदर हावी है कि सम्बन्धों को भी वह मुनाफे की दृष्टि से देखता है। वहीं ’दस साल बाद‘ कहानी के माध्यम से स्वयंप्रकाश ने दो मध्यवर्गीय युवाओं के आपसी टकराव को दिखाने की कोशिश की है, जो वर्तमान माहौल में ही जी रहा है, लेकिन किसी चुम्बक के दो ध्रुवों की भाँति हैं। एक तरफ कहानी का ’मैं‘ है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आदर्श से समझौता नहीं करता, तो दूसरी तरफ ’संजू‘ है, जो स्वयं को भ्रष्ट व्यवस्था का अंग बना लेता है।
आज जिस व्यवस्था के इर्द-गिर्द हम जी रहे हैं, वहाँ पर हमारा राजनीतिक रूप से चेतना सम्पन्न होना महत्त्वपूर्ण ही नहीं अति-आवश्यक हो जाता है। भारतीय परिदृश्य में जिस तरह की राजनीति विद्यमान है या हो रही है, उससे मोहभंग हो जाना स्वाभाविक है। कहने को लोग यह कहते हुए भी नजर आते हैं कि राजनीति अति-महत्त्वाकांक्षी लोगों की चीज है। लेकिन यह कह-सोचकर उससे मुँह फेर लेना कितना मुनासिब होगा? यह सवाल भारतीय मध्यवर्ग से पूछना इसलिए भी लाजमी है कि आबादी का एक बहुत बडा हिस्सा मध्यवर्ग के अंतर्गत आता है। यही वह वर्ग है जो राजनीति की दशा-दिशा तय करने में सक्षम है। लेकिन आज की स्थिति यह है कि मध्यवर्गीय युवा इससे मुँह फेर रहे हैं। मध्यवर्गीय युवा वर्गान्वित होकर निम्नवर्ग के हक-अधिकार को लेकर लडने को तैयार नहीं है। वह सुविधाभोगी हो गया है। उसका एकमात्र ध्येय रह गया है कि जल्द से जल्द उच्च वर्ग में शामिल हो जाए। तमाम भौतिक सुख-सुविधाओं से लैस हो जाए। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो राजनीति को फैशन के तौर पर लेते हैं। वे डींगें तो बहुत हाँकते हैं मगर जमीनी स्तर पर जब कार्य करने की बात होती है तब उनके पसीने छूटने लगते हैं। ऐसे ही एक युवा की कहानी है ’बस‘। इस कहानी का प्रमुख पात्र कॉमरेड बुद्धिप्रिय के लिए राजनीति शौक की चीज है। इस कहानी को पढकर ऐसा मालूम होता है मानो यह उस दौर में लिखी गई जब स्वयंप्रकाश का खुद माक्र्सवाद से मोहभंग होने लगा हो, लेकिन यह कहना ज्यादा उचित होगा कि यह मोहभंग शौकिया राजनीति करने वाले उस युवा वर्ग से है, जिसका प्रतिनिधित्व बुद्धिप्रिय कर रहा है। बुद्धिप्रिय जैसे तथाकथित शौकिया राजनीति में आने वाले के लिए वे लिखते हैं, ’’उन्होंने माक्र्स, लेनिन आदि सज्जनों की पुस्तकें नहीं पढीं, पर साथ में रखते जरूर थे। उन्हें कॉमरेड कहना-कहलवाना अच्छा लगता था। वह भारत के लिए एक मौलिक समाजवाद की खोज में थे और एक नई देशभक्त क्रांतिकारी पार्टी बनाना चाहते थे। पार्टी का नाम, झंडा, संविधान तक उन्होंने तैयार कर लिया था। पर शहर में कोई ’फॉलोवर‘ नहीं मिलने से वह निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि भारत की अस्सी प्रतिशत जनता गाँव में रहती है। इसलिए अब गाँव जा रहे थे। उस बेचारे को अपना कार्यक्षेत्र बनाने।‘‘१८ गौरतलब है कि बुद्धिप्रिय गाँव इसलिए नहीं जा रहा है कि वह समाज के हाशिए पर जी रहे लोगों में आधुनिक चेतना का संचार करेगा बल्कि वह इसलिए जा रहा है कि गाँव में उसे आसानी से अनुकरण करने वाले मिल जाएँगे। लेकिन बस में शहर से गाँव तक की यह यात्रा हास्यास्पद स्थिति पैदा करती है। कहानी के बीच-बीच में कहानीकार की व्यंग्यात्मक टिप्पणी जहाँ हँसाती है वहीं दूसरी ओर सोचने पर विवश भी करती है। यात्रा में बुद्धिप्रिय का सुविधाभोगी चरित्र सामने आ जाता है। अंत तक जाते-जाते कहानी समाजवाद की पोल खोलकर रख देती है। कहानीकार कहता है - ’’शाम छह बजे खातेगाँव के बस स्टॉप पर कॉमरेड बुद्धिप्रिय गुप्त उतरे। उतरते ही उन्होंने चाय की गुमटीवाले से जो सवाल पूछे, बताकर कहानी खत्म करता हूँ। पहला सवाल - कुछ ऐस्प्रो-वेस्प्रो है? दूसरा सवाल - वापसी की बस कब मिलेगी?‘‘१९ कहना न होगा कि बुद्धिप्रिय की यह वापसी समझौतापरस्ती की वही निशानी है जिसको लेकर मुक्तिबोध ने ’अँधेरे में‘ कविता के माध्यम से मध्यवर्गीय चेतना पर सवाल उठाए हैं।
भारतीय परिदृश्य पर दृष्टिपात करें तो हम देखते हैं कि छोटे-बडे आंदोलन होते रहे हैं। कभी सत्ता की ताकत उसे दबा देती है तो कभी आंदोलनों का हश्र बहुत बुरा होता है, क्योंकि शुरुआती उत्साह में लोग उससे जुडते हैं तो धीरे-धीरे अपना हाथ उससे खींच लेते हैं। वापस वे लोग अपनी-अपनी जिंदगी में यथावत् लौट आते हैं। कुछ अवसरवादी लोग इसलिए प्रतिनिधित्व करने लगते हैं कि इससे उन्हें लोकप्रियता चाहिए होती है, मगर ऐसी संभावना न देख वे भी वापस किसी और जुगत में लग जाते हैं। स्वयंप्रकाश की ऐसी ही एक कहानी है ’एक छोटी-सी लडाई‘, जिसका जक्र करना यहाँ आवश्यक हो जाता है। यह कहानी शिक्षक आंदोलन से जुडी है। दत्त इस कहानी का मुख्य पात्र है जो इस आंदोलन का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन ज्यों-ज्यों वह इस आंदोलन को नजदीक से देखता जाता है, उसका मोहभंग होने लगता है। स्वयंप्रकाश, दत्त की मनःस्थिति का वर्णन करते हुए लिखते हैं, ’’दत्त का दिल डूबने लगा। शिक्षक कोई रिवोल्यूशनरी क्लास नहीं माना, पर प्रदेशभर के शिक्षकों की सम्मिलित आवाज भी इतनी बेदम और बूदम साबित होगी, यह उसने नहीं सोचा था। उसे निराश कर रहे थे वे लोग, जो हडताल और आंदोलन के नाम पर सबसे ज्यादा जोश में आसमान में घूँसे उछालते थे... वे अपने-अपने घरों में बदन तोड रहे थे या उन्होंने ट्यूशनें चालू कर दी थीं या वे दार्शनिक हो गए थे। कुछ तो ऐसे संत भी पाए गए, जो इधर मीटिंग चल रही है, उधर चाय की दुकान पर बैठे गप्पा रहे हैं। दत्त को लगता कि उसने इन लोगों से आशा रखकर कितनी भूल की! क्या ये निर्लिप्त और निकम्मे लोग अपनी उदासीनता में आकंठ डूबे और मदहोश गैरबवास्ता लोग...इन्हीं के बल पर, और इन्हीं के लिए, वह और उसके जैसे लोग लड रहे हैं?‘‘२० ध्यातव्य है कि आज भी मध्यवर्गीय उदासीनता के कारण बहुत सारे आंदोलन सफल नहीं हो पाते हैं। एक तरफ जहाँ सत्ता का गठजोड इस तरह के आंदोलनों को दबाने का हरसम्भव प्रयास करता है, वहाँ पर लोगों की उदासीनता और विमुखता सत्ता पक्ष के लिए काम और भी आसान कर देती है।
’तलबी‘ कहानी में कहानीकार ने एक कस्बा में नए-नए स्थानान्तरित होकर आए एक शिक्षक और उसके कुछ छात्रों के मुकाबले एक संस्कृत शिक्षक और उसके प्रतिनिधित्व में संघीय कार्यक्रम के द्वारा वाम और संघ के बीच की मुठभेड को दिखाने का प्रयास किया है। यह कहानी इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि तमाम आधुनिकताओं के बावजूद आज भी हमारे समाज में यह समस्या बनी हुई है कि लोग अंध-श्रद्धा के शिकार हो जाते हैं, जिससे उनका धर्म का धंधा चलता रहता है। रामधन जी, जो कि संस्कृत के शिक्षक हैं, हर रविवार प्रवचन सुनाते थे, जिसे वहाँ के लोग बोलचाल की भाषा घ्घ्घ् ’तलबी‘ कहते थे। कहानी का ’मैं‘ जो रामधन का ही सहकर्मी है, रामधन से तार्किक सवाल करने लगता है और हर बार रामधन जी झेंप जाते हैं या कुतर्क करने लगते हैं। स्थिति ऐसी बन जाती है कि रामधन के अंधभक्त कहानी के ’मैं‘ को धमकाने तक लगते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद वह अडिग रहता है और ’तलबी‘ बंद करने में जुट जाता है। लोगों को समझाने लगता है। वह कुछ हद तक इसमें सफल भी हो जाता है, लेकिन उसका तबादला हो जाता है। कुछ समय बाद रामधन का भी तबादला हो जाता है। लेकिन कहानी के ’मैं‘ की चिंता वाजिब ही है जो कहानी के अंत में जाहिर होती है - ’’मित्र लोग अपनी इस विजय पर खुश हैं। दुःखी तो मैं भी नहीं हूँ। लेकिन सोच यह रहा हूँ कि रामधन जी जहाँ जाएँगे तलबी चला लेंगे। इसलिए खुश मैं तब होऊँगा, जिस दिन बोलने वाले तो तलबी पहुँच जाएँगे, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं होगा।‘‘२१ यह चिंता स्वाभाविक ही है, क्योंकि तमाम तार्किकता, आधुनिकता आदि के बावजूद लोग अपनी बौद्धिकता, विवेक को नकारते हुए ऐसे प्रवचन में शरीक होते हैं, इतना भर नहीं है। यही लोग आगे चलकर भगवान का दर्जा प्राप्त कर लेते हैं और अपने तथाकथित भक्तों से कुछ भी करवा लेते हैं।
स्वयंप्रकाश की ’सूट‘ शीर्षक कहानी मध्यवर्गीय युवा मानसिकता की पडताल करती है। यह कहानी एक ऐसे युवा की है, जो पढते-लिखते परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए किसी तरह मास्टर बन जाता है। वह अपने शुरुआती दौर में उच्च-मध्यवर्गीय तथाकथित सूट पहनने वालों से चिढता है। वह मास्टर बन जाने के बाद भी निम्नवर्गीय लोगों के साथ उठता-बैठता है, जिससे उसके सहकर्मी चिढते हैं और उससे ठीक से बात नहीं करते। वह व्यवस्था से लडने की ठानता है, लेकिन उसका तबादला करवा दिया जाता है। पुनः वह एक साल बाद अपने शहर की उसी स्कूल में पैसे देकर तबादला करवा लेता है, लेकिन इस बार जब वह लौटता है तो मध्यवर्गीय मानसिकता के साथ। उसका चरित्र पूरी तरह से बदला हुआ होता है। इस कहानी में लेखक ने वर्ग-चरित्र के बदलाव को भी लक्ष्य किया है। कहानी का नायक भी सूट सिलवा लेता है और उसे लगता भी है कि वह सचमुच बडा आदमी हो गया है। लेकिन धीरे-धीरे वह मध्यवर्गीय अंतर्द्वन्द्व का शिकार हो जाता है। लेकिन इन सबके बावजूद उसकी वर्गीय आस्था उसे मध्यवर्गीय अंतर्द्वन्द्व से बाहर निकाल ले जाती है। वह कहता है - ’’हर सुंदर चीज तब तक असुंदर है, कुरूप है जब तक उसकी जड में दूसरों का शोषण है।‘‘२२ गौरतलब है कि यहाँ उसकी वापसी होती है एक ऐसी विचारधारा के साथ जहाँ से वह समाज के स्वस्थ विकास में अपना योगदान दे सकता है।
इसी कडी में हम स्वयंप्रकाश की कहानी ’चोर की माँ‘ को भी देख सकते हैं। यह कहानी है फर्स्ट ईयर की पढाई छोडकर एक छोटे से कस्बे में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी करने आए एक नवयुवक पप्पू की। उसे वहीं टेलीफोन एक्सचेंज में काम कर रहे एक अनुभवी व्यक्ति का सहारा मिलता है जो उसे एक्सचेंज में व्याप्त भ्रष्टाचार के बारे में बताता है और सही रास्ते पर चलने की हिदायत भी देता रहता है। वह कहता है, ’’मैंने अपने-आपसे पूछा कि पत्ते क्यों तोड रहा हूँ? और इस तरह कहाँ पहुँचा जा सकता है? जड कहाँ है? वहीं क्यों न वार किया जाए? चोर की माँ को ही क्यों न मारा जाए? और इसलिए मैं संगठन और यूनियन के लम्बे रास्ते पर निकल पडा, जिसका वैसे देखो तो ईमानदारी-बेईमानी से कोई सम्बन्ध नजर नहीं आएगा, पर गहराई से सोचो तो है, और बहुत है।... लेकिन यह करने के लिए भी पहली शर्त खुद ईमानदार होना होती है। तुम्हें बेईमानी करनी है, करो। जरूर करो। लेकिन एक बात याद रखो। फिर तुम बेईमानी और भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का अपना नैसर्गिक अधिकार हमेशा-हमेशा के लिए खो दोगे। दस रुपए के एक नोट पर बेच दोगे, किसी भी तरह की बेईमानी और धांधली के खिलाफ आवाज उठाने का अपना अधिकार और फिर जब भी, जहाँ भी किसी चोर को कोई गाली दी जाएगी... वह गाली थोडी-थोडी तुम्हारे लिए भी होगी। यह है इसकी कीमत। सोच लो।‘‘२३ लेकिन पप्पू की महत्त्वाकांक्षाएँ बढती जाती हैं और वह मध्यवर्गीय चारित्रिक कमजोरी का शिकार हो जाता है और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार का सहयोगी बन जाता है। स्वयंप्रकाश यहाँ पप्पू के बहाने मध्यवर्गीय नवयुवक की त्रासदी लिखते हैं। कहना न होगा कि जब यही युवा वर्ग सर्वग्राही व्यवस्था के चंगुल से खुद को नहीं बचा पा रहा है तो आने वाली पीढयों का क्या होगा? क्या होगा उस समाज का जो आज भी जाति, धर्म, लिंग आदि में फँसा हुआ है
स्वयंप्रकाश की कहानी ’एक यूँ ही मौत‘ इस दृष्टि से सचमुच व्यथित करने वाली कहानी है। इस कहानी का प्रमुख पात्र ’वह‘ नागरिक शास्त्र का अध्यापक है। वह विज्ञान का समर्थक है। हर चीज को तार्किकता के साथ समझने की कोशिश करता है। वह एक प्रखर आलोचक है - सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक व्यवस्था का। वह इन तमाम व्यवस्थाओं में विद्यमान विसंगतियों से वाकिफ है लेकिन उसका विरोध नहीं करता। वह न व्यवस्था का अंग बनता है और न ही व्यवस्था को बदलने की कोई कोशिश ही करता है। उसके अन्दर न विरोध है और न ही बदलाव की आकांक्षा। एक दिन वह मर जाता है और उसके साथ एक संभाव्य चेतना भी मर जाती है। लेखक उसकी मौत पर लिखता है - ’’कुछ दिन बाद वह मर गया। एक नाराज आदमी की चुपचाप मौत। न किसी से तीमारदारी करवाई न किसी से अफसोस। लेकिन यह जीवन असफल चाहे न रहा हो, निरर्थक जरूर बीत गया। क्योंकि इस बेहूदा दुनिया की बेहूदगी समझने के बावजूद उसने इसके खिलाफ न तो आवाज उठाई, न उन लोगों को ढूँढने की कोशिश की, जो उसी की तरह ’जानते‘ थे। क्योंकि तब ये सब मिलकर शायद-शायद इस दुनिया को कुछ कम बेहूदा बनाने की तरकीब कर सकते थे।‘‘२४ कहानीकार यहाँ जीवन के प्रति आस्था को महत्त्वपूर्ण मानते हुए मध्यवर्गीय पलायनवाद की भी खबर लेते हैं।
स्वयंप्रकाश ने अपनी कहानियों के माध्यम से मध्यवर्गीय युवाओं की मानसिकता के साथ-साथ उसके जीवन में आने वाली समस्याओं की भी पडताल की है। उन्होंने जहाँ मध्यवर्गीय युवाओं की यथास्थितिवादी और अवसरवादी रवैये पर व्यंग्य किया है, वहीं उन्होंने इस वर्ग के प्रति अपनी आस्था भी बनाई रखी है। स्वयंप्रकाश भविष्य के प्रति आस्था रखने वाले कथाकार हैं।
संदर्भ
१. प्रतिनिधि कविताएँ, गजानन माधव मुक्तिबोध, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, आवृति-२०१०, पृ.सं. १४१
२. जनवादी कहानी ः पृष्ठभूमि से पुनर्विचार तक, रमेश उपाध्याय, (भूमिका), वाणी प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण २०००, पृ.सं. १२
३. स्वयंप्रकाश के बहाने, सदाशिव श्रोत्रिय, असम्भव के विरुद्ध ः कथाकार स्वयंप्रकाश, संपादक कनक जैन, अमन प्रकाशन, कानपुर, प्रथम संस्करण २०१८, पृ.सं. ३६
४. आधुनिक हिन्दी कहानी, गंगा प्रसाद विमल, ग्रंथलोक प्रकाशन, प्रथम संस्करण २००२, पृ.सं. ७९
५. ’नीलकांत का सफर‘, इक्यावन कहानियाँ, स्वयंप्रकाश, समय प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली, संस्करण २०१७, पृ.सं. १२
६. ’घिन तो नहीं आती है?‘ नागार्जुन, नागार्जुन रचनावली भाग एक, संपादक शोभाकांत, दिल्ली, संस्करण २०११, पृ.सं. ३५१
७. हमारी कहानी ः संदर्भ और संभावना, अन्यथा (पत्रिका), अंक १३, संपादक कृष्ण किशोर, पृ.सं. ७३
८. ’संहारकर्त्ता‘, चर्चित कहानियाँ, स्वयंप्रकाश, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण २००५, पृ.सं. ८२
९. वही, पृ.सं. ८५
१०. वही, पृ.सं. ८७
११. वही, पृ.सं. ९१
१२. वही, पृ.सं. ९१-९२
१३. कहानीकार स्वयंप्रकाश ः रचना दृष्टि और रचना शिल्प - डॉ. सायरा बानो, अमन प्रकाशन, कानपुर, संस्करण २०१५, पृ.सं. १३४
१४. भय और आशा के बीच (लेख), शंभुनाथ, बनास जन, प्रवेशांक, बसंत २००८, पृ.सं. १८४
१५. ’गौरी का गुस्सा‘, दस प्रतिनिधि कहानियाँ - स्वयं प्रकाश, किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण २००८, पृ.सं. ७८
१६. ’नन्हा कासिद‘, दस प्रतिनिधि कहानियाँ - स्वयंप्रकाश, किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण २००८, पृ.सं. ५३
१७. वही, पृ.सं. ५६
१८. ’बस‘ - स्वयंप्रकाश, चर्चित कहानियाँ, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण २००५, पृ.सं. २८
१९. वही, पृ.सं. २९
२०. ’एक छोटी सी लडाई‘ - इक्यावन कहानियाँ, स्वयंप्रकाश, समय प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली, प्रथम संस्करण २०१७, पृ.सं. ५५
२१. ’तलबी‘, स्वयंप्रकाश, पार्टीशन, रचना प्रकाशन, जयपुर, संस्करण २००२, पृ.सं. ५६
२२. ’सूट‘, इक्यावन कहानियाँ, स्वयंप्रकाश, समय प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण २०१७, पृ.सं. ७१
२३. ’चोर की माँ‘, वही, पृ.सं. २६८-२६९
२४. ’एक यूँ ही मौत‘, वही, पृ.सं. २०६
कथा साहित्य में रुचि है। कथा आलोचना भी करते हैं। अन्वेषीवृत्ति सम्पन्न हैं। सम्फ ः शोधार्थी, भारतीय भाषा केन्द्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-११००६७, कमरा सं. १०८, झेलम छात्रावास, जे.एन.यू., मो. ९०१५३२६४०८