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सृजन और भाषाबोध

ब्रजरतन जोशी
माइकल एन्जेलो (इतावली मूर्तिकार, चित्रकार, वास्तुकार और कवि) धरती के उन महान कलाकारों की श्रेणी में अग्रिम है जिन्हें उनकी कला के लिए दिव्य प्रतिभा का प्रतिनिधि माना गया। उनकी बनायी प्रतिमा डेविड को पुरुष सौन्दर्य की अप्रतिम अभिव्यक्ति के रूप में जाना जाता है। एक बार किसी ने एन्जेलो से डेविड के इस अद्भुत सौन्दर्य और कलाकर्म के बारे में जिज्ञासा प्रकट की तो एन्जेलो का उत्तर था - मैंने तो एक चट्टान का टुकडा लिया और उसमें से वह हिस्सा निकाल दिया जो डेविड नहीं था।
यह चट्टान में डेविड का होना और उसमें से शेष को छोडना ही सृजन का असली मार्ग है। यही सृजन का रहस्य भी है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि सृजन अस्तित्व के साथ एक लयात्मक संवाद है, जीवन उसमें एक सुन्दर धुन की तरह है। कई बार उस धुन की लय बिगड भी जाती है, पर उसका तात्पर्य यह नहीं है कि जीवन की कोई लय ही नहीं है।
प्रत्येक कलाकार इस आधारभूत शास्त्रीय मान्यता में विश्वास रखता है कि नवनवो भवति जायमानः अर्थात मनुष्य को प्रतिदिन नया होना चाहिए। यह जो नया होना है, वह ठीक उसी प्रकार से नया होना है जैसे आकाश में चन्द्रमा हर रोज नया उगता है। चन्द्रमा की यह यात्रा जिसमें वह रोज स्वयं में कुछ जोडता है और कुछ छोडता है, यही उसकी कला है। ठीक इसी प्रकार व्यक्ति वही होता है, पर अनुभव रोज नये-नये होते हैं। जीवन अनन्त अनुभवों के व्यापारों का केन्द्र है। असंख्य अनुभूतियाँ लहरों की तरह जीवन के इर्द-गिर्द प्रवाहमान है। इसी प्रवाह और असंख्य अनुभवों के बीच कुछ ऐसे पलों-क्षणों को पकडना, जो अपनी व्याप्ति में समूची मनुष्य जाति का पथ आलोकित कर सकते हैं, ही कलाकर्म है।
विनोबा भावे कहा करते थे कि हर नदी का स्वप्न सागर को खुद को सौंपना होता है। हर नदी यह चाहती है कि उसका अंतिम पडाव समुद्र हो, पर अपने इस स्वप्न के बावजूद वह अपने सामने आ रहे गड्डों को भरना नहीं छोडती, फिर चाहे वह समुद्र तक पहुँचे या ना पहुँचे। यानी लेखक के अन्तरतम में बहती रचनाशीलता का प्रभाव अस्तित्व के सभी आयामों को पाने-छूने की अनथक कोशिश करता है। चाहे वह आयाम छोटा हो या बडा। रचनाशीलता के प्रवाह में सब कुछ आ जाता है। जो रचनाकार इस प्रक्रिया को जितनी तन्मयता, सजगता और सघुराई से सम्पन्न करता है, वह अपनी विधा के विकास में उतनी ही बडी भूमिका निभाता है।
लेकिन इस प्रक्रिया में एक समस्या का सामना हर कलाकार को करना पडता है, वह है जीवन की निरन्तरता। हम जानते हैं कि जीवन निरन्तर अपने आप को दुहराने की प्रक्रिया है। यह दोहराव हर व्यक्ति से लेकर कलाकार तक महसूस करता है। इसीलिए हम इस दोहराव को अलग-अलग नाम-रूपों से जानते-पहचानते हैं। क्या इन अर्थों में शब्द का प्रयोग दुहराव का ही एक रूप भर नहीं है?क्या वह हमारे परिचित अनुभव का संकेत नहीं है?यानी यहाँ चुनौती है। चुनौती यह है कि कवि को अपनी भाषा के उन्हीं शब्दों का, जो उस दोहराव के विभिन्न रूप हैं, का अन्वेषण करना है। अतः जो कलाकार/कवि अपने माध्यम का जितना अन्वेषण और नवीन संस्कार कर पाता है, वह उतनी ही उच्च कोटि का कलाकार/कवि है।
विपिन कुमार अग्रवाल ने इस संकट की ओर हमारा ध्यान खींचा और लिखा- क्योंकि शब्द जिन्दगी के साथ गड्डमड्ड होकर उसको मिले हैं, उसी में से वे सारे शब्द पैदा हुए हैं। तब कैसे शब्दों के द्वारा वह जिन्दगी को देखें? या यूं कहें, शब्दों और जिन्दगी या अनुभवों का जो मिला हुआ गड्डमड्ड है, उसको शब्दों में कैसे देखें। यहीं पर कह सकते हैं कि कवि के लिए कठिनाई पैदा होती है। वह शब्द को चुनता है और चुन करके जो गड्डमड्ड है उसमें से उसे भिन्न करके, अलग करके रखता है। जब वह रखता है, तब अनुभव के किसी एक हिस्से को उजागर करता है। जो स्वाभाविक भी है और पूरे गड्डमगड्ड को लेकर चल रहा था। इसका तात्पर्य हुआ कि अनुभव के अस्पर्शी, अलक्षित और अदीठ से जो अभिव्यक्ति मिलती है, वही उसकी कला है। वही हमारे जीवन को आलोकित भी करती है। यही प्रक्रिया इसी जाने-पहचाने संसार का वह रूप हमारे सामने उजागर करती है, जो अब तक हमारे ध्यान के परिसर का हिस्सा नहीं था। जिसे पहले ऐसे और इस तरह से देखा नहीं गया था। यह प्रक्रिया कला विवेक के कारण घटती है।
कला विवेक की यह निर्मिति भाषाबोध पर निर्भर करती है। किसी भी कलाकार का भाषाबोध जितना गहरा और संवेदनशील होगा, उसका अपनी भाषा और संवेदना के साथ उतना ही परिपक्व एवं सर्जनात्मक रिश्ता होगा। इसी सर्जनात्मक रिश्ते के चलते ही वह भाषा के माध्यम से संवदेनात्मक अन्वेषण करता है। वह अपनी अभिव्यक्ति में लय की टूटन तभी महसूस करेगा जब वह अपने अनुभव की अनुभूति में से कुछ छोड देगा या उससे कुछ छूट जाएगा।
साहित्यकार का कला विवेक उसे शब्दों को परस्पर रखने और उनसे नवीन अर्थमयी व्यंजना प्राप्त करने की राह सुझाता है। प्रसिद्ध आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी ने इस हेतु काव्य रचना के सन्दर्भ से एक बहत ही सुन्दर उदाहरण हमारे सामने रखा है। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने दुःख और दुख के उदाहरण से इसे और अधिक स्पष्ट तरीके से हमारे सामने रखा है। बकौल चतुर्वेदी निराला ने लिखा दुख ही जीवन की कथा रही और अज्ञेय ने लिखा है दुःख सबको माँजता है। दोनों ने एक ही शब्द के दो भिन्न रूप अपनी कविता में प्रयोग किए। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि कैसे दोनों अपने-अपने प्रयोग से अर्थ का वह आलोक, जो उसी परिवेश में व्याप्त है, को व्यक्त करते हैं।
अज्ञेय तत्सम दुःख को तद्भव क्रिया माँजना के साथ रख रहे हैं, वहीं निराला तद्भव दुख को (यहाँ दुख दुःख की तुलना में तद्भव है) तत्सम कथा के साथ रख रहे हैं। यह जो तत्सम के सामने तद्भव और तद्भव के सामने तत्सम रखना है वही काव्य विवेक या काव्य संस्कार है। क्योंकि वही अर्थ में व्याप्त अनुभव की प्रामाणिकता को अधिक विश्वसनीय बना रहा है। यानी पहले कवि स्वयं इस प्रक्रिया से गुजरता है और नवीन भावबोध ग्रहण करता है। और फिर भावक भी इस प्रक्रिया से गुजरते हुए अपना नवीन भावबोध ग्रहण करता है।
इसी क्रम में एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह भी है जिसकी तरफ हमारा ध्यान अक्सर बहुत कम जाता है। हम प्रायः भाषा के बारे में बात करते हुए कहते हैं ंकि हम भाषा का इस्तेमाल करते हैं। परन्तु ऐसा कहते समय हम यह समझने की चूक कर रहे होते हैं कि भाषा अपने आप में एक विराट विश्व है और हम भली-भाँति जानते हैं कि विश्व का इस्तेमाल नहीं हो सकता वरन् इस विराट विश्व को या तो स्वयं के अनुकूल बनाया या हुआ अथवा प्राप्त किया जा सकता है। यानी हम जो कुछ भी है, वह भाषा ही तो है। हमारा सोचना, विचारना और समझना सब कुछ भाषा में ही सम्भव और सम्पन्न होता है।
अक्सर कहा जाता है कि साहित्य में प्रगल्भ वाचालता का वर्चस्व बढता ही जा रहा है। हम यह भी सुनते रहते हैं कि आज की कविताएँ बोलती तो बहुत है, पर कहती कुछ नहीं। यह जो बोलने और कहने के बीच का फर्क है वह सृजन और भाषा बोध की प्रक्रिया का ही परिणाम है। कविता या श्रेष्ठ साहित्य किसी इतर लोक की भाषा में जन्म नहीं लेता वरन् वह हमारी दैनिक जीवन की भाषा से ही उपजता है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि ये जो दैनिक भाषा है उसे कवि या साहित्यकार सृजन प्रक्रिया के दौरान संस्कारित करता है। इस सर्जनात्मक प्रक्रिया के दौरान वह शब्दों के परस्पर तनाव, टकराहट, द्वंद्व से अपनी अभिव्यक्ति को आकार देता है। इसी तनाव, द्वंद्व और टकराहट से हमें नित नूतन अनुभव प्राप्त होते रहते हैं। कईं बार हमारे मन में यह प्रश्न उठता है कि एक ही अनुभव को दो भिन्न कलाकार किस तरह अपनी-अपनी तरह से व्यक्त करते हैं?उत्तर साफ है कि दोनों की संवेदनात्मक अन्वेषण की प्रक्रिया और उसके पडाव अलग-अलग होते है, इसलिए उसकी अभिव्यक्ति भी अलग-अलग होती है। जो कलाकार अपने को अपने ही मुहावरे से मुक्त कर के नित्य नये अनुभव संसार की खोज करता है वह अपनी भाषा के विकास में उतनी ही अहम भूमिका निभाता है और अभिव्यक्ति के नए द्वार भी खोलता है। क्योंकि इसी प्रक्रिया से अस्तित्व के विविध आयामों के साथ जीवन का रिश्ता मजबूत होता जाता है।
इस बीच एक सुखद निर्णय यह हुआ है कि राज्य सरकार ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की १५०व जयंति वर्ष पर्यन्त मनाने का स्वागत योग्य निर्णय लिया है। गाँधी हिन्दुस्तान के मन, आत्मा और हृदय को एक साथ जानने वाले मतिधीरों में अग्रणी रहे हैं। यह हमारे लिए सौभाग्य का विषय है कि हमारे समय के वरिष्ठ गाँधीवादी विचारक और प्रख्यात इतिहासकार सुधीरचन्द्र ने हमारे आग्रह का मान रखते हुए एक विचारोत्तेजक लेख गाँधी ः किसके राष्ट्रपिता ? इस अंक हेतु लिखा है। इस अंक में आपको एक साथ प्रेमचन्द, नामवर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ सिंह जैसे दिग्गज हिन्दी मूर्धन्यों पर विश्लेषणात्मक सामग्री मिलेगी। इस बार का संस्मरण हिन्दी में अपनी तरह के कथाकार शैलेश मटियानी पर है। हम आभारी हैं वरिष्ठ गद्यकार प्रकाश मनु के जिन्होंने याद आते हैं मटियानी संस्मरण में जैसे खुद को निचोड ही दिया है।
वरिष्ठ साहित्यकार हेतु भरद्वाज और प्रो.नवलकिशोर के विश्लेषणात्मक लेखों के साथ प्रख्यात कवि शिवराज छंगाणी, गोविन्द माथुर और अरुणदेव की कविताई भी आपको रससिक्त करेगी।
आशा है आपको यह सामग्री रूचिकर लगेगी। शुभकामनाओं के साथ