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नामवर सिंह : हशमत की निगाह में

हेतु भारद्वाज
हिन्दी आलोचना में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से बडा व्यक्तित्व शायद कोई नहीं है। यदि यह बात सच न होती तो हिन्दी साहित्य में किंवदंतियों में महानायक के रूप में प्रतिष्ठा पाने वाले नामवर सिंह यह न कहते कि वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल बनना चाहते थे और हिन्दी साहित्य का इतिहास कई खण्डों में लिखना चाहते थे। क्या यह विचित्र नहीं लगता कि अपने गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को स्थापित करने के लिए वे अपने विवेचन के केन्द्र में कबीर को रखकर ’दूसरी परम्परा की खोज‘ लिखते हैं। एक शिक्षक के रूप में वे पं. केशवप्रसाद मिश्र के वैदुष्य और शिक्षण कौशल को बार-बार याद करते हैं। कबीर को केन्द्र में रखकर दूसरी परम्परा की स्थापना देने वाले नामवर सिंह तुलसी के कवि रूप को शाश्वत महत्त्व का मानते हैं तथा गहरी पीडा के साथ स्वीकार करते हैं कि तुलसी को खारिज कर देने के बाद हिन्दी साहित्य दरिद्र हो जाएगा। प्रोफेसर सदानंद शाही ने ’नामवर सिंह जी से ग्राम्शी के हवाले से पूछा था कि आप ट्रेडिशनल इन्टेलेक्चुल हैं या आर्गेनिक। इस पर नामवर जी ने कहा था कि होना तो आर्गेनिक चाहता हूँ, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। दूसरी परम्परा को बीच में छोडकर पहली परम्परा की ओर वापसी नामवर सिंह को टडिशनल इन्टेलेक्चुअल ही बनाती है।‘ (सदानंद शाही-भूमिका, पृ. १३, नामवर-संदर्भ और विमर्श-डॉ. पी.एन. सिंह।)
स्पष्ट है कि नामवर सिंह का व्यक्तित्व साधारण नहीं था और वे आलोचक, अध्येता, वक्ता, विमर्शकार तथा अध्यापक के रूप में अद्भुत हैं। उन्हें आसानी से न समझा जा सकता है न उनकी मान्यताओं को पूर्ण रूप से स्वीकार किया जा सकता है, न निरस्त किया जा सकता है। वे जीवनभर विवादों के केन्द्र में रहे - उन्होंने ’परिमल‘ दल से लोहा लिया तथा स्वयं भी अनेक विवाद उत्पन्न किये। उनके बारे में भिन्न-भिन्न लोगों की अलग-अलग राय रही। निश्चय ही उनका व्यक्तित्व करिश्माई था। उनसे जुडने में लोग अपना सौभाग्य मानते थे तो उन्हें नापसंद करने वाले लोगों का भी अभाव नहीं था। रूपवादी उन्हें माक्र्सवादी तथा माक्र्सवादी विचारधारा का प्रचारक मानते रहे तो वामपंथी लोग उन्हें रूपवादी कहते रहे। वे अपने जीवनकाल में ही मिथ बन गये थे।
अनेक विद्वानों ने नामवर सिंह के व्यक्तित्व का आकलन-मूल्यांकन किया। लेकिन इनमें सबसे मौलिक, विश्वसनीय, रोचक, तटस्थ, रचनात्मक मूल्यांकन कृष्णा सोबती ने ’हशमत‘ नाम से किया है। ’हम हशमत‘ श्ाृंखला में कृष्णा सोबती ने अपने समकालीन वरिष्ठ तथा युवा लेखकों पर जो संस्मरण लिखे हैं, वे बेजोड हैं। कृष्णा सोबती ने इन संस्मरणों को लिखने के लिए एक पुरुषवाचक नाम चुना है - हशमत। जब ये संस्मरण पत्र-पत्रिकाओं में छपे तो लोगों का ध्यान इनकी ओर गया। कृष्णा सोबती एक लम्बे कालखण्ड की रचनात्मक यात्रा करती हैं। वे हिन्दी में क्रांतिकारी तथा युग प्रवर्तनकारी रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करती ह। वे न किसी गुट से जुडी हैं न किसी विवाद से जुडकर अपनी रचनाशीलता को क्षति पहुँचाती हैं। इनकी रचनात्मक दृष्टि बहुत सूक्ष्मता के साथ अपने समकालीनों का आकलन करती है।
नामवर सिंह पर उन्होंने काफी मात्रा में लिखा है, जो ’हम हशमत‘ के भाग-२ एवं ४ में संकलित है। अन्य संस्मरणों की तरह नामवर सिंह पर लिखा उनका संस्मरण किसी शास्त्रीय रूप में बँधा न होकर नामवर सिंह के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके योगदान को व्यंग्यात्मक भंगिमा के साथ रेखांकित करता है। जैसे नामवर सिंह के व्यक्तित्व के विषय में लिखती हैं -
’दोस्तो, मशहूर तो यह है कि नामवर हिन्दी साहित्य-मंच के आलमआरा हैं। आबदार खादी की पोशाक और रखरखाव में बनारसी अदा। कद-काठी भी ऐसी कि हिन्दुस्तान के किसी भी हिस्से में राष्ट्रभाषा हिन्दी की नुमाइंदगी कर सकें। एक अखिल भारतीय प्रतीक नागरिक के रूप में इल्मो-अदब का अनोखा ठस्सा और बाकायदा पुरुषोचित सिंगार से लैस हाथ में गुटवादी गुटका। यार लोगों का कहना यह भी है कि नामवरी चेहरे से भान तो यही होता है कि उस्ताद यख्नी पी-पीकर बडे हुए हैं। पेशानी पर संतोष की झलक भी कुछ ऐसी कि देखने वालों को मगजों वाली ठंडाई याद हो जाए। सोचें तो कुछ अतिशयोक्ति भी नहीं। बनारस वालों का नामवरी अखाडा राजधानी में मशहूर तो है ही। दिन-ब-दिन मुलायम होते दिल्ली के सँवरे-सहेजे बुद्धिवादी, उस्तादों और इज्जत तलबों की जमात में नामवर खलीलुल्लाह से बने रहते हैं। शख्सयत का नमक उस लडाकू पीढी की याद दिलाता है, जिसने देश की स्वाधीनता के लिए विदेशी सत्ता को चुनौती दी थी। इस ऐतिहासिक संदर्भ में नामवर की पीढी एक साथ तीन जमानों के तजुर्बों का अर्क निचोडे हुए है। गुलामी, आजादी और आजादी के बाद पहले बदलाव की खुशगवार खुशऔकाती। सच तो यह है कि यह एक मिला-जुला रसायन है। नामवर की पीढी ने जो चमत्कार देखे और सहे हैं, उनका एक सिरा गुलामी और अलम्बरदारी से जुडा है और दूसरा उस जादुई माहौल से, जो सिर्फ आजाद होने के बाद ही महसूस किया जा सकता है। जिस पीढी के सफर में ये लम्बे ऐतिहासिक सिलसिले आ जुडे हों, वह बेशक अपने आगे वाली कतार से जरूरत से ज्यादा चौकन्नी और सजग हुआ करती है। शक्की।‘ (हम हशमत-२, पृ. ८-९)
हिन्दी के किसी लेखक ने नामवर सिंह के व्यक्तित्व पर ऐसा मनोहारी और दिल में सीधे उतरने वाला परिचय शायद दिया हो। इसका कारण यह है कि नामवर सिंह के बारे में विस्तार से लिखने वालों में कोई भी कृष्णा सोबती के पाए का रचनाकार नहीं है। वे या तो नामवर जी के विवादों की सतही बातें करते हैं या उनकी वैचारिक ईमानदारी पर संदेह करते हैं। कोई उन्हें जातिवादी कहता है तो कोई अवसरवादी, कोई वामपंथी तो कोई धुर दक्षिणपंथी, कोई उन्हें साम्प्रदायिक कहता है तो कोई सत्ता मुखापेक्षी, कोई स्पष्टवादी तो कोई मुँह देखी बात करने वाला, कोई बडे-बडे विवादों का उत्तर देने वाला तो कोई अपने ही बयानों से मुकरने वाला। कोई उन्हें गुटबाजी से ऊपर तो कोई पक्का गुटबाज आदि। ये सारी बातें सही भी हो सकती हैं और झूठी भी। पर न कोई उनके पारदर्शी वैदुष्य पर शंका करता है न उनकी वक्तृत्व कला के सम्मोहन पर। उनमें कुछ तो है, जो हिन्दी का लेखक उनसे निकटता पाने को तरसता रहा। जिस मंच पर नामवर जी रहे और तो जैसे खानापूर्ति भर के लिए। गोष्ठी का विषय चाहे जो रहा हो पर नामवर जी जो कुछ अपने बीज वक्तव्य में कह गये, आगे की बहसें उसी को लेकर होती रहीं। लेकिन हशमत उनके वैपर्ययों का आकलन इस तरह करते हैं -
’कुछ परहेज और कुछ एहतियात के साथ नामवर ने भी अदबी अराजकता को रोकने और फैलाने के लिए नए प्रतिमानों वाला मठ स्थापित किया है। आधुनिक तर्ज की बौद्धिक ड्योढी बैठाई है। इस संदर्भ में नामवर के कद्रदानों की गिनती बेहिसाब है। उन्हें कितनों ने बेवफा समझा होगा, इसका कोई सच्चा-झूठा चिट्ठा हम आपकी खिदमत में न पेश कर सकेंगे। मोटे तौर पर इतना ही कि नामवर के जितने व्यापक विस्तृत आलोचकीय क्रियाकलाप, उतनी ही दस्तकें उनके बौद्धिक दरवाजे पर, उतनी ही आहटें-फुसफुसाहटें उनके कानों के बाहर। इतना कह दें कि नामवर के सुसंस्कृत साबुत व्यक्तित्व में हिन्दी साहित्य के नायक और प्रतिनायक की छवि एक साथ देखी जा सकती है। ऐसा नहीं कि वे अपने सामर्थ्य से बेखबर हैं, लेकिन काबिलेगौर बात यह कि नामवर होने की प्रतीति को वे गरूर से नहीं, गर्व और गरिमा से संजोए रहते हैं। हमने उनकी जुबान से गर्वोक्तियाँ कभी नहीं सुनी।‘ (वही, पृ. ९-१०)
इतना ही नहीं हशमत नामवर के व्यक्तित्व का आकलन दूसरों का हवाला देकर करते-करते नामवर सिंह के व्यक्तित्व को अनेक विपर्ययों का संयोजन इस तरह करते हुए उनकी महानता का अहसास पाठक को करा देते हैं*-
दोस्तो, हम नामवर की इस खूबी का बयान कर ही रहे थे कि किसी ने हमें डपटकर कहा - जनाब तारीफ और तरफदारी के लिए भी कुछ समझदारी चाहिए। क्या आप सचमुच नहीं जानते कि नामवर अपने स्वभाव के शीतयुद्ध के पूरे उपकरण जुटाए रहते हैं। उनकी दृष्टि में भेदक और छेदक - दोनों फिट हुए पडे हैं। इन्हीं की मदद से वे खामोशी से विपक्षियों की गुटबंदी के लिए उकसाया करते हैं। उनके व्यक्तित्व में एक है उनका ’मैं‘ और दूसरा उसी ’मैं‘ का मैं। ये दोन हमेशा नहीं तो कभी-कभी एक-दूसरे का अतिक्रमण कर जाते हैं और एक हो जाते हैं। यूँ बहुत से अदबी हल्कों में मशहूर तो यह भी है कि नामवर जिस पर दस्ते-शफकत रख दें वह उनके ’यहाँ‘ से होते-होते ’वहाँ‘ तक पहुँचकर ही दम लेता है। दोस्तो, यह मुगालतों की दुनिया है, अदब के रामलीला मैदान में आए दिन नए-नए परकोटे घ्घ्घ्घ्घ् से चिने जाते हैं और एक खास वक्त गुजर जाने पर नीति के मुताबिक खामोशी से पंचों की राय से ढहा भी दिए जाते हैं। इधर उल्लू की टिटियाहट शुरू हुई, उधर लेखक को लेकर एक खास तरह की हर्फ-ब-हर्फ हमेशगी-सी फैला दी जाती है। ’यारमारी‘ की शक्ल में यह हिन्दी वालों की विशेष सांस्कृतिक देन है। इसके मौसमी हमले से लम्बे से लम्बा धारावाहिक नायक भी बचकर नहीं निकल सकता। इधर चेहरा पकना शुरू हुआ, उधर जहर-मोहरा की छडें तैयार। इधर प्रतिभा का लेबल नीचे लगा, उधर संपादित सामग्री का बाजार गरम। गरम-नरम, नरम-गरम दोनों पर मोम रोगन। मतलब यह कि आपसदारी का चूना एक-दूसरे पर। माफ कीजिएगा, यह तो दिलजले लेखकों की अलामतें -मलामतें हैं। आलोचकों को तो भला इससे क्या लेना-देना, वे तो झटके देने वाले हैं। धकेलिए, खींचिए, चढाइए, गिरा दीजिए। साहिबो, अदबी सरगर्मियाँ उन्हीं की दानिशमंदी से चला करती हैं। (पृ. १०)
निश्चय ही इन उक्तियों को पढकर पाठक हशमत के व्यंग्य से अभिभूत तो होता ही है, साथ ही नामवर सिंह के महान व्यक्तित्व के अदृश्य कोणों से भी मुतासिर होता है।
इस तथ्य से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि नामवर सिंह अद्भुत वक्ता थे। मंच को लूटना वे जानते थे। उनके इस गुण की व्याख्या हशमत इस तरह करते हैं -
’बकौल अशोक वाजपेयी - हिन्दी की अपनी भौगोलिक ऐतिहासिक स्थानीयता भी है। इस स्थानीयता का अतिक्रमण नामवर ने किया है। उनकी कला उनके बोले हुए सम्पूर्ण में है। खंडों में विभाजित करके उन्हें देखा नहीं जा सकता। एक अच्छे वक्ता का कौशल, अपने भाव पर कडा नियंत्रण और साहित्य-संस्कार के स्रोत से संचारित होता तीव्र अनुभव। हाँ, गोष्ठीजनित एकरसता आप नामवर के भाषण में नहीं पाएँगे। बिना शब्दीय आडम्बर के वे अपनी सोच को दूसरों के लिए परिभाषित करते हैं। भाषण के दौरान हमने नामवर को कभी दो में विभाजित नहीं देखा। जिस मुद्दे को उठाया, उसे कसाव से निभाया। विचार-विरलता के शिकार वे कभी नहीं होते। उनकी नजरबरदारी उनकी अपनी बसीरत पर टिकी रहती है। वजह इतनी ही कि नामवर की बौद्धिक निधि मात्र धंधई स्पर्धा से नहीं, कडे अनुशासन और वैचारिक व्याकरण से बँधी है। उनका निजी वैशिष्ट्य है, भावावेश में कुछ भी न कहने का निर्णय। उनकी असाधारण दृष्टि किसी भी किस्म की रूढबद्धता और अस्पष्टता को काटती चली जाती है। नामवरी वक्तव्य की बुनावट और बनावट - दोनों उनकी परिकल्पना के वैचारिक तनाव पर बनी रहती हैं। उसमें से सम्प्रेषित होता चला जाता है, एक व्यापक तार्किक अर्थ। उनकी भाषिक संरचना को हम बारीकी से देखें तो विषय-प्रवर्तन के वैज्ञानिक औचित्य से प्रमुख कोई दूसरा आग्रह आडे नहीं आता। प्रामाणिक और विश्वसनीय साक्ष्यों के साथ नामवर भाषण को शतरंज के नियमों वाली नियमबद्धता से श्रोताओं में संचारित करते हैं। अनुभव के अपूर्व कौशल से आलोचना का प्रत्यक्षीकरण करवाते हैं। आलोचकीय अनिवार्यता के उत्तरदायित्व को वे चिरसंचित चौकसी से भी निभाते हैं। उन्हीं के शब्दों में, आलोचना औजारों का बक्सा नहीं कि ज्यों ही खरीदा त्यों ही साहित्यिक कवियों की ठोक-पीट करने को चालू हो गए। सच तो यह है कि आलोचना की समझ हो तो ’टूल बॉक्स‘ का एक पेचकस भी काफी है। साहित्य का काम क्या सिर्फ भावोत्तेजना है? इससे थोडी देर के लिए मजमा तो लगाया जा सकता है, किन्तु जनता को वर्ग-चेतना के फौलादी संकल्प में ढाला नहीं जा सकता। दोस्तो, राजधानी के अपत्रकार रिपोर्टर होने के नाते हशमत इतना तो कह ही सकते हैं कि नामवर जो बोलते हैं, वे सिर्फ सैद्धान्तिक इबारत और मुहारत नहीं हुआ करती। उनका दमदार बौद्धिक सम्प्रेषण अपने व्यापक संचार में सभागार की पहली पंक्ति से अंतिम पंक्ति के श्रोता तक सचेत रूप में एक बौद्धिक परिस्पंदन देता चला जाता है। मंच पर उनका प्रवेश अभिनेता की नपी-तुली चाल में एक साथ सहज, सधा और प्रभावशाली। वैसे आपसे बाँट लें कि हमने सभागारों में नामवर जी को उनकी साहित्यिक मंडली के साथ भी देखा है। नामवर जाहिरा तौर पर उनमें भक्ति-भाव नहीं जगाते, अपनी शर्तों पर उन्हें खेल खिलाते हैं।‘ (पृ. १२-१३)
जब तक नामवर जीते रहे, उनकी उपस्थिति हमेशा एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की रही। वे जो कहते थे वे साधिकार कहते थे। उनमें असाधारण सम्प्रेषण क्षमता थी, क्योंकि वे जिस विषय को उठाते थे, उसका रेशा-रेशा पाठकों के समक्ष रख देते थे। उनकी इस अद्वितीय शक्ति के बारे में हशमत कहते हैं*-
’उनकी गंभीर भंगिमा निहायत सुधरी और संयमित, वार करने को आखरी तीर तक लैस। गर्म को नर्म तक और नर्म को परम तक पहुँचाने को तत्पर। मात्र संयोग नहीं कि नामवर न भडक से बोलते हैं, न फडक से। वे गहरे तक छने हुए हैं। अपने शांत को लचीले दिखने वाले तर्क से व्याख्यायित करते चले जाते हैं। उनकी प्रस्तुति में नामुकम्मल अगर कुछ होता भी है तो दीखता नहीं। माक्र्सवादी आलोचना का सांस्कृतिक एकाधिपतित्व आज की तारीख में उनकी मूठ में है, लेकिन कहना होगा कि पीरो-मुर्शिदवाली भंगिमा खाली कठमुल्लेपन से कहीं दूर है।‘ (पृ. १४)
साथ ही - ’उनकी सम्प्रेषण क्षमता में अर्थ आरोपित नहीं लगते। वे बौद्धिक अंतःसक्रियता द्वारा किसी भी अस्पष्टता को साफ करते चले जाते हैं। उनके यहाँ अस्पष्टता की कोई ध्वनि नहीं होती वैचारिक आस्थाओं में, न ही कोई संदिग्धता की परछाईं। सम्प्रेषण का सैद्धान्तिक स्तर कोई भी हो, सम्प्रेषण की सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि यह मानकर चलती है कि मानव सम्प्रेषण में सम्पूर्ण व्यक्ति से जुडा और पूरा रहता है। इसी संदर्भ में हम वक्ता नामवर के वैचारिक घेरे को सुयोजित संकेत का पर्याय मानते हैं।‘ (पृ. १५)
नामवर जी पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वे लिखते कम बोलते अधिक हैं। बोलने में सुविधा यह रहती है कि वे आज जो कह रहे हैं, कल उसके विपरीत भी कह सकते हैं। लिखने से तो प्रमाण सुरक्षित रह जाता है जबकि वाचिक परम्परा में अपनी ही मान्यता को ठुकराने की पूरी सुविधा रहती है। उनके बोलने को लेकर उन पर बराबर आरोप लगते रहे। पर हशमत उनके बोलने की गुणवत्ता को रेखांकित करती है -
’बोले हुए शब्द की भी अपनी एक ताकत है। इसी की लीक पर हम मुडते हैं नामवर की ओर। उनकी तर्क-क्षमता और मुद्दों के परीक्षण की कसी हुई जाँच-प्रणाली उनकी पक्षधरता के बावजूद एक बौद्धिक प्रामाणिकता का जुगाड करती है। उनके आलोचकीय क्षमता के सिलसिले मात्र तथ्यों को किसी सार्वजनिक सत्य में बदलने-भर को नहीं होते। उनके तर्कसंगत शब्दों और अर्थों में आप शिरकत करते हैं। आलोचना से एक रचनात्मक रिश्ता कायम करते हैं। पहचान के इस मूल्यांकन, आस्वादन से श्रोता और साहित्य में आदान-प्रदान की एक इकाई कम होती चली जाती है।‘ (पृ. १७)
नामवर जी के बोलने की कला का एक जीवंत उल्लेख हशमत ने किया है, जो हर पाठक को उनका कायल कर सकता है*-
’कमानी सभागार में उस समारोह का आयोजन किया गया था, बच्चन ग्रंथावली विमोचन के उपलक्ष्य में। मंच दमक रहा था, प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से। उनके चेहरे पर एक लम्बी पारिवारिक मैत्री की सहज मुस्कान थी। पास बैठे थे कविवर बच्चन, शीला संधू, नामवर सिंह और मंच का संयोजन करने वाले अजित कुमार। सत्ता के उच्चतम गुंबद की सजावट वाले मंच पर विराजमान विशिष्ट जनगुच्छा देवी-देवताओं के कुटुम्ब-परिवार की झलक मार रहा था। नीचे सभागार की पहली पंक्ति में बैठे थे - राजीव गाँधी और सोनिया गाँधी, तेजी बच्चन, जया और अमिताभ बच्चन। अमिताभ अपने रखरखाव और सिंगार में सम्पूर्ण अभिनेता, कंट्रास्ट में राजीव अपनी उजली पोशाक और चाल-ढाल में नेहरू परिवार की ऐतिहासिक तराश को अपने में जज्ब किए हुए। सहज, न कुछ ज्यादा, न कम। तेजी बच्चन आधुनिक बनी-ठनी के सिंगार से आमूल सजी-सँवरी। आज की शाम के नायक कवि बच्चन अपने में मग्न देर तक कविता पाठ करते रहे।
दोस्तो, नामवर बोलने को उठे तो क्षणांश में मंच पर चौंध की तरह कुछ घट गया। जाने गणित के किस हिसाब से नामवर ने सहसा राजधानी के लेखकों की अतिविशिष्ट तर्ज को बदलकर साधारण कर दिया। सभागार में बैठा श्रोता अब वह था, जो कोई भी लेखक था और नामवर थे। मंच पर जो विशिष्ट उभरा था, वह सादगी से चमकता इंदिरा गाँधी का चेहरा था। नामवर बोले, संक्षिप्त और सादा। मगर मूर्त और अमूर्त को परखने के सामर्थ्य के साथ। दोस्तो, हमने अपनी आँख से यह मंजर देखा कि शब्दों के सम्प्रेषण से नामवर सभागार में बैठे हर उस व्यक्ति के साथ जुड गए जो सरकारी बिरादरी से हटकर लेखकीय अस्मिता को गंभीरता से बचाए रखता है, रखना चाहता है। इंदिरा गाँधी की अचूक निगाह से न चूकी थी बौद्धिक वर्ग की वह ढीठ क्षमता भी, जो हमेशा व्यवस्था को फर्शी सलाम नहीं करती।‘ (पृ. १८-१९)
नामवर सिंह को जो भी प्रतिष्ठा मिली है, वह उनके आलोचना कर्म के कारण है। वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को हिन्दी का सबसे बडा आलोचक मानते हैं। इसलिए वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ही बनना चाहते थे। फिर भी अपने आलोचना कर्म के बल पर उन्हें जो सितारा छवि मिली, वह हिन्दी के अन्य किसी आलोचक को नहीं मिली। इसका कारण यह है कि उन्होंने आलोचना कर्म को साहित्य की दूसरे दर्जे की विधा नहीं माना। कृष्णा सोबती उन्हें ’एक स्वतंत्रचेता और एक साहित्यिक योद्धा‘ मानती हैं। वे अपनी राय रखती हैं*-
’साहिबो, नामवर के मुखालफीनों का कहना यह भी है कि आलोचक के रूप में नामवर द्वारा ही हिन्दी में बौद्धिक आतंकवाद की शुरुआत की गई है। वही इसके पहले खलीफा भी हैं। वैचारिक स्तर पर बौद्धिक डायनामाइट भी इनके पास है। इसी से लैस हो नामवर ने अपने ऊँचे कद से आलोचना के बौनेपन का उद्धार किया है। नामवर स्वयं अक्सर उत्तेजित नहीं होते। हमें लगता है, उनकी यही मुद्रा लोगों में मुठभेड का माद्दा जगाती है। (पृ. १४)
इसका कारण यह है कि नामवर सिंह आलोचना कर्म को भी रचना कर्म की तरह ही सृजनात्मक मानते हैं। उनके लिए आलोचना का कार्य केवल किसी रचना के गुण-दोषों का विवेचन मात्र नहीं है बल्कि आलोचना कर्म भी उसी तरह सत्य की खोज करता है, जैसे रचनाकार करता है। आलोचक का संघर्ष भी रचनाकार के संघर्ष की तरह है। उसे भी रचना से पहले उसके समय की पडताल करनी पडती है, उसे भी जीवन को डूबकर समझना पडता है। उसे रचनाकार द्वारा प्रयुक्त नयी भाषा-भंगिमा तथा नये मुहावरों को समझना होता है। उनकी ’इतिहास और आलोचना‘ तथा ’वाद-विवाद संवाद‘ के आलेख अपने समय की चुनौतियों से मुठभेड करने वाले आलेख हैं। ’आलोचना उथली अटकलबाजी नहीं, न ही पेशेवर दर्जी के हाथ वाली कैंची का करतब है। ...आलोचना जैसी गम्भीर साहित्यिक विधा के लिए आलोचक से प्रखर बौद्धिकता और कृतियों का मूल्यांकन करने वाली सुथरी सजग दृष्टि और गहरी सुसंस्कृत मानसिकता की अपेक्षाएँ की जाती हैं।‘ (पृ. २३)
कोई नहीं कह सकता कि नामवर सिंह इन अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते। माना उन्होंने पुस्तक समीक्षा के नाम पर ऐरे-गैरों को खूब प्रसाद बाँटा है। उन्होंने समय-समय पर अपने ही विचारों को काटा है। एक गोष्ठी में जो कहा, ठीक उसके विपरीत दूसरी में कहा है। लेकिन नामवर सिंह की समझ पर संदेह नहीं किया जा सकता, जिसकी ओर कृष्णा सोबती संकेत करती हैं*-
’दोस्तो, नामवर को हमने उनके आलोचना कर्म को बडे जालिमाना अंदाज से निभाते देखा है। तर्क से छोटी मछली को बडी और बडी को और भी बडी आगे सरकाते नामवरी खमीर में फ वैचारिक और तार्किक साक्ष्यों के बल पर बेदर्दी से किनारे लगाते भी देखा है, कुछ ऐसे कि अगला दाएँ हो तो बाएँ पहुँच जाए, बाएँ हो तो दाएँ।‘ (पृ. २०-२१)
नामवर सिंह साहित्य को उसकी समग्रता में देखते हैं। ’कविता के नये प्रतिमान‘ पुस्तक में वे श्रीकांत वर्मा, विजय देवनारायण साही, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल आदि कवियों को पूरी शिद्दत के साथ विश्लेषित करते हैं। उनके योगदान को भी रेखांकित करते हैं, किन्तु सर्वाधिक महत्त्व वे मुक्तिबोध को देते हैं। रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध की उपेक्षा ही नहीं, उनको मनोरोगी भी माना, इसलिए उनकी कविता को भी महत्त्व नहीं दिया, किन्तु नामवर एक पूरा अध्याय मुक्तिबोध की कविता, विशेष रूप से उनकी ’अंधेरे में‘ कविता की व्याख्या करते हुए मुक्तिबोध के रचनात्मक कौशल को रेखांकित करते हैं। हशमत इस ओर संकेत करते हुए कहते हैं*-
’मुक्तिबोध की कविता ’अंधेरे में‘ का परीक्षण उनके देखने की बोधगम्य अभिव्यक्ति का परिचायक है। उनके शब्दों में - ’अंधेरे में‘ कविता की पृष्ठभूमि हर तरह से विशाल है। स्वप्न-चित्रों का सम्बन्ध किसी फिल्म की पटकथा के समान है। जगह-जगह कट और क्लोजअप इस्तेमाल किए गए हैं। ध्वनि और रूप - दोनों का अंतर्वेशी नियोजन है। वैसे मूल कथ्य है*- संभावित आत्मरूप या अस्मिता की खोज, जिसे मनोविज्ञान की भाषा में ’सर्च फॉर आइडेंटिटि‘ कहते हैं, मुक्तिबोध की इस कविता की विशेषता है। आज के अन्य आलोचक अस्मिता की खोज आत्मपरक ढंग से करते हैं। मुक्तिबोध ने उसे अंदर और बाहर - दोनों जगह खोजा है। यह कहना अधिक संगत होगा कि मुक्तिबोध की काव्यानुभूति की बनावट ही ऐसी है कि इसके अंदर और बाहर के बीच कोई अंतर नहीं रह जाता। कविता के ’मैं‘ का प्रतिरूप पहले तो प्रेम की तरह अँधेरे कमरे में अपने आने की आहट का आभास देता है, डरावने रूप में। उसकी धमक से भींत के पलस्तर अकस्मात् गिर जाते हैं। उनमें से एक डरावना चेहरा उभर आता है। दरवाजे की आहट सुनाई पडती है, किन्तु दरवाजा खोलने पर कुछ भी दिखाई नहीं देता। इस भय के वातावरण में ही कविता का ’मैं‘ बाहर निकलता है और उसे रात के अँधेरे में एक मशालों वाला जुलूस दिखाई पडता है। जुलूस क्या है, किसी मृत्युदल की शोभायात्रा। जुलूस में आगे बैंड बजता चल रहा है, पीछे-पीछे इसी नगर के प्रतिष्ठित पत्रकार, आलोचक, विचारक, कविगण, उद्योगपति, विद्वान, मंत्री यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात डोमाजी उस्ताद भी।
दोस्तो, मुक्तिबोध कितना पहले हमारे आज के समय को देख रहे थे। इस सिलसिले में नामवर की अगली पंक्ति है - कहने की आवश्यकता नहीं कि यह किसी फासिस्ट दल का जुलूस है। कविता का ’मैं‘ उसका साक्षी है, जो जुलूस की नजरों से बच नहीं पाता। ’मारो गोली‘ की आवाज आती है और वह भागता है। उसका अपराध यह है कि उसने उन लोगों को नंगा देख लिया, जो दिन में विभिन्न दफ्तरों, कार्यालयों, केन्द्रों में षड्यंत्र करते हैं और रात को जुलस निकालते हैं।
कुल मिलाकर ’अँधेरे में‘ कविता का संसार एक साथ दहशत-भरा और उम्मीद-भरा दोनों ही है। यह फैंटेसी का दुहरा प्रयोग है। कवि ने यथार्थ पर अँधेरे की चादर डालकर उसके अंदर से एक जीती-जागती, स्पष्ट, गोचर दुनिया को उभारकर रख दिया है। वह यथार्थ से भी अधिक यथार्थ मालूम होती है। ’आग लग गई - कहीं गोली चल गई है‘ - इस वाक्य की आवृत्ति इतनी बार हुई है और हर बार इतने सार्थक ढंग से कि कविता समाप्त करने के बाद दिमाग में गूँजती रह जाती है। एक ओर जनक्रांति की आग भडकती है और दूसरी ओर उसे दबाने के लिए गोली चलती है, लेकिन सब चुप हैं। साहित्यिक चुप और कविगण चुप, क्योंकि उनके खयाल में यह गप है। इस पर मुक्तिबोध की टिप्पणी है - बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास, किराए के विचारों का उद्भास। फिर भी कवियों को विश्वास है कि ’मेरे युवकों में होता जा रहा है व्यक्तित्वांतर‘। (पृ. १७-१८)
नामवर सिंह ने मुक्तिबोध के बारे में जो लिखा वह अपनी जगह, पर कृष्णा सोबती ने कितनी गहराई से मुक्तिबोध को समझा और विश्लेषित किया है, यह देखने की बात है। एक व्यापक दृष्टि वाला रचनाकार ही दूसरे रचनाकार को समझ सकता है। कृष्णा सोबती एक क्रांतिकारी कथाकार हैं, पर वे एक बडे कवि की संवेदना को भी अपनी रचनात्मक दृष्टि से विश्लेषित कर सकती हैं, यह इन पंक्तियों से स्पष्ट हो सकता है। मुझे यह कहने में भी संकोच नहीं है कि भले नामवर सिंह ने मुक्तिबोध को पहली बार एक बडे कवि के रूप में हिन्दी समुदाय के समक्ष प्रस्तुत किया है, पर ’अँधेरे में‘ कविता पर नामवर जी का विश्लेषण बहुत गहराई से किया हुआ नहीं है और वे जैसे मुक्तिबोध द्वारा प्रयुक्त शब्दावली को ही दोहरा रहे हैं। किन्तु कृष्णा सोबती के ये थोडे से वाक्य मुक्तिबोध की कविता की आत्मा की ओर संकेत करते हैं।
नामवर सिंह ने हिन्दी आलोचना को गरिमा प्रदान की, साथ ही उसके बौनेपन को दूर कर उसे रचनात्मक विधाओं के बराबर ला खडा किया। फिर भी उन पर यह आरोप भी लगता रहा है कि वे हिन्दी के लेखकों से खिलवाड करते हैं। हशमत इस ओर संकेत करते हैं*-
’इसी सिलसिले में एक मजमे ने यह भी मशहूर कर रखा है कि नामवर अपने कमरे में बैठे-बैठे हिरणों के झुंड दौडाया करते हैं कि वे रिमोट कंट्रोल से देश-भर के हिन्दी कार्यकलापों की बागडोर अपने हाथ में रखते हैं। यह अतिशयोक्ति है। दोस्तो, वैसे लेखक बिरादरी इतना तो जानती ही है कि बिना सोचे-समझे नामवर न किसी ’हाँ‘ में हाँ करते हैं और न ’न‘ में न। इसका मतलब एक ही है कि वे भूमध्यरेखा पर अटल और अडिग हैं। वे अपनी चालाक चुप्पी के लिए तो मशहूर हैं ही। हमारा कहना इतना ही है कि इसका सम्बन्ध पान मसाले के व्याकरण से ही जुडा होगा।‘ (पृ. २१)
कृष्णा सोबती स्वयं आलोचना को हल्की विधा नहीं मानती। वे आलोचना में मुँहदेखी कहने और आदान-प्रदान के आधार पर आलोचना करने को उचित नहीं मानती। वे स्वयं आलोचना की गरिमा के बारे में कहती हैं*-
’आलोचना उथली अटकलबाजी नहीं, न ही पेशेवर दर्जी के हाथवाली कैंची का करतब है। अँगुलियों की गिरिफ्तनी में लेकर कपडे को फाड डालने वाली हिकमतमाली भी नहीं। आलोचना जैसी गंभीर विधा को सिर्फ पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले मनचले मौसमी रिव्यू भी न समझ लिया जाए। मात्र खुंदकवाद और घुडकवाद का पंचायती मसला भी नहीं है यह। हशमत मियाँ अपने तराजू के तौल को यकसाँ दिखाने के लिए आप ’फलहाल‘ और ’कुछ पूर्वग्रह‘ भी पढ रहे होंगे। हम अनसुनी लगा गए। आलोचना जैसी गंभीर साहित्यिक विधा के लिए आलोचक से प्रखर बौद्धिकता और कृतियों का मूल्यांकन करने वाली सुथरी सजग दृष्टि और गहरी सुसंस्कृत मानसिकता की अपेक्षाएँ की जाती हैं।‘ (पृ. २३)
वे आलोचक नामवर सिंह के साहित्य विवेक के प्रति पूर्ण आश्वस्त हैं तथा अशोक वाजपेयी की दृष्टि में ’नामवर सिंह उनसे (वामपंथियों) से अलग रसलोभी काव्यविद् आलोचक भी हैं।‘ यह एक विडम्बना है कि हिन्दी का हर आलोचक या तो नामवर सिंह की आलोचना का विस्तार करने में लगा है या नामवर सिंह ने आलोचना का जो नुकसान किया है, उसकी भरपाई करने में। इस तरह नामवर सिंह आलोचना के क्षेत्र में एक ऐसी मूर्ति के रूप में स्थापित हो गये हैं, जिससे टकराकर हर आलोचक अपना सिर फुडवा रहा है और कमाल यह है कि नामवर की मूर्ति पर खरोंच तक नहीं आती। इसीलिए नामवर जी के बारे में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित होती रहती हैं। नामवर के कद की ऊँचाई को छूने की महत्त्वाकांक्षा रखने वाले आलोचकों की भरमार है। साहित्यिक विधाओं में अल्पसंख्यक मानी जाने वाली आलोचना को नामवर जी ने जो प्रतिष्ठा दिलाई है, उसे चुनौती देना आसान नहीं है। कहानी की आलोचना क्षेत्र में फुटकर लेखन करने वाले नामवर ने एक बार कह दिया कि निर्मल वर्मा की ’परिन्दे‘ हिन्दी की पहली नई कहानी है, आगे के समीक्षक अभी भी नामवर की इस स्थापना से टकरा रहे हैं। इस दृष्टि से हशमत की यह उक्ति गौरतलब है, ’नामवर ने कहानी की पडताल करते हुए स्पष्ट कहा था कि कहानी जीवन के टुकडों में निहित अन्तर्विरोधी, द्वन्द्व, संक्रान्ति अथवा क्राइसिस को पकडने की कोशिश करती है।‘ (पृ. ४३) अब इस उक्ति पर आप बहस करते रहिए - इसे गलत-सही सिद्ध करते रहिए पर ’कहानी ः नयी कहानी‘ में संकलित आलेख अपनी जगह मील के पत्थर की तरह सुरक्षित हैं।
हशमत की यह टिप्पणी बिलकुल सटीक है कि ’आलोचना में जिस विविधता और प्रतिभा की जरूरत होती है, वह नामवर के पास है। राजधानी के प्रतिमानों से भी मापें तो कहा जा सकता है कि बनारस जिस बौद्धिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता रहा है, नामवर जी ने उसे अपने संकल्प की शक्ति से पुख्ता किया है। नामवर के एक दिलजले दोस्त का कहना यह भी है कि नामवर अब इस हद तक दिल्ली वाले हो चुके हैं कि बिना बोले ही बहुत कुछ कह-सुन लेते हैं और बिना पलक झफ ही सूँघ-भाँपकर प्रतिद्वंद्वियों को ललकार लिया करते हैं। दोस्तो, हममें से कौन नहीं जानता कि किसी भी राजधानी में रहने वाले बाघंबर ओढे रहते हैं। दिल्ली वालों की बुकरम लगी जीवनशैली बाहर वालों को कृत्रिम और बनावटी लगती है। शुरू में उनमें एक अजीब किस्म की हिचक और परायापन जगाती है। फिर धीरे-धीरे इस व्यक्तिगत फतवे में बदल जाती है कि दिल्ली वाले अपने सांस्कृतिक स्तर में निहायत सतही और उथले हैं। गैर-जरूरी है यह कहना कि हर राजधानी का अपना एक सांस्कृतिक व्याकरण हुआ करता है।‘ (पृ. ४८)
हशमत नामवर की प्रतिभा को पूरी तरह पहचानते हैं तथा उन्हें विश्वास है कि ’एक खास तरह की गपशप में माहिर नामवर जितना चाहे अपनी चुटीली चुटकियों से दूसरों को हँसा सकते हैं, तपा भी सकते हैं।‘ हशमत का मानना है कि ’आलोचक न किसी लेखक विशेष के गाथा गीत लिखने को बाध्य है और न ही किसी का व्यथागीत।‘ हशमत इस प्रश्न पर बडे खिलंदड अंदाज में लिखते हैं -
’इसके जवाब में नामवर कुछ न बोले। पान चबाने की क्रिया पर अटके रहे। हशमत जाने क्यों तैश में आ गए। एकाएक कहीं से फुदककर चेखव की यह उक्ति याद हो आई कि आलोचक उन मक्खियों की तरह होते हैं जो खेत में जुते बैल को ठीक से काम करने नहीं देते। नामवर ने हमारे चेहरे पर इकट्ठा होता कचरा जरूर देखा कि बाकायदा फूलझाडू के अंदाज में साफ करने को कहा - विचार जिस प्रकार प्राप्त होता है, उसी तरह व्यक्ति भी होता है। अगर एकांत कमरे में आराम-कुर्सी-चिंतन से प्राप्त होता है तो रचना में भी एकांत और वैयक्तिक चिंतन का रूप लेता है। यदि वह जीवन के संघर्षों में कुछ कीमत अदा करने से प्राप्त होता है तो वैसी ही गरमाहट, ताजगी और सजीवता-सक्रियता के साथ रूपायित होता है।‘ (पृ. ५०)
हशमत की दृष्टि में नामवर साहित्यिक शोर-शराबे से न अलग हैं न उसके साथ हैं। यही उनकी खूबी है कि आलोचक के रूप में वे सबसे अलग हैं तथा उनके नाम अनेक तरह के विवाद और कीर्तिमान हैं। इस ओर संकेत करते हुए हशमत कहते हैं -
’आखिर में इतना ही दोस्तो कि लेखक, कवि, उपन्यासकार, आलोचक कोई भी हो, हर एक का चेहरा उसका अपना खुद का नाम है और हर नाम का मुखडा उसके द्वारा किया हुआ काम है। हममें से कौन नहीं जानता कि हर इंसान को अपने ही चेहरे से अपने नाम को अर्जित करना होता है। दूसरे का चेहरा लगाकर अपना नाम अर्जित नहीं किया जा सकता।‘ (पृ. ५५)
इसमें संदेह नहीं कि हशमत नामवर जी की प्रतिभा की कायल हैं तथा उनकी गतिविधियों पर तीखी नजर रखती हैं। २०१६ में इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र ने, जिसके उस समय अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार तथा भाजपा के समर्थक रामबहादुर राय थे, नामवर जी को सम्मानित किया था। यह पहला आयोजन था इस तरह का। प्रथम सम्मान के लिए नामवर जी को चुने जाने पर काफी विवाद हुआ था। वामपंथी लेखक तथा कलावादी रचनाकार इससे प्रसन्न नहीं थे। शायद इन सबकी यह कामना रही हो कि नामवर जी इस सम्मान को अस्वीकार कर दें। कृष्णा सोबती भी इस निर्णय से प्रसन्न नहीं थी, तभी उन्होंने लिखा, ’प्रगतिशीलों के पुराने विश्वसनीय नामवर जी को इन्दिरा गाँधी कला संस्थान से जोडने का महा-आयोजन कुछ कमतर राजनीतिक समझदारी का अभियान नहीं था। ...हाँ, जे.एन.यू. से जुडे प्रगतिशीलों की ओर आप जयचन्दी दोस्ती का हाथ बढा रहे हैं। इस सियासी दूरदर्शिता के लिए मुबारकें।‘ (हम हशमत-४, पृ. ४९) इस कथन में जहाँ हशमत का आश्चर्य प्रकट होता है, वहीं भाजपा सरकार की चालाकी का आभास भी। क्योंकि केन्द्र के अन्दर भी इस निर्णय का विरोध हुआ था। बात प्रधानमंत्री तक भी पहुँची थी। इस निर्णय पर करारा तंज कसते हुए हशमत ने कहा था, ’ऐसे मुबारक कदमों से आप निश्चय ही इस महान राष्ट्र के लोकतंत्र को मनमानी तानाशाही का मिजाज दे सकते हैं।‘ (हम हशमत-४, पृ. ५०)
भले हशमत को नामवर जी का यह सम्मान स्वीकार करना रुचिकर न लगा हो, पर वे भाजपा के छिपे एजेण्डे को समझ रही थीं और उस पर प्रहार कर रही थीं, ’इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने भाजपा की सभी साहित्यिक विचार नीतियों से जुडी सांस्कृतिक मानसिकता को फलांग कर कहा कि शरीर अगर संस्कृति है तो अभिव्यक्ति उसकी आत्मा है। हम समझे नहीं कि यह निर्देश उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने क्या सोचकर दिया है।‘ (हम हशमत-४, पृ. ५२)
स्पष्ट है कि ’हम हशमत‘ के रूप में लिखे गये ये संस्मरण कृष्णा सोबती के सूक्ष्म पर्यवेक्षण के सबूत हैं। साथ ही वे अपने विवेचन में इतनी निस्संग और तटस्थ रहती हैं कि उन पर पक्षपात का आरोप नहीं लगाया जा सकता। यदि अकादमिक मूल्यांकन की दृष्टि से देखें तो कृष्णा सोबती ने नामवर सिंह का अनूठा मूल्यांकन किया है।
हिन्दी के वरिष्ठ गद्यकार सम्पादक और आलोचक हैं गद्य साहित्य में गहरी रूचि रखते हैं।