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रणजीत : पार्टीशाही से बगावत करता एक ’कामरेड‘ कवि

नवलकिशोर
स्तालिनकालीन ’सोवियत-संघ‘ में न केवल साम्यवाद-विरोधी चिंतन वर्जित था - पार्टी-लाइन से हटकर सोचना भी दण्डनीय अपराध हो गया था। फलतः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वथा समाप्त हो गई थी। इसके बावजूद मानवीय स्वातंत्र्य-चेतना से अभिप्रेरित कोई-न-कोई लेखक प्राणदण्ड या यातनाप्रद लम्बे कारावास का खतरा उठाता रहता था। शीतयुद्ध के दिनों सोवियत-विरोधी दुष्प्रचार के चलते विचारकों और लेखकों के दमन के समाचारों पर साधारणतः भरोसा नहीं होता था, क्योंकि लेखकों और कलाकारों को वहाँ राज्य की ओर से ऐसी विशेष सुविधाएँ प्राप्त थीं, जो पश्चिम के किसी भी पूँजीवादी जनतंत्र में अप्राप्य थीं - भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में तो वे अकल्पनीय ही थी। लेकिन सच्चाई अपारदर्शी लौह-दीवारों के पार भी छन कर आने लगी थी - विशेषतः तब जब ’पास्तरनाक‘ को नोबल-पुरस्कार लेने की न केवल अनुमति नहीं दी गई, उनके लेखन की घोर निंदा भी की गई। आगे शांतिवादी अणु-वैज्ञानिक सखारोव भी भर्त्सना का विषय बने। सोवियत-सत्ता स्तालिन और साम्यवादी दल के प्रति वफादारी में तनिक-से भी विचलन को बर्दाश्त नहीं करती थी। ’समाजवादी यथार्थवाद‘ के नाम पर एक निर्देशित कला-सिद्धान्त रचनात्मक अभिप्रेरणा का स्रोत और लक्ष्य बना दिया गया था। इसका अनुपालन न करने वाले लेखकों-कलाकारों को ’गुलाग‘ (सोल्जेनित्सिन-प्रदत्त नाम) जैसे श्रमशिविरों (कैदखानों) में भेज दिया जाता था, जहाँ अनेक कैदी क्रूर व्यवहार को भोगते लम्बी सजा के बीच ही चल बसते थे। सोवियत-अधिनायकवाद से मोह-भंग वाले पूर्व कामरेडों की पश्चिम में एक बडी जमात थी। उनमें ज्यादातर सोवियत-शत्रु ही नहीं, समाजवाद-विरोधी और जनतंत्र-समर्थन के नाम पर पूँजीवादी व्यवस्था के पक्षधर तक हो गए थे। उन दिनों पाश्चात्य बौद्धिक संसार में आर्थर कोएस्लर (भूतपूर्व कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी) की माक्र्सवाद की विफलता पर - विशेषतः सोवियत साम्यवाद के अन्तर्गत स्वतंत्रता के सर्वथा अभाव को लेकर - ’द गॉड दैट फेल्ड‘ की विशेष चर्चा थी। खुश्चेव के द्वारा स्तालिन के भयावह दमन-चक्र के खुलासे के बाद भी ब्रेज्नेव-काल तक सोवियत समाज विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिहाज से एक प्रतिबंधित समाज ही बना रहा। स्तालिन की निरंकुश तानाशाही को पार्टी में सामूहिक निर्णय के सिद्धान्त को ’व्यक्ति-पूजा‘ (पर्सनैलिटी- कल्ट) द्वारा निरस्त किए जाने का परिणाम माना गया। शीतयुद्ध के दिनों सोवियत-संघ और उसके प्रभाव-क्षेत्र के पूर्वी यूरोप में वाक-स्वतंत्रता पर जो कठोर बंधन थे और जिनके कारण लेखकों- कलाकारों के साथ जो यातनाप्रद व्यवहार होते थे, भारत के साम्यवादी नेता-कार्यकर्त्ता उन्हें साम्राज्यवादी-पूँजीवादी प्रचार तो करार देते ही थे, उससे आगे बढकर समाजवाद की रक्षा में हिंसापूर्ण दमन को अनिवार्य भी मानते थे। इस बारे में प्रगतिशील लेखक-संघ के सदस्य व हमराही या तो पार्टी-प्रचारित सफाई देते थे या चुप रहते थे। पास्तरनाक-प्रसंग में मुझे याद है कई दिनों तक अमृतराय के अलावा किसी नामचीन लेखक ने कोई असहमतिपरक वक्तव्य नहीं दिया था। समाजशास्त्री श्री पी.सी. जोशी की सोवियत सच का खुलासा करने वाली किताब सोवियत-संघ के विघटन के लगभग दो दशक बाद आई है।
प्रगतिशील लेखक-संघ यों तो गैर-माक्र्सवादी किन्तु उन्नतिशील विचारों के लेखकों के लिए भी खुला था, लेकिन प्रधानतः वह भारतीय साम्यवादी दल का ही एक साहित्यिक मंच था, जो सोवियत-संघ के प्रति निष्ठावान था। इसलिए प्रगतिशील लेखक-संघ की निष्ठा भी सोवियत- माक्र्सवाद के प्रति प्रगाढ थी और फलतः साहित्यिक आदर्शों के लिए वह सोवियत सांस्कृतिक नीति-रीति का मुखापेक्षी भी था। ऐसे में विचारधारा-प्रतिबद्ध किसी प्रगतिशील लेखक से यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती थी कि वह सोवियत साम्यवादी दल और उसके द्वारा निर्देशित कलानुशासन को प्रश्नांकित करे। पार्टी से अप्रतिबद्ध वाम सोच के लेखकों के बीच विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में रूस के विरुद्ध आलोचनात्मक स्वर अवश्य उभरने लगे थे। हिन्दी के मान्य प्रगतिशील लेखक इस सम्बन्ध में जब लगभग चुप-से थे तब जिन चन्द घोषित माक्र्सवादी युवा रचनाकारों ने सोवियत-व्यवस्था के प्रति संदेह और शिकायत को स्वर दिए, उनमें एक मुखर आवाज रणजीत की थी, जो उन्नीस सौ साठ के दशक में उभरे प्रगतिशील कवियों में एक जाना-पहचाना नाम है।
आज स्थिति एकदम बदल गई है। साम्यवादी दल के विभाजन के बाद भारतीय साम्यवादी (माक्र्सवादी) दल बना और उससे सम्बद्ध जनवादी लेखक-संघ गठित हुआ। आगे एक और वामपंथी लेखक संघ ’जन संस्कृति-मंच‘ अस्तित्व में आया, जिसका सम्बन्ध भारतीय साम्यवादी-दल (माक्र्सिस्ट- लेनिनिस्ट) से है। इनके बीच विचारधारागत मतभेद बहुत धुँधले हैं और अब वे अलग-अलग वामपंथी गुटों के लिए अलग-अलग प्लेटफार्म जैसे होकर रह गए हैं। लेखक समाज पर उनका वैसा प्रभाव नहीं है, जैसा कभी प्रगतिशील लेखक-संघ का था। स्वयं प्रगतिशील लेखक-संघ का प्रभाव आजादी के बाद - विशेषतः तेलंगाना की विफल क्रान्ति के बाद क्षीण हो गया था। अब तो वामपंथी रुझान के बहुत-से लेखक लेखक-संगठनों के बाहर हैं और वे समतावादी तो अवश्य हैं, पर दल-निरपेक्ष हैं, क्योंकि तीनों संगठन प्रच्छन्नतः अपने-अपने मूल राजनीतिक दलों से अनुशासित हैं।
ग ग ग ग ग
रणजीत की काव्य-रचना का आरम्भ प्रगतिशील विचारधारा के पक्के अनुयायी की तरह हुआ और इसलिए प्रगतिशील लेखक-संघ का वह अत्यन्त सक्रिय कार्यकर्त्ता भी बना। प्रगतिशील कवि के रूप में उभरने के साथ ही उसने शोध-प्रबन्ध के रूप में ’हिन्दी की प्रगतिशील कविता‘ नाम से एक आलोचना-पुस्तक लिखी, जिसकी महत्त्व- स्वीकृति ’सोवियत लैण्ड-नेहरू पुरस्कार‘ (१९७१) के रूप में हुई। १९७३ में अल्माअत्ता में आयोजित पाँचव अफ्रीकी एशियाई लेखक-सम्मेलन में उसे भारतीय लेखकों के आमंत्रित दल में शामिल होने का अवसर दिया। १९७३ में ही उसने केदारनाथ अग्रवाल के सहयोगी के रूप में बाँदा में अखिल भारतीय प्रगतिशील हिन्दी साहित्यकार-सम्मेलन का आयोजन किया, जिसे कई साल के अन्तराल के बाद प्रगतिशील-मंच द्वारा सम्पन्न एक वृहद् समारोह का गौरव मिला था। अपने कविता-संग्रहों के प्रकाशन के साथ उसने ऐतिहासिक क्रम से चयन करते हुए आधुनिक हिन्दी-कविता का एक संकलन ’प्रगतिशील कविता के मील के पत्थर‘ के नाम से निकाला, जिसमें प्रगतिशीलता के प्रतिमानों को वृहत्तर मानवीय सरोकारों तक व्याप्त कर दिया गया है।
रणजीत का मोहभंग न सोवियत रूस के ध्रुव विरोध तक गया और न समाजवादी निष्ठा से उसका तनिक भी विचलन हुआ। हिन्दी में मोहभंग के बाद समाजवाद ही नहीं, मानववाद-सामान्य तक के विरोध की सीमा तक जाने वाले एकमात्र लेखक निर्मल वर्मा हैं, जो अति-आधुनिक/अति- भारतीयतावादी/अति-प्रतिगामी एक साथ हैं। प्रगतिशील आलोचना में व्यक्तिवादी और कलावादी करार दिए गए अज्ञेय तक न सोवियत-शत्रु थे और न मानववादी आदर्शों के अस्वीकारक। खैर, समाजवाद-मानववाद के उनके अस्वीकार के बावजूद मेरी दृष्टि में निर्मल वर्मा एक बडे लेखक हैं और रणजीत-प्रसंग में उनके स्मरण का मकसद उन्हें रणजीत की बराबरी पर लाने का नहीं है; कामरेड-बिरादरी से निकले लेखकों में उसकी उस हिम्मत और उस ईमानदारी की तारीफ करने का है, जो उसने बिना माक्र्सवाद-विरोधी हुए तब दिखाई थी, जब रूसी शासन की निंदा को संगठन में कुफ्र से कम नहीं समझा जाता था।
आज की रणजीत की विचारदृष्टि को मोटे तौर पर ऐसी मानववादी विचार-पद्धति कहा जा सकता है, जिसमें समाजवादी समाज-रचना का लक्ष्य तो जस-का-तस है, पर जिसका स्थापन और संचालन जनतांत्रिक आधारों पर ही होना चाहिए। प्रगतिशील लेखक-संघ से १९८० में सम्बन्ध-विच्छेद के बाद भी उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक क्रियाशीलता बराबर बनी रही है। इधर वह स्व. कमलेश्वर, राजकिशोर, गीतेश शर्मा व कतिपय अन्य लेखकों व समाजकर्मियों तथा संदीप पांडेय द्वारा गठित ’मानवीय समाज‘ नामक जाति-धर्म-निरपेक्ष संगठन के संस्थापक के रूप में सक्रिय हैं। सामाजिक- राजनीतिक सक्रियता के साथ उसका रचना-कर्म भी निरन्तर चलता रहा है।
रणजीत ने कलम उठाई थी एक ऐसे प्रतिबद्ध कवि के रूप में, जिसके लिए ’कामरेड‘ शब्द सिर्फ एक शब्द नहीं, इंसान के नये भविष्य का वाचक था -
’कामरेड‘!
सिर्फ एक चुंबन नहीं, एक मंत्र है
जो बोलने वाले और सुनने वाले
दोनों को पवित्र कर देता है
एक मंत्र, जिसे छूते ही अलग-अलग देशों, नस्लों, रंगों और वर्गों के लोग
एक दूसरे के सहज सहोदर बन जाते हैं।
एक रहस्यमय मंत्र
जो इंसान की आजादी,
बराबरी और भाईचारे के लिए
कुरबान होने वाले लाखों शहीदों की
समाधियों के दरवाजे सबके लिए खोल देता है और साधारण से साधारण व्यक्ति
उनकी महानता से हाथ मिला सकता है।
इस कामरेड कवि ने साहित्य को क्रांति का औजार मानते हुए अपने शब्दों को मुक्ति-सैनिकों की भूमिका देनी चाही थी - ’जाओ!/ओ मेरे शब्दों के मुक्ति सैनिको, जाओ!/जिन जिन के मन का देश अभी तक है गुलाम/...उन सब तक नई रोशनी का पैगाम आज पहुँचाओ...।‘
अपने देश के लोकतंत्र को वह ’बटमारों और तम के पहरेदारों‘ की ऐसी बस्ती मानता है जहाँ ’खून चूसने की सबको पूरी-पूरी आजादी है‘ और इसलिए उसके लिए कविता लिखना उस लडाई में शामिल होना है, जो उसकी इस अपनी बस्ती को ही नहीं, पूरी दुनिया को बदलने के लिए लडी जा रही है और लडी जाती रहेगी। तब तक, ’मानव मानव मध्य विषमता जब तक दूर नहीं होती/सुख से कैसे जी सकते हैं, इस दुनिया के सारे लोग?‘ अपना आत्म-परिचय देते हुए कवि अपने रचना-लक्ष्य को इन शब्दों में रखता है*-
प्यार और बगावत के मैं गीत लिखता हूँ
हैवानियत की हार और
इंसानियत की जीत लिखता हूँ
लडाई जारी रहेगी जब तक
’इंसान‘ इंसान नहीं बनता
इसलिए अपना नाम अभी ’रणजीत‘ लिखता हूँ।
इस कामरेड कवि का यह जोश तब ठंडा पडने लगता है, जब साम्यवादी देशों में जब-तब चलते रहने वाले शुद्धि-अभियानों के प्रति उसमें संदेह जागता है। वह विभ्रमित है कि कल के वफादार क्रांतिकारी क्यों आज गद्दार करार दिए जा रहे हैं और कैसा न्याय है कि उनसे आनन-फानन में जुर्म कबूलवाया जा रहा है, गोली से मारे जाने के लिए उन्हें फायरिंग-स्क्वाड के सामने पेश किया जा रहा है या बर्फीले रेगिस्तान की काल-कोठरियों में भेजा जा रहा है! उसे इस सच का पता चलने लगता है - जनता ने की थी क्रांति/संसार को स्वर्ग बनाने के लिए/क्रांति ने पैदा किए नेता/ नेताओं ने डाल दिया क्रांति को अपने हरम में/ जनता जाए जहन्नुम में/और क्रांति/जनता के दमन और दोहन का हथियार बन गई।
ट्राट्स्की की पुस्तक ’रूसी क्रांति का इतिहास‘ पढते हुए उसे क्रांति के अधिकृत रूसी इतिहास में भूतपूर्व क्रांतिकारियों पर कालिख पोते जाने पर गहरा रंज होता है -
वे सब जो विजयी होकर लौटे हैं/जिन्दा बचे हैं/सच्चे हैं, देशभक्त हैं, महापुरुष हैं/वे सब जो हार गए/खेत रहे/झूठे थे, गद्दार थे, दुष्ट थे/नीति कहती है/सत्य की हमेशा जीत होती है/इतिहास कहता है/जो जीतता है वह सत्य कहा जाता है।
इन्हीं शंकाओं के चलते साम्य के स्वर्ग की सम्भावित (सोवियत) भूमि से उसका मोहभंग होने लगता है और तब से रूस का भीतरी तंत्र और बाहरी विस्तारवाद उसकी आलोचना के विषय हो जाते हैं। १९८६ में लोकभारती से प्रकाशित ’झुलसा हुआ रक्त कमल‘ की अधिकांश कविताएँ उसकी इस बदली दृष्टि की बेबाक अभिव्यक्तियाँ हैं - ’चेकोस्लाविया में रूस के हस्तक्षेप से दर्द और क्रोध की जो प्रक्रिया शुरू हुई वह अफगानिस्तान में उसके फौजी दखल से बेगानेपन में बदल गई।‘ एक स्वयंचेता साम्यवादी कवि का जन- अभियान के लिए किया गया यात्रारम्भ विश्व क्रांति-आंदोलन के अगुआ दल द्वारा अपनी सत्ता को बदस्तूर कायम रखने और आश्रित दलों को अपने नियंत्रण से बाहर जाने न देने के लिए की जाने वाली बेशर्म ज्यादतियों का इतिहास बनता गया तो उसे अपना यात्रांत भयावह लगने लगा। उसकी इस मनोदशा की अभिव्यक्ति के लिए यह पूरी किताब ही पढने लायक है। यहाँ केवल दो उदाहरण दिए जा रहे हैं -
पौलेण्ड के बारे में कविता की पंक्तियाँ हैं -
(१) बीचों बीच से फट गया है/’सर्वहारा तानाशाही‘ का शानदार पोस्टर/और सर्वहारा हवा में मुट्ठियाँ लहरा-लहरा कर/अपने हिस्से की रोटी और गोश्त माँग रहे हैं/अपने ही नाम पर खडी की गई तानाशाही से/पूरी जनता एकजुट होकर/लड रही है/’जनता के जनतंत्र‘ से!/अपने जनतांत्रिक अधिकारों के लिए!!‘
(२) तुम किसके साथ हो/पीडतों के या पीडकों के?/क्या तब भी/जब दोनों साम्यवादी हों?/ तुम किसके साथ हो/दूसरों के देश में टैंक भेजने वालों के/या टैंकों पर बम न फेंक कर/ उनके चालकों से बहस करने वालों के?/तुम किसके साथ हो
कवि का यह सवाल जितना अपने लिए है, उतना ही अपने साथियों (प्रगतिशीलों) के लिए भी है।
पूर्वी यूरोप में रूस के सैनिक हस्तक्षेपों के बाद भी कवि साम्यवाद के भविष्य के प्रति आश्वस्त लगता है, क्योंकि पौलेण्ड/हंगेरी/चेकोस्लाविया की घटनाएँ उसे साम्यवाद के जनवादीकरण में विकास की सूचनाएँ देती लगती हैं। उसका विश्वास है कि ’साम्यवाद जैसा महान् मानवीय आदर्शों से प्रेरित आन्दोलन कुछ निहित-स्वार्थ यथास्थितिवादी नेताओं के कारण एक बँधा तालाब बनकर नहीं रह सकता।‘ लेकिन इसी संकलन में ’सोल्झेनित्सिन के नाम‘ शीर्षक से जो कविता है, उससे साम्यवादी शासन के जनतंत्र की ओर बढने के प्रति उसका विश्वास डिगता हुआ लगता है -
सोल्झेनित्सिन तुमने यह क्या किया? तुम्हारे ’गुलाग‘ ने मेरी आत्मा को आमूल झकझोर दिया/लेनिन मेरी नजरों में नये युग का अग्रदूत था, क्रांति का मसीहा/और स्तालिन एक घृणास्पद तानाशाह/पर आह! स्तालिनवाद के सूत्र/तुमने लेनिनवाद की कोख से ही निकलते दिखा दिए।
कवि जानता है कि उसकी इन कविताओं पर साथी कामरेडों की विपरीत प्रतिक्रिया होगी - ’’अनेक कट्टर ’प्रगतिशील‘ या ’जनवादी‘ आलोचक या दलीय कार्यकर्त्ता मुझे न केवल अप्रगतिशील बल्कि प्रतिक्रियावादी भी घोषित करने लगेंगे... वैचारिक मतभेद रखने वाले को झटपट विरोधी और शत्रु तक घोषित करने का उतावलापन साम्यवादी संस्कारों में गहरा बसा है।‘‘ वास्तव में वह अपने संगठन के साथियों के बीच निंदा-पात्र बना और उसे उस समय के महामंत्री ने, जो कभी उसके अच्छे मित्र थे, क्षमा-याचना की सलाह दी, लेकिन सम्बन्ध-विच्छेद की कीमत पर भी उसने अपने इस नवबोध को नहीं त्यागा कि ’अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता - आलोचना की स्वतंत्रता, एक ऐसा मानवीय मूल्य है, जिसके प्रति सहनशीलता किसी भी प्रबुद्ध और मानवीय आदर्शों से प्रतिबद्ध सत्ता में अवश्य होनी चाहिए।‘ इसके साथ ही व्यवस्था-परिवर्तन के लिए रक्त- क्रांति की अनिवार्यता से उसका विश्वास उठने लगा। वैसी क्रांति के बाद जनतंत्र-स्थापना की कोई गारंटी इतिहास नहीं देता - फ्रांसीसी क्रांति के बाद नेपोलियन की राजशाही आई और सोवियत क्रांति के बाद पार्टी की व पार्टी के बहाने पार्टी-प्रमुख की तानाशाही कायम हुई। अंतिम जनवादी क्रांति की सम्भावना अब तक तो ’गोदो का इंतजार‘ ही बनी हुई है। विचार के धरातल पर माक्र्सवाद कवि के लिए प्रेरणा-स्रोत है, लेकिन अब वह विकल्पहीन सत्यवाला ’पवित्र सिद्धान्त‘ नहीं रहा है।
वृद्ध चेहरा, धँसी आँखें टिकी हैं अदृष्ट पर
औ‘ पडी है थकी ऐनक ’कैपिटल‘ के पृष्ठ पर अनगिनत बलिदानियों के लहू से लिक्खी
कताबें-इन्कलाब
आह! सत्तर साल में ही आ गयी परिशिष्ट पर।
दुनिया बदलने के लिए उसे अब सशस्त्र संघर्ष का मार्ग विफलता की ओर ले जाता लगता है, इसलिए गाँधी के अहिंसात्मक आन्दोलन का रास्ता ही उसे बेहतर विकल्प भी लगने लगा है*-
मैं लडूँगा/लडता रहूँगा/इस बर्बर आततायी अमानवीय व्यवस्था से/लेकिन बिना हथियार उठाए/गगग मैं शहीदों के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद/नहीं मरना चाहता एक शहीद की मौत/गगग इसलिए/बहुत धैर्य से लडना पडेगा इससे/बहुत जागरूकता, बहुत सतर्कता से/ व्यापक संगठन और आन्दोलन से/कविता से, कहानी से, फिल्म-दूरदर्शन से/चिंतन से, मंथन से, विमर्श और विचार से/दलित, शोषित, वंचितों के व्यापक सहकार से/पूर्ण असहयोग से, चुनौती से, ललकार से।
इससे पहले वह सोवियत-संघ के साठवें साल में वहाँ गाँधी के आविर्भाव की कामना करता है, क्योंकि उनके अलावा और कौन है, जो आम रूसी को निर्भय बना सके और आजाद हिन्दुस्तान के तीसवें साल में यहाँ लेनिन के पदार्पण की प्रतीक्षा करता है, क्योंकि उनके सिवा और कौन है जो दो-तिहाई भूखे भारतीयों की समस्या का समाधान कर सके।
रणजीत की साम्यवादी सत्ता से मोहभंग की लगभग सभी कविताएँ सोवियत-संघ को लक्षित हैं, चीन की और माओ की आलोचना अपवाद रूप में ही आई है, जैसे ’आम्रकुंजों में उभरता हुआ वियतनाम‘ (बांग्लादेश) में -
सिर्फ चुप ही नहीं है/वह याह्या के लिए छुरियाँ भी तेज कर रहा है/तुम अपनी इस बेहयाई को/सिद्धान्तवादिता के कौन-से गड्ढे में धोओगे माओ/जरा सोचो तो!
गौरतलब है कि सोवियत-संघ से मोहभंग के बाद उसने चीन की तरफ किसी भी कविता में किसी उम्मीद से देखा तक नहीं है।
रणजीत ने प्रकृति, प्यार, औरत, दलित आदि के बारे में, साम्प्रदायिकता और जातिवाद के विरोध में और सामाजिक विडम्बनाओं तथा तात्कालिक राजनीतिक प्रसंगों के बारे में भी कविताएँ रची हैं, लेकिन वह प्रधानतः विचारधारात्मक संकल्पनाओं और स्थापित साम्यवादी सत्ताओं से मिली भग्न प्रत्याशाओं का कवि रहा है। उसकी कविताएँ आज के नक्सल क्रांतिकारियों से भी मानो पूछ रही हैं क्या हथियारबंद बगावत से वे जीत के आखिरी मुकाम तक बढते रह सकेंगे? और क्या गारंटी है कि उनके निजाम में फिर निरंकुश दमनचक्र न चले? क्या उनका प्रतिशोध ’पोलपोती‘ दिशा में बढता नहीं लगता
रणजीत मुख्यतः संबोधन, आह्वान, आमंत्रण, वक्तव्य और व्यंग्य का राजनीतिक कवि रहा है और इसलिए उसका रचना-शिल्प अभिधाप्रधान है। भाषा को धारदार बनाने की सजगता उसमें बराबर मिलती है। अपूर्वता और विलक्षणता की तलाश उसे नहीं है, फिर भी अपनी एक पहचान बनाने का प्रयास अवश्य है।
’प्रगतिशील खेमे‘ से अलग हुए एक सिद्धान्तनिष्ठ कवि की कट्टर कामरेड से उदार समतावादी के रूप में उसकी काव्य-यात्रा बीसवीं सदी के छठे दशक से अब तक की साहित्य के जरीए की गई एक राजनीतिक यात्रा भी है, जिसकी दिशा रही है*-
बीस साल मैंने जन-सामान्य को
साम्यवादी बनाने की कोशिश की।
अगले बीस साल मैं साम्यवादियों को जनवादी बनाने की कोशिश करना चाहता हूँ।
आलोचक और अध्येता श्री नवलकिशोर अपनी तरह के गंभीर अन्वेषी भी हैं। मानववाद और उपन्यास साहित्य पर इनका नाम आज भी प्रासंगिक है। उदयपुर में रहते हैं।