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गाँधी : किसके राष्ट्रपिता

सुधीर चन्द्र
गाँधी ने अपने जीवन में पाँच आमरण अनशन किए। इनमें से दो अनशन उन साढे पाँच महीनों के दौरान हुए, जिनमें उनको ’महात्मा‘ और ’राष्ट्रपिता‘ कहने वाला हिन्दुस्तान आजाद होने के बाद उन्हें जन्दा रख पाया था। ये दोनों अनशन गाँधी ने देश में फूट पडी साम्प्रदायिक हिंसा को समाप्त करने के लिए किए। इनमें से पहला अनशन कलकत्ता में मुसलमानों के खलाफ अचानक भडक उठी हिंसा के खलाफ था और दूसरा अनशन मुसलमानों के ख्ालाफ दिल्ली में हो रही हिंसा के खलाफ था। कहने के लिए तो ये अनशन स्थानीय हिंसा को शांत करने के लिए थे। इनका असल उद्देश्य था हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों में ही शांति स्थापना करना।
विभाजन के बाद भी गाँधी के लिए देश का मतलब सिफर् हिन्दुस्तान नहीं था। विभाजन के कारण एक नए राष्ट्र-राज्य के रूप में अपनी अलग हैसियत बना लेने वाला पाकिस्तान और वहाँ रहने वाले लोग भी गाँधी के लिए उतने ही अपने थे, जितने बँटवारे से पहले थे। जब १३ जनवरी १९४८ को गाँधी ने दिल्ली में अपना अंतिम आमरण अनशन शुरू किया तो उनसे पूछा गया कि क्या उनका अनशन हिन्दुस्तान के मुसलमानों को बचाने के लिए नहीं किया जा रहा। दिखाने को तो यह सवाल था, दरअस्ल इसमें वह लांछन दुहराया जा रहा था, जो उन पर लगाया जाने लगा था। लांछन था कि हिन्दुओं और सिखों के नहीं, मुसलमानों के हितैषी हैं वह।
गाँधी का जवाब था कि हाँ मेरा यह अनशन है भारतीय संघ में मारे और सताए जाने वाले मुसलमानों को बचाने के लिए। लेकिन इसमें उन्होंने कुछ और भी जोडा। उन्होंने कहा कि यह अनशन पाकिस्तान में मारे और सताए जाने वाले हिन्दुओं और सिखों को बचाने के लिए भी है। जरा कल्पना कीजिए उन साढे पाँच महीनों में व्याप्त क्रूर हिंसा, घृणा और वैर के वातावरण की। किसी को भी हताश कर सकने वाले उस पागल वातावरण में गाँधी आशा तजने को तैयार नहीं थे। स्वयं प्रेम और भाईचारे की मूर्ति थे और वही पाठ सबको सिखा रहे थे। सीधी-सच्ची बातें कर-कर के लोगों के दिलों तक पहुँचना चाह रहे थे। कह रहे थे कि जब दोनों तरफ के लोग जानवर बन जाएँ तो एक ही रास्ता बचा रहता है - कोई जानवर न बने। कह रहे थे कि गाँधी के यहाँ ऐसा नहीं है कि कोई मुसलमान है और कोई हिन्दू। गाँधी के लिए सब एक हैं। कह रहे थे कि मेरे लिए तो हिन्दू और मुसलमान एक ही पेड की शाखें हैं; कैसे मैं एक को अपना लूँ और दूसरी को छोड दूँ। कह रहे थे कि जो न्याय चाहते हैं उन्हें न्याय करना भी होगा। कह रहे थे कि धर्म को सिर्फ धर्म की मार्फत बचाया जा सकता है। कह रहे थे कि हिन्दू का नाश हिन्दू ही कर सकता है, और कोई नहीं। कह रहे थे कि आज हिन्दू-मुस्लिम एका किसी के दिल में है तो बस मेरे। कह रहे थे कि मेरे लिए तो बस करना या मरना है। कह रहे थे कि यह हो ही नहीं सकता कि पाकिस्तान नरक बन जाए और भारतीय संघ स्वर्ग। कि अगर अमृतमय होना है तो दोनों को अमृतमय होना होगा।
कह रहे थे कि कुछ ऐसा हो गया है कि हमारी आँख टेढा ही देखती है। ऐसा भी कि नाम राम का लो और काम राक्षसों का करो।
और कह रहे थे कि मैं तो कहते-कहते चला जाऊँगा, एक दिन समझ में आएगा कि ये बूढा मिसकीन जो कहता था वही सच है।
कहते रहे गाँधी बार-बार वही-वही बातें। कहते हुए कि मैं जानता हूँ कि मैं रोज-रोज वही बातें कह रहा हूँ। यह भी कि कोई मेरी सुनता ही नहीं है। फिर जब कहने से काम नहीं चला तो अपनी जान की बाजी लगा दी। उसी गाँधी ने दो बार अपनी जान की बाजी लगा दी, जिसे हर ऐरा गैरा नत्थू खैरा खुलेआम ताने दे रहा था कि क्या हो गया अब, डर गए मरने से, बडी-बडी बातें कर रहे थे, कह रहे थे कि देश का बँटवारा मेरी लाश पर होगा, क्यों नहीं आमरण अनशन करते अब देश की अखंडता बचाने के लिए।
आज भी, किसी को और कुछ मालूम हो या न मालूम हो गाँधी के बारे में, जिसे देखो वही उलाहना देता है कि अच्छे सत्य के पुजारी थे, मरने का खतरा देखा तो भूल गए अपना कहा। न ही कोई यह भूलता कि जबरदस्ती दिला दिए ५५ करोड रुपए पाकिस्तान को, भले ही यह न मालूम हो कि उस ५५ करोड की असल कहानी है क्या। कोई कोशिश भी नहीं करता जानने की कि उस समय गाँधी ने आमरण अनशन नहीं किया तो क्यों नहीं किया। न ही यह कि क्यों पाकिस्तान को ५५ करोड दिलवाए गाँधी ने, कि वह पाकिस्तान का ही पैसा था।
कोशिश तो वह करे जो जाने कि वह जानता(ती) नहीं, और जानना चाहे कि आखर हुआ क्या था।
यह जो मसला है जानने का, बडा पेचीदा होता है। हम सभी मानते हैं कि जानना तथ्यों - असलियत - के आधार पर होता है। असलियत होती क्या है? क्या असलियत को सिर्फ यह दिखा कर बदला जा सकता है कि असल में कुछ और ही हुआ था? बात इतनी आसान होती तो गाँधी के मौत से घबरा जाने में लोगों का विश्वास कैसे बना रह सकता था। इस तथ्य*- असलियत*- के बावजूद कि अगले ही कुछ महीनों में यह आदमी एक बार नहीं, दो-दो बार अपनी जान पर खेल बैठा।
दिल्ली में पूर्ण शांति स्थापित होने के बाद १८ तारीख को गाँधी का अनशन समाप्त हुआ तो न सिर्फ देश में बल्कि पाकिस्तान में भी इसका बडा प्रभाव पडा। मृदुला साराभाई उस समय पाकिस्तान में थीं। उन्होंने वहाँ से खबर भेजी कि पाकिस्तान में आम लोग और हुक्मरान दोनों समझ रहे हैं गाँधी के अनशन का अर्थ। गाँधी के पास सरकारी हलकों से आभार व्यक्त करते हुए संदेशे भी आए जिनमें वादा किया गया कि पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की पूरी हिफाजत की जाएगी। यह भी उल्लेखनीय है कि जब गाँधी ने अपना अनशन तोडा तो उस मौके पर दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्च आयुक्त भी उपस्थित थे।
गाँधी खुद अपना अनशन समाप्त करते समय बडे प्रसन्न थे। जून १९४७ के मध्य, यानी कि आजादी हासिल होने के दो महीने पहले, से ही गाँधी कहने लगे थे कि १२५ वर्ष तक जीने और सेवा करने की उनकी इच्छा ख्ात्म हो गयी है। दिनों दिन उनकी निराशा गहराती जा रही थी। लेकिन दिल्ली वाला अनशन समाप्त करने के बाद उन्होंने कहा कि वह १३३ साल तक जिंदा रहेंगे। एक बडी खुशी उन्हें यह थी कि मुसलमान भी उनको अपना मानने लगे थे। अपना परम मित्र और हितैषी। १९१५ में दक्षिण अफ्रीका से लौटकर जो ३२ साल गाँधी ने देश में बिताए थे और बार-बार अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध हुए आंदोलनों की बागडोर सम्हाली थी, उस सारे वक्त वह चाहते रहे थे कि मुसलमानों समेत देश के सारे लोग उनको अपना मानें। पर, खलाफत आंदोलन के बावजूद, मुसलमान उन्हें संदेह की दृष्टि से ही देखते रहे। बस उन आखरी दिनों में मुसलमानों ने गाँधी को पहचाना। पर तब तक न जाने कितने हिन्दू और सिख उनको संदेह की नजर से देखने लगे थे। मानने लगे थे उन्हें अपना दुश्मन और मुसलमान और पाकिस्तान का हितैषी।
इस संदेह की गहराई में और संदेह करने वालों की गिनती में गाँधी के मारे जाने से लेकर आज तक बढोतरी ही होती रही है। आजकल यह बढोतरी पहले से कहीं ज्यादा तेजी से हो रही है। पहले इस तरह की गाँधी विरोधी भावनाएँ दबी-दबी सी रहती थीं, आपसी बातचीत में व्यक्त होती थीं। अब डंके की चोट पर बोली जा रही हैं और उन पर तरह-तरह से अमल किया जा रहा है।
बढते आक्रोश का एक प्रदर्शन पिछली ३० जनवरी को अलीगढ में हुआ। गाँधी का पुतला बनाकर ३० जनवरी १९४८ को हुई गाँधी की हत्या का सार्वजनिक मंचन किया गया। उस घटना के साढे तीन महीने बाद अब सार्वजनिक रूप से कहा जा रहा है कि गाँधी थे तो राष्ट्रपिता, पर पाकिस्तान के।
गाँधी को न राष्ट्रपिता कहलाए जाने का लालच था और न ही लालच था महात्मा कहलाने का। पर पाकिस्तान का राष्ट्रपिता कहलाए जाना - अगर पाकिस्तानी ऐसा महसूस करते तो - उनके लिए गाली न होता। उनके लिए तो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान या हिन्दू और मुसलमान अलग थे ही नहीं। दोनों ही बराबर के अपने और प्यारे थे। सच तो यह है कि वह समस्त दुखी जगत् की सोचते थे।
कौनसी वह मानसिकता है जो बतौर गाली गाँधी को पाकिस्तान का राष्ट्रपिता कह कर अपनी भडास निकाल पाती है? राहत महसूस करती है उस आदमी को इस तरह गलियाने में। अपनी देशभक्ति और अपने राष्ट्रवाद का सबूत पाती है ऐसा करने में। मैं यहाँ गाँधी को ’उस आदमी‘ कह रहा हूँ जबकि कहना चाहता हूँ हमारे वक्त का सबसे बडा आदमी। कारण कि गाँधी को गाली देने वाले उन्हें ऐसे ही सम्बोधित करते हैं। चिल्लाता रहूँ मैं महान, गाली देने वाले तो गाली खाने के लायक ही मानते रहेंगे गाँधी को।
तो फिर मैं लिख क्यों रहा हूँ यह आलेख? गाली देने वालों को बुरा-भला कहकर अपनी भडास निकालने की मेरी कोई इच्छा नहीं। न ही अपनी तरह की सोच वालों को प्रसन्न या आश्वस्त करने की जरूरत। उनके लिए जरूर लिखना चाहता हूँ, जो सचमुच इस विषय की जानकारी नहीं रखते किन्तु जानना चाहते हैं। पर जो सबसे मुश्किल काम है और सबसे ज्यादा जरूरी, वह है गाँधी को गाली देने वालों के साथ संवाद के लिए लिख पाना। गाँधी खुद यही करना चाहते थे और करते भी रहे ताउम्र। आखर तक जिन्ना से बातचीत करते रहे, बँटवारा बचाने की उम्मीद म। हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ भी संवाद बनाए रहे। सिर्फ आजादी के बाद का जक्र करूँ तो उल्लेखनीय है कि जब कलकत्ता और दिल्ली के गाँधी के अनशन समाप्त हुए तब इन संस्थाओं की ओर से भी साम्प्रदायिक शांति और सौहार्द बनाए रखने का वादा किया गया था। कलकत्ता में अनशन के तुरन्त बाद ९ सितम्बर को दिल्ली लौट आए गाँधी ने १२ सितम्बर को सुबह साढे दस बजे गुरु गोलवलकर से मुलाकात की थी। इसके बाद १६ सितम्बर को सुबह आठ बजे वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सभा में रैडिंग रोड की भंगी कॉलोनी गए थे।
ब्रजकृष्ण चाँदीवाला ने अपनी पुस्तक ’गाँधीजी की दिल्ली डायरी‘ के तृतीय खंड में गाँधी और गुरुजी की मुलाकात के बारे में लिखा है -
गाँधी जी ने उनसे कहा कि उन्होंने सुना है कि आर.एस.एस. के आदमियों ने बहुत दंगा फसाद किया है और तूफान मचाया है।
गुरुजी ने कहा, ’यह गलत बात है। मैं स्वयं इस वक्त शांति चाहता हूँ। बस जो इसमें फँस गए हैं उनको बचाना मेरा कर्त्तव्य है और यही हमारी नीति है।
गाँधीजी ने आगे कहा, ’जो यही नीति हो तो आपको एक बयान निकालना चाहिए कि हमारी यह नीति है। हमारे ऊपर जो आरोप लगाया गया है वह बिलकुल गलत है।‘ लेकिन गुरुजी कहने लगे, ’आप ही कहें कि मुझे आर.एस.एस. के नेता मिलने आए थे और उनकी यह नीति है।‘
गाँधीजी ने कहा, ’मैं तो कहूँगा ही, लेकिन आप जो सच्चे हो तो आपका निवेदन निकलना चाहिए।‘ (२८७)
आप गौर करेंगे कि गाँधी कितनी सीधी-सच्ची बात कर रहे हैं। कोई नमक-मिर्च नहीं, कोई दावा नहीं - केवल यह कि उन्होंने ऐसा सुना है। अकलमंद को इशारा काफी - ’ए वर्ड टू द वाइज‘ - गाँधी का प्रिय मुहावरा था। सो केवल - ’मैं तो कहूँगा ही लेकिन आप जो सच्चे हो तो आपका निवेदन निकलना चाहिए।‘
थोडा लम्बा पर महत्त्वपूर्ण उद्धरण १६ सितम्बर को स्वयंसेवकों को दिए गए गाँधी के भाषण से -
दिल्ली में आते ही मैंने संघ के मुख्य कार्यकर्त्ताओं से मिलने की इच्छा प्रकट की थी। संघ के विरुद्ध मेरे पास काफी शिकायतें यहाँ और कलकत्ता म आई थीं। संघ के साथ मेरा बरसों का सम्बन्ध है। स्व. श्री जमनालाल बजाज कई वर्ष पहले मुझे वर्धा में संघ के एक कैम्प में ले गए थे। उस कैम्प को देखकर मैं बहुत खुश हुआ था। वहाँ कडा अनुशासन था। सादगी थी और सवर्ण व असवर्ण सब समान थे। संघ को चलाने वाले श्री हेडगेवार जी बहुत बडे सेवक थे और सेवा के लिए ही जीते थे। वो चले गए, लेकिन संघ की ताकत दिन प्रतिदिन बढती गयी। मैं तो हमेशा से मानता आया हूँ कि जिस संस्था में सच्चा त्याग भाव रहता है, उसकी ताकत बढती ही है। अगर त्याग भाव के साथ शुद्ध भावना भी रहे, तो वह संस्था जगत् के लिए फायदेमंद होती है। शुद्धता न हो तो सिर्फ त्याग से जगत् को फायदा नहीं पहुँचता। शुद्ध त्याग के साथ शुद्ध ज्ञान और शुद्ध भावना न हो तो काम पूरा नहीं होता, गिरावट आ जाती है।
...आपकी प्रार्थना में हिन्द माता और हिन्दू धर्म के गौरव की बात है। मैं तो दक्षिण अफ्रीका से यह दावा करता आया हूँ कि मैं सनातनी हिन्दू हूँ। ... हिन्दू धर्म की विशेषता रही है उसकी सहिष्णुता और जिसके सम्फ म आए उसकी अच्छी चीजों को पचा लेने की ताकत।
आफ गुरुजी से यहाँ मेरी मुलाकात हुई। उन्होंने कहा - ’हमारे संघ में गंदगी हो नहीं सकती। हम हिन्दू धर्म की उन्नति चाहते हैं पर किसी को नुकसान पहुँचा कर नहीं। स्वरक्षा के लिए हम हमेशा तैयार हैं। संघ में सब भले ही हैं, ऐसा दावा हम नहीं कर सकते, लेकिन हमारी नीति क्या है, यह मैंने आपको सुना दिया।‘... आफ गुरुजी ने यह भी कहा कि बुरे काम करने वालों, दंगियों और हुकूमत को गिराने की चेष्टा करने वालों के साथ संघ का सम्बन्ध नहीं है। मैंने कहा कि हुकूमत को कौन मिटायेंगे? हुकूमत तो हमारी अपनी है। इंडियन यूनियन में ज्यादा संख्या हिन्दुओं की है। इसमें कोई शर्म की बात नहीं। लेकिन अगर हम यह कहें कि यहाँ हिन्दुओं के सिवा दूसरा कोई रह ही नहीं सकता और कोई रहे भी तो उसे हिन्दुओं का गुलाम बन कर रहना होगा, तो यह गलत बात है। हिन्दू धर्म ऐसा नहीं सिखाता। मेरे हिन्दू धर्म में सब धर्म आ जाते हैं। सब धर्मों का निचोड हिन्दू धर्म में मिलता है।...
मुल्क के टुकडे तो हो चुके हैं। सबने यह मंजूर किया, तभी तो ऐसा हुआ। अब उसे दुरुस्त करने का तरीका क्या है? एक हिस्सा गंदा बने तो क्या दूसरा भी वैसा ही करे? बुराई का सामना बुराई से करने से, फिर वह समान मात्रा में हो या ज्यादा या कम मात्रा में, बुराई मिटती नहीं। बुराई के सामने भलाई करने से ही बुराई मिटती है। मैं तो जो मेरे दिल में है, वही बात कह सकता हूँ।
...अगर हिन्दुस्तान के सब हिन्दू एक दिशा में जाना चाहें, चाहे वह गलत ही क्यों न हो, तो उन्हें कोई रोक नहीं सकता। लेकिन कोई भी आदमी, फिर वह अकेला ही क्यों न हो, उनके खलाफ अपनी आवाज उठा सकता है। वही मैं आज कर रहा हूँ।
...मुझसे कहा जाता है कि आप मुसलमानों के दोस्त हैं और हिन्दू और सिक्खों के दुश्मन। मुसलमानों का दोस्त तो मैं १२ बरस की उमर से रहा हूँ और आज भी हूँ। लेकिन जो मुझे हिन्दुओं और सिक्खों का दुश्मन कहते हैं, वे मुझे पहचानते नहीं। मेरी रग-रग में हिन्दू धर्म समाया हुआ है। हिन्दुस्तान की रक्षा का, उनकी उन्नति का यह रास्ता नहीं कि जो बुराई पाकिस्तान में हुई उसका हम अनुकरण करें। अनुकरण हम सिर्फ भलाई का ही करें।
...आपकी संख्या बडी है। आपकी ताकत हिन्दुस्तान की बर्बादी में लगे तो वह बुरी बात होगी। आप पर जो इलजाम लगाया जाता है, उसमें कुछ भी सच है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। मैंने तो सिर्फ बता दिया कि किसी चीज का नतीजा क्या हो सकता है। यह संघ का काम है कि वह अपने सही कामों से इस इलजाम को झूठ साबित कर दे। (वही, २९४-६)
गाँधी मुक्तकंठ से संघ के अनुशासन की प्रशंसा कर रहे हैं। खुलकर उसकी सादगी, उसकी त्याग भावना और उसके जाति-भेद उन्मूलन को सराह रहे हैं। पर चेतावनी भी दे रहे हैं कि बगैर शुद्ध ज्ञान और शुद्ध भावना के शुद्ध से शुद्ध त्याग भी गिरावट ही लाएगा। वैर और वैरी में भेद करते हुए वैरी की बुराइयों के अनुकरण के खतरों के प्रति आगाह करते हैं और - अकलमंद को इशारे वाले अपने अंदाज में - देश या राष्ट्र के बजाय जगत् के फायदे की बात छेड कर विवश कर रहे हैं सोचने को कि क्यों हमारे विवेकी पूर्वजों ने वसुधैव कुटुम्बकम् का सिद्धान्त - मात्र आदर्श नहीं - प्रतिपादित किया था? क्यों हमारे शांति-पाठ में वनस्पति का कल्याण भी अनिवार्य है? बडा सीधा तर्क है - सबके कल्याण में ही सबका कल्याण है। प्रकृति के अकल्याण में मानव का कल्याण हो नहीं सकता, भले ही हम अपनी सुख-सुविधा में अंधे हो प्रकृति का अबाध दोहन करते रहें। वैसे ही पडोसी के अकल्याण में मेरा कल्याण सम्भव नहीं। गाँधी अपने को आकबतअंदेशी कहते थे। आज के फायदे से आगे बढ प्रलय तक की देखते-सोचते थे। इंसान की स्वार्थपरता से उपजी प्रलय। उस स्वार्थपरता से जो बढते-बढते इतनी बढ गई है कि अब इंसान के इशारों पर चलने के बजाय इंसान को अपने इशारों पर चला रही है।
बताने को तो मैं विस्तार से बता सकता हूँ कि क्यों गाँधी ने लोगों के उलाहने बर्दाश्त कर लिए किन्तु बँटवारे के विरोध में आमरण अनशन नहीं किया कि ३ जून को, वाइसरॉय माउंटबैटन द्वारा बुलाई गई मीटिंग में कांग्रेस ने, बगैर गाँधी को बताए, देश के विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। कि मीटिंग में माउंटबैटन घबराए हुए थे कि पता नहीं गाँधी क्या कर बैठेंगे इस फैसले की खबर पाने पर। वह एक अलग कहानी है। बहुत दिलचस्प और महत्त्वपूर्ण। यहाँ केवल इतना ही कि अगले ही दिन अपनी प्रार्थना-सभा में, यह कहते हुए कि वह विभाजन को सही नहीं मानते, गाँधी ने घोषणा कर दी कि वह विभाजन के फैसले को मान लेंगे। इसके बाद लगभग प्रतिदिन वह इस विषय पर बोलते रहे। खुलकर बताते रहे कि उनको धिक्कारते हुए कैसे-कैसे पत्र और तार उनके पास आ रहे हैं। कि जब उन्होंने कहा कि देश का बँटवारा उनकी लाश पर होगा तो उन्हें यकीन था कि लोग इस फैसले के खलाफ हैं। पर अब वह देख पा रहे हैं कि न सिर्फ मुस्लिम लीग बल्कि कांग्रेस और आम लोग विभाजन के पक्ष में हैं। उन्होंने कहा कि आज जो स्थिति है उसमें विभाजन टल नहीं सकता। तो क्या वह अपने को सही सिद्ध करने के लिए आमरण अनशन पर बैठें
एक बहुत ही पते की बात कही गाँधी ने विभाजन के बारे में। न उस वक्त इस पर अमल हुआ, न आज हो रहा है। बल्कि आज तो हम भूल ही गए हैं यह बात। गाँधी ने कहा कि अगर जबरदस्ती विभाजन रोक भी दिया गया तो वह लोगों के दिलों में बैठ जाएगा। बेहतर यही होगा कि भले ही भूगोल का बँटवारा हो गया हो, दिलों को बँटने से रोका जाए। अगर ऐसा हो गया तो बँटवारा हो कर भी नहीं होगा। दोनों देश और दोनों देशों के लोग भाइयों की तरह, अच्छे पडोसियों की तरह रहेंगे और यही गाँधी ने वह पते की बात कही। उन्होंने कहा कि हमें याद रखना चाहिए कि बँटवारा किया क्यों जा रहा है। बटवारा किया जा रहा है आपस में शांति से रहने के लिए। सो सबको इसी उद्देश्य को पूरा करने में लग जाना चाहिए।
गौर से देखें तो समझने में दिक्कत नहीं होगी कि सम्भव और असम्भव के अचूक पारखी गाँधी बँटवारे को मानकर इसे व्यवहार में निरस्त करने में जुट गए थे। इसी कोशिश का फल थे उनके दो आखरी आमरण अनशन। जिनके बावजूद गाँधी पर लांछन लगते रहते हैं, मुसलमानों की तरफदारी के और अंत तक विभाजन का विरोध करने के बावजूद उन्हें जम्मेदार ठहराया जाता है देश के विभाजन के लिए। क्यों करेंगे तर्क और क्या करेंगे तथ्य
सुधीर चन्द्र ’गाँधी ः एक असम्भव सम्भावना‘ के लेखक हैं। इतिहास, दर्शन और साहित्य के गंभीर अध्येता हैं। कई विदेशी विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे हैं।