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अज्ञेय, असाध्य वीणा और अर्थान्वेषी आलोचना

डॉ. छबील कुमार मेहेर
१. अज्ञेय : रचनाधर्मिता और आधुनिकता
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ’अज्ञेय‘ - हिन्दी के आधुनिक भावबोध के प्रवर्तक कवि और साथ ही प्रयोगवाद और नयी कविता के उन्नायक। इस नाते उन्हें आधुनिक हिन्दी नई कविता का पर्याय कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। इससे भी बढकर वे तार सप्तक, दूसरा सप्तक, तीसरा सप्तक एवं चौथा सप्तक के ख्यात सम्पादक रहे तथा ’शेखर ः एक जीवनी‘, ’अपने अपने अजनबी‘ और ’नदी के द्वीप‘ उपन्यासों के लब्धप्रतिष्ठ कथाकार, ’असाध्य वीणा‘ जैसी विलक्षण कविता के अनोखे स्रष्टा भी। आधुनिक काल से उनका नाम उसी प्रकार हटाया नहीं जा सकता, जिस प्रकार तुलसी का भक्तिकाल से, बिहारी का रीतिकाल से, प्रसाद का छायावाद से। ’’संस्कृति और परिस्थिति, संस्कार और संवेदना, भारतीयता और आधुनिकता के द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों की जैसी गहरी पहचान और इससे जुडा दायित्व सजग चिंतक अज्ञेय के यहाँ मिलता है, वैसा आधुनिक युग के शायद ही किसी अन्य लेखक में मिले। यही कारण है कि वे न केवल हिन्दी में आधुनिक भाव-बोध के प्रवर्तक के रूप में प्रतिष्ठित हुए, बल्कि लगातार लगभग आधी सदी तक अपनी और परवर्ती पीढी के लिए प्रेरणा और चुनौती बने रहे।‘‘१ बहरहाल, अपने आधुनिक भावबोध, गहन अध्ययन, चिंतन-मनन एवं नये प्रयोगों की माफर्त अज्ञेय न केवल पारम्परिक कविता की अन्तर्वस्तु और शिल्प में तब्दीली लाए, बल्कि नई कविता को प्रयोग के धरातल पर उतारकर, उसे नवीन सौष्ठव प्रदान कर उसकी प्रयोगधर्मिता को भी स्थापित किया। यदि नये प्रयोग उनके सम्बल हैं तो सत्यान्वेषण उनकी रचना दृष्टि का लक्ष्य। इससे जहाँ एक ओर उनका खोजी सृजनशील व्यक्तित्व, अथक अन्वेषक मानस स्पष्ट होता है वहीं दूसरी ओर उनके स्वतंत्रचेता एवं सतत जागरूक कवि रूप का भी परिचय मिल जाता है। हिन्दी साहित्य में अज्ञेय एक मात्र ऐसे व्यक्ति रहे जो अपने जीवन व लेखन, दोनों में एक अत्युच्च मानदण्ड के आग्रह और उसके समुचित निर्वाह से परिचालित रहे। उनकी समग्र सृजन साधना और जीवनव्यापी कार्यों में भी सांस्कृतिक अस्मिता का यह आग्रह निरन्तर प्रतिफलित होते देखा जा सकता है। प्रारम्भ से ही अज्ञेय की छवि और भंगिमा पूरी तरह से कवि की ही थी ः उदात्त, उत्तुंग और गंभीर। इन्हीं के सम्मिश्रण से उनकी कविता में जो भंगिमा और गरिमा आती थी, वह उनके समकालीन कवियों के लिए ईर्ष्या का विषय था और नयी पीढयों के लिए प्रेरणा और आदर्श का। इस कारण वे जहाँ भी होते थे, उनकी उपस्थिति की भव्यता छिपती या दबती नहीं थी।
हिन्दी कविता में आधुनिक दौर की शुरुआत अज्ञेय द्वारा सम्पादित ’तार सप्तक‘ से होती है। अज्ञेय मूलतः तीव्र भागावेगों के कवि हैं। यही भावावेग सभ्यता के सांस्कृतिक मूल्यबोध के साथ मिलकर कवि को उदात्त भावभूमि पर प्रतिष्ठित कर देता है। ’’ऐसे आवेगशील किन्तु नैतिक बुद्धिजीवी की प्राकृतिक-सांस्कृतिक ऊर्जा ही उसे सच्चा संतुलन प्रदान करती है, उसे उत्तरोत्तर उदार बनाती जाती है। उसे वह संवेदनशील अन्तर्दृष्टि देती है, जो किसी भी कोरे सिद्धान्त से बडी चीज है।‘‘२ उनके जैसा शायद ही कोई सर्जक व्यक्तित्व हो, जो उनके समान जीवनभर सक्रिय व सृजनशील रहा हो। लिखना अज्ञेय के लिए पराधीनता, जडता व संकीर्णता से मुक्त होना है। इस मुक्त होने में व्यक्ति और काल दोनों समाहित हैं।
वरिष्ठ आलोचक कृष्णदत्त पालीवाल ने ठीक ही लक्ष्य किया था कि ’’अज्ञेय होने का अर्थ है अपने समय-समाज की सर्जनात्मकता को पहचान कर उसे डी-कंस्ट्रक्ट करना। तभी तो उनके चिंतन के केन्द्र में रही है आधुनिक मानव की स्वाधीनता और सर्जनात्मकता।‘‘३ यह संयोग की ही बात है कि भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का समय अज्ञेय के सृजनशील व्यक्तित्व के उभार और उत्कर्ष का भी दौर रहा है और ऐसे में यदि ’स्वतंत्रता की तलाश‘ अज्ञेय के सृजन संसार का मूल स्वर रहा है तो आश्चर्य की बात नहीं। इसी का समर्थन करते हुए पालीवाल जी लिखते हैं, ’’अपने-अपने अजनबी‘ में स्वाधीनता की तलाश ही केन्द्रीय सरोकार है। अज्ञेय की दृष्टि को सेल्मा व्यंजित करती है, जो सभी प्रकार के अहंकारों से छुटकारा पा जाने को ही वास्तविक स्वतंत्रता मानती है। अज्ञेय की महत्त्वपूर्ण लम्बी कविता ’असाध्य वीणा‘ में प्रियंवद का आत्म-समर्पण कलाकार के स्वाधीनता बोध का सृष्टिव्यापी विस्तार है।‘‘४ अज्ञेय की महत्ता इसी में आँकी जा सकती है कि उन्होंने जीवनभर इसी ’स्वाधीनता-स्वतंत्रता‘ की अवधारणा को अपने सृजन, चिंतन और विचारबोध के केन्द्र में रखा और स्वतंत्रता और आत्मबोध के अन्वेषण की इस भूमिका को निभाते हुए हिन्दी को आधुनिकता और भारतीयता का संस्कार दे गये।
२. ’असाध्य वीणा‘ ः सृजन रहस्य की आत्मदानी व्याख्या
’असाध्य वीणा‘ अज्ञेय जी की सबसे लम्बी कविता है। सन् १९५७-५८ के जापान प्रवास के बाद १८-२० जून, १९६१ को अल्मोडा के अपने कॉटेज में उन्होंने ३२१ पंक्ति वाली यह लम्बी कविता लिखी थी। चीन के ताओवाद के एक कथानक ’वीणा वादन‘ और जापान के कलाप्रेमी कजुओ ओकाकुरा की पुस्तक श्जीम ठववा व ज्तममश् में संकलित श्ज्ंउपदह व जीम भ्ंतचश् कहानी के आधार पर इस लम्बी कविता की परिकल्पना की गई थी। पाश्चात्य प्रेरणा के बावजूद ’असाध्य वीणा‘ को शुद्ध भारतीय धरातल पर रखते हुए सृजन-सम्प्रेषण समस्या को कविता के निहितार्थ के रूप में स्थापित कर अज्ञेय जी ने अपने सर्जक व्यक्तित्व का लोहा मनवाया। यही कारण है कि ’असाध्य वीणा‘ को लम्बी कविताओं की परम्परा में ही नहीं, आधुनिक हिन्दी नयी कविता में भी अत्यन्त प्रांजल और प्रौढ स्वीकारा गया है।
कविता में एक संक्षिप्त आख्यान वर्णित है। कविता की शुरुआत नाटकीय ढंग से होती है ः ’आ गये प्रियंवद केशकम्बली गुफा-गेह‘। केशकम्बली के आगमन पर राजा कृतकृत्य हो गये, धन्य हो उठे। उनमें यह उम्मीद जगती है कि अपने जीवन की अपूर्ण-साध पूरी होने वाली है। इसका लघु संकेत पाकर गण दौडे। असाध्य वीणा लाकर साधक के चरणों में रख दी गई। सभासदों की उत्सुक दृष्टि वीणा को लखकर प्रियंवद के चेहरे पर टिक गई। यहाँ अचानक दृश्य बदल जाता है और पूर्वदीप्ति ;सिंेी इंबाद्ध की शैली में वीणा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का वर्णन चलता है।
किंवदंती बन चुके तपस्वी साधक वज्रकीर्ति ने राजा को एक वीणा भेंट की थी, जिसे उन्होंने एक विराट् वृक्ष ’किरीट तरु‘ के तने से बनाया था, उसका फैलाव इतना व्यापक था कि वह पाताल को बादलों के पार आकाश से जोडता था। इस तरु के कानों में हिम-शिखर अपने रहस्य कहा करते थे; उसके कंधों पर बादल सोते थे, उसकी छाया में अनगिनत जीव-जन्तुओं ने आश्रय पाया था। उसके कोटर में भालू बसते थे, उसके वल्कल से सिंह कन्धे खुजलाते थे। इसकी गंधप्रवण शीतलता से फन टिकाकर वासुकि नाग सोता था। जिस दिन वज्रकीर्ति ने उस किरीटी तरु से वीणा बनाकर पूरी कर ली, उसी दिन उनकी साधना एवं जीवन-लीला का भी समापन हो गया। ऐसे महान् वृक्ष से बनी अभिमंत्रित वीणा को बजायेगा कौन? बडे-बडे कलावंत भी इसे बजा न सके*-
’मेरे हार गये सब जाने माने कलावंत
सब की विद्या हो गयी अकारथ, दर्प-चूर
कोई ज्ञानी गुणी आज तक इसे न साध सका!‘
ऐसा लगता है राजा की वाणी में सम्राट् जनक को विचलित करने वाला जानकी-स्वयंवर का वर-विषयक नैराश्य गूँज रहा है - ’तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न विधि वैदेहि विवाहू‘। और इस प्रकार यह वीणा ही असाध्य घोषित हो गई।
यहाँ वर्णित वीणा एक सामान्य वीणा नहीं है, बल्कि मंत्रपूत असाधारण वीणा है। फिर किरीटी तरु की आत्मा अभी भी उसमें बसी हुई है। अतः ऐसी स्थिति में कलाकार की परिभाषाधारी सामान्य व्यक्ति उसे साध नहीं सकता। उसमें से संगीत की सृष्टि वही कर सकता है जो महामौन या ब्रह्म का साधक हो। विशिष्ट व मंत्रपूत होने के कारण वीणा जीवित है, परमसत्ता के साथ उसका सीधा रागात्मक सम्बन्ध अभी भी है। वह परमसत्ता की अभिव्यक्ति का मौनरूप है। अतः उसे बजाना नहीं, उसके मौन को तोडना है। कोई कलावंत उसे बजा ही नहीं पाता।
बावजूद इसके राजा की आस्था बनी रही। उन्हें न जाने क्यों विश्वास था कि वज्रकीर्ति का कृच्छ्र तप व्यर्थ नहीं जा सकता। अपेक्षा है तो किसी सच्चे स्वर-सिद्ध की, समान-धर्मा साधक की। और चूँकि काल अनन्त है और पृथ्वी विशाल है कोई न कोई तो मिलेगा ही - ’उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोपि समानधर्मा / कालोह्ययं निरवधिः र्विपुला च पृथ्वी/‘। तब राजा एक ’केशकम्बली गुफागेह‘ को आमंत्रित करते हैं, जो तथाकथित ’कलाकार‘ नहीं है वरन् एक ’शिष्य साधक‘ है। केशकम्बली ने वीणा हाथों में थामी। राजा और रानी समेत सभी सभाजन उदग्र, पर्युत्सुक एवं प्रतीक्षमाण थे। प्रियंवद ने कम्बल खोलकर बिछाया, उस पर वीणा रखी और नेत्र मूँद लिये तथा तारों पर मस्तक टिका दिया। अपने को उसके प्रति समर्पित कर प्रियंवद उस वृक्ष के ध्यान में लीन हो जाते हैं। सभा में उपस्थित सहृदय ने सोचा कि साधक सो रहा है। जबकि साधक तो वीणा को साधने में तल्लीन था, आत्म-परिशोध करने में मग्न था। यहाँ पर अज्ञेय जी ने एक से एक ध्वनि प्रतीकों की झडी लगा दी है। इससे न केवल कवि का सौंदर्यबोध उजागर होता है बल्कि कविता सहज भाव से प्रकृति और जीवन के साथ जुड जाती है*-
हाँ, मुझे स्मरण है
बदली-कौंध-पत्तियों पर वर्षा-बूँदों की पट-पट घनी रात में महुए का चुप-चाप टपकना
चौंके खग-शावक की चिहुँक
शिलाओं को दुलराते वन-झरने के
द्रुत लहरीले जल का कल-निनाद
कुहरे में छन कर आती
पर्वती गाँव के उत्सव-ढोलक की थाप।
यहाँ पाठक अज्ञेय के काव्य कौशल, उनके वर्णन चातुर्य, बिम्ब एवं नाद योजना की दाद दिये बिना नहीं रह पाता। कहना असंगत न होगा कि यहाँ अज्ञेय की कवि-प्रतिभा स्वतः मुखरित होकर बोल रही है और सिर्फ इन्हीं ध्वनि प्रतीकों के मद्देनजर अज्ञेय को महत्त्वपूर्ण आधुनिक कवि ठहराया जा सकता है। पुनश्च, किरीट तरु के आंतरिक जगत् से तादात्म्य स्थापित कर वीणा को संगीत की ओर प्रवृत्त करने के लिए केशकम्बली जिन शब्दों का सहारा लेता है, वह भी बेजोड है*-
तू उतर बीन के तारों म
अपने को गा
अपने से गा -
अपने खग-कुल को मुखरित कर
अपनी छाया में पले मृगों की
चौकडयों को ताल बाँध,
अपने छायातप, वृष्टि-पवन,
पल्लव-कुसुमन की लय पर
अपने जीवन-संचय को कर छंदयुक्त,
अपनी प्रज्ञा को वाणी दे!
तू गा, तू गा -
तू सन्निधि पा - तू खो
तू आ - तू हो - तू गा ! तू गा !
बहरहाल, किरीटी तरु के समक्ष वह उसका सच्चा, शुद्ध समर्पण था। ध्यान में ’स्वयं को तिरोहित-समर्पित करते ही वीणा अपने आप झंकृत हो उठती है और उससे फूटने वाला संगीत सृष्टि का संगीत है, जिसे हर सहृदय अलग तरीके से सुनता है -
’’राजा ने अलग सुना ः
जय देवी यशःकाय
वरमाल लिये
गाती थी मंगल गीत
......................................
राज-मुकुट सहसा हलका हो आया था,
मानो हो फूल सिरिस का।
ईर्ष्या, महदाकांक्षा, द्वेष, चाटुता
सभी पुराने लुगडे-से झर गये,
निखर आया था जीवन-कांचन
.............................................
रानी ने अलग सुना ः
...............................................
सब ने भी अलग-अलग संगीत सुना
...................................................
किसी एक को नयी वधू की
सहमी-सी पायल-ध्वनि।
किसी दूसरे को शिशु की किलकारी
एक किसी को जाल-फँसी मछली की तडपन।‘‘
यह अश्रुतपूर्व संगीत सबको अलग-अलग सुनाई पडता है, अपने-अपने कर्मफल और आकांक्षा के अनुरूप - ’जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।‘ किसी को वह संगीत प्रभु का कृपा-वाक्य जान पडा तो किसी को भरी तिजोरी में कनक की खनक। किसी के लिए वह नववधू की पायल-निस्वन थी और किसी के निमित्त शिशु की किलकारी। कोई उसमें मण्डी की ठेलमठेल का आनन्द ले रहा था, जबकि कोई उसे तालयुक्त घण्टा-ध्वनि समझ बैठा। किसी को उस संगीत में हथौडों की चोटें सुनाई पडी और इतर जन को उसमें नौका पर लहरों की अविराम थपक। एक को यदि वह नट्टिन की पग-शिंजिनी की रुनझुन जान पडी तो दूसरे को युद्ध के कर्कष ढोल। इस समष्टि-संगीत के अवतरण में सब व्यक्ति एक साथ डूबते जरूर हैं, परन्तु तिरते हैं सब अलग-अलग और प्रत्येक व्यक्ति की पृथक-पृथक इयत्ता जगती है*-
’सब डूबे, तिरे, झिपे, जागे,
हो रहे वशवद, स्तब्ध
इयत्ता सबकी अलग अलग जागी
संधीत हुई
पा गई विलय!‘
इसके पश्चात् वीणा मूक हो गई। राजा सिंहासन से उतरे, रानी ने उन्हें सतलडी हार अर्पित किया। जनता ने जय-जयकार किया - ’धन्य! हे स्वरजित्! धन्य! धन्य!‘
जिस अस्मिता की तलाश यहाँ हो रही है वह अपने आत्म को सृष्टि की अखण्डता में तिरोहित करने वाली एक गुह्य अस्तित्व की तलाश है। यह शब्द ब्रह्म की तलाश है, ओहम से सोहम तक की यात्रा है। किन्तु यह महत्त्वपूर्ण है कि कविता के अन्त में कवि सीधे अपने पाठक को सम्बोधित करता है - ’प्रिय पाठक मेरी वीणा मौन हुई!‘ पाठक को सम्बोधित उनकी यह उक्ति छद्म आत्मपरकता का रोचक उदाहरण प्रस्तुत करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो समापन की ये पंक्तियाँ पाठक को इस विनोदपूर्ण आभास का आनन्द देती हैं कि कवि वस्तुपरकता के छद्म से मानो आत्मकथा ही कहता रहा है। असल में हर बडा कवि असाध्य वीणा को ही बजाता है। इस कविता को ध्यान से पढने के बाद हम लोग जान जाएँगे कि असाध्य वीणा को साधने वाला प्रियंवद केशकम्बली और कोई नहीं स्वयं वात्स्यायन जी हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी जी के कथनानुसार ’अज्ञेय के संदर्भ में यह ’मौन‘ मित कथन है, कहने और करने के बीच अनकहना है और गहरे स्तर पर आत्मदान का भाव है, जहाँ बोलना मानो आक्रमण है, मौन ही अपने को दे देना है।‘५ इस मौन के संदर्भ में विद्यानिवास जी ने लिखा है कि ’अंतिम पंक्तियाँ इसलिए आवश्यक थीं कि वाणी की सार्थकता मौन में है...यह मौन एक तरह से उस विराट् सत्य के नाना मुखरित रूपांतरों के ध्यान का संस्कार पाकर मौन बना है, यह अजनबी वीणा की तरह वीणा के स्रोत के आवाहन के माध्यम से बजकर मौन हुआ है, दूसरे शब्दों में स्रष्टा के संस्कार के प्रसाद-रूप में पाये हुए नये व्यक्तित्व के रूप में उदय हुआ है।‘६
मौन से मुखर और मुखर से मौन, द्वैत से अद्वैत, मम से ममेतर, व्यष्टि से समष्टि और पुनः समष्टि से व्यष्टि की विलक्षण यात्रा करने वाली यह कथात्मक लम्बी कविता अन्ततोगत्वा यह संदेश देती है कि सृजन कर्म, चाहे वह कला हो या साहित्य, नृत्य हो या संगीत, अंततः सर्वशक्तिमान का ही स्वर है, परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है। ’असाध्य वीणा‘ को बजाने वाला केशकम्बली गलकलुष और निरभिमानी होकर, कर्त्ता के बोध का त्याग करके वज्रकीर्ति द्वारा निर्मित ’असाध्य वीणा‘ को बजाता है। यहाँ केशकम्बली माध्यम ;उमकपनउद्ध मात्र है। वीणा बजने का श्रेय उसको नहीं जाता। केशकम्बली की स्वीकारोक्ति द्रष्टव्य है*-
’’श्रेय नहीं कुछ मेरा ः
मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में -
वीणा के माध्यम से अपने को मैं ने
सब-कुछ को सौंप दिया था -
सुना आपने जो वह मेरा नहीं,
न वीणा का था ः
वह तो सब-कुछ की तथता थी।‘‘
जापानी कथा श्ज्ंउपदह व जीम भ्ंतचश् में भी पाइवोह कहता है, ’’मैंने वीणा में सोये हुए संगीत को जगाया, अपने आपको भूलकर। मैं स्वयं नहीं जान सका कि मैं वाद्ययंत्र हूँ या वाद्ययंत्र मैं।‘‘ इस प्रकार प्रियंवद भी वीणा के सामने पूर्णतः समर्पित हो जाता है, उसमें तन्मय हो जाता है... तभी वीणा के माध्यम से वह विश्व संगीत, उस परम सत्ता का अस्तित्व अनुभूत होता है। कदाचित् इसीलिए भारतीय परम्परा में अभ्यास से ज्यादा साधना पर जोर दिया जाता है, प्रदर्शन से ज्यादा समर्पण पर। अज्ञेय ने ’ताजमहल की छाया में‘ कविता में लिखा भी है - ’साधन तो क्या, व्यक्ति साधना से ही होता दानी।‘ केशकम्बली अगर वीणा को जगा सकने में सफल होता है तो केवल अपने स्वत्व के बल से ही। वैसे भी महत् व्यक्ति उपकरणों का सहारा कहाँ लेता है - ’क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे‘। निराला जी ने भी तो ’तुम्हीं गाती हो अपना गान, व्यर्थ में पाता हूँ सम्मान‘ कहकर काव्य के इसी स्वतः स्फुरण ;ेचवदजंदमवने वअमतसिवूद्ध की ओर निर्देश किया है।
इस कविता में बौद्ध दर्शन के ’तथता‘ सिद्धान्त की भावपूर्ण अनुभूति कराई गई है। ’तथता‘ से तात्पर्य है ’वह सर्वातीत सत्य जो अपने मूल-रूप में कलाकार के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। ’असाध्य वीणा‘ की गाथा कुछ ऐसी ही है। मूलतः ’असाध्य वीणा‘ एक आध्यात्मिक आनन्द से परिपूर्ण करने वाली कविता है, जो अपने कथ्य और शिल्प दोनों को मिलाकर काव्य की उच्च वेदी पर प्रतिष्ठित होती है। ’प्रवृत्ति ः अहं का विलयन‘ शीर्षक अपने निबन्ध में अज्ञेय ने कविता को ’अहं के विलयन का साधन‘ और ’स्वस्थ व्यक्ति की आनन्द साधना‘ कहा है। ’असाध्य वीणा‘ की रचना और रचना-प्रक्रिया में इन दोनों ही महत् लक्ष्यों की उपस्थिति सहज ही महसूस की जा सकती है। कहने की, बल्कि दुहराने की जरूरत नहीं कि ’अहं का विलयन‘ और ’अभिव्यक्ति की खोज‘ - अज्ञेय और ’असाध्य वीणा‘ का जरूरी सरोकार है। ’पूर्ण समर्पण‘ और ’व्यक्तित्व की खोज‘ को भी इन्हीं के समानान्तर रखा जा सकता है। फिर ’असाध्य वीणा‘ हमारे अंतः और बाह्य जगत् की एकाकारता को ही नहीं, आत्मा और परमात्मा, व्यष्टि और समष्टि के तादात्म्य को भी रेखांकित करती है। पं. विद्यानिवास मिश्र जी ने इसी के समर्थन में लिखा है कि ’’गुफा-गेह में रहने वाला केशकम्बली ’प्रियंवद‘ कलावंत के रूप में नहीं बल्कि एक शिष्य साधक के रूप में वीणा के प्रति अपने को अर्पित करता है। ठीक-ठीक कहें तो अपनी व्यष्टि को उस समष्टिमयी वीणा में निःशेष भाव से डुबो देता है और समष्टि के प्रत्येक जीवन-स्पर्शी क्षण के साथ अपनी व्यष्टि का सीधा और रागात्मक तादात्म्य स्थापित करता है। जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तब वीणा बज उठती है। व्यक्ति का अभिमान विराट् के प्रति अर्पित होकर विराट् को गतिशील बना देता है। जब तक व्यक्ति के भीतर विराट् से निजता का सम्बन्ध स्थापित नहीं होता, तब तक वह एक अभिमंत्रित जड पदार्थ बना रहता है। उसे गतिशील बनाने के लिए व्यक्ति की आवश्यकता है और व्यक्ति को अपनी निजता प्रमाणित करने के लिए उस विराट् की आवश्यकता है। जब दोनों परस्पर साकांक्ष हो जायें और दोनों के बीच परस्पर पूर्ण रागात्मक सम्बन्ध स्थापित हो जाए, तब विराट् व्यक्ति की ओर उन्मुख हो जाता है, सृष्टि की धारा फौव्वारे की तरह एक केन्द्र से ऊपर जाकर अनेक केन्द्रों को छूने लगती है।‘७
बावजूद इसके ’असाध्य वीणा‘ को समय-समय पर स्थूल सामाजिक यथार्थ व आधुनिक जीवन संघर्ष की तराजू में तौला गया और शत-प्रतिशत खरा न उतरने के कारण इसे मूल्यांकन के परिदृश्य से बाहर भी रखा गया। इतना ही नहीं इसे ’आधुनिक परिवेश के साथ समझौते का सूचक‘, ’हिन्दू मानसिकता की उपज‘ कहकर इसकी कडी आलोचना भी की गई। यह सच है कि अज्ञेय शुद्ध यथार्थवादी सर्जक नहीं हैं परन्तु इससे यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि उनका सृजन समय-सापेक्ष नहीं। अज्ञेय जैसा सचेत सर्जक अपने युग यथार्थ को कैसे अनदेखा कर सकता है। ’असाध्य वीणा‘ के अंतिम हिस्से में अज्ञेय ने लिखा भी है ः ’उठ गयी सभा। सब अपने-अपने काम लगे।/युग पलट गया।‘ स्पष्ट है कि युग-जीवन से पलायन अज्ञेय जी का लक्ष्य नहीं रहा है, वरन् उस अविभाज्य महामौन का स्मरण कर समाज को समर्पित होने, अपने आपको बदलने और अपने कर्म को जिम्मेदारी से निभाने और विकास करने पर उन्होंने बल दिया है। सच तो यह है कि आज ’असाध्य वीणा‘ की प्रासंगिकता और बढ गई है। आज के इस उत्तर आधुनिक कोलाहल-विश्ाृंखलित समय में यह ’मौन साधना‘ की कविता है, निरर्थक-मूल्यहीन सृजन समय में यह ’सार्थक-सृजन‘ की कविता है, हिंसा-क्रूरता-बर्बरता के इस कठिन समय में यह ’शांति व आत्मशोध‘ की कविता है, मानवीय रिश्तों के टूटन, विघटन के इस दौर में यह ’समन्वय संगीत‘ की कविता है। शंभुनाथ आलोचना के अज्ञेय केन्द्रित विशेषांक में आधुनिक युग-यथार्थ की तर्ज पर इस कविता की सार्थकता को परखते हैं और इसकी प्रासंगिकता को उजागर करते हैं। वे ’असाध्य वीणा‘ को ’आधुनिक शोर, विघटन और हिंसा के युग में हार्मोनी की कविता‘ कहते हैं।
कहा जा सकता है कि ’असाध्य वीणा‘ के माध्यम से अज्ञेय जी ने साहित्य, संगीत अथवा कला की अलौकिक सृजन-प्रक्रिया और उसके आस्वादन की व्याख्या की है और सृष्टि की अविभाज्यता से एकाकार होने की महत् कथा सुनायी है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सार्थक सृजन में साधक और उसके सम्पूर्ण आत्मदान व समर्पण की भी माँग सदा रहती ही है। कथ्य और संरचना, दोनों दृष्टियों से हिन्दी की लम्बी कविताओं की परम्परा में ’असाध्य वीणा‘ का अपना अलग महत्त्व है और रहेगा। यह कविता अज्ञेय के सहज कवि-कर्म की दुर्लभ व अप्रतिम उपलब्धि है। हिन्दी की ही क्यों, समग्र भारतीय भाषाओं की दस शीर्षस्थ लम्बी कविताओं की सूची में भी ’असाध्य वीणा‘ को सहज ही शामिल किया जा सकता है।
३. ’असाध्य वीणा‘ की अर्थान्वेषी आलोचना
लम्बी कविताओं में सबसे अधिक चर्चा ’राम की शक्तिपूजा‘, ’असाध्य वीणा‘, ’अँधेरे में‘ और ’पटकथा‘ की हुई। अधिकतर आलोचकों ने समय-समय पर ’असाध्य वीणा‘ का अलग-अलग कोणों से मूल्यांकन किया है। यहाँ सिर्फ कुछ महत्त्वपूर्ण टिप्पणियों की चर्चा की जा रही है, जो चर्चित पुस्तकों में बिखरी पडी हैं और उन पर सहज ही सामान्य पाठक एवं छात्रों का ध्यान नहीं जाता। यहाँ सबकी चर्चा करना न तो सम्भव है और न ही अपेक्षित। चर्चा की शुरुआत श्रेष्ठ आलोचक नामवर सिंह से करते हैं।
’असाध्य वीणा‘ की मौन-व्यंजना को अद्वैत के साथ जोडते हुए नामवर जी ’कविता के नए प्रतिमान‘ में लिखते हैं*-*’असाध्य वीणा के विन्यास पर दृष्टिपात करें तो वह दो स्थिर बिन्दुओं के बीच फैलाई हुई रचना प्रतीत होती है। आदि में मौन और अन्त में मौन और दोनों ही स्थिर एवं पूर्ण निर्धारित। किन्तु मौन उभयनिष्ठ है। इस प्रकार आदि अन्त का द्वैत आभास मात्र है। आधार बिन्दु एक ही है। वह अद्वैत है।‘८
’कामायनी‘ और ’असाध्य वीणा‘ की तुलना के बहाने नामवर जी ’असाध्य वीणा‘ में निहित सार्थक जीवन ध्वनियों की प्रासंगिक चर्चा करते हैं*- ’जिस प्रकार ’कामायनी‘ का आरम्भ और अन्त दोनों ही हिमालय में होता है। उसी प्रकार ’असाध्य वीणा‘ का भी आदि-अन्त दोनों मौन में होता है। प्रसाद का हिमालय भी ’मधुरिमा में अपनी ही मौन सोया एक महान् संदेश‘ है। आकस्मिक नहीं है कि ’असाध्य वीणा‘ का मौन भी हिमालय के समान ही स्थिर, विराट् और हिम-शीतल है। वस्तुतः ’असाध्य वीणा‘ जिस वज्र किरीटी तरु के दारु से बनी है, उसकी जन्मभूमि हिमालय की ही उपत्यका है। मौन की इस स्थिर भूमि से ही व्यापक जीवन की हलचल की अनेक ध्वनियाँ निस्तृत होती हुई दिखाई गई हैं। इन ध्वनियों का चयन, कलन और विवरण अत्यन्त सावधानी से किया गया है। जीवन की विविधता और व्यापकता का पूरा आभास दिया गया है।‘‘९ आगे नामवर जी कविता में वर्णित विविध जीवित ध्वनियों की चर्चा कर उसे उस अखण्ड मौन से निसृत बताते हुए लिखते हैं*ः ’’वीणा बजती है राज-दरबार में, किन्तु उससे दरबार के वातावरण की ही रूप-छवियाँ नहीं ध्वनित होतीं, बल्कि ’बटिया के चमरौंधे की रुँधी चॉप‘, ’कुलिया की कटी में मेंड से बहते जल की छुल-छुल‘, ’लोहे पर सधे हथौडे की सम चोटें‘ आदि की भी ध्वनियाँ सुनाई पडती हैं। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार निर्गुण निराकार ब्रह्म से यह सृष्टि उत्पन्न हुई है, उसी प्रकार ’असाध्य वीणा‘ के मौन से अखिल सृष्टि की ध्वनियाँ उत्पन्न हुई हैं। किन्तु अन्त तक जाकर ये सभी ध्वनियाँ मौन में विलीन भी हो जाती हैं, जैसे कि ब्रह्म में सम्पूर्ण सृष्टि का अन्ततः लय होना निश्चित माना जाता है। यह परिणति सृष्टि की सारी ध्वनियों को माया में बदल देती है और अन्ततः इसकी असारता का एहसास होने लगता है। उल्लेखनीय है कि यह कथ्य स्वयं भाषा की रचना में अन्तर्ध्वनित होता है।‘‘१० परन्तु ध्यान देने की बात यह है कि नामवर जी ’असाध्य वीणा‘ में प्रयुक्त शब्दों को सामूहिक रूप से तनावहीन भाषा ः अशक्य भाषा कह कर इसकी खिंचाई करते हैं और साथ ही ’असाध्य वीणा‘ को छायावाद और रीतिवाद का मिलन बिन्दु घोषित करते हैं*ः ’’चाहे शिशु-सुलभ आह्लाद, विस्मय, कातर आत्मनिवेदन, समर्पण आदि का भावोच्छ्वास हो, चाहे वस्तुओं के ब्योरेवार बारीक विवरण की नपी-तुली सतर्कता, तुतलाहट-हकलाहट में टूटती हुई भाषा हो या स्थिर संयत सुनिश्चित शब्दों का सधा प्रयोग, सर्वत्र एक-सी तनावहीन भाषा है। ’असाध्य वीणा‘ की भाषा में आश्चर्यजनक रूप से छायावाद और रीतिवाद - जैसे दो विरोधी छोर एक बिन्दु पर मिलते दिखाई पडते हैं। एक ही निष्प्राण चेतना भाषा से लेकर भाव के स्तर तक - कथन से कथ्य तक आद्योपान्त व्याप्त है। भाषा की यह अशक्यता नैतिक अशक्यता का पर्याय है। इस प्रकार ’असाध्य वीणा‘ का मौन अपनी सारी वर्णन-चातुरी, नाटकीयता और शब्द-प्रयोग संबंधी सतर्कता के बावजूद आधुनिक परिवेश के साथ एक समझौते का सूचक है।‘‘११
नामवर जी के उपर्युक्त कथनों से स्पष्ट है कि वे ’असाध्य वीणा‘ के मौन की प्रशंसा करते हैं और वर्णित भाषा को निष्प्राण-अशक्य भाषा कहकर उसकी आलोचना भी करते हैं। महत्त्वपूर्ण स्थापना यह है कि वे इस कविता को ’मौन‘ की दृष्टि से छायावाद के साथ और ’शब्दावली‘ के लिहाज से रीतिवाद के साथ जोडते हुए, दोनों वादों के छोर को छूने वाली रचना कहते हैं।
बच्चन सिंह ’असाध्य वीणा‘ के भाव एवं कला पक्ष की बारीक चर्चा करते हुए इस कविता को अज्ञेय की प्रतिनिधि कविता मानते हैं। बावजूद इसके इसमें वे संवेदना की कमी को रेखांकित करते हैं। उनके मतानुसार ’’असाध्य वीणा‘ में मौन भी है, समर्पण भी है, रचना प्रक्रिया भी है, रहस्य भी है। यदि नहीं है तो संवेदना।‘‘१२ शब्द प्रयोग, ध्वनि, लय, नाद योजना हर दृष्टि से बच्चन जी इस कविता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं और जैन बुद्धिज्म के ध्यान सम्प्रदाय के साथ इस कविता का नाता जोडते हुए वे कहते हैं, ’’जिस ध्यान सम्प्रदाय जैन बुद्धिज्म को इस कविता का आधार बनाया गया है उसे अ-शब्द सम्प्रदाय भी कहा जाता है, अन्य सिद्धान्त शब्द-सिद्धान्त हैं। अन्य सिद्धान्त लेख हैं, यह अलेख है। अन्य सिद्धान्तों में बुद्ध के उपदेश हैं तो इसमें बुद्ध का मन या हृदय। यही कवि की अन्तर्मुखता और अन्तर्मुखता के संघटन की जटिलता है।‘‘१३ पद-बंधों की विशिष्टता के अन्तर्गत वे नाद, लय के अलावा विशेषण वक्रता, विस्मयात्मक और विराट् अर्थबोध-युक्त शब्दों का चुनाव, प्रगीतात्मकता की चर्चा करते हैं, साथ ही नाद योजना का वर्गीकरण भी करते हैं*ः १-प्रकृति या वातावरण से चुना गया नाद, और २-कर्म या जीवन से चुना गया नाद। पहले वर्ग में वे ’वर्षा बूँदों की पटपट‘, ’महुए का टपकना‘ आदि तथा दूसरे वर्ग में ’सोने की खनक‘, ’अन्न की सौंधी खुदबुद‘, ’नयी वधू की सहमी-सी पायल ध्वनि‘ आदि को रखते हैं और अन्त में बच्चन जी ’असाध्य वीणा‘ की सम्यक आलोचना करते हुए ’आत्मान्वेषण व अहं के विसर्जन‘ को कविता का मूल प्रतिपाद्य घोषित करते हैं*ः ’असाध्य वीणा, साहित्य-साधना की संकेतक है। प्रियंवद की तरह इसकी साधना में आत्म-शोध, आत्मान्वेषण करना पडता है, अहं का विसर्जन करना पडता है। शब्द से अशब्द की ओर जाना पडता है। लोग इसकी झँकृति को अपने-अपने ढंग से लेते हैं, अर्थात् कविता में अर्थ की अनेक परतें होती हैं। अन्यत्र विसर्जन में द्वैत बना रहता है किन्तु यहाँ पर विसर्जन की पूर्णता है - अद्वैत है। कलाकृति के रूप में यह महत्त्वपूर्ण रचना है। आधुनिकतावादी रचना। इतिहास से कटी हुई।‘‘१४
नरेश मेहता अज्ञेय के कवि होने और आधुनिक होने वाली बात को सहज रूप में स्वीकार नहीं कर पाते। उनके विचार से अज्ञेय की कविता और प्रतिभा स्वतःस्फूर्त ;ेचवदजंदमवनेद्ध नहीं है*- ’’आधुनिक कवियों की तरह वात्स्यायन के संदर्भ में भी यह काफी सच है कि अधिकांश समय वे यह नहीं भूल पाते हैं कि वे कवि हैं बल्कि आधुनिक और कविता लिख रहे हैं, इसीलिए उनकी कविता लिखे जाने का ही बोध करवाती है, रचे जाने या होने का नहीं। इसीलिए अहं या दमित उद्दाम वासना का सृजनात्मक विसर्जन या उदात्त शमन प्रायः नहीं हो पाता। पर हाँ, शाब्दिक कविता के द्वारा कुछ तनाव जरूर कम होता है। जो फूल जहाँ खिला है, वहीं वह अर्पित है - इस काव्य-उक्ति को पूर्ण काव्य बनने की स्थिति तक पहुँचने में बाधा स्वयं कवि की वह उपस्थिति है जो काव्य-चेष्टा के रूप में शेष पंक्तियों में होती है।
...वह केशकम्बली के अहं के विलयन की महत्ता को अनुभव भी करते हैं और उद्दाम वासना के शमन के हेतु भरी राजसभा में अनासक्त एकाग्रता वाली प्रक्रिया को भी जानते हैं परन्तु वह अज्ञेय से केशकम्बली नहीं बन पाते हैं। इसलिए ’असाध्य वीणा‘ कविता तो जरूर बन जाती है परन्तु कवि-व्यक्तित्व का काव्य-सत्य नहीं बन पाती। यद्यपि यह भी छोटी उपलब्धि नहीं है, फिर भी अन्तर तो है ही। वस्तुतः यह जानना ही होगा कि उपमान, उपादान या अलंकरण पूजा के लिए हैं, ये स्वयं पूजा नहीं होते। तब पूजा क्या है? भला इसका जवाब कोई क्या दे सकता है? पूजा के स्वरूप का निर्णय तो स्वयं सर्जक को ही अपने तईं करना होगा। क्या वह केशकम्बली उस वीणा को जानता था? क्या वह केशकम्बली उस वादन को जानता था, क्या वह केशकम्बली यह भी जानता था कि उसमें से क्या निसृत हुआ? मान लो यदि वह कहता, जो कि नहीं कह सकता था, तो वीणा की वह अलभ्य असाध्यता कभी साध्य हो पाती, जैसी कि उनके पूर्व किसी अन्य वादक, साधक या सर्जक के द्वारा नहीं हो सकी थी*? तात्पर्य यह कि कोई काठिन्य है, जिसका कि उल्लंघन केशकम्बली की भाँति असंज्ञ भाव से वात्स्यायन नहीं कर पाते हैं।‘‘१५
वरिष्ठ आलोचक-सर्जक रमेशचन्द्र शाह को निराला के अतिरिक्त अगर किसी कवि ने आकर्षित किया है तो वो हैं अज्ञेय। प्रारम्भ से ही शाह जी अज्ञेय साहित्य में डूबते-उतराते रहे हैं। इसी आकर्षण-सम्मोहन के परिणामस्वरूप अज्ञेय पर उनकी आलोचना सार्थक विमर्श बनकर हमेशा पाठकों का ध्यान खींचती रही है।
रमेशचन्द्र शाह ने अपनी छोटी-सी पुस्तक ’अज्ञेय और असाध्य वीणा‘ में ’असाध्य वीणा‘ का साँगोपाँग विवेचन करने के उपरान्त स्पष्ट रूप से कहा है कि ’यह कविता स्वयं सृजन-प्रक्रिया और सृजन रहस्य के बारे में है। सृजन स्वतंत्र और स्वयंभू है अपने उद्गम में, अपनी समूची प्रक्रिया में और अपनी निष्पत्ति तथा प्रभाव में भी, यह इस पूरी कविता के रचना-विधान से स्पष्ट व्यंजित होता है।‘ आगे विद्यानिवास मिश्र को उद्धृत कर शाह जी ’असाध्य वीणा‘ की अपनी व्याख्या में ’आत्मदान‘ को भी जोड देते हैं। वे लिखते हैं कि ’पं. विद्यानिवास मिश्र ने अज्ञेय के तीन चरणों की बात की थी*ः पहला ’विद्रोह और हताशा‘ का, दूसरा ’अपने भीतर शक्ति संचय‘ का, और तीसरा ’बिना किसी आशा के आत्मदान में सार्थकता पाने‘ का। ’असाध्य वीणा‘ - कहना न होगा, कवि के विकास-क्रम के इसी तीसरे चरण से ही सम्बद्ध रचना है।‘ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी द्वारा सम्पादित पुस्तक ’अज्ञेय‘ में सम्मिलित आलेख ’आँगन के पार द्वार‘ में ’असाध्य वीणा‘ की सम्यक आलोचना करते हुए (नरेश मेहता की ही तरह) वे लिखते हैं, ’असाध्य वीणा‘, जो अपनी सारी आंतरिक समृद्धि के बावजूद हमें आश्वस्त नहीं करती। उसका ’सत्य‘ जैसे हमारा अपना ’सत्य‘ होकर भी हमारे गले नहीं उतरता, क्योंकि वह नितान्त एकाकी और एकांगी सत्य है। ’असाध्यता‘ का एक ही स्तर कवि ने देखा और दिखाना चाहा किन्तु अपने इतिहास-बोध की असह्य यंत्रणा में छटपटाती हमारी उच्छिन्न चेतना के सामने उस असाध्यता के न जाने कितने एक से एक भयावह पहलू वास्तविक हो उठे हैं।‘१६ आगे शाहजी अपनी बात को और स्पष्ट करते हैं, ’’प्रियंवद केशकम्बली के वीणा के माध्यम से स्वयं को ’सबकुछ की तथता‘ को सौंपने का दृश्य अपनी सारी उदात्त पावनता‘ के साथ ही हमको आश्वस्त नहीं करता।‘‘१७
’आँगन के पार द्वार‘ संग्रह की समीक्षा करते हुए कुँवर नारायण जी ने ’असाध्य वीणा‘ को एक ’वृहत्तर माध्यम की खोज‘ की संज्ञा दी है। वे लिखते हैं कि ’असाध्य वीणा‘ - अज्ञेय की अब तक की सबसे लम्बी कविता है और वर्णनात्मक कविता की दिशा में भी उनकी पहली देन। कथावस्तु का जहाँ तक सवाल है, अज्ञेय ने उसे न्यूनतम रखा है - विषय किसी हद तक आध्यात्मिक क्षेत्र का ही है - जब कि सफल वर्णनात्मक काव्य के लिए शायद कथातत्त्व का ठोस आधार आवश्यक है। ’असाध्य वीणा‘ में ’प्रियंवद‘, ’रानी‘, ’वज्रकीर्ति‘, ’गण‘ आदि केवल नाम हैं। इन नामों में जितना कहानीपन है, कथानक की शायद उससे अधिक माँग होती है।‘१८
’असाध्य वीणा‘ की शैलीगत बुनावट के बारे में अपनी राय देते हुए कुँवर नारायण लिखते हैं - ’इस कविता की लय सोलह मात्राओं पर आधारित है, जिसमें काफी प्रबन्ध-रचना हुई है, लेकिन वर्णन में शायद कथा-तत्त्व के अभाव के कारण, थोडी एकरसता मालूम पडती है। इसमें संदेह नहीं कि ’असाध्य वीणा‘ की धीमी, मननशील लय बहुत-कुछ इसी छन्द के कारण सम्भव हो सकी है, लेकिन वर्णन में कथा जितनी भी है, ठीक से नहीं उभर पाती। कथातत्त्व और अधिक होता तो शायद यह एकरसता दब जाती, लेकिन जिस रूप में ’असाध्य वीणा‘ है, उससे यही लगता है कि भावों और स्थलों के अपेक्षाकृत हल्के-भारी निर्वाह के लिए लय अत्यधिक समतल है। सम्भव है इस लम्बाई की कविता के लिए वर्णिक छन्द अधिक उपयुक्त रहता, अधिक उन्मुक्त लय में, हो सकता है, इस ढंग का ’वर्णनात्मक चिंतन‘ बेहतर निभाता। कविता के गहरे आध्यात्मिक रंग में कहानी या वस्तुएँ या लोग, ठीक से घुलमिल नहीं पाते, अलग तैरते हुए लगते हैं।‘१९
विजयमोहन सिंह का कहना है कि ’अज्ञेय जी की कविताओं में निहित अतिरिक्त व अत्यधिक सचेतनता, प्रयत्न एवं सतर्कता ही उन्हें कदाचित् स्वाभाविकता के विपरीत कृत्रिमता की ओर ले जाते हैं। नरेश मेहता ने प्रकारांतर से इसी की ओर संकेत किया था। विजयमोहन सिंह इसे स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, ’अतिरिक्त सजगता या आत्मसजगता कविता में सायासता उत्पन्न करती है, जो एक सीमा के बाद काव्य के स्वाभाविक और प्रांजल रूप को क्षति पहुँचाती है।‘... ’जब तब बौद्धिकता पिघलकर भावनाओं के साथ संयुक्त नहीं हो जाती, कविता ’कठगुलाब‘ ही बनी रहती है। इस मामले में अज्ञेय की काव्य-प्रकृति पन्त से अधिक मिलती-जुलती है, यद्यपि उन्होंने निराला की तरह ऊबड-खाबड विषयों पर भी कभी-कभार छलांग लगाई है।‘२०
विजयमोहन जी ने ’असाध्य वीणा‘ को ’रचना प्रक्रिया को साधने की खोज‘ - ’महामौन को साधने की साधना‘ - ’मौन से मौन तक की यात्रा‘ की कविता कहा है और वर्णित कथावस्तु के आधार पर इसका मूल्यांकन ’पूर्वपक्ष‘ और ’उत्तर पक्ष‘ के रूप में किया है। प्रियंवद की साधना, वीणा का मुखर होना कविता का पूर्वपक्ष है और उसकी प्रभावान्विति, रसग्रहण तथा साधारणीकरण उसका उत्तरपक्ष है। बावजूद इसके वे असाध्य वीणा को एक विफल कविता के रूप में अपना निष्कर्ष देते हैं। विफलता के मूल में वे उपर्युक्त ’अतिरिक्त सजगता‘ मानते हैं*ः ’अज्ञेय ने भरसक यह चेष्टा की है कि यह सब प्रयत्न साध्य प्रतीत न हो, किन्तु पूरी कविता की संरचना में एक ऐसी पूर्व नियोजित प्रक्रिया तथा सचेष्टता है, जो कविता और उसके प्रभाव को कृत्रिम, आवेगहीन तथा काव्यात्मक ऊष्मा से रहित एक गूँजहीन ढाँचा बना देती है। सच तो यह है कि मूल उद्देश्य के विपरीत ’असाध्य वीणा‘ की कोई काव्यात्मक प्रभावान्विति होती ही नहीं।‘२१ और अपनी बात के समर्थन में वे पहले कुँवर नारायण की समीक्षा का उल्लेख करते हैं ’ऐसा कोई नया आयाम नहीं पाता जो पहले ही अज्ञेय के काव्य में इससे अधिक ऋजुता से व्यक्त न हो चुका हो।... वर्णनात्मक काव्य के लिए शायद कथातत्त्व का ठोस आधार आवश्यक है।... जबकि यहाँ कथा-तत्त्व के अभाव के कारण, थोडी एकरसता मालूम पडती है। कथा जितनी भी है, ठीक से उभर नहीं पाती...। कविता के गहरे आध्यात्मिक रंग में कहानी या वस्तुएँ या लोग ठीक से घुलमिल नहीं पाते, अलग तैरते हुए लगते हैं और अन्त में की यह बात उन्हें अखरती है कि बावजूद इसके ’कुँवर नारायण ’असाध्य वीणा‘ को वर्णनात्मक काव्य की दिशा में एक महल मानते हैं और उन्हें, यानी कुँवर जी को, लगता है कि अज्ञेय काव्य में किसी वृहत्तर माध्यम की खोज है।‘ विजयमोहन जी प्रकारान्तर से नरेश जी के कथन की व्याख्या करते हुए कुँवर जी की समीक्षा को आगे बढाते हैं। इसी क्रम में वे ’असाध्य वीणा‘ की मौलिक व्याख्या करने का सायास प्रयास भी करते दिखाई देते हैं और कुछ दूर तक वे सफल भी हुए हैं*ः ’’अज्ञेय के साहित्य में मौन, दर्द, पीडा, यातना आदि ’बीजशब्द‘ रहे हैं। ’असाध्य वीणा‘ में पीडा नहीं है पर महामौन को ही साधने की साधना है। लेकिन ’असाध्य वीणा‘ की अन्तर्वस्तु में एक अन्तर्निहित विडम्बना है*ः इस कविता में कवि कहना चाहता है कि वीणा कौशल और प्रयत्न से मुखरित नहीं होगी। उसके लिए महामौन को ही साधना चाहिए।... यहाँ प्रियंवद को माध्यम बनाकर अज्ञेय इलियट के उस सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं, जहाँ कलाकार मीडियम या माध्यम मात्र होता है। प्रियंवद और वीणा दोनों माध्यम मात्र हैं। जो मुखरित होता है, वह तो पृष्ठभूमि में महामौन का अलक्षित परिवेश है जिसमें वन, पशु, मेघ, वर्षा, पक्षियों की ध्वनियाँ सभी सम्मिलित हैं। वीणा के स्वर उनके संचार मात्र हैं। प्रियंवद अपनी समाधिस्थ साधना से उन्हीं ध्वनियों का आह्वान कर जाग्रत् करता है। यह जागृति ही वीणा का स्वरित होना है।‘‘२२
अज्ञेय की भारतीयता, उनकी कृतियों में निहित देशज संस्कृति व रागात्मक मनोवृत्ति एवं जीवन प्रियता से स्पष्ट होती है। स्वतंत्रता, जीवन-प्रियता एवं आस्था के प्रतिपादन के सहारे अज्ञेय जी जहाँ एक ओर पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति व मृत्यु को नकारते हैं, वहीं दूसरी ओर देशज संस्कृति व आधुनिकता की स्थापना भी करते हैं और रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में कहा जाए तो ’’मृत्यु के आधुनिक अस्तित्ववादी आतंक और तज्जन्य अनर्थकता से सर्जनात्मक होकर ही उबरा जा सकता है - अज्ञेय के कृतित्व में यह आधारभूत वस्तु अपने विभिन्न पक्षों और संदर्भों में अंकित हुई है।‘‘२३ इस रूप में अज्ञेय जी ने भारतीय रचना-परम्परा को नवीनता प्रदान करने के साथ-साथ उसे समृद्ध किया...समूची परम्परा को आलोकित किया।
वरिष्ठ आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी ने ’असाध्य वीणा‘ को केन्द्र में रखकर उसकी तुलना निराला की ’राम की शक्तिपूजा‘ एवं मुक्तिबोध की ’अँधेरे में‘ के साथ की है। ’राम की शक्तिपूजा‘ के साथ ’असाध्य वीणा‘ की तुलना करते हुए वे लिखते हैं कि ’’सृजन के इस रहस्य की आत्मदान के रूप में व्याख्या रचनाकार ने ’आँगन के पार द्वार‘ में संकलित लम्बी कविता ’असाध्य वीणा‘ में की है, जो अपने गठन में निराला की ’राम की शक्तिपूजा‘ का स्मरण दिलाती है। दोनों कविताओं में शक्ति और सृजन को अन्तः और बाह्य की टकराहट में देखने का यत्न किया गया है।.. आत्मदान के माध्यम से ’शक्तिपूजा‘ के राम शक्ति साधना करते हैं और आत्मदान के ही माध्यम से ’असाध्य वीणा‘ का कलावन्त वीणा को साधता है। यही शक्ति और सृजन के रहस्य का साक्षात्कार है। निराला ने अपने लिए कथानक बंगाल में प्रचलित राम-कथा से चुना, अज्ञेय ने एक जापानी लोककथा से।‘‘२४ और यह स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं कि ’असाध्य वीणा‘ की विवेचना के संदर्भों में यह ’आत्मदानी साधना‘ चतुर्वेदी जी की महत्त्वपूर्ण स्थापना थी।
आगे ’अँधेरे में‘ के साथ ’असाध्य वीणा‘ की तुलना करते हुए चतुर्वेदी जी ने लिखा है कि ’’नयी कविता की इन दोनों लम्बी कविताओं में रचना-शक्ति की खोज का आख्यान है।... दोनों कविताओं के बिम्ब-विधान को लेकर उभरता है*ः ’असाध्य वीणा‘ में केन्द्रीय बिम्ब संगीत के क्षेत्र का है, जहाँ अनुभूति के रचाव पर विशेष बल है, ’अँधेरे में‘ का केन्द्रीय बिम्ब लेखन-कार्य से जुडा है, मौत की सजा का विधान भी उसी पर आधारित है।... ’असाध्य वीणा‘ में संगीतकार की सृजन-प्रक्रिया अनुभूति के तईं अपने को समर्पित करने में है जबकि ’अँधेरे में‘ के नायक के लेखन-कार्य में वैचारिकता के विविध द्वन्द्व हैं।‘‘२५ वैसे भी ’अज्ञेय के कृतित्व का वैशिष्ट्य व्यक्तित्व और भाषा के गहरे आयामों को समरस करने में रहा है, कविता और कथा-साहित्य दोनों में। मानव की सर्जनात्मक क्षमता को केन्द्रीय वस्तु मानने के कारण अज्ञेय की कविताओं में जगह-जगह रचना-प्रक्रिया की व्याख्या होती है।‘२६
परन्तु लब्धप्रतिष्ठ आलोचक कृष्णदत्त पालीवाल ’असाध्य वीणा‘ की व्याख्या को ’सृजन-प्रक्रिया के रहस्य‘ तक सीमित नहीं करते। उनका कहना है कि ’अज्ञेय के रचना कर्म की सृजन-प्रक्रिया को उनके सर्जनात्मक परिवेश से जोडना निहायत जरूरी है। हो सकता है ’असाध्य वीणा‘ जैसी रचना उनकी किसी आंतरिक जरूरत, कला की भीतरी प्रश्नाकुलता, कला संदर्भों में जज्ब चुनौती हो, जिसे कलाकृति में बाँधते समय उनकी चेतना अपने तीर और पक्षी की आँख पर एकाग्र होकर केन्द्रित रही है। इसलिए ’असाध्य वीणा‘ जैसी कलाकृति क केवल सृजन-प्रक्रिया के रहस्य को उद्घाटित करने वाली रचना नहीं कहा जा सकता। पूरी कविता का कथा-रूपक चाहे विदेशी हो या देशी उसमें रचना-कर्म की ’मनोभूमिका‘, सृजन-प्रेरणा का तंत्रलोक पूरे विस्मय के साथ उपस्थित है। इस भावतंत्र के साधक हैं अज्ञेय।‘२७
विजय बहादुर सिंह ’असाध्य वीणा‘ को हिन्दी खडी बोली कविताओं की एक प्रतिनिधि कविता स्वीकारते हैं। वे सार्थक कला सृजन के लिए ’आत्मशोध‘ को अनिवार्य मानते हुए लिखते हैं कि ’कला न तो रूढ काव्य-विवेक है, न अंधपरम्परानुगमन। वह तो परम्परा का पुनरान्वेषण और पुनर्सृजन है। किन्तु यह तभी सम्भव है, जब यह प्रक्रिया आत्मशोधन से शुरू की जाए।‘२८ इसी बात को विस्तार देते हुए आगे वे ’उस स्पंदित सन्नाटे में/मौन प्रियंवद साध रहा था वीणा‘ के संदर्भ में लिखते हैं कि ’बाहर से भीतर और भीतर से और भीतर की यह यात्रा ही वह आत्मशोध है, जो किसी भी साधक को उस कठिन असाध्यता पर विजय प्राप्त करने के श्रेय से भर देता है।‘२९ और ’असाध्य वीणा‘ पर अपना निष्कर्ष सा देते हुए सिंह जी कहते हैं कि ’असाध्य वीणा‘ एक ऐसा ही ’संचित संगीत‘ है, जिसे अज्ञेय ने अपनी प्रतिभा के चरम पुरुषार्थ से रचा है... अज्ञेय इस कविता के माध्यम से प्रकृति और लोक-जीवन के एक असाधारण सर्जक के रूप में हमारे सामने आते हैं।‘ कहा जा सकता है कि ’असाध्य वीणा‘ सृजन-प्रक्रिया की गहन अनुभूति के धरातल को न सिर्फ छूती है बल्कि एक विलक्षण सामर्थ्य के साथ उसे सम्प्रेषित भी करती है और हर समीक्षक ’असाध्य वीणा‘ को कुछ न कुछ नये संदर्भ से जोडते हुए नये-नये अर्थ विस्तार से युक्त करते हैं।
संदर्भ ः
१. रमेशचन्द्र शाह, अज्ञेय, साहित्य अकादेमी, दिल्ली, पृ.*७०
२. वही, पृ. १२
३. कृष्णदत्त पालीवाल, अज्ञेय होने का अर्थ, वत्सल निधि, पृ. १५
४. वही, पृ. ३६
५. रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिन्दी काव्य संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, पृ. २१४
६. विद्यानिवास मिश्र, रीति विज्ञान, राधाकृष्ण प्रकाशन, पृ. १७२
७. वही, पृ. १७०-१७१
८. नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, पृ. ११२
९. वही, पृ. ११२-११३
१०. वही, पृ. ११२-११३
११. वही, पृ. ११३
१२. बच्चन सिंह, हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन, पृ. ४२६
१३. वही, पृ. ४२६
१४. वही, पृ. ४२७
१५. नरेश मेहता , काव्यपुरुष अज्ञेय, लोकभारती प्रकाशन, पृ. ७२
१६. सं. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, अज्ञेय, में सम्मिलित रमेशचन्द्र शाह जी के आलेख ’आँगन के पार द्वार‘, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, पृ. ४४
१७. वही, पृ. ५०
१८. सं. देवीशंकर अवस्थी, विवेक के रंग, वाणी प्रकाशन में संकलित कुँवर नारायण द्वारा लिखित ’आंगन के पार द्वार‘ की समीक्षा ’एक वृहत्तर माध्यम की खोज‘ से, पृ. १२८-१२९
१९. वही, पृ. १२९
२०. विजयमोहन सिंह, बीसवीं शताब्दी हिन्दी साहित्य, राजकमल प्रकाशन, पृ. ४८
२१. वही, पृ. ४९
२२. सं. देवीशंकर अवस्थी, विवेक के रंग, वाणी प्रकाशन में संकलित कुँवर नारायण द्वारा लिखित ’आँगन के पार द्वार‘ की समीक्षा ’एक वृहत्तर माध्यम की खोज‘ से, पृ. १२८-१२९
२३. रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिन्दी काव्य संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, पृ. २०८
२४. वही, पृ. २१०
२५. वही, पृ. २२६-२२८
२६. वही, पृ. २१४
२७. वाक सं. सुधीश पचौरी, अंक १३, अक्टूबर-दिसम्बर २०१३ में प्रकाशित कृष्णदत्त पालीवाल जी का आलेख, ’अज्ञेय ः कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ‘, पृ. ३५
२८. विजय बहादुर सिंह, कविता और संवेदना, पृ. १४६
२९. वही, पृ. १४९
युवा ऊर्जावान आलोचक। हिन्दी के प्राध्यापक हैं। वे कई सम्मानों से अलंकृत भी हैं।