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चार लघुकथाएँ

छगनलाल व्यास
छगनलाल व्यास
चार लघुकथाऐ
;१द्ध
समझदारी
एक कुाा भूलवश दूसरी गली में प्रवेश कर गया। अनजान कुो को
देखते ही गली के कुो की नाक भौंह चढ गई। उसने कारण पूछा...।
उसे वहीं रोकने का साहस किया लेकिन सामने वाला बलशाली था,
बढे जा रहा था। तब गली वाले ने साथियों को सतर्क किया, पलभर
में सभी इसके इर्द-गिर्द थे।

फिर क्या! बाहरी कुो के पैर कोपने लगे। उसने दुम दबाकर गलती
मानी। ’सॉरी‘ महसूस किया। अब कभी इस क्षेत्र में न आने की कसम
खाई।
सभी कुाों ने माफ करते हुए उसके इर्द-गिर्द रहते-रहते उसे ट्टाीरे से
गली से बाहर किया। गली के बाहर निकलते ही उसकी सोस में सोस
आई। वह सिर पर पैर रखकर भाग रहा था।
;२द्ध
अपना-पराया
घर में सब अपने लगते हैं। भाई-बहिन, माता-पिता, छोटे-बडे, यहो
तक कि कुो व बिल्ली भी। कहीं किसी को तनिक भय नहीं...। कहीं
कोई वस्तु पडी है तब भी चिन्ता नहीं। कुछ उठा लिया गया तब
खोजबीन नहीं। यह है अपनापन।
यहो कुाा भी किसी खाने की चीज को छूता तक नहीं और बिल्ली पर
वार! नहीं, कतई नहीं। दोनों संग-संग खेलते-कूदते हैं। प्रेम की अमूल
निट्टिा...घर... अपनापन।
लेकिन ज्योंही घर से बाहर कदम रखा... सभी सतर्क। न जाने कब
कोई आफत गले पड जाए... कोई वार कर दे ...जेबकतरा जेब काट दे
या कोई बदसूलकी कर बैठे...। यहो तक कि कुो-बिल्ली भी फक-फक
कर पैर रख रहे हैं। बाहरी कुो की तिरछी ओखें बिल्ली पर है एवं

बाहरी कुाा घर के कुो पर वार करने को उतावला हो रहा है। यहो सब
पराये।
यह अपना-पराया भेद न जाने कब तक चलता रहेगा।
;३द्ध
भ्रम
उसने जिस दिन से सुना कि विमला दीदी के घर में कछुए के आने
के बाद बच्चों की प्रगति हुई है एवं खुश्यिों में नित-नई बढोतरी हो
रही है, उसी दिन से कछुए की ’चाह‘ बढ रही है।
एक दिन वह अपने पुत्र के साथ बाइक पर जा रही थी और बीच
सडक कछुआ अपनी ट्टाीमी चाल से चलता नजर आया, तब क्या
कहना! उसके मन की मुराद पूरी होते देख बच्चे से बाईक रोकने को
कहा और कछुए को ऐसे उठाया मानो लावारिस बच्चे को। उसे
सहलाते हुए स्वयं की गोदी में रख, पल्लू से ढेका। कहीं नजर न
लगे। सर्दी न लगे।
बेटा, मो के कार्य से आश्चर्यचकित था, क्योंकि उसे ज्ञात था कि ’यह
जीव-जन्तु अत्याचार की श्रेणी में आता है‘। अतः किसी को भनक
लग गई, तब लेने के देने पड सकते हैं।
उट्टार मो कह रही थी, ’मैं लम्बे समय से जिसके इंतजार में थी, वह
राह चलते मिल गया। बेटा! घर में कछुआ रखना समृ= का प्रतीक
होता है।‘

बेटे रूधक्ष ने मोटरसाइकिल की गति तेज की और घर पहचे।
घर पहचते ही मो ने उसे स्वच्छ जल से नहलाया, कुमकुम, मोली,
चावल से उसकी पूजा-अर्चना की और नये टब में पानी भर छोडा। इस
कार्य को आर्यन, शिक्षा, पूर्वी, डिम्पी एक नजर से देख रहे थे। वहीं
चुन्नू-मुन्नू और वैभव उसके खाने हेतु ककडी-घास टब में सतत्
डालते हुए उसे खाने का कह रहे थे, ’खा..., भूख लगी है? खा...।‘
मो कछुए हेतु रात-रात जागने लगी, जैसे संतान हेतु।
दो-तीन दिन में पडोसन प्रतिभा आई और कछुए को देख उसकी
सुन्दरता, समझदारी की प्रशंसा करते हुए बोली, ’एक बात कह?...
यदि बुरा न माने तब...।‘
स्त्री में बात सुनने की आतुरता अट्टिाक होती है, अतः बोली ’...क्या
?‘
’इसके साथ मादा कछुआ भी रखा जाये, तब दोनों हेसे-खेलें, सुख-दुःख
बोटे एवं प्रसन्नचिा रहने पर हमें भी प्रसन्नता दे। आप स्वयं सोचिए
जब निर्जीव भी साथ-साथ रहकर खुश रहते हैं, यथा - चकला-बेलन,
टायर-ट्यूब। तब ये तो बिना जोडे कितने ओसू बहाता होगा।‘
मो को बात लगी... वह मादा कछुए का बेसब्री से इंतजार करने लगी।
पति से मोग करने लगी। वहीं सोचती, ये सब बातें केवल ’भ्रम‘ तो
नहीं...।
;४द्ध

परोपकार
उसने न जाने कहो से सुना था शब्द, ’परोपकार‘ और उसका अर्थ
जाना था, दूसरों की भलाई। जब से यह शब्द सीखा है, उसे गले से
लगाये रखा। यही कारण है कि राह चलते कोई कोटा, पत्थर दिखा
कि वाहन रोक कर भी उसे एक तरफ कर ही आगे बढता है।
मित्र ने पूछा कि ’आज किया कोई परोपकार का कार्य?‘
उसी समय सामने व्यर्थ में बह रहे पानी को देख दौडते हुए नल तक
पहचकर पानी की टोंटी को बंद करके प्रसन्नचिा हो बोला, ’यह हुआ
आज का कार्य‘।
मित्र भी तब तक किसी के घर के बाहर लग रही बाी बुझाने हेतु
मकान मालिक से निवेदन कर रहा था।