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केदारनाथ सिंह की कविता ’गाँव आने पर‘ : एक अवलोकन

अभिषेक सौरभ
केदारनाथ सिंह की कविताओं में ग्राम्य और शहरी अनुभवों की विशेष बुनावट एक साथ सहज परिलक्षित की जा सकती है। उनका जीवनकाल भी एक ऐसा दौर रहा है, जिसमें लोगों के गाँव छूटते रहे हैं और उनसे शहरों का निर्माण होता रहा है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के उपरान्त भारतीय समाज के शहरीकरण में जो तेजी आई, कवि और उनकी पीढी इसके साक्षी रहे हैं। इस दौर के बहुत सारे कवियों की रचना के केन्द्र में गाँव और शहर का द्वन्द्व रहा है। गाँवों के प्रति नौस्टेलजिक-भाव के साथ-साथ वहाँ की गरीबी, शोषण, ऊँच-नीच आदि उनकी रचनात्मकता और विचारों के केन्द्र में रहा किन्तु उनमें केदारनाथ सिंह की दृष्टि अलग रही है। केदारनाथ सिंह की दृष्टि के गाँव में सामूहिकता, सामुदायिकता-बोध, लोक-संस्कृति, देशजता, गँवई-संस्कृति की निश्छलता, कर्मण्यता और उनका संघर्ष प्रमुख रूप से उभर कर आया है। दयनीयता, दरिद्रता और परायापन उनके गाँव को स्वीकार्य नहीं है।
उनकी कविता ’गाँव जाने पर‘ का रचनावर्ष १९९४ है। अगले वर्ष १९९५ में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उनके कविता-संग्रह की पुस्तक ’उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ‘ में ’गाँव आने पर‘ शीर्षक-कविता संकलित थी। नब्बे का यह दशक भारतीय समाज में उदारीकरण, भूमंडलीकरण और लाइसेंस-राज के खात्मे के साथ-साथ कुछ विशेष अर्थों में साम्प्रदायिकता के उभार (बाबरी-मस्जद का तोडा जाना) तथा मंडल-कमंडल राजनीतिक- आंदोलनों के लिए जाना जाता है। यह वह दौर था जब मार्शल मैक्लुहान के विश्व-ग्राम की अवधारणा का जोर भारतीय-समाज के मानस पर भी खासा प्रभाव छोड रहा था। दुनिया एक गाँव (विश्व-ग्राम) में सिमट रही थी और खुले बाजार के रूप में स्थापित भी हो रही थी। इन्हीं सामयिक अंतरालों में लिखी गयी ’गाँव आने पर‘ कविता अपने शीर्षक से ही इस तथ्य को सहज भाव में इत्तला करती हुई चलती है कि बात गाँव लौट कर आने पर प्रारम्भ हो रही है। जाहिर तौर पर यह लौट कर आना शहर से ही जुडा है, जहाँ कवि विश्वविद्यालय में शिक्षक के तौर पर कार्यरत है। यद्यपि अबकि गाँव आ जाने में कवि के अंतस की स्थिति कुछ-कुछ किंकर्तव्यविमूढ सी हो चली है। असमंजस का भाव तो है ही। कविता की प्रारम्भिक पंक्तियों में ही कवि कहता है - ’’अब आ तो गया हूँ/पर क्या करूँ मैं?‘‘१
गौरतलब है कि इस दौर में आमतौर पर गाँव खाली हो रहे थे। ग्रामीण कृषि-मजदूर, परम्परागत पेशे वाले कुम्हार-कहार-बढई-लुहार-धुनिया- तम्बोली-लकडहारा आदि तथा छोटे-मझोले किसान सब किसी न किसी रोजगार की तलाश में शहर की ओर पलायन कर रहे थे। अधिकांश ग्रामीण परिवारों से कोई-न-कोई सदस्य निकटवर्ती शहर या जहाँ से रोजगार की बेहतर उम्मीदें नजर आ रही थीं, उस शहर की ओर विचारोन्मुख थे तथा ठौर-ठिकाने की गुँजाइश ढूँढ रहे थे। कलकत्ता, सूरत, मुम्बई, अहमदाबाद, दिल्ली, बंगलुरु, चैन्नई, धनबाद, लखनऊ, पटना, राउरकेला आदि जैसे भारतीय शहर, गाँवों से आये हुए इन नये कामगारों से निरन्तर आबाद होते जा रहे थे। जिस तेजी से शहर आबाद होते जा रहे थे, उसी अनुपात में गाँव खाली। ऐसे में, एक तो बुढापे का खालीपन, ऊपर से बचपन के संगी-साथियों-परिचितों की अनुपस्थिति से खाली गाँव, यदि ऊबन की स्थिति को और दुरूह नहीं बनायेगा तो उस ऊब में रस का संचार तो कतई ही नहीं करेगा। शायद इसी ऊब के संदर्भ में; अपनी वर्तमान आयु को एक बूढे पक्षी के बरक्स रखते हुए कवि कहते हैं - ’’एक बूढे पक्षी की तरह लौट-लौटकर/मैं क्यों यहाँ चला आता हूँ बार-बार?/पृथ्वी पर ऊब/क्या उतनी ही पुरानी है/जितनी दूब?‘‘२
बूढे पक्षी की तरह लौट-लौटकर आने की बात में दो और तथ्य निहित हैं; एक तो यह कि जहाँ लौट कर बूढा पक्षी आयेगा वह जगह निस्संदेह उसका बुढापा व्यतीत करने के लिए सबसे उपयुक्त और उसकी हैसियत की सबसे उत्तम जगह होगी। ऐसी जगह, जहाँ कि एक सामर्थ्यहीन वृद्ध सम्पूर्ण सामाजिक सुरक्षा व देख-रेख की भावना के साथ अच्छे से अपना बुढापा व्यतीत कर सके। बुढापे की हाडी-व्याधि से जूझने के लिए जहाँ वक्त-बेवक्त यदि सहारे की जरूरत हो तो दो हाथ उसकी मदद को जरूर उपस्थित हों। दूसरा तथ्य यह है कि बुढापे में नीड का निर्माण फिर से नहीं हो पाता। एक घर बनाने में लोगों का सारा सामर्थ्य और जमा-पूँजी जा चुकी होती है, फिर भला बुढापे में अपने चिर-परिचित ठिकाने को छोडकर और कहाँ जाया जाए। शहर के किराये वाले मकान का किराया चुकाने की कमाई बुढापे में सम्भव नहीं। नये के निर्माण का सामर्थ्य तो वैसे भी नहीं। यदि थोडी बचाकर रखी जमा-पूँजी से ईंटें खडी भी कर ली तो चिर-परिचित माधुर्य वाले पडोसी और पहचान के लोग तो यकायक नहीं ही मिल पाते हैं। लेकिन परेशानी तब होती है जब अपना घरौंदा, घर, गाँव भी एक अजनबीयत के मोह-पाश में बँध जाए। लाख अपनत्व के बावजूद भी सामयिक परायेपन का एक झीना यथार्थ सब पर हावी हो जाए। उस वक्त कवि को कुछ नहीं सूझता। एक घनी पेचीदगी महसूस होती है और कवि सोचने लगता है कि - ’’क्या करूँ मैं? क्या करूँ, क्या करूँ कि लगे/कि मैं इन्हीं में से हूँ/इन्हीं का हूँ/कि यही हैं मेरे लोग/जिनका मैं दम भरता हूँ कविता में।‘‘३
यह सच है कि कवि के हृदयस्थल पर गाँव में बिताये जीवन के शीतलता की जो छाया थी, वो कभी धूमिल नहीं पडी। ’तीसरा सप्तक‘ के अपने वक्तव्य में कवि लिखते हैं, ’’मेरा घर गंगा और घाघरा के बीच में है। घर के ठीक सामने एक छोटा-सा नाला है जो दोनों को मिलाता है। मेरे भीतर भी कहीं गंगा और घाघरा की लहरें बराबर टकराती रहती हैं। खुले कछार, मक्का के खेत और दूर-दूर तक फैली पगडंडिय की छाप आज भी मेरे मन पर उतनी ही स्पष्ट है जितनी उस दिन थी, जब मैं पहली बार देहात के ठेठ वातावरण से शहर के धूमैले और शतशः खण्डित आकाश के नीचे आया।‘‘४ कवि गाँव में रहे, छोटे-मझोले शहरों में रहे, देश की राजधानी में रहे। कवि गाँव की भी सच्चाई जानते हैं और शहरी रहन-सहन से भी परिचित हो चुके हैं। कवि के अंतस को इन दोनों जगहों की तुलना करने पर ग्रामीण सामाजिकता-सामूहिकता की ओर खींच पाती है। कवि के गाँव आने का एक कारण तो यह भी है कि ऊब के बावजूद भी ग्राम्य संस्कृति से, अपने गाँव के लोग और वहाँ की मिट्टी से कवि को एक आत्मिक लगाव है और यहाँ की आबोहवा भी कवि के व्यक्तित्व से मेल खाती है। कवि के लिए, शहर की आधुनिकता और चकाचौंध किस तरह डरावनी है, इसकी अनुगूँज कवि की ही एक दूसरी कविता ’ऊँचाई‘ में स्पष्ट है - ’’मैं वहाँ पहुँचा/और डर गया.../ ...मेरे शहर के लोगों/यह कितना भयानक है/कि शहर की सारी सीढयाँ मिलकर/जिस महान ऊँचाई तक जाती हैं/वहाँ कोई नहीं रहता!‘‘५
नित तेजी से बदलती हुई दुनिया, दुनिया-भर के शहरों और उन शहरों से लगे, दूर-सुदूर बसे गाँवों की नियति अब पूँजीवाद के हाथ में है; पूँजीवाद के बहाने बडी-बडी बहुराष्ट्रीय-राष्ट्रीय कम्पनियों के हाथ में है, नये-पुराने धन्ना-सेठों, उद्योगपतियों और उनकी हितैषी लोकतांत्रिक सरकारों के हाथ में है। अर्थ (मुद्रा) जिसके केन्द्र में हो, ऐसी सामाजिक व्यवस्था में अपना-पराया भी आर्थिक आधार पर ही तय होते होंगे? है ना! किन्तु कवि दुविधा में है। यह दुविधा ग्राम्यता और शहरीकरण के बीच है, गाँव, शहर और राजधानी के बीच है। इस झिझक के केन्द्र में अपना और पराया की पूँजीगत वर्गीय-चेतना है। यह अलगाव एकपक्षीय विकास और आधुनिकता की देन है। व्यक्तिवाद और सामुदायिकता की दो धुरी बन चुकी है; जो एक में है वो दूजे में समा नहीं सकता। आप इन दोनों धुरियों में बुर्जुवा और सर्वहारा की भी पहचान कर सकते हैं। बकौल हरिवंशराय बच्चन कवित्व चूँकि दैव का सबसे बडा दंड है इसलिए कवि दोनों तरफ है, किन्तु दिल्ली का अस्तित्व ज्यादा बडा, कठोर और मारक है। अपनी असमंजसपूर्ण मनःस्थिति में कवि कहते हैं - ’’छू लूँ किसी को?/लिपट जाऊँ किसी से?/मिलूँ/पर किस तरह मिलूँ/ कि बस मैं ही मिलूँ/और दिल्ली न आए बीच में?‘‘६
यह दिल्ली जो है, यह शहर और गाँव के बीच की वास्तविक दूरी है। गाँव में लोग अब भी यह कहते हैं कि ’अभी दिल्ली दूर है‘। यह दूरी घट रही है या बढ रही है, यह अलग से विवाद-संवाद का विषय निश्चित तौर पर है, किन्तु गाँव और शहर से परे दिल्ली की जो सच्चाई है, वह शहर से परे संग्राहक की छवि ज्यादा है। समूचे भारत की मेहनत की सारी कमाई अकेली दिल्ली को अपनी सुख-सुविधा हेतु अपने दरबार में चाहिए और वो भी अपनी कीमत पर, अपनी शर्तों पर। दिल्ली ’आम‘ और ’खास‘ के व्यवस्था-निर्धारण की सबसे बडी प्राधिकारी है। दिल्ली ’खास‘ का विशेष खयाल रखना जानती है और कवि ’आम‘ के गले मिलना चाहते हैं, लिपटना चाहते हैं तो दिल्ली का बीच में आना स्वाभाविक है।
बकौल केदारनाथ सिंह, ’’मानव-संस्कृति के विकास में कवि का योग दो प्रकार से होता है - नवीन परिस्थितियों के तल में अंतःसलिला की तरह बहती हुई अननुभूत लय से आविष्कार के रूप में, तथा अछूते बिम्बों की कलात्मक योजना के रूप में। पहले में कवि का व्यक्तित्व मुखर होता है, दूसरे में वस्तु-जगत् के साथ उसका अधिकाधिक सम्बन्ध। लय के आविष्कार के द्वारा वह मानवीय संवेदना को व्यापक बनाता है और नवीन बिम्बों के परिचय से हमारी ऐन्द्रिय चेतना को बृहत्तर यथार्थ के साथ सम्पृक्त करता है।‘‘७ कवि मानवीय संवेदना का सच्चा संवाहक है ही, वस्तु-जगत् में ’आम लोगों‘ से उसका खासा लगाव है, ग्राम्यता और प्रकृति से अपने जुडाव को वह गाहे-बगाहे जतलाता रहा है, राज-समाज और जग-जीवन की नवीन परिस्थितियों से सीधा साक्षात्कार कर सकने की ईमानदारी उसमें है। कुल मिलाकर कवित्व-धर्म और इनसे जुडे सरोकारों के प्रति कवि की निष्ठा असंदिग्ध है और फिर गाँव कवि के लिए हमेशा से महत्त्वपूर्ण रहा है। अधिकांश का मानना है कि भारत गाँवों में बसता है। कवि मानता है कि ’वहाँ वे कुछ वस्तुएँ अभी भी सुरक्षित हैं, जो आज के युग में तेजी से ध्वस्त हो रही हैं। उन वस्तुओं से कवि को बेहद प्रेम है और वह उन्हें आज के लिए ही नहीं, भविष्य के लिए भी बचाकर रखना चाहता है।‘८ उन वस्तुओं में गाँव की दरिद्रता, शोषण और महाजनी ब्याज का तीव्र नकार है, उपेक्षा की हद तक। कवि के लिए उन सहेजनीय वस्तुओं में ऋतुओं के अनुसार रंग बदलने वाली गाँव की उर्वर-शस्य-श्यामला जमीन, नदियों का कछार, गाँव की चक्की, वसंत ऋतु, हल-बैल, बिना नाम की नदी, मछली और मछली फँसाने के लिए बंसी लगाकर बैठे झुम्मन मियाँ, रोटी, माली का कुदाल, माँझी का पुल, पगडण्डी, पशुओं का बुखार, पेड, सूखी धरती पर चोंच मारता सारस, भैंस आदि है।
गाँव के बारे में बात करते हुए केदारनाथ सिंह एक बडी गूढ बात कहते हैं, ’’गाँव आज सडकों के जाल और आवागमन के बढते हुए साधनों के कारण फैला जरूर है और बृहत्तर दुनिया से उसके रग-रेशे भी जुडे हैं, पर कई बार मुझे लगता है कि गाँव का मन अभी न तो अपनी भूलने की आदत से मुक्त हुआ है, न ही वह इस सच्चाई के साथ अपनी संगति ही बैठा सका है कि वह अपनी चौहद्दी में सिमटा अब एक निस्संग गाँव नहीं है।‘‘९ ऐसे ही निस्संग नहीं रह गये अपने गाँव में लौट कर आने पर कवि इस बात के लिए फिक्रमंद है कि इस पदार्थवादी युग में वह भी कहीं अपने ही लोगों के बीच में उपेक्षित ना हो जाये, या फिर कहीं पहचान में ही ना आये। उसके चेहरे पर जो यात्रा की गर्द और थकान स्पष्ट दिख रही है, उस धधलेपन की आड लेकर कहीं उसे अपने ही लोगों द्वारा पहचानने से इनकार ना कर दिया जाये या फिर उसके गँदलेपन के कारण कहीं उसे कोई तौलिया या सूटकेस ही न समझ लिया जाए। जबकि कवि अपने गाँव लौटा है तो अपनत्व के रस-भाव से लबालब भरा हुआ है। यह गाँव की सामूहिक-संस्कृति को अपने नथुनों में ताजी हवा के मानिंद भरने को आतुर है। वह अपना-पराया, तेरा घर - मेरा घर के दुनियावी जद के सामने एक प्रश्नचिह्व है। कवि अपने उद्गार व्यक्त करता है और साथ ही उसमें अपनी सही-पहचान की चिंता भी जाहिर करता हैं, ’’जो मेरे नहीं है/आखर वे भी तो मेरे ही हैं/चाहे जहाँ भी रहते हों/फिर क्यों यह जद/कि यही-यही/ सिर्फ यही मेरा घर है?.../... अपनी सारी गर्द/और थकान के साथ/अब आ तो गया हूँ/पर यह कैसे साबित हो/कि उनकी आँखों में/मैं कोई तौलिया या सूटकेस नहीं/मैं ही हूँ।‘‘१०
गाँव का जक्र होते ही खेत और किसान-जाति की याद बरबस चली आती है। वर्तमान में भी किसानों के बीच बहुत तीव्र बेचैनी है। देश के समक्ष विभिन्न प्रांतों में प्रत्येक वर्ष हजारों किसानों की आत्महत्या एक गंभीर, चिंतनीय और कटु वास्तविकता का रूप धारण कर चुकी है। आत्महत्या से अलग, वैश्वीकरण, सरकारी उपेक्षा, कृषि-कार्य के उपरान्त फसलों के लागत मूल्य का भी ना मिल पाना आदि अनेक व्यावहारिक-समस्याएँ किसानों के जीवन में हैं, जिनसे उनका जीवन-स्तर लगातार निम्नतर होता जा रहा है। कवि की दृष्टि से किसान-जाति की मुश्किलें ओझल नहीं हैं, साथ ही किसान की मेहनत के प्रति सम्मान का भाव भी उनकी कविताओं में मुखरित है। अपने लघु-निबंध ’मेरा गाँव सुन्दर है, लेकिन उसे कुछ भी याद नहीं‘ में केदारनाथ सिंह लिखते हैं, ’’सच्चाई यह है कि आज भारतीय किसान वैश्वीकरण के अदृश्य पहलवान से लडने के लिए अखाडे में खडा तो है, पर उसके पास कोई दावँ नहीं है।‘‘११ सभी जानते हैं कि शहर की मंडी से किसान ठगाकर-हारकर ही घर आते हैं। केदारनाथ सिंह किसान की इस पीडा को शब्द देते हैं और अनाज के हवाले से कहते हैं, ’’नहीं/हम मंडी नहीं जाएँगे/खलिहान से उठते हुए/कहते हैं दाने।‘‘१२
किसान और अनाज को ध्यान में रखते हुए कवि द्वारा १९८६ में लिखी गई एक अन्य शीर्षक कविता ’कुछ सूत्र जो एक किसान बाप ने बेटे को दिए‘ में किसान अपने बेटे से कहता है - ’’हरा पत्ता/कभी मत तोडना/और अगर तोडना तो ऐसे/कि पेड को जरा भी/न हो पीडा.../... रात को रोटी जब भी तोडना/तो पहले सिर झुकाकर/गेहूँ के पौधे को याद कर लेना।‘‘१३
यद्यपि आज गाँव में खाली-बेगार बैठे युवाओं की एक अच्छी संख्या हो चली है, जिसमें शनैः शनैः बढोतरी ही हो रही है। खाली दिमाग शैतान का घर की तर्ज पर इन बेकाम युवाओं के कारण गाँव में असुरक्षा और हिंसा का वातावरण गहराता जा रहा है। सामूहिक जीवन का ताना-बाना भी असुरक्षा बोध और असामाजिक तत्त्वों में बढोतरी से चरमराता रहा है। यह स्थिति कमोबेश शहरी जीवन पर भी लागू है; रोजगार-विहीन युवाओं की दिशाहीन भीड वहाँ भी है। पीढयों को जोडे रखने वाली वाचिक परम्परा गाँवों में धीरे-धीरे समाप्ति के कगार पर है और साहित्य अब गाँव की सामूहिक स्मृति से दूर होता जा रहा है। इन चिंताओं के मद्देनजर अपने लघु-आलेख ’मेरा गाँव सुन्दर है, लेकिन उसे कुछ भी याद नहीं‘ में केदारनाथ सिंह लिखते हैं, ’’मैं अपने गाँव को प्यार करता हूँ, पर सोचता हूँ कि यदि कोई उसका इतिहास लिखना चाहे तो उस खालीपन का क्या करेगा, जो लोगों की स्मृति में यहाँ से वहाँ तक सपाट फैला है?‘‘१४
गाँव लौट कर आने पर कवि इस खालीपन का प्रभाव अपने चहुँओर भी पाता है। इस खालीपन में अगर ऊब की गंध है तो साफ-स्वच्छ वायु का निर्मल प्रवाह भी है और उस ठंडी, सुकून-भरी हवा का घेराव कवि को निरन्तर आच्छादित किए हुए है जो कदाचित् उसे कभी-कभी विचलित भी कर देता हो। कवि को यह किंचित् विचलन इसलिए महसूस हो सकता है क्योंकि कवि की जीवनशैली पर अब भौतिक सुख-सुविधाओं युक्त शहरी जीवनशैली की भी छाप है। किन्तु अंत-अंत तक कवि को ग्राम्य-धरा की नैसर्गिकता का ही कायल हो जाना तय है। अपने गाँव की हवा, उस अकुंठित-प्रदूषणरहित आबोहवा में प्राणों तक छुआया गया गहरा श्वास और अपने ग्रामवासियों जिसे कवि ’मेरे लोग‘ मान रहा है, का सम्मिलित प्रभाव कवि पर इस तरह प्रभावोत्पादक है कि कवि उनसे हमकदम हो सकने के लिए उनके चेहरों को देखकर अपनी घडी की सुईयों का बार-बार प्रयत्नपूर्वक मिलान करता है। ’गाँव आने पर‘ कविता की ही कुछ पंक्तियाँ इसकी पुष्टि करती हैं, ’’यह हवा/मुझे घेरती क्यों है?/क्यों यहाँ चलते हुए लगता है/ अपनी साँस के अन्दर के/किसी गहरे भरे मैदान में चल रहा हूँ.../... कौन हैं ये लोग/जो कि मेरे हैं?/इनके चेहरों को देखकर/मुझे अपनी घडी की सुई/ठीक क्यों करनी पडती है बार-बार।‘‘१५
यद्यपि केदारनाथ सिंह ने अपने ग्रामवासियों के चेहरों को देखकर अपनी घडी की सुईयों को ठीक करने की बात इस कविता ’गाँव आने पर‘ में की है, किन्तु सच्चाई यही है कि अपनी अधिकांश रचनाओं में उन्होंने गाँव की स्मृतियों का ही सहारा लिया है। अपनी रचनात्मकता को समय के सापेक्ष, समकालीन रखने में उन्होंने लोक से गहरा रिश्ता रखते हुए उन्हीं अनगढ मूरतों का सहारा लिया, जिन्हें वो ’अपने लोग‘ मानते थे और यह जानते हुए भी कि वो उन्हें कभी नहीं पढेंगे, उन्हीं के लिए पूरा जोर लगाकर लिखते थे, अपनी कविताओं में उनका ही दम भरते थे।
शोधार्थी हैं। पढने-लिखने के लिए आतुर रहते हैं। समकालीन सृजन पर पैनी नजर रखते हैं।