fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

प्रवासी कथा साहित्य के संदर्भ में स्त्री

(विशेष संदर्भ - अमेरिकी कहानियाँ )
अलका
न्नवासी कथा साहित्य के संदर्भ में स्त्री
;विशेष संदर्भ - अमेरिकी कहानियोद्ध
स्त्री मानवता का आट्टाा हिस्सा है पर फिर भी स्त्री को समाज में वह स्थान नहीं मिला है, जो मिलना चाहिए। आज महिला हर क्षेत्र में बढ रही है, पर फिर भी उसकी स्थिति अभी भी उतनी बेहतर नहीं है कि कहा जा सके कि जो स्वतंत्रता और अट्टिाकार उसे मिलने थे, वे उसे मिल चुके हैं। भारत ही नहीं भारत से बाहर भी महिलाओं की स्थिति में अभी थोडा-सा सुट्टाार हुआ है। आज के दौर में स्त्री के संदर्भ में काफी कुछ साहित्य में लिखा जा रहा है। स्वयं स्त्री भी अपनी स्थिति व संवेदनाओं को साहित्य के माट्टयम से व्यक्त कर रही हैं। हिन्दी का साहित्य भारत में ही नहीं भारत से बाहर भी लिखा जा रहा है, जिसे प्रवासी हिन्दी साहित्य की संज्ञा दी गई है। प्रवासी लेखिकाओं की कलम भी स्त्री के मुड्ढे पर काफी मुखर हो उठती है, क्योंकि उन्होंने भारत व विदेश में महिलाओं की स्थिति को काफी पास से देखा है। विदेश की संस्कृति में रहकर वे सीखती हैं कि किस तरह से भारत में संस्कारों के नाम पर महिलाओं को दब कर रहना सिखाया जाता है। आज की नारी का सारा असंतोष इसी बात के लिए है कि क्यों उन्हें उन अट्टिाकारों से वंचित किया गया है, जिन पर पुरुषों का अट्टिाकार है। मनुष्य के रूप में प्रकृति द्वारा प्रदा अट्टिाकारों में भी पुरुषों का वर्चस्व है, क्योंकि स्त्री को पुरुषों के समान अट्टिाकार नहीं है। इस मुड्ढे पर दुनिया के सभी बु=जीवी एकत्र होते हैं और उस पर अपने मत व्यक्त करते हैं। पर आज तक भी कोई सटीक हल नहीं निकाल पाए हैं, क्योंकि इस बु=जीवी वर्ग में वर्चस्व पुरुषों का है, जो कैसे भी करके अपने वर्चस्व को बचाने में हमेशा कामयाब होते हैं और यह इसलिए भी होता है क्योंकि हमारे समाज में पुरुष साा का वर्चस्व है। यह वर्ग स्त्री को उतनी ही स्वतंत्रता व अट्टिाकार देता है, जितने से वह उसके अट्टाीन बनी रहे। क्योंकि शोषणकर्ता का अस्तित्व शोषित के अस्तित्व से जुडा है। अगर शोषित वर्ग होगा ही नहीं तो शोषणकाार् का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
१९४९ में सिमोन द बोउवार ने जीम ैमबवदक ैमग के माट्टयम से पहली बार स्त्री की स्वतंत्रता के पक्ष को उठाया, जिसमें उन्होंने समाज के सााट्टाीशों पर यह आक्षेप लगाया कि स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि उसे एक सुनियोजित षड्यंत्र के द्वारा बनाया जाता है। उस पर विभिन्न तरीके के पहरे, पाबन्दियो लगाकर पुरुष से अलग व कमजोर कर दिया जाता है। स्त्री को स्वयं ही अपने अट्टिाकारों के लिए लडना होगा और अपने अट्टिाकारों को प्राप्त भी करना होगा। प्रभा खेतान कहती है कि ’’स्त्री न गुलाम रहना चाहती है न ही पुरुष को गुलाम बनाना चाहती है। स्त्री चाहती है मानवीय अट्टिाकार।‘‘१ बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में चला स्त्री विमर्श साहित्य में स्त्री की इन्हीं संवेनाओं, पीडा को व्यक्त करता है। डॉ. ललिता एन. राठौड के अनुसार, ’’स्त्री द्वारा किया गया संघर्ष और उसकी अभिव्यक्ति ही स्त्री विमर्श है।‘‘२ प्रवासी महिला लेखिकाओं ने स्त्री विमर्श में मुख्य रूप से संवेदनाओं और पीडा को स्थान दिया है, जब वे स्त्री के पक्ष में अपनी राय बनाती है तो उनके दिमाग म भारतीय व विदेशी परिप्रेक्ष्य दोनों होते हैं। उन्होंने दोनों समाजों में एक लम्बा समय बिताया है, जिससे वे भारतीय समाज की बुराई-अच्छाई व विदेशी समाज की स्वच्छन्दता दोनों को समझती हैं और इन्हीं को विषय बनाकर अपना साहित्य रचती है। अनिल प्रभा कुमार, देवी नागरानी हो या सुट्टाा ओम ढींगरा या रेण गुप्ता राजवंशी या सुषमा बेदी सभी प्रवासी लेखिकाऐ हैं। इनकी कहानियों में स्त्री को कहो-कहो बेडयों में जकडा गया है, इसके सहज ही दर्शन हो जाते हैं।
अनिल प्रभा कुमार अपनी कहानी ’बहता पानी‘ में नायिका के मन की पीडा को व्यक्त करती है, जिसे उसके अपने मायके में ही मेहमान बना दिया जाता है। जिस घर में लडकी अपने जीवन का एक लम्बा वक्त बिताती हैऋ पैदा होती है, खेलती है, सभी संस्कार सीखती है, वही घर शादी के बाद उसका अपना नहीं रह जाता। उसे वहो पर कोई अट्टिाकार नहीं मिलते और अगर मिल जाए तो भाई-भाभी ही उसके दुश्मन हो जाते हैं। ’बेघर सच‘ में भी सुट्टाा ओम ढींगरा ने इसी पीडा का वर्णन किया है, जिसमें रंजना को बचपन से ही यह अहसास दिलाया जाता है कि यह उसका घर नहीं है, बल्कि शादी के बाद उसके पति का घर उसका अपना घर होगा। मायका कभी लडकी का स्थाई घर नहीं हो सकता। यही सीख घर की बूढी औरतें हमेशा से छोटी बच्चियों को देती आई हैं। ’और मैं बडी हो गई‘ में देवी नागरानी भी मिनी को उसकी मो के माट्टयम से यही बताना चाहती है कि वह चाहती है, जल्दी से उसकी शादी कर दे ताकि वह इस घर के नरक से दूर हो जाए, जहो उसका बाप ही दुश्मन बना बैठा है।
पर यह कितना सच है कि ससुराल लडकी का स्थाई घर साबित होगा या नहीं, क्योंकि अक्सर देखने में यही आता है कि लडकी का कोई घर नहीं होता है। वह अपनी जी-जान से ससुराल को सजाती है और वहीं उसे यह कहकर प्रताडत किया जाता है कि यह घर उसका नहीं है। ’बेघर सच‘ की नायिका रंजना को उसका पति अपने शक के चलते घर से बाहर निकाल देता है। रंजना इस बात को सोचती है कि बचपन में दादी उसे यही सिखाती आई थी कि पति का घर उसका अपना घर होगा। पर अब तो पति भी यह कह रहा है कि यह घर उसका नहीं मेरा है तो वह अब कहो जाए, कौन सा घर उसका होगा।
’तुम्हारी आइशा‘ कहानी में सुदर्शन प्रियदर्शनी भी इसी मुड्ढे को उठाती है, आइशा के माट्टयम से। पुरुष हमेशा से ही स्त्री को दबाता आया है, चाहे वह मो के रूप में हो या पत्नी, बहन या बेटी। वह कभी नहीं चाहता कि वह अपना विकास कर सके। आइशा को भी उसका पति नौकरानी के रूप में रखना चाहता है, पर आइशा विधेह करती है और नतीजा वही निकलता है कि घर मेरा है तुम्हारा नहीं।
आट्टाुनिक दौर में जहो कुछ लोग अभी भी पुरानी रूढयों को ढो रहे हैं, वहीं महिलाऐ उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद स्वावलम्बी बन रही है। पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में आकर स्वच्छन्दता पूर्वक जीवन जीने का विकल्प उनके सामने खुला है, वे आत्मनिर्भर हैं और अपना जीवन वे आसानी से जी सकती हैं। विदेश में रहकर उनमें और आत्मनिर्भरता आई है। ’बेघर सच‘ की रंजना हो या ’तुम्हारी आइशा‘ की आइशा या फिर ’तलाश‘ कहानी की बेबी सभी विदेश में रहकर आत्मनिर्भर है या फिर विदेश की संस्कृति उन्हें इसके मौके हमेशा देती रहती है कि वे आत्मनिर्भर बन सकें। ’बेघर सच‘ की रंजना को जब उसका पति उसके स्वाभिमान पर चोट करता है तो वह उसके घर को तुरन्त छोड दती है। ’’मकान में वह घूम रही है, अब वह घर बन जायेगा। उसका अपना घर, जिसमें वह अपने अस्तित्व, व्यक्तित्व, अस्मिता और होंद के साथ एक इंसान के रूप में रहेगी।‘‘३
तुम्हारी आइशा की आइशा भी कुछ इसी तरह का पात्र है जो अपने पति के द्वारा किये गये अत्याचारों को न सह पाने पर विरोट्टा करने का साहस जुटा ही लेती है। वह स्वयं कहती है, ’’यहो बाहर वाली और घर वाली में फरक रखते हैं। हिन्दुस्तानी लडके मो-बाप को खुश करने के लिए हिन्दुस्तानी नौकरानी रख लेते हैं, पर हर हिन्दुस्तानी लडकी की तरह दो पाटों के बीच पिसने वाला ट्टाान मैं नहीं बन सकी।‘‘४
आइशा तलाक लेकर सेटलमेंट में घर प्राप्त करती है, वह अपनी बेटी को बताती है कि ’’पैसे का कोई नैतिक मूल्य हो या न हो जैनी! पर व्यावहारिक शक्ति का भण्डार निहित है इसमें। इस शक्ति पर आप सोस ले सकते हैं, बडे हो सकते हैं, अपनी कीमत अेकवा सकते हैं। वही मैंने किया।‘‘५ आइशा अपने पहले पति को छोडकर अमेरिकन स्कॉट से शादी कर लेती है और स्वतंत्रता के साथ जीवन जीती है और अपनी बेटी जैनी को भी इसी बात की शिक्षा देती है।
तलाश कहानी की बेबी भी भारत से विदेश आकर बस जाती है और वापस नहीं लौटना चाहती, क्योंकि यहो पर उसे मुक्त जीवन का अहसास होता है। वह भारतीय संस्कारों को गले की फोस समझने लगती है और वापस भारत नहीं लौटना चाहती। ’’मट्टयमवर्गीय परिवार के नैतिक अनुशासन की कडयों में बेट्टाी बेबी यूरोप के इस शहर में पहच कर सहसा अपने आपको आजाद परिन्दे जैसा महसूस करने लगी है। वह कहीं भी जा सकती है, कुछ भी पहन सकती है, किसी के साथ भी घूम सकती है। यहो कोई कुछ कहने वाला नहीं है।‘‘६ बेबी स्वच्छन्द जीवन चाहती है, जो विदेश में सम्भव है। पर उसकी बहन उसे यह समझाने का प्रयत्न करती है कि इस तरह से जीवन नहीं जिया जा सकता है।
प्रवास की पृष्ठभूमि में लिखी गई कहानियों में जहो एक ओर स्त्री को स्वतंत्र और आर्थिक रूप से निर्भर दिखाने की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर यह स्वतंत्रता कब स्वच्छन्दता और भारतीय संस्कारों व नैतिकता के तिरस्कार में बदल जाती है, यह पता भी नहीं चलता। भारतीय पुरुष विदेश में जाकर अपने लिए बहुत अट्टिाक छूट पा जाते हैं और अपनी पत्नी पर अनावश्यक ट्टाौंस जमाने का प्रयत्न करने लगते हैं। विदेश में अगर पुरुषों को छूट मिलती है तो महिलाऐ भी अपने अट्टिाकारों के प्रति जाग्रत होती हैं और अपने आपको आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास जारी रखती हैं। आइशा, रंजना दोनों किसी न किसी रूप में पति या परिवार से प्रताडत होकर स्वयं के लिए आत्मनिर्भरता व अलग से राह बताने का मार्ग चुनती है, क्योंकि विदेश में किसी महिला को अकेले रहने पर या पति से अलग हो जाने पर हीनदृष्टि से नहीं देखा जाता। इसी कारण से वे अपना नया जीवन सुविट्टाा व सरलता से जी पाती हैं।
हननीय व तलाश कहानी भारतीय संस्कारों के तिरस्कार की हातनी है। इसमें सोची व बेबी जैसे चरित्र भारतीय संस्कारों की अवहेलना करके स्वच्छन्द जीवन की चाह में है। हननीय की सोची अपने अजन्मे बच्चे का गर्भपात करवा देती है, क्योंकि वह बच्चा उसकी आर्थिक निर्भरता में बाट्टाक या सोची को उस अजन्मे बच्चे से नाममात्र का मोह नहीं था, बस वह उससे छुटकारा पाना चाहती थी। वहीं तलाश की बेबी भी विदेश के मुक्त माहौल को देखकर वापस भारत नहीं जाना चाहती, क्योंकि वहो उसे माता-पिता और अन्य लोगों के अनुसार जीवन जीना पडता है। विदेश में वह जिसके साथ रहना चाहे रह सकती है, कोई टोकने वाला नहीं है। ’’बेबी बात तो सिर्फ अकेले की ही करती है, लेकिन ये बिल्लू जान, पिलात और हमीद अपने आप ही उसके भीतरी अर्थ से सिमट आते हैं, अकेले नहीं, बेबी मुक्त और स्वतंत्र रहना चाहती है और वीणा समझ नहीं पाती उसे रोके या जाने दे।‘‘७
प्रवासी लखिकाओं ने अपनी कहानी में स्त्री के रूप को स्वतंत्र, आत्मनिर्भर, मुक्त, स्वच्छन्द, सभी रूपों को दिखाने का प्रयास किया है परन्तु सबसे ज्यादा सफल रूप में वे आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से सुदृढ रूप को ही दिखा पाई हैं, क्योंकि अट्टिाक स्वच्छन्द या मुक्त यौन सम्बन्ट्टाों को उन्होंने अट्टिाक दिखाने का प्रयास नहीं किया है। वे संकेत रूप में अपनी बात पूरी कर देती हैं। भाव व विचारों को अत्यट्टिाक स्थान उनकी कहानियों में मिला है। वे भारतीय मूल्यों की तुलना विदेशी मूल्यों से करती ह। भारतीय रूढवादी सोच का विरोट्टा करती है, स्त्री अगर आत्मनिर्भर हो तो वह जीवन में बिना पुरुष के भी रह सकती है, अपना विकास कर सकती है। इन लेखिकाओं ने अपनी कहानियों में स्त्री के लिए एक स्वयं के घर को सोच प्रदान करते हुए उसे रंजना व आइशा के माट्टयम से साकार होते हुए भी दिखाया है। प्रवासी कहानियो स्त्री स्वातंत्र्य की कथा है और प्रवास मं रहते हुए इन लेखिकाओं ने भारतीय संस्कारों को बहुत ही गहराई से समझा व रूढवादी सोच को भी पाठकों के सामने रखा है। यह कहने में संकोच नहीं है कि ये कहानियो अपने विषय के साथ न्याय करती हैं और कहीं भी आक्षेपित और बोझिल महसूस नहीं कराती हैं।
संदर्भ ः
१. हंस ः दिसम्बर, १९९६, पृ. ३१
२. आट्टाुनिकता ः स्त्री विमर्श - डॉ. ललिता एन. राठौड, पृ. १४
३. इतर - सम्पादक सुट्टाा ओम ढींगरा, पृ. ८८
४. हिन्दी प्रवासी साहित्य ः सम्पादक - कमल किशोर गोयनका, पृ. ८१
५. हिन्दी प्रवासी साहित्य ः सम्पादक - कमल किशोर गोयनका, पृ. ८३
६. हिन्दी प्रवासी साहित्य ः सम्पादक - कमल किशोर गोयनका, पृ. १०५
७. हिन्दी प्रवासी साहित्य ः सम्पादक - कमल किशोर गोयनका, पृ. १०८-१९८