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प्रेमचन्द और राष्ट्रवाद

नीरज
राष्ट्रवाद का प्रश्न, प्रेमचन्द के युग में जितना ज्वलंत था कमोबेश उतना ही आज भी है। यह जुदा बात है कि दोनों की प्रवृत्ति अलग-अलग है। तत्कालीन राष्ट्रवाद जहाँ विरोधी विचारधाराओं को साथ लेकर चलने पर जोर देता था, वहीं आज का राष्ट्रवाद विभिन्न धाराओं के अलगाव की बात करता है। खैर!
प्रेमचन्द का राष्ट्रवाद? यह प्रश्न अपने आप में जरा पेचीदा मालूम होता है कि आखर यह राष्ट्रवाद क्या चीज है जो प्रेमचन्द में ढूँढी जानी है। इससे भी जरूरी है कि इस पडताल का आधार क्या होगा - उनका साहित्य, विचार, जीवन या यह सब शून्य में ही होगा। जवाब सीधा-सा है कि जब विश्व के तमाम रचनाकारों (होमर, व्यास, वाल्मीकि, दाते, गेट, शेक्सपीयर, कबीर, सूर, बायरन, शैली, गोर्की, चेखव, लू शुन, रवीन्द्रनाथ, टॉलस्टॉय आदि) के मूल्यांकन का आधार उनका साहित्य है तो प्रेमचन्द के मूल्यांकन का आधार भी यही होना चाहिए।
राष्ट्रवाद पर आगे विचार करने से पहले यह आवश्यक है कि हमें राष्ट्र, राज्य और देश जैसे - समानार्थी प्रतीत होने वाले शब्दों का भेद मालूम हो। वस्तुतः जहाँ राष्ट्र एक सांस्कृतिक शब्द है वहीं राज्य और देश एक राजनीतिक शब्द (पारिभाषिक) है। राज्य की अपनी एक भौगोलिक सीमा, सेना, सरकार आदि होती है जबकि राष्ट्र केवल मानसिक कल्पना भर है, जिसके पीछे वहाँ की सभ्यता और संस्कृति होती है। मसलन कोई अफ्रीका में रहने वाला व्यक्ति, जिसकी संवेदनाएँ भारत से जुडी हो वह भी राष्ट्रवादी हो सकता है, भले ही वह भारत का नागरिक न हो। सामान्य शब्दों में, राष्ट्र कहीं भौगोलिक रूप से अवस्थित कोई क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक कल्पना भर है। इस संदर्भ में प्रेमचन्द स्वयं एक स्थान पर लिखते हैं -
’’राष्ट्र एक मानसिक प्रवृत्ति है। जब वह प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है तो किसी प्रांत निवासियों में भ्रातृत्व पैदा हो जाता है। प्राचीनकाल का भारत इसी मायने में एक था कि उसकी संस्कृति एक थी।‘‘१
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’’राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्ण-व्यवस्था, ऊँच-नीच के भेद और धार्मिक पाखण्ड की जड खोदना है।‘‘२
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’’हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें जन्मजात वर्णों की तो गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न कोई हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय। उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी बर्कहमान होंगे या सभी हरिजन।‘‘३
दरअस्ल प्रेमचन्द का समय आज के समय से पर्याप्त भिन्न था। उस दौर में समाज का कोई भी वर्ग चाहे स्त्री-पुरुष, हिन्दू-मुस्लिम, दलित-शूद्र, अमीर-गरीब, किसान-मजदूर कोई भी क्यों न हो, सबका एक ही दुश्मन था - अंग्रेज। इसलिए प्रेमचंद किसी भी प्रकार के विघटनकारी विचार को अपने चिंतन का आधार नहीं बना सकते थे क्योंकि उन्हें प्राचीन भारतीय परम्परा एवं सभ्यता का बराबर खयाल रहता था। चूँकि प्रेमचन्द का दौर नवजागरण कालीन दौर था और नवजागरण की यह प्राथमिक शर्त होती है कि वह अपने अतीत के उन स्वर्णिम अध्यायों की खोज करता है, जिस पर उसका वर्तमान समाज गर्व कर सके। इसकी परिणति प्रायः सभ्यताओं के संशोधन के रूप में दिखाई देती है। यही समस्या प्रेमचन्द के सम्मुख भी थी। प्रेमचन्द जैसे साहित्य स्रष्टा के समक्ष औपनिवेशिक भारत और प्राचीन भारत के बीच चुनने का द्वंद्व था। यही वजह थी कि प्रेमचन्द ने प्राचीन भारत, जिसकी सभ्यता-संस्कृति विकृष्ट हो गई थी, को पुनर्जीवित करने का फैसला लिया। क्योंकि जब हम अपनी सभ्यता को नितांत त्याज्य मान लेते हैं तो हमारे पास उधार के इतिहास से काम चलाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प ही नहीं बचता। प्रेमचन्द के समक्ष यह द्वंद्व था कि जागरण के बाद जो भारत बनेगा उसमें कितना प्रतिशत पुराने भारत का होगा और कितना प्रतिशत नए भारत का। इस द्वंद्व को राजनीतिक स्तर पर गाँधी व नेहरू के विचारों में भी देखा जा सकता है। आगे चलकर प्रेमचंद साहित्य पर भी गाँधी के विचारों का गहरा प्रभाव पडा - अहिंसा, हृदय परिवर्तन, साधन की पवित्रता आदि के रूप में। वास्तव में, जो काम गाँधी राजनीति के माध्यम से कर रहे थे, वही काम प्रेमचन्द साहित्य के माध्यम से कर रहे थे। निस्संदेह गाँधी तत्कालीन दौर के सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तित्व थे। गाँधी ने ही पहली बार भारतीयों को पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति की आलोचना करना सिखाया। प्रेमचन्द स्वयं लिखते हैं- ’’महात्मा गाँधी के आने से पश्चिम की बुराइयाँ हमें नजर आने लगी।‘‘४ इस प्रकार पश्चिम के प्रति प्रेमचन्द के नजरिये पर तत्कालीन बौद्धिक चिंतन के रूप में गाँधी का सबसे गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
तत्कालीन भारत की जनता को जिस प्रकार गाँधी में अपना प्रतिबिम्ब दिखाई देता था, उसी प्रकार प्रेमचन्द के साहित्य में तत्कालीन भारत, उसकी जनता व उसके दुःख-दर्द को देखा जा सकता है। प्रेमचन्द अपने दौर के सभी प्रमुख सवालों से टकराते हैं। वे अपने समय में मौजूद असमानता, शोषण, धर्म, जाति-वर्ण व्यवस्था, गरीबी-अभाव जैसे सभी प्रमुख सवालों से टकराते हैं। लेकिन यह टकराव कैसा है? यह टकराव पत्थर व हथौडे का नहीं है, बल्कि पत्थर व पानी का है। पानी भी अंततः तो पत्थर के आकार को बदलता ही है, लेकिन यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है। उदाहरणस्वरूप प्रेमचन्द अपने साहित्य में जाति व्यवस्था, शोषण, असमानता व धर्म की बात को तो शुरू से लेकर चले लेकिन उसे लेकर कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे! या पहुँचे भी तो इसकी गति काफी धीमी रही। इस धीमेपन से असंतुष्ट होकर ही प्रेमचन्द अंत तक आते-आते स्वयं गाँधी के हृदय परिवर्तन को छोडकर यथार्थवादी समाजवाद का सहारा लेते हैं।
प्रेमचन्द के पूरे कथा साहित्य में एक त्रिकोण उभर कर आता है, जिसके तीनों छोर पर क्रमशः स्त्री, दलित और किसान/मजदूर हैं। प्रेमचन्द के सम्पूर्ण साहित्य, चाहे वह कहानी हो या उपन्यास, सभी में किसानों/मजदूरों का दुःख-दर्द व उसकी अभिव्यक्ति प्रमुखतया हुई है। चूँकि भारत प्राचीनकाल से आज तक एक कृषि प्रधान*देश रहा है। इसलिए किसी भी रचनाकार द्वारा अपनी रचनाओं में उनका चित्रण किए जाने के आधार पर उसके (रचनाकार) दृष्टिकोण को समझा जा सकता है। यह अनायास नहीं था, जब रामविलास शर्मा ने लिखा - ’’यदि उन्नीसवीं सदी के भारत का राजनीतिक-सांस्कृतिक परिदृश्य जानना हो तो प्रेमचन्द के साहित्य को देखा जाना चाहिए।‘‘ प्रेमचन्द द्वारा इस प्रकार किये गए भारतीय समाज के बारीक चित्रण को रेखांकित करते हुए अमृतराय लिखते हैं -
’’प्रेमचन्द के किसान पात्रों की भाषा उनकी अपनी जन्दगी से ही इस प्रकार निसृत होती है कि वह अपने सब आसंगों के कारण उस परिवेश को सजीव कर देती है - वह घर कैसा है जिसमें वह आदमी रहता है; वह कपडे क्या पहने है, वह कैसे बात करता है, उठता-बैठता कैसे है, उसके चारों तरफ उस गाँव का कैसा नक्शा है, गाँव का वह कुआँ, वह चौपाल जहाँ शाम को सब किसान मिलते-बैठते हैं और उस रोज जो-जो कुछ उस गाँव में हुआ और किस पर क्या मुसीबत पडी है और सूखे-बूढे और हारी-बीमारी और जाफा- बेदखली की बातें करते हैं। गाँव का प्राकृतिक परिदृश्य, फूल-पत्ती, गैया-गोरू, सानी-पानी, रीति-रिवाज, मेले-ठेले - प्रेमचन्द की नजर इन पर रहती है और मैं समझता हूँ यही वे चीजें हैं जिनमें प्रेमचन्द की भारतीयता बोलती है।‘‘५ इस प्रकार प्रेमचन्द के कथा साहित्य में सम्पूर्ण भारत और विशेषतः ग्रामीण भारत अपने सब हर्ष-विषाद, आशाओं-आकांक्षाओं और दुःख-दर्द के साथ सजीव रूप से सामने आकर खडा हो जाता है। यह सर्वविदित है कि भारतीय गाँवों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इकाई उसके किसान हैं। यह मात्र संयोग नहीं है कि ’’हिन्दी के प्रेमचन्द, बांग्ला के विभूति भूषण बंद्योपाध्याय, उडया के गोपीनाथ महान्ति, कन्नड के शिवराम करंत और मलयालम के तकषी शिवशंकर पिल्लै, अपने यहाँ के किसान की दुःख-दर्द भरी कहानी लिखते हैं।‘‘६
प्रेमचन्द के यहाँ किसान रचना में प्रभाव उत्पन्न करने के लिए या सजावट मात्र के लिए नहीं बल्कि अपने समग्र जीवन के साथ मजबूती से सामने आते हैं। प्रेमचन्द की किसान समस्या व उसके चित्रण का नमूना देखने के लिए ’गोदान‘ उपन्यास काफी है। उसकी शुरुआत और अंत दोनों अभाव से ही होते हैं। गोदान की अंतिम पंक्ति मानो पूरे उपन्यास और स्वयं प्रेमचन्द की भी अंतिम सीमा है। मानो उसके आगे कुछ कहना प्रेमचन्द की समर्थता के बाहर था - ’’महराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा। यही पैसे हैं, यही इनका गोदान है। और पछाड खा कर गिर पडी।‘‘७
किसान का छोटे किसान व निरन्तर गरीब होते-होते अंततः एक दिन अपनी जमीन से हाथ धोकर मजबूरन कलकत्ता-बम्बई-कानपुर-अहमदाबाद का रास्ता पकडना और वहाँ मजदूरी करना भी प्रेमचन्द की लेखनी का हिस्सा रहा है। रंगभूमि उपन्यास की केन्द्रीय समस्या भी यही है, जिसमें अँधा भिखारी सूरदास पूँजीपति जॉन सेवक से लडता रहता है। क्योंकि वह (जॉन) सूरदास को उसकी जमीन से बेदखल करके वहाँ पर अपना सिगरेट का कारखाना लगाना चाहता था। सूरदास उसके खिलाफ अंत तक लडता है। किन्तु वह अपने साधन की पवित्रता और अहिंसा (संदर्भ ः गाँधी) का भी बराबर खयाल रखता है।
दूसरी प्रमुख समस्या के रूप में दलित प्रश्न है। इस विषय पर प्रेमचन्द तुलनात्मक रूप से कमजोर दिखाई देते हैं। इसका एक कारण उनका आदर्शवाद और गाँधी के प्रति आस्था हो सकती है। यह खुला रहस्य है कि, जो गाँधी तमाम विषयों पर बडे प्रगतिशील मालूम होते हैं वे किस प्रकार जाति समस्या पर परम्परा की लीक को पीटने वाले नजर आते हैं। यह जाति समस्या का सवाल ही था जिस पर उनके डॉ. अम्बेडकर से मतभेद रहा करते थे। अन्यथा तो स्वराज्य को लेकर दोनों का साध्य एक ही था।
प्रेमचन्द ने अपने कथा साहित्य में यूँ तो हरिजन समस्या को यत्र-तत्र उठाया ही है। लेकिन कुछ रचनाएँ हैं, जिनमें यह समस्या प्रमुखता से सामने आई है। मसलन कुछ कहानियाँ (ठाकुर का कुआँ, मंदिर, कफन, सद्गति) और कुछ उपन्यास (रंगभूमि, गोदान) इसमें शामिल हैं। इन रचनाओं के माध्यम से प्रेमचन्द ने दिखाया है, किस प्रकार एक बडा वर्ग (हरिजन) अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए एक खास वर्ग पर आश्रित है। वह जरूरत चाहे पीने के पानी, मंदिर प्रवेश, भोजन, श्रम के मूल्य की, बच्चों की सगाई की हो या फर अंतिम संस्कार जैसी क्रिया की ही क्यों न हो! प्रेमचन्द दिखाते हैं कि किस प्रकार सवर्ण समाज ने धर्म के माध्यम से एक कृत्रिम डर कायम किया है, जिसके चलते अवर्ण समाज के लोग अपने जीवन का कोई भी फैसला स्वेच्छा से नहीं ले पा रहे हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वे अपने रचनात्मक साहित्य के माध्यम से इस यातनादायक व्यवस्था के बरक्स कोई दूसरी व्यवस्था दे पा रहे हैं? ऐसा हर जगह तो नहीं लेकिन कहीं-कहीं अवश्य दिखलाई देता है। मसलन ईदगाह कहानी में जहाँ मस्जद के बाहर का दृश्य देखकर हामिद कहता है, ’’नए आने वाले पीछे की कतार में खडे हो जाते हैं। आगे जगह नहीं है। यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता, इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पीछे की पंक्ति में खडे हो गए। कितना सुंदर संचालन है कितनी सुंदर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खडे हो जाते हैं, एक साथ झुक जाते हैं और सब एक साथ खडे हो जाते हैं, कई बार यही क्रिया होती है। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थी, मानो भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त समस्याओं को एक लडी में पिरोये हुए हो।‘‘८
लेकिन हिन्दू धर्म को लेकर प्रेमचन्द के पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है। यद्यपि गोदान में कुछ संकेत अवश्य दिखाई देते हैं, लेकिन वे अपर्याप्त हैं। इस संदर्भ में नामवर सिंह का मानना है - ’’प्रेमचन्द दलित लेखक नहीं हैं और यह कहना प्रेमचन्द की तौहीन नहीं बल्कि प्रेमचन्द को उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की प्रस्तावना है।‘‘९
इस प्रकार दलित समस्या पर प्रेमचन्द का कोई बहुत परिवर्तनकारी योगदान तो नहीं लेकिन फिर भी उनका महत्त्व इस बात में है कि वे हिन्दी साहित्य में आभिजात्यता के आतंक को कम करने वाले (नायकों का नामकरण) प्रारम्भिक रचनाकार हैं। या कहें हिन्दी साहित्य में दलित प्रश्नों को उठाने वाले शुरुआती रचनाकार हैं।
इसी क्रम में अगली प्रमुख समस्या स्त्री विषयक है। इस देश का प्रभुत्वशाली वर्ग सदा से ही षड्यंत्रकारी और बहुत कुटिल रहा है। यह वही देश है जिसकी संस्कृति में देश की कल्पना एक स्त्री के रूप में की जाती रही है - भारत माता! क्योंकि स्त्री की छवि प्राचीनकाल से ही पूज्य, देवी और पवित्रता की रही है। यही वह देश है, जहाँ धन (लक्ष्मी), विद्या (सरस्वती) और शक्ति (दुर्गा) तीनों का स्रोत स्त्री ही रही है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि देश की स्त्रियाँ इन तीनों शक्तियों से ही दूर रही। यह अपने किस्म का एक षड्यंत्र है, जिसके पीछे धर्म और पितृसत्तात्मक सोच है। किन्तु प्रेमचन्द के साहित्य में इस समस्या से जुडे प्रश्न दिखलाई देते हैं। इसके उदाहरण के रूप में उनका पहला उपन्यास ’असरारे मआविद‘ (हिन्दी में देवस्थान रहस्य) ही देखा जा सकता है। जिसमें एक मठ के महंत द्वारा किया जाने वाला स्त्रियों का शोषण चित्रित है। इसके साथ ही ’प्रेमा‘ (विधवा स्त्री जीवन की समस्या पर), ’सेवासदन‘ (वेश्या स्त्री की समस्या), ’निर्मला‘ (अनमेल विवाह), ’गबन‘ (स्त्रियों की विनाशकारी आभूषण वासना का चित्रण) और ’गोदान‘ (दलित-किसान जीवन में स्त्री की समस्या) आदि उपन्यास इसी प्रकार के हैं। साथ ही ’बालक‘, ’ठाकुर का कुआँ‘ और ’कफन‘ जैसी कुछ कहानियाँ भी हैं।
इस प्रकार देश की आधी आबादी के दुःख-दर्द की आवाज भी प्रेमचन्द के कथा-साहित्य में दिखलाई पडती है। यह अलग बात है कि आज का स्त्री-विमर्श उसे अपने अनुकूल नहीं पाता। उसके अनुसार प्रेमचन्द ने जो प्रश्न और जिस तीव्रता के साथ उठाये हैं, वे अपर्याप्त हैं। इसलिए उनका कोई खास महत्त्व नहीं है। किन्तु दलित समस्या की तरह ही इनका महत्त्व भी इनकी ऐतिहासिकता में है। उस दौर में पितृसत्ता और धर्म के पंजे इतने मजबूत थे कि प्रेमचन्द के प्रयास नाकाफी मालूम होते हैं।
प्रेमचन्द ने राजनीति द्वारा किये जाने वाले सामान्य जनता के शोषण का भी बखूबी चित्रण किया है। ’कायाकल्प‘ उपन्यास इसका अच्छा उदाहरण है, जिसमें उन्होंने पुनर्जन्म के माध्यम से राजनीतिक नेताओं के स्वार्थ, लोभ व झूठे वादों की पोल खोलने की कोशिश की है। प्रेमचन्द ने तो १९३६ के अपने प्रलेस के अध्यक्षीय भाषण में ही कहा था - ’’साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उसका दर्जा इतना न गिराइये। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखती हुई चलने वाली सच्चाई है।‘‘
भाषा के स्तर पर भी प्रेमचन्द राष्ट्रीय एकता की बात उठाते हैं। यह सर्वज्ञात है कि प्रेमचन्द ने अपने लेखन की शुरुआत उर्दू से की और बाद में हिन्दी में लिखना शुरू किया। किन्तु उन्होंने इसके अतिरिक्त अन्य भाषाओं से उनके अच्छे साहित्य का हिन्दी में अनुवाद भी किया। यह उनकी राष्ट्रवादिता का एक अनूठा पहलू है। इसी क्रम में प्रेमचन्द १९३५ में रंजन सेन को एक पत्र में लिखते हैं - ’’बंकिम, रमेश, डी.एल. राय, शरत और गुरुदेव समस्त भारत के हैं और उनमें से कुछ तो सारे संसार में प्रसिद्ध हो चुके हैं, लेकिन हम लोगों में एक-दूसरे के साथ जो दिलचस्पी है, वह कम नहीं होनी चाहिए। बडे-बडे लेखक किसी एक प्रांत या देश के नहीं होते। जब हम लोग एक राष्ट्र के रूप में हैं, तो बंकिम का भी उतना ही अधिक अभिमान होना चाहिए, जितना इकबाल और जोशी का।‘‘१० इस प्रकार प्रेमचन्द के साहित्य व जीवन, दोनों से ही उनकी राष्ट्र के प्रति दृढता की भावना परिलक्षित होती है।



गद्य लेखन में गहरी रुचि है। शोधार्थी हैं। दिल्ली में रहते हैं।