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मुक्तिबोध की कविता ’ब्रह्मराक्षस‘ : शब्दों के सहारे

शिवकिशोर तिवाडी
’ब्रह्मराक्षस‘ (१९५७) के बारे में खूब लिखा गया है और भाँति-भाँति के लोगों द्वारा। एक और टिप्पणी लिखने का तर्क यह है कि कविता के शब्दों को केन्द्र में रखकर कविता की टीका हो न कि पूर्वनिर्धारित कल्पों के आधार पर। मेरा एक उद्देश्य यह भी है कि मुक्तिबोध की कविता को सामान्य पाठक के लिए सहज-बोधगम्य बनाया जाए।
परित्यक्त बावडी और उसका परिवेश
कविता की पहली ३२ पंक्तियों में एक परित्यक्त बावडी और उसके परिवेश का चित्र है। बावडी शहर के बाहर किसी खण्डहर की ओर, शायद खण्डहर का हिस्सा है। उसके ठहरे पानी के अन्दर तक सीढयाँ गई हैं, कितनी सीढयाँ, पता नहीं। यह वर्णन एलियट के ष्ैजतममजे जींज विससवू सपाम ं जमकपवने ंतहनउमदजष् की याद दिलाने वाली शैली में हुआ है*-
सीढयाँ डूबीं अनेकों
उस पुराने घिरे पानी में...
समझ में आ न सकता हो
कि जैसे बात का आधार
लेकिन बात गहरी हो।
प्रकाशन के ५ साल बाद तक मुक्तिबोध इस कविता में संशोधन करते रहे। ये पंक्तियाँ फिर भी रह गईं तो इनका कोई निहितार्थ होगा। केवल चामत्कारिक अप्रस्तुत-विधान का लोभ नहीं होगा। मैं समझता हूँ कि इन पंक्तियों को बाद में आने वाली पंक्तियों ’’विगत शत पुण्य का आभास‘‘ इत्यादि से जोडना चाहिए।
इसके बाद की पंक्तियाँ बहुत कसी हुई और संदर्भित (अर्थात् संदर्भ में ही पूरी तरह सार्थक) हैं। बावडी के चारों ओर गूलर के पुराने पेड हैं, जिनकी शाखाओं पर घुग्घुओं के परित्यक्त घोंसले हैं। गूलर दत्तात्रेय नामक ऋषि और अवतार से जुडा प्राचीन काल से समादृत वृक्ष है। अथर्ववेद और कौशिकसूत्रों में इसकी लकडी के अनेक रहस्यमय, तांत्रिक उपयोग बताये हैं। बावडी को घेरे खडे ये पेड प्राचीन भी हैं। उनकी डालियाँ परस्पर जटाओं की तरह उलझी हैं। कवि उन्हें औदुंबर (संस्कृत उदुम्बर से व्युत्पन्न) नाम से अभिहित करता है, जिससे उनकी विशिष्टता द्योतित होती है। ये वृक्ष प्राचीनता, भूतकाल के गौरव और रहस्य का वातावरण बनाते हैं। उल्लुओं के परित्यक्त घोंसले खण्डहर, बावडी और पुराने गूलरों के सम्मिलित प्रभाव को गाढा करते हैं - यह ऐसी जगह है, जिसे उजाड कर प्राणी उल्लू भी छोड गया है।
’’विगत शत पुण्य का आभास‘‘ से आरम्भ करके अगली छह पंक्तियाँ किसी विगत श्रेष्ठता का चित्र हैं, जो वातावरण में अस्पष्ट भाव की तरह अटकी हुई हैं - दिल के खटके की तरह जो दृश्य और घटित को स्वीकार करने में बाधक हैं। इस बावडी के इर्दगिर्द भूतकाल में कुछ अच्छा घटा है, जिसकी सुगंध वर्तमान की प्राकृतिक गंधों में अब भी समाई है। पर सुगन्ध की अंतर्हिति एक आभास, किसी संदेह की तरह अस्पष्ट है।
बावडी के किनारे और भी वनस्पतियाँ हैं, जो पुरानी नहीं हैं। टगर का पौधा है, पाँच सफेद पंखुडयों वाले उसके फूल तारों की शक्ल में हैं। टगर कुहनी टेके (हथेली पर मुँह धरे) बावडी में झाँक रही है। वह दृश्य का अंग होकर भी अलग है - एक निर्दोष द्रष्टा, पर अनासक्त। टगर सामान्य जन का प्रतीक लगती है। जहाँ बावडी का मुँह गूलर की शाखाओं में आवृत नहीं है, जहाँ खुला आसमान है, वहीं एक लाल कनेर का पेड है, जो सम्भवतः भविष्य और आशा का प्रतीक है।
ब्रह्मराक्षस का प्रवेश
अब कविता में ब्रह्मराक्षस का प्रवेश होता है। वह बावडी में रहता है। करीब ६० पंक्तियों में कवि ने ब्रह्मराक्षस की मानसिकता का चित्रण किया है, जिसमें तीन बातें उभरकर आती हैं - विक्षिप्त आचरण, अपराध-बोध और आत्ममुग्धता। विक्षिप्त आचरण के निदर्शन हैं बडबडाहट, लगातार नहाने की मनोवैज्ञानिक बाध्यता, अद्भुत मंत्रों का असमंजित उच्चारण, मन के अंदर कोई अँधेरा कोना, उद्भ्रांत शब्दों की नित्य नवीन जटिलताएँ, परस्पर विरोधी विचारों का टकराव और उससे उपजी धुंध और अंत में ज्ञानानुभव का उलझाव जो केवल असम्बद्ध, पागलपन-भरे प्रतीकों में ही व्यक्त हो पाता है। इस संदर्भ में कवि ने एक अभिव्यक्ति का प्रयोग किया है - ’’गहन अनुमानिता‘‘। हिन्दी-संस्कृत में तो यह अभिव्यक्ति प्रचलित नहीं लगती, हो सकता है मराठी में हो, परन्तु संस्कृत मूल शब्द (अनु+मन्) तथा कविता के संदर्भ के अनुसार यह एक संज्ञा शब्द लग रहा है, जिसका अर्थ परिकल्पना में मिलता-जुलता होना चाहिए। गहन अनुमानिता का अर्थ हुआ परिकल्पनाओं का उलझाव, जो ब्रह्मराक्षस की विक्षिप्तता का एक कारण है। अपराध-बोध इस पागलपन का दूसरा कारण है। ब्रह्मराक्षस को अपना अंतर-बाह्य मलिन लगता है। वह अनवरत स्नान करता है, पर मलिनता दूर नहीं होती। मंत्रोच्चार से शांति नहीं मिलती। आत्मालोचन के प्रकाश से अंदर पैठी संवेदनात्मक कालिका दूर नहीं होती। यह प्रबल अपराध-बोध किस प्रकार का है? अस्तित्वमूलक या नैतिक? अस्तित्वमूलक अपराध-बोध अकारण होता है - जैसे अपूर्णता का बोध, जो हमारे किसी किये-अनकिये का परिणाम नहीं होता। अपूर्णता हमारे अस्तित्व का अनिवार्य गुण है। फिर भी उसको लेकर हम अपराध-बोध-ग्रस्त होते हैं। दूसरी तरह का अपराध-बोध नैतिक होता है, जिसका आधार हमारा कर्म या कर्म का अभाव होता है। ब्रह्मराक्षस का अपराध-बोध किस प्रकार का है? इस प्रश्न का उत्तर कविता के दूसरे भाग में ढूँढना पडेगा। अपराध-बोध की बगल में उसकी विरोधी मानसिकता - आत्ममुग्धता - बैठी है। सूर्य की किरणें जब बावडी में पहुँचती हैं या चाँदनी की कोई भटकी किरण बावडी की दीवारों को छू आती है तो ब्रह्मराक्षस समझता है कि सूर्य, चन्द्रमा बल्कि सारे आकाश ने उसकी वंदना की है और उसे ज्ञानगुरु मान लिया है। यह आत्ममुग्धता भी कदाचित् उसकी विक्षिप्तता का ही अंग है।
जब ब्रह्मराक्षस आत्ममुग्धता के क्षणों में होता है तो वह द्विगुण उत्साह से सुमेरी-बेबिलोनी जनकथाओं और वेदों से लेकर कविता के रचनाकाल में जीवित तथा सक्रिय दार्शनिकों तक के कथ्यों और सिद्धान्तों की व्याख्या करता है। केवल व्याख्या नहीं, नई व्याख्या करता है। अर्थात् बावडी के अँधेरे में कैद ब्रह्मराक्षस वस्तुतः रचनाशील है। उसकी रचनाशीलता का अंत लेकिन उद्भ्रांत ध्वनियों में होता है, जिनमें हर शब्द अपनी ही प्रतिध्वनि से कटकर अर्थ खो रहा है। बावडी के किनारे बैठी टगर बावडी से उठने वाली ’कन्फ्यूज्ड‘ ध्वनियों को सुनती है और सुनते हैं प्राचीन गूलर वृक्ष तथा वक्ता-कवि स्वयं। कनेर के फूलों की जगह अब करौंदे के फलों का जक्र आया है, जो सुनने वालों में शामिल हैं।
इस तरह कविता के प्रथम भाग का अंत होता है। इसके बाद विराम का संकेत है - ग्ग्ग्
रूपककथात्मक फंतासी (एलिगॉरिकल फैंटेसी)
यहाँ रुककर रूपककथा (एलिगरी) और प्रतीकात्मक कविता का अंतर समझ लेना चाहिए। यद्यपि रूपककथा में भी प्रतीकों का व्यवहार होता है, तथापि दोनों काव्य-प्रकारों में अंतर है। रूपककथा में प्रत्येक चरित्र किसी विचार या भाव का प्रतिनिधित्व करता है और उसके अपने क्रियाकलाप या उससे संबंधित घटनाओं का महत्त्व बहुत कम होता है। प्रतीकात्मक काव्य में चरित्रों की कथा अपनी जगह महत्त्वपूर्ण होती है, यद्यपि प्रत्येक चरित्र किसी विचार या भाव का भी प्रतीक होता है। उदाहरण के लिए जार्ज ऑर्वेल के उपन्यास ’एनिमल फॉर्म‘ में पशुओं की क्रांति से लेकर नेपोलियन नामक सुअर की तानाशाही और सुअरों के नये शासक वर्ग के रूप में उदय तक की कथा सोवियत क्रांति और उसके उपरान्त रूस में घटी घटनाओं का रूपक है। पशुओं की कथा अपने आप में अति गौण, प्रायः महत्त्वहीन है। इसकी तुलना में प्रसाद की कामायनी में मनु, श्रद्धा और इडा की कथा अपने आप में महत्त्वपूर्ण है, यद्यपि तीनों चरित्र क्रमशः मन, भावनात्मकता और बुद्धि के प्रतीक भी हैं। पात्रों की कथा और प्रतीकात्मकता दोनों समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। इस हिसाब से मुक्तिबोध की कविता ’ब्रह्मराक्षस‘ एक रूपककथा है, क्योंकि ब्रह्मराक्षस और शोधक की कथाएँ अपने आप में कोई महत्त्व नहीं रखतीं। प्रतीकात्मकता ही केन्द्रीय है। इस अंतर पर बल देने का कारण है। प्रतीकात्मक कविता में प्रतीक और प्रतीकार्थ के बीच सहधर्मिता होती है, जबकि रूपककथा में दोनों प्रायः अभिन्न होते हैं। उदाहरण के लिए यदि कविता को प्रतीकात्मक और ब्रह्मराक्षस को बुद्धिजीवियों का प्रतीक मानें तो हमें बुद्धिजीवियों में विक्षिप्तता, अपराध-भाव और आत्ममुग्धता का आरोप करना पडेगा, अर्थात् बुद्धिजीवी तब सहानुभूति का पात्र नहीं रह जायेगा, जबकि कविता में ब्रह्मराक्षस सहानुभूति उत्पन्न करता है। अन्यथा कवि/वाचक उसका शिष्य बनने की कामना न करता। जब हम ब्रह्मराक्षस की कहानी को एक रूपककथा के रूप में पढते हैं तो वह ’सिम्पैथेटिक‘ चरित्र (ऐसा चरित्र जिससे पाठक समानुभूति स्थापित कर सके) के रूप में उभरता है।
यह भी तय करना है कि ब्रह्मराक्षस किसका प्रतीक है*? प्रायः ब्रह्मराक्षस को बौद्धिकों और चिंतकों का साहित्यिक प्रतीक माना गया है। ये चिंतक सत्य के अन्वेषी हैं। मानव जाति के ज्ञान-भंडार में वृद्धि करने के साथ-साथ वे प्राचीन ज्ञान की पुनर्व्याख्या भी करते चलते हैं। मानव जाति को देने के लिए उनके पास बहुत कुछ है। परन्तु वे सामान्य जन से पूरी तरह कटे हुए हैं। उन्होंने अपने को आत्ममुग्धता की बावडी में कैद कर रखा है। अपने तत्त्वज्ञान का दंभ है उनमें, पर कहीं एक अतृप्ति भी है। ज्ञान की स्वाभाविक परिणति जो होनी चाहिए - कि वह सामान्य जन के जीवन का अंग बने और उसे समृद्ध करे - वह उनसे नहीं सध पाई है। इसलिए उनके मन में एक अपराध-बोध है, एक व्यर्थता का बोध है जो ’पागल प्रतीकों‘ में प्रकट होता है। परिणति को न पहुँच पाना उनकी ट्रैजेडी है।
इस व्याख्या को मानें तो वेदों के ऋषियों से लेकर टॉयनबी तक सभी ग्रंथ और मनीषी, जिनका नाम कविता में आया है, ब्रह्मराक्षस के प्रतीक में समाहित हैं। यह सम्भव नहीं है कि इन विचारकों को अपनी परिणति प्राप्त हो गई हो और हमारा नायक केवल उनका अध्येता है जो इस परिणति से च्युत है। एक व्यावहारिक समस्या भी है। कविता में जिन चिंतकों का उल्लेख है, उनमें से चार कविता में लिखे जाने के समय जीवित और लेखनरत थे। दूसरी ओर हमारा नायक पहले ही मृत होकर ब्रह्मराक्षस बन चुका है और काफी समय से बावडी में कैद है। उसका इतना समसामयिक होना ठीक नहीं लगता। प्रतीक का यह सामान्य चरित्र है कि वह खुद सच रहते हुए एक और सच का द्योतन करता है। साहित्यिक प्रतीक मानेंगे तो ब्रह्मराक्षस को सचमुच का ब्रह्मराक्षस होना होगा। सार्त्र ’ब्रह्मराक्षस‘ के प्रकाशन के समय ५१ वर्ष के थे। उनके काम को परिभाषित करने वाली कृतियाँ १२-१४ साल पहले आई थीं। तो क्या ब्रह्मराक्षस केवल दसेक साल पुराना है? कविता के प्रारम्भ में खण्डहर, परित्यक्त बावडी और पुराने उदुंबरों का जो माहौल बनाया है, वह तो इस सम्भावना से मेल नहीं खाता।
मेरा प्रस्ताव है कि कविता का कथ्य मानवीय चिंतन और ज्ञान की ऐतिहासिक विफलता है। सभ्यता के आरम्भ से आज तक ज्ञान ’एक्सक्लूसिव‘ रहा है, न कि समावेशी। कविता में जिस ट्रैजेडी का जक्र है वह मानवता के संचित ज्ञान की ट्रैजेडी है। इसलिए मैं दूसरी वैकल्पिक व्याख्या की ओर जाना चाहूँगा, जिसमें ब्रह्मराक्षस की कथा को एक रूपककथा की तरह ग्रहण किया जाए। ब्रह्मराक्षस, जिसकी यह कथा या वर्णना है, मानव जाति के संचित, सतत वर्धमान और पुनर्भाषित ज्ञान का रूपक है, जो अभी जनता तक नहीं पहुँचा और इसलिए आत्मतुष्टि के बीच व्यर्थता का बोध लिए हुए है। बावडी मानवीय ज्ञान के संकुचित आश्रय का रूपक है, जो उसे एक वर्ग-विशेष के दायरे में रोककर रखे है। गूलर के वृक्ष इतिहास का रूपक है, जो इस जडता का साक्षी है। ये सभी अपनी वस्तु-सत्ता के बजाय उनके द्वारा द्योतित विचार-सत्त्वों के रूप में इस रूपककथा के अंग हैं। एक बार इस बात को समझ लेने के बाद कविता की बाकी की लगभग ९० पंक्तियों को समझना आसान हो जाता है।
रूपककथा की वर्णना - ’शोधकों‘ और ब्रह्मराक्षस की त्रासदी
कविता पीछे जाकर वहाँ पहुँचती है, जब ब्रह्मराक्षस अभी ब्रह्मराक्षस नहीं बना था। उस बिंदु पर नायक एक शोधक है, जो किसी आभ्यंतर जगत् की सँकरी मुश्किल सीढयाँ बार-बार चढता-उतरता है। चढना मुश्किल है, कभी गिर जाता है और चोटिल होता है। सही सीढयों की खोज में बार-बार सफलता-असफलता के बीच लडखडाता है। उसके मन में एक विकट संघर्ष है। यह संघर्ष अच्छे और बुरे के बीच नहीं है, अच्छे और अधिक अच्छे के बीच है। यह एक पूर्णता की खोज है, जिसके बिना शोध अकृतकार्य अनुभव करता है। कवि पूर्णता की इस कामना को एक आंतरिक नैतिकता से जोडता है। यह आंतरिक नैतिकता बाह्य नैतिकता से भिन्न है। बाह्य नैतिकता ’’ज्यामितिक संगति (और) गणित से प्राप्त एक भव्य मान‘‘ है, जो अनिवार्य पर मशीनी है। ’’आत्मचेतन सूक्ष्म नैतिक भान‘‘ - आत्मचेतना के भीतर स्थित एक अहसास कि पूर्णता स्वाभाविक धर्म है - आंतरिक नैतिकता है। शोधक के भीतर की यह नैतिकता असंतुष्टि और अपराध-बोध पैदा करती है। ज्ञान का स्वाभाविक धर्म और परिणति है कि उससे प्राप्त होने वाला प्रकाश, शांति, आत्मचेतना, दृष्टि इत्यादि सर्वसुलभ हों। इस तरह शोधक का अपराध-बोध अपूर्णता और नैतिकता दोनों से जुडा है पर अपूर्णता का बोध अस्तित्ववादी नहीं है, न नैतिकता स्थूल नैतिकता है। यहाँ पूर्णता की कामना और आंतरिक नैतिकता के बीच असादृश्य नहीं है। ज्ञान की पूर्णता जनोपयोगी होने में है और यही ज्ञान की नैतिकता भी है - जन से जुडना।
इसके बाद सूर्य, चन्द्रमा और तारों का चित्र आता है। सूर्य चिंता उत्पन्न करके घायल करता है। यह जागृति का क्षण है, जब जगत् के अनुत्तरित प्रश्न शोधक को विकल करते हैं। रात को चाँद उन घावों पर मरहम लगाता है। यह एकांत का क्षण है, जब कुछ देर के लिए शांति मिलती है। जब चाँद नहीं होता, केवल सितारे होते हैं तो असंख्य गुत्थियों को केवल बुद्धि से सुलझाने का उपक्रम होता है (सितारे दशमलव बिंदुओं की तरह हैं, जिनके गणित का सामना करना एक युद्ध है।) अनुभव (सूर्य और चन्द्रमा से द्योतित) और बुद्धि (तारों के ’गणित‘ से द्योतित) का कर्म से संयोग न होने के कारण शोधक अपने ज्ञान को अपूर्ण मानता है। वह भाव, बद्धि और कर्म को समंजित करने हेतु किसी गुरु की खोज करता है। ऐसा गुरु नहीं मिलता और अपूर्णता-बोध की व्यथा शोधक के प्राण ले लेती है। (कर्म से समंजन करने का उद्देश्य ज्ञान से लोक को जोडना है।)
युग बदलता है। पूँजी और बाजार का युग आता है, जब धन मुख्य ध्येय हो जाता है। जिससे धनलाभ हो, वही कर्म करणीय रह गया है। यहाँ तक कि अंतःकरण पर भी धन छा गया है। शोधक का आत्म-संघर्ष तो था ही, अब बाहर से पूँजीवादी संस्कृति का दबाव पडता है। भीतरी और बाहरी दबावों के बीच पिसकर शोधक की मृत्यु हो जाती है।
ऐसा प्रतीत होता है कि वाचक/कवि के अनुसार इतिहास में एक समय आया था, जब संचित ज्ञान सम्पदा को समस्त मानव जाति के लिए उपयोगी बनाया जा सकता था। केवल एक मार्गदर्शक चाहिए था। सम्भवतः इशारा सांस्कृतिक पुनर्जागरण के बाद के यूरोप की ओर है। निकट का संदर्भ ढूँढें तो तुलसीदास जैसे कवि की ओर दृष्टि जाती है, जिन्होंने गूढ धर्म और दर्शन की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया। पूँजीवादी संस्कृति के आगमन से यह सम्भावना समाप्त हो गई। हमारा नायक अपने अपराध-बोध के ऊपर इस बाह्य सांस्कृतिक संकट का सामना करने को बाध्य हुआ और हार गया। द्रष्टा कवि सोचता है कि वह स्वयं उस काल में उपस्थित होता तो संचित मानवीय ज्ञान की धरोहर का ’हम सरीखे‘ लोगों के लिए उपयोग और महत्त्व व्याख्यायित करता।
रूपककथा में दो जगह शोधक की मृत्यु का उल्लेख आया है और दोनों के बीच में लगभग ३५ पंक्तियाँ हैं। सम्भव है नायक की मृत्यु को दो अलग संदर्भों में रखा गया हो, पहले उसकी एकांत बौद्धिकता के संदर्भ में और दूसरी बार बाह्य दबावों के संदर्भ में। पर यह भी हो सकता है कि प्रत्येक साधक और उसकी मृत्यु रूपककथा की अलग घटना हो। फंतासी का अवलंबन करके कवि स्थूल घटनाओं और कालक्रम के बंधनों से मुक्त रहता है।
कविता के इस अंश को ध्यान से पढें तो स्पष्ट हो जाएगा कि ’शोधक‘ पूर्णता और कृतकार्यता की खोज का रूपक है। इतिहास के भिन्न-भिन्न क्षणों में आंतरिक और बाह्य दबावों के कारण मानव जाति की ज्ञानसम्पद् कुछ लोगों के हाथ में रह गई। लोक से वह विमुख रही। अतः पूर्णता या परिणति से वंचित रही। शोधक की मृत्यु इस असफलता का रूपक है। ये दो चित्र देखिये*-
१. रवि निकलता
लाल चिंता की रुधिर-सरिता
प्रवाहित कर दिवालों पर;
उदित होकर चन्द्र
व्रण पर बाँध देता
श्वेत-धौली पट्टियाँ
उद्विग्न भालों पर।
सितारे आसमानी छोर तक फैले हुए
अनगिन दशमलव से
दशमलव गणित के सर्वतः
पसरे हुए उलझे गणित मैदान में
मारा गया, वह काम आया,
और वह पसरा पडा है...
वक्ष बाँहें खुली फैलीं
एक शोधक की।
(यह पूँजीवादी सभ्यता के पहले का दौर है। सूर्य और चन्द्रमा के बिम्ब अनुभव के बिम्ब हैं। शोधक के समक्ष अनेक अनसुलझे प्रश्न हैं, जिन्हें सूर्य का उदय मानो दृष्टिगोचर कराता है। चन्द्रमा उदय होता है तो शोधक को राहत मिलती है, अर्थात् अनुत्तरित प्रश्नों के प्रति भय के बजाय स्वीकार का भाव आता है। तारे बुद्धि और तर्क के प्रतीक हैं, जिनके माध्यम से शोधक उत्तर ढूँढता है। परन्तु अनुभव और बुद्धि पर्याप्त नहीं हैं। इनके साथ कर्म का योग हो तभी ज्ञान परिणति प्राप्त करेगा - ’’उस भाव-तर्क व कार्य-सामंजस्य-योजन-शोध में/सब पंडितों, सब चिंतकों के पास/वह गुरु प्राप्त करने के लिए/भटका!!‘‘ पर वह समायोजन न हो पाया और ज्ञान लोक से दूर रहा। ज्ञान को लोक से जोडने की कडी (कार्य) नहीं मिली। इस आत्मिक यंत्रणा से शोधक की मृत्यु हुई।)
२. किन्तु युग बदला व आया कीर्ति-व्यवसायी ...लाभकारी कार्य में से धन,
व धन से हृदय-मन
और, घन-अभिभूत अंतःकरण में से
सत्य की झाँईं
निरन्तर चिलचिलाती थी।
(यह पूँजीवादी सभ्यता का चित्र है। ज्ञान व्यवसाय का अंग हो गया। कीर्ति का अपने आप में कोई मूल्य नहीं रहा। व्यवसायी उससे जितना धनोपार्जन कर सके वही उसका मूल्य हो गया। यह बाहरी दबाव शोधक के ऊपर पहले नहीं था। पहले केवल ज्ञान को लोक से न जोड पाने का आंतरिक दबाव था, जो अब भी है। शोधक का काम अधिक कठिन हो गया है - ’’पिस गया वह भीतरी/औ‘ बाहरी दो कठिन पाटों बीच‘‘।)
अंत की पंक्तियों में कवि वर्तमान में लौट आता है, जब ब्रह्मराक्षस अपनी त्रासद गाथा ’पागल प्रतीकों‘ में कह रहा है। कवि की इच्छा है कि वह ब्रह्मराक्षस का सहानुभूतिशील शिष्य बने और उसका अधूरा कार्य - मानव जाति के ज्ञान की धरोहर को सर्वजन के जीवन का अंग बनाने का कार्य - पूरा करने का प्रयास करे।
प्रसंगतः
इस कविता के प्रकाशन के तीन-चार महीने पहले मुक्तिबोध की कहानी ’ब्रह्मराक्षस का शिष्य‘ प्रकाशित हुई थी। यह भी एक रूपककथात्मक फंतासी (एलिगॉरिकल फैंटेसी) है।
आलोचक, अनुवादक एवं विश्व साहित्य के गंभीर अध्येता शिवकिशोर तिवाडी भारतीय प्रशासनिक सेवा से भी जुडे रहे हैं।